इतना बड़ा कुआं नहीं देखा होगा आपने! बनाकर चर्चित किसान हुआ खुशहाल-मालामाल

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मारुति बाजगुड़े जो अपने कुएं के आकार के कारण हो गए मशहूर

देश में जल संकट की विकराल स्थिति का सामना करने की खबरें आती हैें, उनमें महाराष्ट्र के जिलों के नाम शामिल हैंं। खासकर, बीड, लातूर, उस्मानाबाद के दूरस्थ से लेकर शहरी इलाकों तक में, गरमी के अलावा इतर समय में भी पानी के लिए लोगों, किसानों, खेत, खलिहानों को तरसते देखा गया है।

सुकून भरी खबर

यहां महाराष्ट्र के बीड ज़िले के पाडलशिंगी रहवासी मारुति बाजगुडे अपने कुएं के आकार के लिए खासे मशहूर हो गए हैं। न केवल बाजगुड़े, बल्कि उनका गांव भी विशालकाय कुएं के कारण अनोखे अचरजों की फेहरिस्त में आ गया है।

आलम यह है कि कुएं  के आकार और उससे मिलने वाले किसानी लाभ की हकीकत जानने दूसरे राज्यों के लोगों के साध, विदेशी भी उनके कुएं का पानी पीने पहुंच जाते हैं। बाजगुड़े के अनुसार कुएं के कारण उनको खेती में काफी मदद मिली है।

इनके खेत के लिए पानी की जरूरत होती है। गर्मी के दिनों में पूरा बीड जिला ही पीने के पानी के लिए जूझता है तो ऐसे में खेतों में सिंचाई की पूर्ति के लिए उपलब्धता बेमानी है। इस सुरसा जैसी समस्या के समाधान के लिए बाजगुडे ने छोटे मोटे कुएं के बजाए इतना बड़ा कुआं खुदवा डाला, जो चर्चा का केंद्र बन चुका है। वो चाहते थे कि कुआं इतना बड़ा हो जो उन्हें साल भर जलापूर्ति कर सके।

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आश्चर्यों से लबरेज कुआं !

कुआं कुल 12.5 एकड़ जमीन पर बनाया गया है! इस कुएं का डाइमीटर 202 फीट है, यह 41 फीट गहरा है और इसमें 10 करोड़ लीटर पानी समा सकता है।

कभी पानी की आपूर्ति के लिए चिंतित रहने वाले बाजगुडे इस समस्या के समाधान आश्चर्यों की इस कुंड़ी के कारण अब आश्वस्त नजर आते हैं। माना जा सकता है कि उनके कुएं में इतना पानी है कि आगामी दो से 3 सालों में सूखा जैसी स्थिति निर्मित होने पर भी उनको पानी मिलता रहेगा।

कुआं खोदने में निकली मिट्टी का उपयोग

जब इतना बड़ा कुआं बनाने का फैसला किया तो समस्या यह थी कि जमीन खोदने से निकलने वाले अवशेष का कैसे उचित प्रबंधन हो। इसके लिए पथरीले अनुपयोगी अवशेषों को पास में बनने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग तक पहुंचाया गया। उपजाऊ मिट्टी को खेतों में उपयोग में ले लिया गया। लाल मिट्टी, काले बड़े पत्थर और मुरुम को उन्होंने सड़क निर्माता आरआरबी को दे दिया। कुछ का सदुपयोग स्वयं के कुएं का बेसमेंट बनाने में किया गया।

इतनी मशीनों का रोल

कुआं खोदने में तीन पोकलेन मशीन (Poclain), जबकि 10 हाइवा की जरूरत पड़ी। जब यह दुरुह संकल्प अपना प्रथम चरण पूरा कर रहा था, तब लोग आकर उनसे पूछते थे कि आखिर उनकी जमीन पर क्या काम हो रहा है और क्यों। लेकिन संकल्प के आकार लेने के बाद अब लोगों के सवालों का साक्षात जवाब जब सामने पानी से लबालब भरा नजर आता है, तो वे कुआं निर्माता बीड ज़िले के पाडलशिंगी रहवासी मारुति बाजगुडे की सोच और हौसले को दाद देना नहीं भूलते।

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जमापूंजी के साथ धर्मपत्नी के गहने

बाजगुडे के मुताबिक इस विशालकाय कुएं को बनाने के लिए उन्हें सवा करोड़ रुपयों का खर्च आया। इस कुएं को बनाने के लिए जरूरी राशि का प्रबंध उन्होंने उनके स्वयं के पांडाल व्यवसाय के साथ ही राजमार्ग भूमि अधिग्रहण मुआवजे में मिली रााशि से किया।

खुद की जमापूंजी इस सपने को पूरा करने में लगाने के बाद धन की कमी पड़ने पर बाजगुडे ने अपनी पत्नी के गहने तक पानी से कलकल करते सपने को पूरा करने दांव पर लगा दिए। बाजगुडे के मुताबिक उनकी पत्नी हालांकि उनसे नाराज हैं कि उन्होंने इस कुएं के लिए उनके गहनों को क्यों बेच दिया।

बीड की नई पहचान

बीड की खास पहचान अब तक कंकालेश्वर मंदिर, खजाना बावड़ी थे, लेकिन अब बाजगुडे का कुआं भी साकार होते सपनों की मिसाल बन गया है। पहले वे शुष्क भूमि के किसान थे, लेकिन अब उनकी जमीन सिंचित कैटेगरी में समाहित है। अब वे फलों की भी खेती कर रहे हैं, मौसंबी लगा चुके हैं।

इलाके के किसान पानी के बिना गर्मी की फसल नहीं लगा पाता लेकिन अब बाजगुडे के पास साल भर के पानी का संचय होने के कारण वे निश्चिंत भाव से मनचाही फसलों को लगाकर कुशल लाभ अर्जित कर रहे हैं।

दूसरे किसानों की बेहतरी के लिए भी चिंतित बाजगुडे का मानना है कि सात से आठ किसान यदि मिलकर प्रयास करें, तो वे भी उनके नेक काज में मार्गदर्शन एवं मदद कर सकते हैं, ताकि एक और ऐसा कुआं बन सके।

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