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अवसाद तले अन्नदाता और सुशांत

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अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत द्वारा आत्महत्या को लेकर विभिन्न आयामों से मीडिया चर्चा करने में लगा है! एक उभरते हुए अभिनेता के रूप सुशांत का खुदकुशी करना बेहद दुःखद है!

सुशांत की खुदकुशी के बहाने बड़ा सावल यह है कि देश मे लंबे समय से कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या करते चले आ रहे हैं, मीडिया की संवेदना किस तरह सिलेक्टिव है कि किसानों की आत्महत्या उनके लिए चर्चा का विषय नहीं है! जबकि सबसे ज्यादा अवसाद में देश का अन्नदाता जीने को अभिशप्त है! कॉरपोरेट मीडिया के लिए किसानों की आत्महत्या खबर और गंभीर संवेदनशील चर्चा का विषय नहीं रही! किसान कोई सेलेब्रिटी तो है नहीं, जिसे खबर बनाया जाए!

नव उदारीकरण की नीतियों का सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव किसानों के जीवन पर पड़ा है। खेती लगातार घाटे का सौदा बन गयी है! किसान अपने अथक श्रम के बाद भी कर्ज मुक्त नहीं हो सका। खेती एक ऐसा व्यापार जो हर वक्त प्राकृतिक आपदा की आशंकाओं से घिरा रहता है! खाद्यान्न का उत्पादन खुली छत के नीचे होता है! कभी सूखा तो कभी बाढ़ जैसी आपदा किसान की मेहनत और कर्ज पर लिए हुए धन की बर्बादी का सबब बनती है|ऐसी स्थिति में किसान के अवसाद को आसानी से समझा जा सकता है! सरकारी और साहूकार से लिये गये कर्ज की ब्याज से चाहकर भी मुक्त नहीं हो पाता!

सबसे बडी विडंबना इस बात की है कि किसान अपने उत्पाद की कीमत भी तय नहीं कर सकता! उसके उत्पाद की कीमत भी सरकार और आढ़तिया तय करते हैं! इतने जोखिमों के साथ जीने वाला किसान कितने गहरे अवसाद में जीता है इसका एहसास सरकार और बाज़ार को नहीं है! हकीकत तो यह है कि सरकार और व्यापारी किसान की बर्बादी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं!

कोरोना काल मे लॉक डाउन में तीन महीने से घरों में बैठे लोग किसानों के उत्पाद के कारण जिंदा हैं! इतने पर भी लोगों को किसानों का महत्व और उनकी बर्बादी समझ मे नही आ रही। राहत के नाम पर सरकारी मदद ऊंट के मुंह मे जीरे वाली कहावत को चरितार्थ करती है!

किसानों की आत्महत्या की बात की जाए तो प्रतिवर्ष दस हज़ार से अधिक किसानों के द्वारा आत्महत्या की रपटें दर्ज की गई है। 1997 से 2006 के बीच 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की। भारतीय कृषि बहुत हद तक मानसून पर निर्भर है तथा मानसून की असफलता के कारण नकदी फसलें नष्ट होना किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं का मुख्य कारण माना जाता रहा है। मानसून की विफलता, सूखा, कीमतों में वृद्धि, ऋण का अत्यधिक बोझ आदि परिस्तिथियाँ, समस्याओं के एक चक्र की शुरुआत करती हैं। बैंकों, महाजनों, बिचौलियों आदि के चक्र में फँसकर भारत के विभिन्न हिस्सों के किसानों ने आत्महत्याएं की हैं! इतने गहरे अवसाद में जीने वाले किसान पर मीडिया आखिर चर्चा क्यों नहीं करता? क्योंकि खेती किसानी की खबर से टीआरपी नहीं मिलती!

(लेखक: श्री विवेक दत्त मथुरिया)

1 Comment
  1. अनुपम चौधरी says

    बहुत ही सही लिखा है इस संकट के समय मेन एक किसान ही है जिसने अर्थव्यवस्था मे अपना योगदान दिया. लेकिन किसान को सरकार ने क्या दिया? महँगा डीज़ल , महँगी बिजली , ओर rate आप सभी को पता ही है की किसान को फसल का क्या रेट मिलता है. लेकिन सरकार को क्या किसान मरता है तो मरे….

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