जून में बोई जाने वाली फसलें और सब्जियां: किसानों के लिए सही समय पर बुवाई की सलाह

Published on: 18-May-2026
Updated on: 18-May-2026

भारत में जून का महीना खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी समय खरीफ फसलों की बुवाई की शुरुआत होती है। इस दौरान देश के कई हिस्सों में मानसून दस्तक देने लगता है, जिससे खेतों में पर्याप्त नमी बनने लगती है और तेज गर्मी से भी कुछ राहत मिलती है। उत्तर भारत में तापमान अभी भी लगभग 35 से 40 डिग्री सेल्सियस तक बना रहता है, जबकि दक्षिण भारत में मानसून सक्रिय हो जाता है। जून के अंत तक देश के अधिकांश क्षेत्रों में वर्षा शुरू हो जाती है, जो खेती के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है। यही कारण है कि किसान इस मौसम में धान, मक्का, बाजरा और भिंडी जैसी मुख्य खरीफ फसलों की बुवाई करते हैं। हालांकि इसके अलावा कुछ ऐसी कम लोकप्रिय फसलें और सब्जियां भी हैं, जो कम लागत में अच्छी पैदावार और बेहतर मुनाफा देने की क्षमता रखती हैं। इन फसलों की बाजार में मांग लगातार बढ़ रही है, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में।

खेती शुरू करने से पहले जरूरी तैयारियां

जून में खेती करने से पहले खेत की अच्छी तैयारी करना बेहद जरूरी होता है। खेत की गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बनाना चाहिए ताकि बीजों का अंकुरण बेहतर हो सके। मानसून के मौसम में अधिक बारिश होने की संभावना रहती है, इसलिए खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए ताकि पानी जमा न हो। इसके अलावा हमेशा प्रमाणित और उन्नत किस्म के बीजों का ही चयन करना चाहिए, क्योंकि अच्छी गुणवत्ता वाले बीज अधिक उत्पादन देते हैं। यदि मानसून समय पर न आए तो सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था भी पहले से तैयार रखनी चाहिए। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट और जैविक खाद का उपयोग करना फायदेमंद रहता है।

जून में बोई जाने वाली लोकप्रिय लाभदायक फसलें और सब्जियां

1. ग्वार फली (Cluster Beans)

ग्वार खरीफ मौसम की एक महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय फसल है, जो कम पानी में भी अच्छी तरह उग जाती है। यह विशेष रूप से सूखा सहन करने वाली फसल मानी जाती है, इसलिए कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में इसकी खेती अधिक होती है, लेकिन इसे देश के अन्य हिस्सों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। ग्वार की बुवाई जून के पहले सप्ताह से लेकर जुलाई के पहले सप्ताह तक की जा सकती है। इसके लिए रेतीली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। आरजीसी-936, आरजीसी-1003 और एचजी-365 इसकी उन्नत किस्में हैं। ग्वार की फलियों का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है, जबकि इसके बीजों से बनने वाला ग्वार गम खाद्य और औद्योगिक क्षेत्रों में काम आता है। यह फसल मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर भूमि की उर्वरता भी सुधारती है। बुवाई से पहले बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना लाभदायक रहता है और खेत में जलभराव से बचाव जरूरी है।

2. कुल्फा (Purslane)

कुल्फा एक पौष्टिक पत्तेदार सब्जी है, जिसे जून के महीने में आसानी से उगाया जा सकता है। यह गर्मी और नमी दोनों को सहन करने की क्षमता रखती है। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में इसे स्थानीय स्तर पर उगाया जाता है। कुल्फा का उपयोग सलाद, सब्जी और चटनी के रूप में किया जाता है। इसकी बुवाई जून के पहले या दूसरे सप्ताह में की जाती है और यह कम उपजाऊ मिट्टी में भी अच्छी पैदावार देती है। कुल्फा लगभग 30 से 40 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसमें विटामिन और खनिज भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के बीच इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। इसके बीजों को 1 से 2 सेंटीमीटर की गहराई में बोना चाहिए और नियमित सिंचाई तथा खरपतवार नियंत्रण पर ध्यान देना चाहिए।

3. कंगनी (Foxtail Millet)

कंगनी एक पारंपरिक मोटा अनाज है, जिसे आजकल पौष्टिकता के कारण फिर से लोकप्रियता मिल रही है। यह फसल कम पानी और कम उर्वरक में भी अच्छी तरह उग जाती है, इसलिए जून के मानसूनी मौसम के लिए उपयुक्त मानी जाती है। राजस्थान, कर्नाटक और तमिलनाडु में इसकी खेती अधिक होती है। इसकी बुवाई जून के मध्य से जुलाई तक की जाती है। रेतीली या हल्की दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे बेहतर रहती है। सिया-2644, सिया-3156 और धनशक्ति इसकी प्रमुख उन्नत किस्में हैं। कंगनी के दानों का उपयोग रोटी, खिचड़ी और दलिया बनाने में किया जाता है। यह फसल लगभग तीन से चार महीनों में तैयार हो जाती है। बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर 8 से 10 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। खेत में नमी बनाए रखना और समय-समय पर खरपतवार नियंत्रण करना आवश्यक होता है।

4. ककड़ी (Armenian Cucumber)

ककड़ी, जिसे लंबी खीरा या दौलत बेग भी कहा जाता है, जून में बोई जाने वाली एक लाभकारी सब्जी है। उत्तर और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में इसे उगाया जाता है, हालांकि इसका प्रचलन अभी भी सीमित है। इसकी बुवाई जून के पहले सप्ताह से मध्य तक की जा सकती है। हल्की दोमट या रेतीली मिट्टी इसके लिए उपयुक्त रहती है। पूसा उदय और स्थानीय देसी किस्में इसकी लोकप्रिय प्रजातियां हैं। यह लगभग 40 से 50 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। ककड़ी का उपयोग मुख्य रूप से सलाद और सब्जी के रूप में किया जाता है। इसकी बेलों को सहारा देने के लिए लकड़ी या बांस का ढांचा बनाना चाहिए और नियमित सिंचाई करते रहना चाहिए।

5. परवल (Pointed Gourd)

परवल एक बेल वाली सब्जी है जिसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है। बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसकी बुवाई जून से जुलाई के बीच की जाती है। अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। स्वर्ण रेखा, स्वर्ण अलौकिक और राजेंद्र परवल-1 इसकी उन्नत किस्में हैं। परवल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी फसल लगभग 8 से 9 महीनों तक लगातार उत्पादन देती रहती है। बीजों को बोने से पहले रातभर पानी में भिगोने से अंकुरण बेहतर होता है। बेलों को बढ़ने के लिए बांस या लकड़ी का सहारा देना आवश्यक होता है।

6. टिंडा (Indian Round Gourd)

टिंडा उत्तर भारत में उगाई जाने वाली एक कम लोकप्रिय लेकिन अच्छी मांग वाली सब्जी है। इसकी बुवाई जून के पहले सप्ताह से मध्य तक की जा सकती है। रेतीली दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे बेहतर मानी जाती है। पूसा टिंडा और अर्का टिंडा इसकी उन्नत किस्में हैं। यह लगभग 40 से 50 दिनों में तैयार हो जाती है और छोटे खेतों में भी आसानी से उगाई जा सकती है। अच्छी पैदावार के लिए नियमित सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण आवश्यक होता है।

जून में खेती करते समय जरूरी सावधानियां

जून में खेती करते समय मानसून की अनिश्चितता को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। यदि बारिश समय पर नहीं होती है, तो फसलों को बचाने के लिए सिंचाई की व्यवस्था होनी चाहिए। वहीं अधिक बारिश की स्थिति में खेत में जलभराव से फसल खराब हो सकती है, इसलिए जल निकासी की व्यवस्था आवश्यक है। मानसून के मौसम में कीट और फफूंद जनित रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है। इसलिए किसानों को जैविक कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए और फसलों की नियमित निगरानी करनी चाहिए। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए जैविक खाद और हरी खाद का उपयोग लाभदायक होता है। ग्वार जैसी दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाकर अगली फसल के लिए भी लाभ पहुंचाती हैं।

कम लोकप्रिय फसलों की खेती के फायदे

कम लोकप्रिय फसलों और सब्जियों की खेती करने से किसानों को कई प्रकार के लाभ मिलते हैं। इन फसलों में पानी और उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है, जिससे खेती की लागत घटती है। कुल्फा, कंगनी और ककड़ी जैसी फसलों की मांग शहरी बाजारों में तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं। इसके अलावा ग्वार जैसी फसलें मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने में मदद करती हैं। ये फसलें गर्मी और बारिश दोनों परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम होती हैं, इसलिए जून के मौसम के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती हैं।

जून का महीना किसानों के लिए नई संभावनाओं और बेहतर आय का अवसर लेकर आता है। ग्वार, कुल्फा, कंगनी, ककड़ी, मेथी, परवल और टिंडा जैसी कम लोकप्रिय फसलें न केवल कम लागत में अच्छी पैदावार देती हैं, बल्कि बाजार में भी इनकी मांग तेजी से बढ़ रही है। यदि किसान सही समय पर बुवाई करें, उन्नत बीजों का चयन करें और मौसम के अनुसार फसलों की देखभाल करें, तो वे बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही ये फसलें मिट्टी की सेहत सुधारने में भी मददगार साबित होती हैं, जिससे भविष्य की खेती और अधिक लाभदायक बनती है।

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