भारत सरकार की अनुसूचित जाति उपयोजना के अंतर्गत खाद्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा “बागवानी एवं अनाजीय उत्पादों का मूल्यसंवर्धन एवं परिरक्षण” विषय पर दो दिवसीय प्रशिक्षण एवं इनपुट वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इसी कार्यक्रम में मेरीखेती किसान पंचायत का भी भव्य आयोजन उत्तराखंड राज्य के उधम सिंह नगर जनपद के सितारगंज ब्लॉक स्थित कल्याणपुर गांव में 12 एवं 13 मई 2026 को संपन्न हुआ।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में अनुसूचित जाति वर्ग के 250 किसानों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, प्रसंस्करण विधियों तथा मूल्य संवर्धन संबंधी जानकारी प्रदान कर उनकी आय में वृद्धि करना था।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों के कौशल और ज्ञान को मजबूत बनाना था। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा द्वारा विकसित उन्नत एवं अधिक उत्पादन देने वाले धान के बीज किसानों को वितरित किए गए। इसके साथ ही किसानों को बागवानी एवं कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण और संरक्षण की आधुनिक तकनीकों से परिचित कराया गया।
विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन करके उनकी बाजार में मांग और कीमत दोनों बढ़ाई जा सकती हैं। इससे किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त करने में सहायता मिलेगी और कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सकेगा।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के पहले दिन प्रतिभागियों का पंजीकरण किया गया तथा प्रशिक्षण पूर्व मूल्यांकन के माध्यम से किसानों की जानकारी और समझ का आकलन किया गया। इसके पश्चात विशेषज्ञों द्वारा विभिन्न विषयों पर व्याख्यान और व्यवहारिक प्रदर्शन प्रस्तुत किए गए।
प्रशिक्षण में किसानों को कृषि उत्पादों के संरक्षण और प्रसंस्करण से जुड़ी नई तकनीकों की जानकारी दी गई। कार्यक्रम के दौरान किसानों ने बड़ी रुचि और उत्साह के साथ भाग लिया तथा विशेषज्ञों से अपने प्रश्न पूछकर समस्याओं का समाधान प्राप्त किया।
प्रशिक्षण के पहले दिन किसानों को फलों और सब्जियों के न्यूनतम प्रसंस्करण की तकनीकों का व्यावहारिक प्रदर्शन दिया गया। विशेषज्ञों ने श्रिंक पैकेजिंग की प्रक्रिया समझाई, जिससे फल एवं सब्जियां लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकें।
इसके अतिरिक्त विभिन्न दालों के फ्लेक्स तैयार करने, गाजर, फूलगोभी, मटर एवं फ्रेंच बीन्स मिश्रण के फ्रोजेन भंडारण की विधियों की जानकारी दी गई। किसानों को टमाटर के कंसन्ट्रेट और टमाटर केचप बनाने की तकनीक भी सिखाई गई। इन तकनीकों के माध्यम से किसानों को यह समझाया गया कि कृषि उत्पादों का संरक्षण कर उन्हें लंबे समय तक उपयोगी बनाया जा सकता है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के दूसरे दिन बाजरा आधारित उत्पादों के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया। किसानों को बाजरा (मिलेट) से नूडल्स और पास्ता बनाने की तकनीक सिखाई गई। इसके अतिरिक्त बाजरा मफिन, एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर पपीता कैंडी तथा माइक्रोवेव्ड आलू चिप्स बनाने का व्यवहारिक प्रदर्शन भी किया गया।
विशेषज्ञों ने बताया कि बाजरा पोषक तत्वों से भरपूर अनाज है तथा इससे तैयार किए गए उत्पादों की बाजार में मांग तेजी से बढ़ रही है। किसानों को यह भी समझाया गया कि मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार कर वे अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ा सकते हैं तथा बेहतर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
दूसरे दिन दोपहर के भोजन के बाद प्रशिक्षण का मूल्यांकन किया गया तथा प्रतिभागियों से प्रशिक्षण संबंधी प्रतिक्रिया (फीडबैक) प्राप्त की गई। किसानों ने कार्यक्रम को अत्यंत उपयोगी और ज्ञानवर्धक बताया।
प्रतिभागियों ने कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होते हैं क्योंकि इससे उन्हें आधुनिक तकनीकों की जानकारी प्राप्त होती है।
किसानों ने यह भी बताया कि वे प्रशिक्षण में सीखी गई तकनीकों को अपने गांव और खेतों में अपनाकर आय बढ़ाने का प्रयास करेंगे। प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों और किसानों के बीच संवादात्मक वातावरण देखने को मिला, जिससे कार्यक्रम और अधिक प्रभावी बन सका।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के सफल आयोजन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली तथा आईएसडी, किच्छा (उधम सिंह नगर), उत्तराखंड की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. संदीप कुमार लाल थे, जबकि डॉ. दिनेश कुमार ने पाठ्यक्रम निदेशक के रूप में योगदान दिया। डॉ. अलका जोशी एवं डॉ. अनामिका ठाकुर ने पाठ्यक्रम समन्वयक के रूप में कार्यक्रम का संचालन किया।
सभी विशेषज्ञों ने किसानों को सरल भाषा में तकनीकी जानकारी प्रदान की और व्यवहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें आधुनिक कृषि एवं प्रसंस्करण तकनीकों से परिचित कराया। समापन समारोह में सभी आयोजकों, प्रतिभागियों एवं सहयोगियों को धन्यवाद ज्ञापित किया गया।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंत में किसानों को कृषि कार्यों में उपयोग के लिए विभिन्न कृषि इनपुट एवं उपयोगी सामग्री वितरित की गई। इनमें छाता, वर्मीबेड, टोपी, खुरपी, सब्जी किट तथा बाल्टी शामिल थीं।
इसके अतिरिक्त किसानों को दो महत्वपूर्ण हिंदी पुस्तकें— “औद्यानिक एवं अनाजीय उत्पादों का मूल्यसंवर्धनः सिद्धांत एवं उपयोग” तथा “बीज उत्पादन तकनीकी” भी प्रदान की गईं। इन पुस्तकों का उद्देश्य किसानों को कृषि एवं मूल्य संवर्धन संबंधी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना था।
आयोजकों ने बताया कि इन सामग्रियों और पुस्तकों के माध्यम से किसान आधुनिक खेती और प्रसंस्करण तकनीकों को अपनाकर अपनी आय और उत्पादन क्षमता दोनों में वृद्धि कर सकेंगे।