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प्रेमसिंह संरक्षित खेती से हुए मालामाल

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तीन साल में दो नौ हजार वर्गमीटर में बनाया पॉलीहाउस, कमा रहे 12 लाख सालाना
झालीवाडा खुर्द जोधपुर राजस्थान के 29 वर्षीय युवा किसान प्रेमसिंह ने संरक्षित खेती अपनाकर सालाना 12 लाख रुपए की आमदनी की व्यवस्था की है। वह कहते हैं कि संरक्षित खेती के लिए पॉलीहाउस, नेटहाउस आदि भी खूब लग रहे हैं। 2000 वर्ग मीटर के पॉलीहाउस में पहलीबार 18 टन खीरा हुआ। बगैर ट्रेनिंग के ही पॉलीहाउस लगा लिया और परंपरागत तरीके से सब्जियों की खेती करने के कारण उन्हें पॉलीहाउस में खेती करने में कोई दिक्कत नहीं रही। वह वर्तमान में खीरा एवं टमाटर की खेती करते हैं। नेट हाउस में करेला की खेती करते हैं। यहीं पौधे तैयार करते हैं। तीन साल में उन्होंने सात हजार वर्ग मीटर पॉलीहाउस लगा दिया है। दो हजार वर्ग मीटर के पॉलीहाउस पर काम चल रहा है। वह संरक्षित खेती के अलावा काफी बड़े क्षेत्र में लो टनल विधि से तोरई जैसी सब्जियों की फसल लेते हैं।

प्रेमसिंह ने 12 वीं तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद खेती में ही अपना मन लगा लिया। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले यूट्यूब आदि पर लोगों को देखा। इसके बाद कृषि महकमे के अफसरों से मिलना शुरू किया और इसके बाद राह बनती गई। परिवार के पास 10 बीघा कृषि भूमि थी। इस रकबे से खेती से मुनाफा मिलना काफी मुश्किल था। जमीन लीज पर लेकर खेती का दायरा बढ़ाया। वह कहते हैं कि परंपरागत खेती से उनके परिवार का रात दिन खटने के बाद भी गुजारा नहीं होता था। इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने नई दिशा में काम करना शुरू किया।उद्यान विभाग की अनुदान योजना का लाभ लेकर 2 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में पॉली हाउस स्थापित कराया। इसमें खीरे की फसल का उत्पादन लेना शुरू किया। जहां भी परेशानी आई, स्थानीय कृषि अधिकारियों के साथ काजरी जोधपुर के वैज्ञानिकों से मार्गदर्शन प्राप्त करता रहा। इसी का परिणाम है कि संरक्षित संरचना में खीरे के बाद टमाटर फसल का सफल उत्पादन लेने के गुर अब जुबानी हो गए है। उन्होंने बताया कि पहले सिंचाई के लिए ट्यूबवैल था। लेकिन, पानी की कमी के चलते एक नये कुएं का निर्माण कराया है। बता दें कि प्रेम सिंह 30 बीघा जमीन लीज पर लेकर खेती कर रहे है। उन्होंने बताया कि परम्परागत फसलों में जीरा, गेहूं, मूंग, ज्वार और तिल का उत्पादन लेता हॅू। इन फसलों से खर्च निकालने के बाद 3 लाख रूपए की आय मिल जाती है।

खीरा बना लाभकारी
उन्होंने बताया कि पॉली हाउस की स्थापना के बाद खीरा और टमाटर की फसल पर ही मेरा फोकस रहा। इसके चलते दोनों फसलों से 7-8 लाख रूपए की आय सालाना मिल जाती है। उन्होंने बताया कि साढे तीन साल पहले 2 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में पॉली हाउस स्थापित कराया था। संरक्षित खेती का लाभ-हानि समझ आने के डेढ़ साल बाद 4 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में एक और पॉली हाउस स्थापित कराया। उन्होंने बताया कि इसके अलावा पौध तैयार करने के लिए 1000 वर्ग मीटर क्षेत्र में नेट हाउस भी स्थापित किया है। वहीं, 2 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में एक और पॉली हाउस का निर्माण कार्य चल रहा है। 8 बीघा क्षेत्र में सब्जी उत्पादन उन्होंने बताया कि पॉली हाउस की खेती में सफलता मिलने के बाद अब ओपन फील्ड में भी सब्जी उत्पादन का कार्य शुरू कर दिया है। इस साल प्लास्टिक मल्च और ड्रिप का उपयोग करते हुए 8 बीघा क्षेत्र में बेलदार सब्जियों की बुवाई की है। सब्जी फसल में लौकी, तुरई, खीरा, करेला सहित दूसरी सब्जी फसल शामिल है। उन्होंने बताया कि जल और विद्युत बचत के लिए फार्म पौंड और सोलर पंप स्थापित कराया हुआ है। पॉली हाउस के पास में बरसाती पानी को संग्रहित करने के लिए दो फार्म पौंड बनाएं हुए है। इससे सिंचाई की अब समस्या नहीं रही है।

उन्होंने बताया कि पशुधन में मेरे पास 3 गाय है। प्रतिदिन 10-12 लीटर दुग्ध का उत्पादन मिल रहा है। दुग्ध घर में काम आ जाता है। वहीं, पशु अपशिष्ट से जीवामृत, बीजामृत सहित दूसरे जैविक कीटनाशक तैयार करके उपयोग ले रहा हॅू। उन्होंने बताया कि सभी फसलों में जहां तक संभव होता है, जैविक कीटनाशक का उपयोग करता हॅू। नियंत्रण नहीं हो पाने की स्थिति में ही फसल में कीटनाशक का स्प्रे करता हॅू। वह कहते हैं कि पॉलीहाउस लगाने के लिए पानी और मिट्टी का अच्छा पीएच होना आवश्यक है। इसके बगैर इस दिशा में काम करने की कोर्ई भी नए किसान भाई न सोचें। वह कहते हैं कि पॉलीहाउस में तैयार खीरा यदि 15—20 रुपए किलोग्राम से कम कीमत पर बिकता है तो किसान को कुछ नहीं बचता लिहाजा समय का ध्यान रखते हुए उस समय पर फसल लगाएं जबकि बाजार में ओपन फीलड की फसल न आती हो।

 

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