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जंमकर लुटे धान किसान

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इस बार धान किसान उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों में जमकर लूटे गए।एमएसपी से बेहद कम कीमत पर धान की खरीद की गई। एक तरफ सरकारी नीतियों से परेशान कारोबारी थे तो दूसरी तरफ रात दिन खेत में खटने वाले किसान। सरकारी खरीद केन्द्र तो धान के सीजन में नाम मात्र को खोले गए।

एक दशक में ऐसा पहली बार हुआ है कि बासमती श्रेणी के धान कारोबारियों ने मोटे धान की कीमत पर खरीदा। इस बार बासमती धान 1300 से 1500 रुपए प्रति क्विंटल में बेचा गया। धान की ज्यादातर खरीद पूरी होने के बाद तकरीबन एक पखवाडे पूर्व कीमतों में उछाल आया और वह भी एमएसपी के करीब जाकर रुक गया। यानी बासमती श्रेणी का फाइन धान हालिया तौर पर 1900 रुपए प्रति कुंतल पर पहुंचा। पटियाला से प्रगतिशील किसान ने बातचीत में मेरीखेती को बताया कि एक जमाना था जबकि एक ट्राली धान लाख सवा लाख का बैठता था।अब 50 हजार को भी पार नहीं कर पाया। कोरोनाकाल में सब्जियों के बाद अब धान की फसल भी बेकदरी का शिकार रही। इसके चलते किसानों ने सब्जियों को नहीं लगाया। बीच में कुछ समय सब्जियों पर भी इसी लिए बेहद तेजी रही। आम आदमी इसके चलते परेशान रहा।

कारोबारी करते निर्धारण
बासमती श्रेणी का धान ज्यादातर विदेशों को निर्यात होता है। इस काम को देश के चुनिंदा कारोबारी करते हैं। इनमें से ज्यादातर करनाल में रहते हैं। सरकारी नीतियों की अस्थिरता के दौर में यह किसानों की धान की कीमतें इतनी नीचे ले जाते हैं कि उनके लाभ पर केाई प्रभाव न पडेे। मसलन फसल आने पर गेहूं एमएसपी के सापेक्ष 1800 रुपए प्रति क्विंटल खुले बाजार में बिका। सरकारी नीतियों एवं एफसीआई द्वारा गेहूँ के रेट गिरने के बाद गेहूँ की कीमतें गिर कर 1600 पर पहुंच गई हैं। इन हालात में गेहूं में पैसा लगाने वाले कारोबारी बर्बाद होने के कगार पर हैं। कारोबारियों को फसलों के घाटे की भरपाई फसलों से ही करनी होती है। ऐेसे में वह एक फसल के घाटे को दूसरी फसल से पूरा करते हैं। गेहूं के नुकसान का हिसाब किताब धान की मंदी के रूप में किसान को भुगतना पड़ा है।

बासमती की जगह लेगी पूसा सांबा किस्म
बासमती धान की बेकदरी से परेशान किसान इस बार सादा यानी नान सेंटेड किस्म लगाने लगे थे। इसका कारण यह है कि सादा किस्मों में किसी तरह का रोग आने की संभावना बेहद कम होती है। पूसा संस्थान की पूूसा सांबा-1850 किस्म ने इस बार धमाल मचा दिया है। इस किस्म की उपज 70 से 100 कुंतल प्रति हैक्टेयर तक आई है। मथुरा के किसान अंकित अग्रवाल बताते हैं कि यह किस्म 110 दिन में पक जाती है। सरकारी केन्द्रों पर बिक जाती है। इस किस्म में किसी तरह का रोग नहीं आता इसलिए दवाओं का खर्चा जीरो रहता है।

किसान कहते हैं कि इस किस्म की उपज बासमती श्रेणी की किस्मों से दोगुना मिलती है। देखरेख बेहद सामान्य करनी होती है। जब सरकारों के पास बासमती के भण्डारण और बाजार की कोई व्यवस्था नहीं तो फिर किसान क्यों बासमती के पीछे
भाग रहे हैं। वह अगलेे साल अपने खेत के ज्यादा बडे़ हिस्से में पूसा सांबा किस्म ही लगाएंगे।

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