Ad

गौमूत्र

Cow-based Farming: भारत में गौ आधारित खेती और उससे लाभ के ये हैं साक्षात प्रमाण

Cow-based Farming: भारत में गौ आधारित खेती और उससे लाभ के ये हैं साक्षात प्रमाण

दूध की नदियां बहाने वाला देश और सोने की चिड़िया उपनामों से विख्यात, भारत देश के अंग्रेजों के राज में इंडिया कंट्री बनने के बाद, देश में सनातन शिक्षा विधि, स्वास्थ्य रक्षा, कृषि तरीकों एवं सांस्कृतिक विरासत का व्यापक पतन हुआ है।

आलम यह है कि, कालगणना (कैलेंडर), ऋतु चक्र जैसे विज्ञान से दुनिया को परिचित कराने वाले देश में, आज गौ आधारित प्राकृतिक कृषि को अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित करना पड़ रहा है।

घर-घर गौपालन करने वाले भारत में सरकार को सार्वजनिक गौशाला बनाना पड़ रही हैं। पुरातन इतिहास में एक नहीं बल्कि ऐसे कई प्रमाण हैं कि कृषि प्रधान भारत में गौ आधारित कृषि को विशिष्ट स्थान प्रदान किया गया था। जैविक तरीकों की आधुनिक खेती में अब गौवंश के महत्व को स्वीकारते हुए, गौमूत्र एवं गाय के गोबर का प्रचुरता से उपयोग किया जा रहा है।

ये भी पढ़ें: जैविक खेती पर इस संस्थान में मिलता है मुफ्त प्रशिक्षण, घर बैठे शुरू हो जाती है कमाई

सरकारें भी गौपालन के लिए नागरिक एवं कृषकों को प्रेरित कर रही हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने तो किसान एवं पंचायत समितियों से गौमूत्र एवं गाय का गोबर खरीदने तक की योजना को प्रदेश मे लागू कर दिया है।

क्यों पूजनीय है गौमाता

गौमाता के नाम से सम्मानित गाय को भारत में पूजनीय माना जाता है। हिंदू धर्म के अनुसार गाय में 33 करोड़ देवताओं का वास मानकर गौमाता की पूजा अर्चना की जाती है। प्रमुख त्यौहारों खासकर दीपावली के दिन एवं अन्नकूुट पर गाय का विशिष्ट श्रृंगार कर पूजन करने का भारत में विधान है।

ये भी पढ़ें: गाय के गोबर से किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने उठाया कदम

हिंदू पूजन विधियों में गौमय (गोबर) तथा गोमूत्र को भारतीय पवित्र और बहुगुणी मानते हैं। गाय के गोबर से बने कंडों का हवन में उपयोग किया जाता है। वातावरण शुद्धि में इसके कारगर होने के अनेक प्रमाण हैं। अब तक अपठित सिंधु-सरस्वती सभ्यता में गौवंश संबंधी लाभों के अनेक प्रमाण मिले हैं। सिंधु-सरस्वती घाटी एवं वैदिक सभ्यता में गौ आधारित किसानी से स्पष्ट है कि भारत में गौ आधारित कृषि कितनी महत्वपूर्ण रही है। सिंधु-सरस्वती सभ्यता से जुड़े अब तक प्राप्त प्रमाणों के अनुसार इस सभ्यता काल में मानव बस्तियों के साथ खेत, अनाज की प्रजातियों आदि के बारे में कृषकों ने काफी तरक्की कर ली थी। सिंधु-सरस्वती सभ्यता से जुड़ी अब तक प्राप्त हुई मुद्राओं में बैल के चित्र अंकित हैं। इससे इस कालखंड में गाय-बैल के महत्व को समझा जा सकता है।

ये भी पढ़ें: खाद-बीज के साथ-साथ अब सहकारी समिति बेचेंगी आरओ पानी व पशु आहार

खेत, जानवर, गाड़ी/ गाड़ी चालक, यव (बार्ली), चलनी, बीज आदि संबंधी चित्र भी इस दौर की कृषि पद्धति की कहानी बयान करते हैं। सिंधु-सरस्वती सभ्यता के अब तक प्राप्त प्रमाणों में अनाज का संग्रह करने के लिये कोठार (भंडार) की भी पुष्टि हुई है। संस्कृत लिपि में प्रयोग में लाए जाने वाले लाङ्गल, सीर, फाल, सीता, परशु, सूर्प, कृषक, कृषीवल, वृषभ, गौ शब्द अपना इतिहास स्वयं बयान करने के लिए पर्याप्त हैं।

 वैदिक संस्कृत और आधुनिक फारसी में भी बहुत से साम्य हैं। फारसी में उच्चारित गो शब्द का मूल अर्थ गाय से ही है। मतलब गाय भारत में पनपी कई संस्कृतियों का अविभाज्य अंग रही है। गाय के गोबर का खेत में खाद, मकान की लिपाई-पुताई में उपयोग भारत में विधि नहीं बल्कि परंपरा का हिस्सा है। रसोई में चूल्हे को सुलगाने से लेकर पूजन हवन तक गाय के गोबर के कंडों की अपनी उपयोगिता है। गाय की उपयोगिता इस बात से भी प्रमाणित होती है कि पुरातन कृषि मेें गौपालक को दूध, दही, छाछ, मक्खन, घी का पौष्टिक आहार प्राप्त होता था वहीं खेती कार्य के लिए तगड़े बैल भी गाय से प्राप्त होते थे।

ये भी पढ़ें: मुख्यमंत्री लघु सिंचाई योजना में लाभांवित होंगे हजारों किसान

खेत में हल जोतने, अनाज ढोने, गाड़ी खींचने के लिये बैलों का उपयोग पुराने समय से भारत में होता रहा है। खेत की सिंचाई के लिए रहट चलाने में भी बैलों की तैनाती रहती थी।

कभी चलता था 24 बैलों वाला हल गौवंश से मिली इंसान, शहर को पहचान कामधेनु करे इतनी कामनाओं की पूर्ति

24 बैलों वाला हल

कई हॉर्स पॉवर वाले आज के प्रचलित आधुनिक ट्रैक्टर का काम पुराने समय में बैल करते थे। पुरातन ग्रंथों में दो, छह, आठ, बारह, यहां तक कि, 24 बैलों वाले भारी भरकम हलों का भी उल्लेख है।

गाय के नाम अनेक

आपको अचरज होगा कि अनेक शब्दों, नामों का आधार गाय से संबंधित है। गोपाल, गोवर्धन, गौशाला, गोत्र, गोष्ठ, गौव्रज, गोवर्धन, गौधूलि वेला, गौमुख, गौग्रास, गौरस, गोचर, गोरखनाथ (शब्द अभी और शेष हैं) जैसे प्रतिष्ठित शब्दों की अपनी विशिष्ट पहचान है। उपरोक्त वर्णित शब्दों से उसकी प्रकृति की पहचान सुनिश्चित की जा सकती है। जैसे गौधूली बेला से सूर्यास्त के समय का भान होता है, इसी तरह गाय के बछड़े को वसु कहा जाता है। इससे ही भगवान श्रीकृष्ण के पिता का नाम वसुदेव रखा गया। हिंदुओं के प्रमुख त्यौहार दीपावली के कुछ दिन पहले वसुबारस मनाकर गौवंश का पूजन कर पशुधन के प्रति कृतज्ञता जताई जाती है।

ये भी पढ़ें: गाय के गोबर/पंचगव्य उत्पादों के व्यापक उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से “कामधेनु दीपावली अभियान” मनाने के लिए देशव्यापी अभियान शुरू किया

ऋग्वेद काल में भी रथों में बैल जोतने का जिक्र है। मतलब गाय कृषक, कृषि के साथ ही ग्राम वासियों का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तरीके से सहयोगी रही है। गाय और बैल पुरातन काल से भारतीय जनजीवन का आधार रहे हैं। गाय की इन बहुआयामी उपयोगिताओं के कारण ही गौमाता को ‘कामधेनु’ भी कहा जाता है। मानव की इतनी सारी कामनाएं पूरी करने वाली बहुउपयोगी ‘कामधेनु’ (इच्छा पूर्ति करने वाली गाय) वर्तमान मशीनी युग (कलयुग) में और अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है।

गबरबंद

प्राचीन भारत में पानी रोकने के लिए मिट्टी पत्थर से बनाए जाने वाले गबरबन्द को बनाने में गोबर, मिट्टी, घासफूस का उपयोग किया जाता था। महाभारत में गायों की गिनती से संबंधित घोषयात्रा, गोग्रहण का भी उल्लेख है।

गौ अधारित खेती एवं फसल चक्र

भगवान श्रीकृष्ण के पिता का नाम जहां गौवंश पर आधारित वसुदेव है, वहीं उनके भाई बलराम को ‘हलधर’ भी कहा जाता है। हल बलराम का अस्त्र नहीं, बल्कि कृषि कार्य में उपयोगी था। इससे उस कालखंड की खेती-किसानी के तरीकों का भी बोध होता है।

चक्र का महत्व समझिये

प्राचीन भारत में बैल गाड़ियों में प्रयुक्त होने पहिये, कुएं से पानी खींचने के लिये रहट में लगने वाला चक्र, कोल्हू के बैल की चक्राकार परिक्रमा के अपने-अपने महत्व हैं। मतलब कृषि की सुरक्षा में भी चक्र महत्वपूर्ण है। खेती के महत्वपूर्ण चक्र को काल या ऋतु चक्र कहा जाता है। 

 भारत के पूर्वज किसानों ने साल में मौसम के बदलाव के आधार पर फसल चक्र का तक निर्धारण कर लिया था। ऋतुचक्र के मुताबिक ही किसान रवि और खरीफ की फसल का निर्धारण करते आए हैं। बीज बोने, क्यारी बनाने आदि में गौवंश का उल्लेखनीय उपयोग होता आया है। गौ एवं पशु पालन के लिए भी ऋतु चक्र में पूर्वजों ने बहुमूल्य व्यवस्थाएं की थीं। फसल चक्र का खेती, कृषि पैदावार के साथ ही गौ एवं अन्य पशु पालन से पुराना बेजोड़ नाता रहा है।

गौ अधारित खेती

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में गौपालन, गोकुल और बृंदाबन से जुड़ी बातें गौपालन के महत्व को रेखांकित करती हैं। पुरातन व्यवस्था में पालतू गायों का दूध, दही, मक्खन जहां अर्थव्यवस्था की धुरी था वहीं खेती में भी गाय की भूमिका अतुलनीय रही है। मानव उदर पोषण हेतु अनाज की पूर्ति के लिए गौ एवं पशु-पालन के साथ खेती किसानी के मिश्रित प्रबंधन का भारत में इतिहास बहुत पुराना है। गाय-बैलों के पालन का प्रबंध, खाद बनाने में गौमूत्र एवं गोबर का उपयोग, बीजारोपण, सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण आदि के लिए भारतवासी पुरातनकाल से गौवंश का बखूबी उपयोग करते आए हैं।

छत्तीसगढ़ की राह चला कर्नाटक, गौमूत्र व गाय का गोबर बेच किसान होंगे मालामाल!

छत्तीसगढ़ की राह चला कर्नाटक, गौमूत्र व गाय का गोबर बेच किसान होंगे मालामाल!

एक सैकड़ा गौशाला बनाने का लक्ष्य, पशु पालन राज्य मंत्री ने जाहिर किए विचार

योजना प्रारंभिक दौर में, सीएम से करेंगे चर्चाः चव्हाण

गौपालन को बढ़ावा देने एवं किसानों को अतिरिक्त आय का जरिया प्रदान करने के लिए कर्नाटक सरकार ने गौवंश पालकों से
गौमूत्र या गोमूत्र (गाय का मूत्र) (Cow Urine) एवं गाय का गोबर (Cow Dung) खरीदने का निर्णय लिया है। आपको ज्ञात हो छत्तीसगढ़ सरकार भी किसानों से गौमूत्र खरीदकर उन्हें लाभ प्रदान कर रही है।

अतिरिक्त आय प्रदान करना लक्ष्य

कर्नाटक राज्य पशुपालन विभाग किसानों की आय में बढ़ोत्तरी के लिए प्रयासरत है। किसानों की आय मेें वृद्धि हो, इसके लिए कृषि आय से जुड़े आय के तमाम विकल्पों के लिए सरकार प्रोत्साहन एवं मदद प्रदान कर रही है। प्रदेश के गौपालक किसानों को गाय के दूध के अलावा भी अतिरिक्त आय मिल सके, इसके लिए किसानों से गोमूत्र और गोबर खरीदने की योजना कर्नाटक राज्य सरकार ने बनाई है।


ये भी पढ़ें: कुवैत में खेती के लिए भारत से जाएगा 192 मीट्रिक टन गाय का गोबर

गौशालाओं की मदद

राज्य सरकार ने किसानों से गौमूत्र एवं गोबर खरीदने के लिए विशिष्ट योजना बनाई है। इस प्लान के तहत योजना की शुरुआत में प्रस्तावित गौशालाओं की मदद से किसानों से गौमूत्र एवं गाय के गोबर की खरीद की जाएगी। कर्नाटक सरकार इस समय कुछ निजी गौशालाओं का वित्त पोषण करती है। इसके अलावा राज्य सरकार ने इस अभिनव योजना के लिए आगामी दिनों में प्रदेश में गौशालाओं (Cow Shed) के विस्तार की योजना बनाई है। इसके तहत प्रदेश में 100 गौशाला (Cow Shed) बनाने का सरकार का लक्ष्य है।


ये भी पढ़ें: पशुपालन के लिए 90 फीसदी तक मिलेगा अनुदान

शुरू हो चुका है कार्य

लक्ष्य निर्धारित गौशालाओं को बनाने के लिए विभाग ने जिलों में भूमि चिह्नित की है। योजना के अनुसार चराई के लिए पृथक गौशाला बनाने का निर्णय लिया गया है।

गोबर एवं गौमूत्र का उपयोग

किसानों से क्रय किए गए गोबर और गोमूत्र से राज्य में कई तरह के उपयोगी उपोत्पाद बनाए जाएंगे। आमजन को भी गोबर-गौमूत्र निर्मित जीवन रक्षक इन उत्पादों के उपयोग के लिए मेलों, प्रदर्शनियों के जरिये जागरूक किया जाएगा। सरकार का मानना है कि, कृषि आधारित इस अभिनव पहल से प्रदेश में रोजगार के नए अवसर कृषि से इतर दूसरे लोगों को भी मिल सकेंगे।


ये भी पढ़ें: गाय के गोबर से बन रहे सीमेंट और ईंट, घर बनाकर किसान कर रहा लाखों की कमाई

छत्तीसगढ़ सरकार ने किया प्रेरित

आपको बता दें, छत्तीसगढ़ में सरकार ने इस दिशा में पहल शुरू की थी। छत्तीसगढ़ में गौधन न्याय योजना के तहत, गोबर और गौमूत्र की खरीद कर सरकार किसानों को लाभ के अवसर प्रदान कर रही है। इस योजना के अनुसार छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रदेश के गौपालकों से चार रुपए प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदने का निर्णय लिया है। इस पहल के अलावा छत्तीसगढ़ राज्य में पहले से ही राज्य सरकार द्वारा पशुपालकों से दो रुपए प्रति किलो की दर से गाय का गोबर (Cow Dung) खरीदा जा रहा है। प्रदेश सरकार की इस पहल से न केवल पशु पालकों का गौपालन के प्रति रुझान बढ़ा है, बल्कि, गौपालन से पशु पालकों की कमाई में अतिरिक्त इजाफा भी देखने को मिला है।


ये भी पढ़ें: जैविक खेती में किसानों का ज्यादा रुझान : गोबर की भी होगी बुकिंग
पशुपालन राज्य मंत्री प्रभु चव्हाण के हवाले से जारी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, निजी मठ और संगठन राज्य में गौशाला का संचालन कर गौसेवा करते हैं। इन संगठनों द्वारा गोमूत्र और गाय के गोबर से बायो-गैस, दीया, शैंपू, कीटनाशक, औषधि जैसे कई जीवनोपयोगी उत्पाद बनाए जाते हैं। पशुपालन राज्य मंत्री ने इस दिशा में हाथ बंटाने की बात कही।

छग मॉडल से लेंगे प्रेरणा

उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा लागू की गई योजना का अध्ययन कर उससे सीख लेने की बात कही। प्रभु चव्हाण ने बताया कि, कर्नाटक में गौमूत्र एवं गाय के गोबर से जुड़ी योजना को लागू करने के पहले छत्तीसगढ़ के अनुभवों का अध्ययन किया जाएगा। मंत्री के अनुसार उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र राज्य में किए जा रहे जैव ईंधन (Bio Fuel) के प्रयोग भी काफी प्रभावकारी हैें। उन्होंने महाराष्ट्र के किन्नरी मठ में गोबर औऱ गौमूत्र से बनाए जाने वाले 35 उत्पादों से मिलने वाले लाभों का भी जिक्र मीडिया से एक चर्चा में किया। प्रभु चव्हाण ने योजना को फिलहाल शुरुआती चरण में होना बताकर, इसके विस्तार के लिए जल्द ही मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई से चर्चा करने की बात कही।
गौमूत्र से बना ब्रम्हास्त्र और जीवामृत बढ़ा रहा फसल पैदावार

गौमूत्र से बना ब्रम्हास्त्र और जीवामृत बढ़ा रहा फसल पैदावार

छत्तीसगढ़ पहला राज्य जहां गौमूत्र से बन रहा कीटनाशक

इस न्यूज की हेडलाइन पढ़कर लोगों को अटपटा जरूर लगेगा, पर यह खबर किसानों के लिए बड़ी काम की है। जहां गौमूत्र का बड़ा धार्मिक महत्व माना जाता है और गांवों में आज भी लोग इसका सेवन करते हैं, उनका कहना है कि गौमूत्र पीने से कई बीमारियों से बच पाते हैं। वहीं, गौमूत्र अब किसानों के खेतों में कीटनाशक के रूप में, उनकी जमीन की सेहत सुधारकर फसल उत्पादन का बढ़ाने में उनकी काफी मदद करेगा। जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि आधुनिकता के युग में खान-पान सही नहीं होने और फसलों में बेतहासा
जहरीले कीटनाशक के प्रयोग से हमारा अन्न जहरीला होता जा रहा है। वैज्ञानिकों ने भी सिद्ध कर दिया है कि जहरीले कीटनाशक के प्रयोग से लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और आयु घटती जा रही है। लोगों की इस तकलीफ को किसानों ने भी समझा और अब वे भी धीरे-धीरे जैविक खाद के उपयोग को बढ़ावा दे रहे हैं। इससे वे अपनी आमदनी तो बढ़ा ही रहे हैं, साथ-साथ देश के लोगों और भूमि की सेहत भी सुधार रहे हैं। इसी के तहत लोगों की सेहत का ख्याल रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने किसान हित में एक बड़ा कदम उठाया है और पशुपालकों से गौमूत्र खरीदने की योजना शुरू की है, जिससे कीटनाशक बनाया जा रहा है। इसका उत्पादन भी सरकार द्वारा शुरू कर दिया गया है।

चार रुपए लीटर में गौमूत्र की खरीदी

पहले राज्य सरकार ने किसानों को जैविक खेती के प्रति प्रोत्साहित किया, जिसके सुखद परिणाम भी सामने आने लगे हैं, इसके बाद पशुपालकों से गौमूत्र खरीदकर उनको एक अतिरिक्त आय भी दे दी। राज्य सरकार पशुपालक किसानों से चार रुपए लीटर में गौमूत्र खरीद रही है। राज्य के लाखों किसान इस योजना का फायदा उठाकर गौमूत्र बेचने भी लगे हैं।


ये भी पढ़ें:
पशुपालन के लिए 90 फीसदी तक मिलेगा अनुदान

हरेली पर मुख्यमंत्री ने गौमूत्र खरीद कर की थी शुरूआत

हरेली पर्व पर 28 जुलाई से गोधन न्याय योजना के तहत गोमूत्र की खरीदी शुरू की गई है। मुताबिक छत्तीसगढ़ गौ-मूत्र खरीदी करने वाला देश का पहला राज्य है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में हरेली (हरियाली अमावस्या) पर्व के अवसर पर गोमूत्र खरीदा और वे पहले ग्राहक बने। वहीं मुख्यमंत्री ने खुद भी गौमूत्र विक्रय किया था।

अन्य राज्य भी अपना रहे

छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जो पशुपालक ग्रामीणों से चार रुपए लीटर में गोमूत्र खरीद रहा है। गोधन न्याय योजना के बहुआयामी परिणामों को देखते हुए देश के अनेक राज्य इसे अपनाने लगे हैं। इस योजना के तहत, अमीर हो या गरीब, सभी को लाभ मिल रहा है।


ये भी पढ़ें:
प्राकृतिक खेती के साथ देसी गाय पालने वाले किसानों को 26000 दे रही है सरकार

गौमूत्र से बने ब्रम्हास्त्र व जीवामृत का किसान करे उपयोग

अब आते हैं गौमूत्र से बने कीटनाशक की बात पर। विदित हो कि किसान अब जैविक खेती को अपना रहे हैं। ऐसे में गौमूत्र से बने ब्रम्हास्त्र व जीवामृत का उपयोग किसान अपने क्षेत्र में करने लगे हैं। राज्य की महत्वकांक्षी सुराजी गांव योजना के अंतर्गत, गोधन न्याय योजना के तहत अकलतरा विकासखण्ड के तिलई गौठान एवं नवागढ़ विकासखण्ड के खोखरा गौठान में गौमूत्र खरीदी कर, गोठान समिति द्वारा जीवामृत (ग्रोथ प्रमोटर) एवं ब्रम्हास्त्र (जैविक कीट नियंत्रक) का उत्पादन किया जा रहा है।


ये भी पढ़ें:
Cow-based Farming: भारत में गौ आधारित खेती और उससे लाभ के ये हैं साक्षात प्रमाण
गौठानों में सैकड़ों लीटर गौमूत्र की खरीदी की जा चुकी है। जिसमें निर्मित जैविक उत्पाद का उपयोग जिले के कृषक कृषि अधिकारियों के मार्गदर्शन में अपने खेतों में कर रहे हैं। इससे कृषि में जहरीले रसायनों के उपयोग के विकल्प के रूप में गौमूत्र के वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा मिलेगा, रसायनिक खाद तथा रसायनिक कीटनाशक के प्रयोग से होने वाले हानिकारक प्रभाव में कमी आयेगी, पर्यावरण प्रदूषण रोकने में सहायक होगा तथा कृषि में लगने वाली लागत में कमी आएगी।

50 रुपए लीटर ब्रम्हास्त्र और जीवामृत (वृद्धि वर्धक) का मूल्य 40 रुपए लीटर

गौमूत्र से बनाए गए कीट नियंत्रक ब्रम्हास्त्र का विक्रय मूल्य 50 रूपये लीटर तथा जीवामृत (वृद्धि वर्धक) का विक्रय 40 रूपये लीटर है। इस प्रकार गौमूत्र से बने जैविक उत्पादों के दीर्घकालिन लाभ को देखते हुए जिले के कृषक बंधुओं को इसके उपयोग की सलाह कृषि विभाग द्वारा दी जा रही है।
प्राकृतिक खेती के जरिये इस प्रकार होगा गौ संरक्षण

प्राकृतिक खेती के जरिये इस प्रकार होगा गौ संरक्षण

मध्य प्रदेश राज्य के मुरैना जनपद में आयोजित हुए कृषि मेला के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया है, कि खेती में डीएपी, यूरिया का बेहद कम इस्तेमाल करें। साथ ही, जैव उर्वरक व नैनो यूरिया का प्रयोग बढ़ना चाहिए। किसानों को जैविक व प्राकृतिक खेती की तरफ रुख करना चाहिए। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों से प्राकृतिक खेती पर अधिक ध्यान देने की बात कही है। मध्य प्रदेश के मुरैना जनपद में आयोजित कृषि मेले में उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती के माध्यम से गौवंश की उपयोगिता में वृद्धि होगी। गाय के गोबर व गौमूत्र के प्रयोग से उर्वरक निर्मित करेंगे तो निश्चित रूप से कम लागत लगेगी। साथ ही, इस प्रकार से उत्पादन करना स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद रहेगा। आज आवश्यकता इस बात की है, कि खेती की लागत कम हो और किसानों की आमदनी बढ़ती रहे। उत्पाद उम्दा किस्म के होने चाहिए एवं खेतों में सूक्ष्म सिंचाई का प्रयोग करना चाहिए, इससे जल की बचत भी होगी और फसल की पैदावार भी होगी। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का यह भी कहना है, कि भारत में ८० प्रतिशत लघु किसान हैं, जिनकी सहायता के लिए १० हजार नवीन एफपीओ गठित करने की योजना तैयार की है। जिसके लिए ६,८६५ करोड़ खर्च करेगी केंद्र सरकार।


ये भी पढ़ें:
गौमूत्र से बना ब्रम्हास्त्र और जीवामृत बढ़ा रहा फसल पैदावार

खाद्य तेलों की कमी की भरपाई होगी

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि तिलहन की घटोत्तरी व आयात निर्भरता को कम करने हेतु सरकार द्वारा ऑयल पाम मिशन बनाया गया है। जिसके लिए ११ हजार करोड़ रूपये खर्च करेगी सरकार। किसान तकनीक का इस्तेमाल करेंगे तो इसका लाभ आने वाली पीढ़ियों को भी होगा एवं गांव देहातों में नवीन आय के स्त्रोत उत्पन्न होंगे। भारत एक कृषि प्रधान देश है इसलिए आर्थिक संकट व मुसीबत की घड़ी में कृषि क्षेत्र अपनी अहम भूमिका निभाता है

इन किसानों को काफी लाभ मिलेगा

नरेंद्र तोमर ने कहा कि यह कृषि मेला अंचल, चंबल व ग्वालियर के लिए बेहतर कृषि के हिसाब से बहुत सहायक साबित होगा। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर ने इस कृषि मेले के दौरान लगभग हजारों किसानों का मार्गदर्शन किया एवं प्रशिक्षण भी दिया साथ ही किसानों की सहायता हेतु भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) समेत पुरे देश से आये हुए कृषि संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिकों को साधूवाद दिया। साथ ही, मेले को आयोजित करने हेतु समस्त सहायक निधियों का आभार व्यक्त किया। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=BwU3hGXNodM&t=86s[/embed]

नरेंद्र तोमर ने कहा किसानों की आय दोगुनी हो गयी है

नरेंद्र तोमर का कहना है कि आज कृषि संबंधित योजनाएं आय बढ़ाने से संबंधित बनाई गयी हैं जबकि पूर्व में सिर्फ पैदावार से संबंधित योजनाएं बनाई जाती थी। आय में वृद्धि हेतु कई सारी योजनाएं लागू की जा रही हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों की आय दोगुना से ज्यादा करने के लिए कहा उसके उपरांत केंद्र एवं राज्य सरकारों व किसानों ने एक जुट होकर इस ओर भरपूर प्रयास किए हैं। श्रीनगर (कश्मीर) में केसर का उत्पादन होता है, इसलिए केंद्र सरकार द्वारा केसर पार्क स्थापित हुआ साथ ही अन्य सहायक सुविधाऐं प्रदान की जिसके परिणामस्वरूप १ लाख रूपये किलो भाव से बढ़कर २ लाख रूपये किलो हो गयी है।
गाय के गोबर से बनाए जा रहे हैं कई तरह के इको फ्रेंडली प्रोडक्ट, आप भी कमा सकते हैं अच्छा खास मुनाफा

गाय के गोबर से बनाए जा रहे हैं कई तरह के इको फ्रेंडली प्रोडक्ट, आप भी कमा सकते हैं अच्छा खास मुनाफा

गाय को बहुत ही उपयोगी माना गया है और साथ ही गोमूत्र को बहुत सी लाइलाज बीमारियों का इलाज भी कहा गया है। आजकल गोमूत्र के साथ-साथ गाय के गोबर का इस्तेमाल भी कई तरह की चीजों में किया जा रहा है। हाल ही में एक रिपोर्ट के अनुसार गाय के गोबर से बने हुए घर में ऑटोमेटिक रेडिएशन का असर नहीं पड़ता है। गाय के गोबर का इस्तेमाल भी रसोई गैस से लेकर देसी खाद और जैव उर्वरक बनाने में किया जा रहा है। इससे पेंट, पेपर, बैग, ईंट, गौकाष्ठ लकड़ी और दंत मंजन तक बनाए जा रहे हैं। एक अकेली गाय प्राकृतिक खेती के खर्च का आधा कर देती है। यदि आप भी गाय पालते हैं, तो इसके दूध के साथ-साथ गोबर और गौमूत्र को बेचकर अच्छा पैसा कमा सकते हैं।

गोबर से ऑर्गेनिक पेंट (Cow Dung Organic Paint)

पुराने जमाने में घरों को गाय के गोबर से लीपा जाता था। इससे घर ठंडा भी रहता है और साथ ही कीट पतंग भी घर में नहीं आते हैं। भैंस और विदेशी, ब्राजीलियन, जर्सी नस्लों के गोबर में 50 से 70 लाख बैक्टीरिया हैं, लेकिन देसी गाय के एक ग्राम गोबर में 3 से 5 करोड़ बैक्टीरिया मौजूद हैं, जो घर को सुरक्षित रखते हैं। साइंस ने भी ऐसा मानना है, कि गाय के गोबर का इस्तेमाल करने से घरों में कीट पतंग नहीं आते हैं। अब इसी विज्ञान के मद्देनजर गोबर से ऑर्गेनिक पेंट (Organic Paint) बनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के गौठानों में ना सिर्फ फुली ऑर्गेनिक पेंट (Organic Paint) का उत्पादन हो रहा है। बल्कि बाजार में यह पेंट मल्टीनेशनल कंपनियों के पेंट से सस्ता भी बिक रहा है।
ये भी देखें: इस राज्य की आदिवासी महिलाएं गोबर से पेंट बनाकर आत्मनिर्भर बन रहीं हैं
इसके अलावा खादी इंडिया ने भी गोबर से बना हुआ वैदिक पेंट लॉन्च किया है। इसके अलावा, इस गोबर से पेपर, बैग, मैट से लेकर ईंट समेत कई इको-फ्रैंडली प्रोडक्ट लॉन्च किए जा चुके हैं, जो कैमिकल प्रोडक्ट्स का अच्छा विकल्प हैं।

खेती से लेकर रसोई गैस का इंतजाम

हम सभी जानते हैं, कि केमिकल के बढ़ते हुए इस्तेमाल से जमीन बंजर हो रही है। इनका स्वास्थ्य पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है। इस समस्या को खत्म करने के लिए किसानों को जीरो बजट प्राकृतिक खेती करने के लिए प्रेरित किया जाता है। जिसमें पूरी तरह से जैविक खाद का इस्तेमाल किया जाता है, जो गोबर और गोमूत्र से बनाई जाती है। इस कार्य को पूरा करने के लिए कई राज्य सरकारें किसानों को गाय उपलब्ध करवा रही है। साथ ही, ज्यादा से ज्यादा गाय पालने के लिए प्रेरित कर रही है। साथ ही किसानों को गाय का दूध बेचकर भी अच्छी आमदनी मिल जाती है। यदि आप पशुपालक हैं और खुद का डेयरी फार्म चलाते हैं, तो एक बायोगैस प्लांट (Biogas Plant) भी लगा सकते हैं, जिससे पूरे गांव को फ्री में रसोई गैस मिल सकती है।

कागज और कैरी बैग

आपको यह जानकर बहुत हैरानी होगी कि भारत में गोबर से एक बहुत ही मजबूत कागज और कैरी बैग भी तैयार किया जा रहा है। यह जयपुर स्थित कुमारप्पा नेशनल हैंडमेड पेपर इंस्टीट्यूट के प्रयासों का नतीजा है। इस संस्थान में गाय के गोबर से कागज बनाने का तरीका सिखाया जाता है। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम’ से जोड़कर लोगों को इस तरह के उत्पाद बनाने के लिए जागरूक भी किया जाता है। यह पर्यावरण के लिए भी अच्छा है। साथ ही, ग्रामीण लोगों को रोजगार देने में भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।

रेडिएशन कम करने वाले स्टीकर

रिपोर्ट की मानें, तो गोबर से इस तरह के स्टीकर बनाए जा रहे हैं। जो मोबाइल के रेडिएशन कम करने की ताकत रखते हैं। साथ ही, गोबर से अलग अलग तरह की माला बनाई जा रही है। जो सन आयु संबंधित बीमारियों से राहत दे रहे हैं। जहां गोबर से तैयार दंज मंजन को मुंह के पायरिया को खत्म करने में प्रभावी बताया जा रहा है। तो वहीं इससे बने साबुन को स्किन एलर्जी में लाभकारी बताया जा रहा है। इसके अलावा, दीवाली पर गोबर से बने दिए, मूर्तियां भी काफी चर्चाओं में रहती हैं। त्यौहार आते ही इनकी मार्केटिंग भी खूब अच्छी हो जाती है।
ये भी देखें: गौमूत्र से बना ब्रम्हास्त्र और जीवामृत बढ़ा रहा फसल पैदावार

गौमूत्र से ही बन रही है औषधी, कीटनाशक और फिनाइल

आयुर्वेद में गाय के मूत्र को संजीवनी समान बताया गया है। बहुत सी आयुर्वेदिक संस्थानों ने तो गोमूत्र को कैंसर का सफल इलाज भी बताया है। इसमें बहुत से औषधीय गुण होते हैं, जो पेट और चर्म रोग संबंधी कई तरह की बीमारियों को खत्म कर सकते हैं। इसके अलावा गोमूत्र को पीलिया, सांस की बीमारी, आस्थापन, वस्ति, आनाह, विरेचन कर्म, मुख रोग, नेत्र रोग, अतिसार, मूत्राघात, कृमिरोग,हृदय रोग, कैंसर, टीबी, पीलिया, मिर्गी, हिस्टिरिया जैसे घातक रोगों में भी प्रभावी बताया जाता है। इस तरह से गोमूत्र सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि प्रकृति के लिए भी बहुत ही लाभकारी है। आज के आधुनिक दौर में भी गौमूत्र को एक प्रभावी कीटाणुनाशक माना जा रहा है। इसी तर्ज पर कई कंपनियों ने गौमूत्र से कैमिकमुक्त फिनाइल भी तैयार कर दिया है।