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चुकंदर

चुकंदर की खेती के लिए भूमि प्रबंधन, उन्नत किस्में व मृदा और जलवायु

चुकंदर की खेती के लिए भूमि प्रबंधन, उन्नत किस्में व मृदा और जलवायु

भारत के अंदर अधिकतर लोग चुकंदर खाना काफी पसंद करते हैं। किसी को चुकंदर सलाद के रूप में तो किसी को जूस के रूप में चुकंदर काफी अच्छा लगता है। 

हालांकि, बहुत सारे लोग इसका जूस पीना भी काफी पसंद करते हैं। बतादें, कि चुकंदर में पोटेशियम, विटामिन सी, फोलेट, विटामिन बी9, मैंगनीज और मैग्नीशियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है। 

इसका सेवन करने से शरीर में रक्त की कमी नहीं होती है। यही कारण है, कि इसकी बाजार में मांग सदैव बरकरार बनी रहती है। अब ऐसे में यदि किसान भाई चुकंदर की खेती करते हैं, तो उनको एक शानदार और अच्छी कमाई आसानी से प्राप्त हो सकती है।

मुख्य बात यह है, कि चुकंदर औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इस वजह से इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार में भी किया जाता है। साथ ही, इससे बहुत प्रकार की आयुर्वेदिक औषधियां भी तैयार की जाती हैं। 

बाजार में इसका भाव हमेशा 30 से 40 रुपये किलो तक रहता है। अब ऐसी स्थिति में यदि किसान भाई चुकंदर की खेती करने की योजना बना रहे हैं, तो उनके लिए यह काफी अच्छी खबर है। यदि वैज्ञानिक विधि के माध्यम से चुकंदर की खेती की जाए, तो किसानों को बंपर पैदावार मिलेगी।

चुकंदर की सबसे लोकप्रिय व उन्नत किस्में कौन-सी हैं ?

बलुई दोमट मृदा में चुकंदर की खेती करने पर काफी बेहतरीन उपज मिलती है। इसकी खेती के लिए मृदा का पीएच मान 6 से 7 के मध्य उचित माना गया है। 

वहीं, गर्मी, बारिश और सर्दी किसी भी मौसम में इसकी आसानी से खेती की जा सकती है। यदि किसान भाई गर्मी के मौसम में चुकंदर की खेती करने की योजना बना रहे हैं, तो सर्वप्रथम अच्छी और बेहतरीन किस्मों का चयन करें। 

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अर्ली वंडर, मिस्त्र की क्रॉस्बी, डेट्रॉइट डार्क रेड, क्रिमसन ग्लोब, रूबी रानी, रोमनस्काया और एमएसएच 102 चुकंदर की सबसे लोकप्रिय किस्में हैं। इन किस्मों की खेती करने पर किसान को बंपर पैदावार हांसिल होती है। 

चुकंदर की बुवाई एवं भूमि प्रबंधन इस तरह करें 

चुकंदर की बुवाई करने से पूर्व खेत की कई बार जुताई की जाती है। उसके बाद 4 टन प्रति एकड़ की दर से खेत में गोबर की खाद डालें और पाटा लगाकर जमीन को एकसार कर दें। अब इसके बाद क्यारी बनाकर चुकंदर की बुवाई करें।

विशेष बात यह है, कि छिटकवां और मेड़ विधि से चकुंदर की बुवाई की जाती है। अगर आप छिटकवां विधि से चुकंदर की बुवाई कर रहे हैं, तो आपको एक एकड़ में 4 किलो बीज की आवश्यकता पड़ेगी। 

वहीं, यदि आप मेड़ विधि से बुवाई करते हैं तो किसान को कम बीज की आवश्यकता पड़ती है। मेड़ विधि में पहले 10 इंच ऊंची मेड़ बनाई जाती है। अब इसके बाद मेड़ पर 3-3 इंच की दूर पर बीजों को बोया जाता है। 

बुवाई के कितने दिन बाद फसल पूर्णतय तैयार हो जाती है ?

बतादें, कि चुकंदर एक कंदवर्गीय श्रेणी में आने वाली फसल है। इसलिए समय-समय पर इसकी निराई- गुड़ाई की जाती है। साथ ही, आवश्यकता के अनुरूप सिंचाई भी करनी पड़ती है। 

बुवाई करने के 120 दिन पश्चात फसल पककर तैयार हो जाती है। अगर आपने एक हेक्टेयर में खेती कर रखी है, तो 300 क्विंटल तक उपज मिलेगी। यदि 30 रुपये किलो के हिसाब से चुकंदर बेचते हैं, तो इससे आसानी से लाखों रुपये की आय होगी।

किसान भाई महीनों के अनुरूप सब्जी उगाकर तगड़ा मुनाफा कमा सकते हैं ?

किसान भाई महीनों के अनुरूप सब्जी उगाकर तगड़ा मुनाफा कमा सकते हैं ?

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां के ग्रामीण क्षेत्रों की 70% फीसदी से ज्यादा आबादी कृषि व कृषि संबधी कार्यों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है। हम लोग खेती-किसानी का कार्य हम जितना सहज समझते हैं, वास्तविकता में यह उतना ज्यादा आसान नहीं है। 

दरअसल, खेती में भी कृषकों को जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। कृषि क्षेत्र के अंदर सर्वाधिक जोखिम फसल को लेकर है। अगर उचित समय पर फसल की बुवाई कर दी जाए तो पैदावार शानदार हांसिल हो सकती है। 

वहीं अगर समय का प्रतिकूल चुनाव किया गया तो कोई सी भी फसल बोई जाए उत्पादन बहुत कम हांसिल होता है। परिणामस्वरूप, किसानों की आमदनी में भी गिरावट आ जाती है। 

किसानों को प्रत्येक फसल की शानदार उपज प्राप्त हो सके इसके लिए हम आपको बताएंगे कि आप किस महीने में कौन-सी सब्जी की बुवाई करें। जिससे आपको ज्यादा उपज के साथ ही बेहतरीन लाभ हांसिल हो सके। माहवार सब्जी की खेती कृषकों के लिए सदैव लाभ का सौदा रही है। 

किसान भाई जनवरी के महीने में इन फसलों को उगाएं

किसान भाइयों को वर्ष के प्रथम महीने जनवरी में किसान भाईयों को मूली, पालक, बैंगन, चप्पन कद्दू, राजमा और शिमला मिर्च की उन्नत किस्मों की बुवाई करनी चाहिए। 

किसान भाई फरवरी के महीने में इन फसलों को उगाएं

फरवरी के महीने में राजमा, शिमला मिर्च, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, फूलगोभी, बैंगन, भिण्डी, अरबी, ग्वार बोना ज्यादा लाभदायक होता है। 

किसान भाई मार्च के महीने में इन फसलों को उगाएं

किसान भाइयों को मार्च के महीने में लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, भिंडी, अरबी, ग्वार, खीरा-ककड़ी, लोबिया और करेला की खेती करने से लाभ हांसिल हो सकता है। 

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किसान भाई अप्रैल के महीने में इन फसलों को उगाएं  

किसान भाई अप्रैल के महीने में चौलाई, मूली की बुवाई कर सकते हैं। 

किसान भाई मई के महीने में इन फसलों को उगाएं  

किसान भाई मई के महीने में मूली, मिर्च, फूलगोभी, बैंगन और प्याज की खेती से शानदार पैदावार अर्जित कर सकते हैं। 

किसान भाई जून के महीने में इन फसलों को उगाएं  

कृषक जून के महीने में किसानों को करेला, लौकी, तुरई, पेठा, बीन, भिण्डी, टमाटर, प्याज, चौलाई, शरीफा, फूलगोभी, खीरा-ककड़ी और लोबिया आदि की बुवाई करनी चाहिए।

किसान भाई जुलाई के महीने में इन फसलों को उगाएं  

किसान भाई जुलाई के महीने में खीरा-ककड़ी-लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, भिंडी, टमाटर, चौलाई, मूली की फसल लगाना ज्यादा मुनाफादायक रहता है।

किसान भाई अगस्त के महीने में इन फसलों को उगाएं  

किसान भाई अगस्त के महीने में बीन, टमाटर, काली सरसों के बीज, पालक, धनिया, ब्रसल्स स्प्राउट, चौलाई, गाजर, शलगम और फूलगोभी की बुवाई करना अच्छा रहता है।

किसान भाई सितंबर के महीने में इन फसलों को उगाएं  

किसान भाई सितंबर के महीने में आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्ता गोभी, धनिया, सौंफ के बीज, सलाद, ब्रोकोली, गाजर, शलगम और फूलगोभी की खेती से शानदार उपज प्राप्त हो सकती है।

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किसान भाई अक्टूबर के महीने में इन फसलों को उगाएं 

किसान भाई अक्टूबर के महीने में काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्ता गोभी, धनिया, सौंफ के बीज, राजमा, मटर, ब्रोकोली, सलाद, बैंगन, हरी प्याज, लहसुन, गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू और टमाटर की खेती करना लाभकारी हो सकता है।

किसान भाई नवंबर के महीने में इन फसलों को उगाएं 

किसान भाई नवंबर के महीने में टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्ता गोभी, शिमला मिर्च, लहसुन, प्याज, मटर, धनिया, चुकंदर, शलगम और फूलगोभी की फसल को उगाकर कृषक बेहतरीन लाभ कमा सकते हैं।

किसान भाई दिसंबर के महीने में इन फसलों को उगाएं 

किसान भाई दिसंबर के महीने में पालक, पत्ता गोभी, सलाद, बैंगन, प्याज, टमाटर, काली सरसों के बीज और मूली की खेती से बेहतरीन मुनाफा अर्जित किया जा सकता है।

चुकंदर की खेती - Chukandar (Beet Root Farming information in Hindi)

चुकंदर की खेती - Chukandar (Beet Root Farming information in Hindi)

दोस्तों आज हम बात करेंगे चुकंदर की, इसको इंग्लिश में Beet Root भी कहते हैं। चुकंदर के एक नहीं बहुत सारे फायदे हैं, चुकंदर की खेती की पूरी जानकारी और उनसे होने वाले बेनिफिट्स के बारे में जानने के लिए हमारी इस पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहें है। 

चुकंदर

चुकंदर एक ऐसा फल है जिसको लोग खाना बहुत पसंद करते हैं। लोग चुकंदर को सब्जियों के तौर पर पकाकर ,बिना पकाए ,कच्चा,आदि के रूप में खाना पसंद करते हैं। क्योंकि चुकंदर में विभिन्न विभिन्न प्रकार के औषधि गुण है जो शरीर को बहुत फायदा पहुंचाते हैं। चुकंदर का स्वाद थोड़ा मीठा होता है चुकंदर जमीन के अंदर पाए जाते हैं। लोग चुकंदर के फल के साथ ही साथ इनके पत्तों का भी इस्तेमाल करते हैं। सब्जी सलाद आदि के तौर पर, चुकंदर हमारे लिए इतना उपयोगी होता है कि कभी-कभी डॉक्टर विभिन्न प्रकार के रोग हो जाने पर चुकंदर खाने की सलाह देते हैं। जैसे: खून की कमी ,एनीमिया, कैंसर ,हृदय रोग, पित्ताशय विकारों, बवासीर, गुर्दे के विकारों जैसी समस्या को दूर करने के लिए डॉक्टर चुकंदर खाने की सलाह मरीजों को देते हैं। इन कारणों से चुकंदर की मांग बहुत बढ़ जाती है और किसान इस फसल से काफी अच्छा धन निर्यात कर लेते हैं। 

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चुकंदर की फसल की खेती

चुकंदर जैसी लाभदायक फसल की खेती करने के लिए किसान ज्यादातर बलुई दोमट मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं। चुकंदर की खेती करते समय किसान जलभराव वाली समस्या से बचने का भी पूर्ण ध्यान रखते हैं। क्योंकि जलभराव वाली भूमि चुकंदर के फल को पूरी तरह से सड़ा सकती हैं और विभिन्न  प्रकार की समस्याओं को भी पैदा कर सकती है। खेती के लिए कम से कम भूमि का पीएच मान 6 से 7 के बीच का होना आवश्यक होता है। 

चुकंदर की खेती के लिए जलवायु तथा तापमान :

चुकंदर की फसल के लिए सबसे अच्छा मौसम ठंड का बताते हैं, क्योंकि ठंडी के मौसम में चुकंदर की फसल काफी अच्छी तरह से उत्पादन के साथ ही साथ, विकास भी भरपूर होता है। जो प्रदेश ठंडे होते हैं वहां चुकंदर की फसल को काफी उपयुक्त माना जाता है। चुकंदर एक ऐसी फसल है जिसके लिए बहुत ज्यादा बारिश की कोई आवश्यकता नहीं होती है।बारिश किसी भी प्रकार से चुकंदर की फसल को प्रभावित नहीं करती है। चुकंदर की फसल के लिए 20 डिग्री का तापमान इसकी फसल के लिए काफी होता है। सामान तापमान भी चुकंदर की फसल के लिए उपयुक्त समझा जाता है। 

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चुकंदर की फसल के लिए खेत को तैयार करना

सर्वप्रथम चुकंदर की फसल के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार करना आवश्यक होता है। चुकंदर की फसल को उगाने के लिए भूमि की अच्छी गहरी जुताई करनी चाहिए। जुताई के बाद खेतों को कुछ देर के लिए ऐसी ही खुला छोड़ना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से खेतों में भली प्रकार से धूप लग जाती है। चुकंदर की जड़े काफी गहराई में रहती है जिसके फलस्वरूप यह खनिज पदार्थों को ग्रहण करने की क्षमता नहीं रखते। उवर्रक की मात्रा अच्छे से देना जरूरी होता है खेत तैयार करते समय या खेतों के लिए उपयोगी माना जाता है। खेतों में किसान लगभग 14 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद और कल्टीवेटर के जरिए, कम से कम दो से तीन बार तिरछी जुताई करते हैं जिससे मिट्टी में खाद अच्छे से भिन्न जाए।

 खेतों में पानी देने के बाद तीन से चार दिनों के लिए खेतों को ऐसे ही छोड़ देना आवश्यक होता है। जब मिट्टी पानी को अपने अंदर अवशोषित कर ले और ऊपरी सता सूखी नजर आने लगे तो रोटावेटर के जरिए जुताई कर लेनी चाहिए। खेतों को समतल करने के लिए पाटा लगाकर अच्छी तरह जुताई करें। इस प्रक्रिया से जमीन पूरी तरह से समतल हो जाती है और कोई भी जलभराव की समस्या नहीं पैदा होती।चुकंदर की फसलों के छिड़काव के लिए कुछ रसायनिक उर्वरकों का भी इस्तेमाल किया जाता है। जैसे : नाइट्रोजन 40 किलो पोटाश 60 किलो तथा 80 किलो पोटाश की मात्रा प्रति हेक्टेयर का इस्तेमाल जुताई के लिए किया जाता है, यह आखरी जुताई होती है।

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चुकंदर की बीजो की रोपाई, समय तथा तरीका

चुकंदर के लिए रोपाई का समय सबसे अच्छा ठंडी का होता है। बीज रोपण किसान अक्टूबर और नवंबर के महीने में करना शुरू कर देते हैं। बीज रोपण करने से पहले बीजो को अच्छी तरह से उपचारित कर लेना आवश्यक होता है। उपचारित करने से खेतों में किसी भी प्रकार का रोग नहीं लगता। अनुमान के हिसाब से एक हेक्टेयर खेत में लगभग 8 किलो बीजों की जरूरत पड़ती है। इन क्रियाओं के बाद बीज रोपण किया जाता है।

चुकंदर के पौधों की सिंचाई के तरीके

चुकंदर के पौधों की सिंचाई के लिए भूमि में नमी बरकरार रहना आवश्यक होता है। क्योंकि इससे पौधे बहुत अच्छी तरह से अंकुरित होते हैं। बीज रोपण के बाद सर्वप्रथम सिंचाई देनी चाहिए। जब बीज अंकुरित हो जाए ,तो आप खेतों में पानी की मात्रा को कम कर सकते हैं। चुकंदर के पौधों की सिंचाई लगभग 8 से10 दिनों के अंदर करते रहना चाहिए। दोस्तों हम उम्मीद करते हैं कि हमारा Chukandar (Beet Root) वाला आर्टिकल आपको काफी पसंद आया होगा। इस आर्टिकल में चुकंदर की पूर्ण जानकारी दी गई है। जो आपके भविष्य में काम आ सकती है यदि आप हमारी दी हुई जानकारी से संतुष्ट हुए हैं। तो हमारी इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया और अन्य स्थानों और दोस्तों के साथ शेयर करें।

कैसे करें चुकंदर की खेती; जाने फसल के बारे में संपूर्ण जानकारी

कैसे करें चुकंदर की खेती; जाने फसल के बारे में संपूर्ण जानकारी

चुकंदर एक ऐसी कंद वर्गीय फसल  है जिसका सेवन  अलग-अलग तरीकों से किया जा सकता है। इसे आप कल की तरह कच्चा खा सकते हैं या फिर सब्जी की तरह पका कर भी इसे खाया जा सकता है। 

इसके अलावा चुकंदर को बहुत से पेय पदार्थ में भी इस्तेमाल किया जाता है जो आपके स्वास्थ्य के लिए तो लाभदायक होता ही है साथ ही त्वचा की हेल्थ के लिए भी काफी अच्छा माना जाता है। 

 चुकंदर से बनाई जाने वाली सब्जी को बहुत से लोग मीठी सब्जी कहते हैं क्योंकि इसका स्वाद हल्का सा मीठा होता है। चुकंदर जमीन के नीचे उगता है और इसकी सबसे खास बात यह है कि चुकंदर के पत्तों की अलग से सब्जी बनाई जा सकती है।  

इस में पाए जाने वाले पोषक तत्व के बारे में सभी लोग जानते हैं और साथ ही हम सब को यह जानकारी जरूर है कि  यह हमारे स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक है। 

खून की कमी,अपच, ह्रदय रोग और कैंसर जैसी बड़ी बड़ी बीमारियों के लिए भी डॉक्टर के द्वारा बहुत बार चुकंदर के सेवन करने की सलाह दी जाती है। 

मार्केट में चुकंदर की मांग लगभग 12 महीने बनी रहती है और ऐसे में किसान फसल का उत्पादन करते हुए अच्छी खासी कमाई कर सकते हैं। 

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ठंडे क्षेत्रों को चुकंदर की खेती के लिए एकदम सही माना जाता है और इसीलिए भारत में चुकंदर की खेती ज्यादातर उत्तराखंड,  कश्मीर,  हिमाचल प्रदेश और राजस्थान और पंजाब के ठंडे इलाकों में ज्यादातर रबी के सीजन में की जाती हैं।  

इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको चुकंदर के बारे में संपूर्ण जानकारी देने वाले हैं जिसको पढ़ते हुए आप इस फसल का उत्पादन करके मुनाफा कमा सकते हैं।

कैसे करें चुकंदर की खेती

चुकंदर की खेती (chukandar ki kheti) के लिए अगर सही तरह की मिट्टी और जलवायु की बात की जाए तो इस फसल के उत्पादन के लिए बलुई दोमट मिट्टी को सबसे ज्यादा सही माना जाता है। 

इसकी खेती करने के लिए भूमि का P.H. मान 6 से 7 के बीच होना आवश्यक है। इसके अलावा चुकंदर की खेती करते हुए आपको इस बात का खास ख्याल रखने की जरूरत है कि आप की जमीन में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए क्योंकि अगर जमीन में कभी भी जलभराव की स्थिति उत्पन्न होती है तो यह पौधे इसके कारण सड़ने लगते हैं। 

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अगर किसान भाई चाहते हैं कि वह मैग्नीशियम, कैल्शियम, आयोडीन, पोटेशियम, आयरन, विटामिन-सी, और विटामिन-B से भरपूर चुकंदर की खेती  करें तो उसके लिए आदर्श तापमान 18 से 21 डिग्री सेल्सियस तक माना गया है।

भारत में चुकंदर की खेती (Beetroot cultivation in India) के लिए सबसे अच्छा मौसम

अगर भारत की बात की जाए तो यहां पर चुकंदर की खेती करने के लिए अक्टूबर के पहले हफ्ते से लेकर जनवरी तक इसकी खेती की जा सकती हैं।  

सर्दियों के मौसम में चुकंदर के पौधे का विकास बहुत तेजी से होता है और इस पर आपको ज्यादा मेहनत करने की जरूरत भी नहीं पड़ती है।  इसके अलावा एक बात का ध्यान हमेशा रखें कि गर्मियों के मौसम में कभी भी चुकंदर की खेती ना करें। 

साथ ही आपको यह भी ध्यान में रखना है कि बहुत ज्यादा ठंड के मौसम में या फिर जब पाला पड़ने की स्थिति होती है तब भी चुकंदर की खेती करने से बचें क्योंकि यह फसल ऐसे मौसम में प्रभावित हो सकती हैं।

क्या है चुकंदर की खेती के लिए कुछ बढ़िया किस्में

बाजार में आपको चुकंदर की बहुत सी किसमें देखने को मिल जाती हैं लेकिन इसकी कुछ बेहद अच्छी किस्मों के नाम इस प्रकार से हैं;

  • पुष्पा
  • डार्क एज
  • एक्सीडेंटल
  • क्यू टी
  • अल्बर्टीना
  • काली लाल
  • बुले दी
  • गोल्डन
  • चियोगिया
  • बादामी

कैसे करें खेत की तैयारी?

चुकंदर की खेती करने से पहले आपको खेत की गहरी जुताई करना बेहद अनिवार्य है। इसके लिए किसान कल्टीवेटर और रोटावेटर का इस्तेमाल कर सकते हैं। 

एक बार गहरी जुताई करने के बाद आप दो-तीन बार खेत की हल्की जुताई कर ले और उसके बाद ही खेत में बीज डाले इसके अलावा अगर आप चाहते हैं कि आप की पैदावार अच्छी हो तो उसके लिए कोशिश करें कि अपने खेत में प्रति एकड़ के हिसाब से 4 टन गोबर खाद डाल दें।

चुकंदर की फसल की बुवाई की विधि

चुकंदर की फसल की बुवाई के लिए दो विधि अपनाई जा सकती हैं जिसमें से एक है छिड़काव विधि और दूसरी है दूसरी मेड़ विधि है. 

छिटकवा विधि – छिड़काव विधि में खेत में अलग-अलग क्यारियां बनाकर उसमें बीजों को फेंककर बुवाई की जाती है।  इस विधि में अगर लागत की बात की जाए तो प्रति एकड़ लगभग 4 किलो बीज लग जाता है। 

मेड़ विधि – इस विधि में लगभग 10-10 इंच की दूरी पर मेड बनाई जाती है और उस पर बीजों की बुवाई की जाती है।  इसमें हर एक पौधे के बीच में लगभग 3 इंच की दूरी रखी जाती है।  इसके अलावा कुछ चीजें जो आपको इसकी खेती करते समय ध्यान में रखने की जरूरत है वह है;

खेत को उत्तम तरीके से जोता जाना चाहिए और खेत की मिट्टी को उन्नत बनाने के लिए उर्वरक डालना चाहिए।

  • फसल के लिए उत्तम बीज चुनें और बीजों को बुवाई के लिए नियमित अंतराल पर फसल की आवश्यकताओं के अनुसार खेत में बोएं।
  • बीज को बोते समय गहराई लगभग 2 सेमी तक होनी चाहिए।
  • फसल के बाद सिंचाई जरूरी होती है, इसलिए फसल के बाद समय-समय पर सिंचाई की जानी चाहिए।
  • फसल को उगने के दौरान खेत में खरपतवार, कीटाणु और बीमारियों से निपटने के लिए उचित देखभाल दी जानी चाहिए।
  • फसल की उन्नति के लिए उत्तम उर्वरक, खाद और पेस्टिसाइड का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
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चुकंदर की खेती (chukandar ki kheti) में कैसे रखें सिंचाई और उर्वरक का ध्यान?

चुकंदर की फसल ऐसी होती है जिसमें बहुत ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती हैं लेकिन फिर भी समय-समय पर हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए।  

पहली सिंचाई आप फसल बोने के 15 दिनों बाद कर सकते हैं और उसके लगभग पांच-छह दिन बाद दूसरी सिंचाई की जा सकती हैं।  इसके अलावा अगर आप का क्षेत्र ऐसा है जहां पर बरसात नहीं हो रही है तो लगभग हर एक आठ से 10 दिन के बीच में सिंचाई करते रहना चाहिए। 

उर्वरक की बात की जाए तो चुकंदर की खेती करते समय यूरिया, डी.ए.पी यानि डाई-एमोनियम फॉस्फेट और पोटाश का इस्तेमाल किया जा सकता है और इन सब का प्रयोग आप अपने खेत में प्रति एकड़ के हिसाब से करें।  

साथ ही माना जाता है कि अगर चुकंदर की खेती करते समय आप जैविक या ऑर्गेनिक खाद डालते हैं तो उत्पादन बेहतर रहता है। 

चुकंदर की खेती करने से पहले अपने खेत में वरुण की मात्रा का प्रशिक्षण जरूर करवा लें क्योंकि अगर आप के खेत में वरुण की कमी है तो चुकंदर के पौधों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं और समय के साथ टूटने लगती हैं। 

अगर खेत में और उनकी कमी है तो आप बोरिक एसिड या बोरॉक्स  जमीन में डाल सकते हैं।

चुकंदर की फसल में लगने वाले रोग

हालांकि चुकंदर एक ऐसी फसल है जिसमें बहुत ज्यादा रोग नहीं लगते हैं लेकिन फिर भी अगर अच्छी तरह से इसकी देखभाल न की जाए तो फसल को रोक लगने की संभावना रहती है। 

चुकंदर की फसल में विभिन्न प्रकार के रोग हो सकते हैं, जैसे कि दाग पत्तियों वाला रोग, पत्तों की खारीद, धुंधली जड़ें, प्याज की तरह अर्ध-परिपक्वता, फसल के नीचे सफेद कीट, विभिन्न प्रकार की फंगल संक्रमण, आदि।

रोग एवं कीट प्रबंधन कैसे करें

चुकंदर की फसल में खरपतवार और रोगों का नियंत्रण करने के लिए हर एक 25 से 30 दिन के बीच बीच में साफ सफाई करते रहना चाहिए।  

इसके अलावा अगर किसी कारण से आपके चुकंदर की फसल में रोग लग जाता है तो सही मात्रा में केमिकल का छिड़काव करते हुए फसल को इस रोग से बचाया जा सकता है।

रेड स्पाइडर, एफिड्स, फ्ली बीटल और लीफ खाने कीड़ों से बचाव के लिए, 1 लीटर पानी में 2 मिली मैलाथियान 50 ईसी मिलाकर छिड़काव करें। कीटों को नियंत्रित करने से पहले, कृषि वैज्ञानिकों से सलाह लें। 

इसके अलावा जब भी आप बीज रोपण करते हैं तो सही तरह के बीच का इस्तेमाल करें इससे आप के उत्पादन में आपको बेहतर परिणाम मिलेंगे और फसल में रोग लगने की क्षमता भी कम हो जाती है। 

इस तरह से इन सब चीजों का ध्यान रखते हुए किसान चुकंदर की फसल उगा सकते हैं और इससे अच्छा खासा मुनाफा भी ले सकते हैं।

चुकंदर का मूल्य

चुकंदर का मूल्य उसकी गुणवत्ता, उपलब्धता, और बाजार के क्षेत्र के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है। इसलिए, चुकंदर का मूल्य विभिन्न शहरों और बाजारों में भिन्न हो सकता है। 

चुकंदर एक ऐसी फसल है जिसके उत्पादन में ज्यादा समय नहीं लगता है जिसकी वजह से यह बेहद कम समय में किसानों को अच्छा खासा मुनाफा दे सकती है।  

यह फसल एक बार बीज बोने के बाद लगभग 3 महीने में बनकर तैयार हो जाती है और 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक इसका उत्पादन हो जाता है।  

आम तौर पर अगर चुकंदर के मूल्य की बात की जाए तो यह 50 से ₹60 प्रति किलो तक भी रहता है।  इस फसल की एक और खासियत यह है कि इसे बहुत जगह पशु चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

चुकंदर की खेती से जुड़ी जानकारी (How To Cultivate Beetroot Farming)

चुकंदर की खेती से जुड़ी जानकारी (How To Cultivate Beetroot Farming)

चुकंदर की खेती शरद इलाकों में की जाती है। भारत में चुकंदर की खेती राजस्थान, पंजाब, उत्तराखण्ड, काश्मीर और हिमाचल प्रदेश के शरद इलाकों में रबी के सीजन में की जाती है। इस आर्टिकल के माध्यम से चुकंदर की खेती करने की सही व सटीक जानकारी देने वाले हैं। यदि आप चुकंदर की खेती करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए काफी सहयोगी साबित होगा।

चुकंदर विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से मशहूर है

चुकंदर एक कंदवर्गीय श्रेणी में आने वाली फसल है। चुकंदर का उपयोग सब्जी, सलाद और फल के तौर पर किया जाता है। चुकंदर से जुड़ी एक मशहूर कहावत है ‘फल एक, गुण अनेक’ चुकंदर के अंदर प्रचूर मात्रा में आयरन मोजूद मात्रा रहता है। चुकंदर का सेवन करने से शरीर में खून की मात्रा काफी बढ़ती है एव इसके अंदर कैंसर रोधी क्षमता भी विघमान होती है। चुकंदर भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे कि – बांग्ला में बीटा गांछा, हिंदी पट्टी में चुकंदर, गुजरात में सलादा, कन्नड़ भाषा में गजारुगद्दी, मलयालम में बीट, मराठी में बीटा, पंजाबी में बीट और तेलुगु में डंपामोक्का के नाम से मशहूर है।

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चुकंदर की खेती हेतु उपयुक्त मृदा

चुकंदर की खेती से बेहतरीन उत्पादन अर्जित करने के लिए बलुई दोमट मृदा को सबसे अनुकूल माना जाता है। इसकी खेती करने के लिए भूमि का P.H. मान 6 से 7 के मध्य होना बेहद जरुरी होता है। खेत में जल निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि जलभराव जैसी परिस्थिति में इसके पौधे सड़ने शुरू हो जाते हैं। आयरन, विटामिन-सी, विटामिन-B, मैग्नीशियम, कैल्शियम, आयोडीन और पोटेशियम से भरपूर चुकंदर की खेती के लिए 18-21 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है।

चुकंदर की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

भारत की जलवायु के मुताबिक, चुकंदर की खेती करने का सबसे उत्तम समय अक्टूबर के प्रथम सप्ताह से लगाकर जनवरी-फरवरी तक होता है। क्योंकि सर्दियों के मौसम में इसके पौधे बड़ी तीव्रता से प्रगति करते हैं। चुकंदर की खेती अधिकांश गर्मी के मौसम में भूल कर भी न करें। हालांकि, अत्यधिक ठंड एवं पाला इसके उत्पादन को प्रभावित भी कर सकता है।

चुकंदर की खेती हेतु उन्नत किस्में

बाजार में चुकंदर की विभिन्न उन्नत किस्में उपस्थित हैं। परंतु, उत्पादन की दृष्टि से तैयार की जाने वाली किस्मों में अर्ली वंडर, मिस्त्र की क्रॉस्बी, रूबी रानी, रोमनस्काया, एम.एस.एच.–102, डेट्रॉइट डार्क रेड और क्रिमसन ग्लोब शम्मिलित हैं।

चुकंदर की खेती के लिए भूमि की तैयारी

चुकंदर की खेती करने से पूर्व खेत को कल्टीवेटर एवं रोटावेटर के जरिए से एक बार खेत को गहरा जोत लें। इसके पश्चात खेती की 2-3 हल्की जुताई करने के उपरांत ही बीजों की बिजाई करें। यदि चुकंदर की फसल से बेहतरीन उत्पादन लेना चाहते हैं, तो खेत तैयार करने के दौरान प्रति एकड़ खेत में 4 टन गोबर की खाद डालकर मिलाएं।

चुकंदर की बुवाई किस प्रकार करें

चुकंदर की बुवाई दो विधि से की जाती है, इसमें पहली छिटकवा विधि और दूसरी मेड़ विधि है। छिटकवा विधि – इस विधि के अंतर्गत क्यारी बनाकर बीजों को फेंक कर बुवाई की जाती है। इसके लिए प्रति एकड़ 4 किलो बीज लगता हैं। मेड़ विधि – इस विधि के अंतर्गत 10 इंच के फासले पर मेड़ तैयार कर बीजों की बुवाई की जाती है। इसमें पौधे से पौधे का फासला 3 इंच रखा जाता है। साथ ही, आधे सेंटीमीटर की गहराई पर बीज की बुवाई की जाती है।

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चुकंदर की खेती में उवर्रक एवं सिंचाई प्रबंधन

चुकंदर की फसल के लिए सिंचाई की कोई खास अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसकी फसल के लिए हल्की सिंचाई की जरूरत होती है। फसल बिजाई के 15 दिनों में पहली सिंचाई एवं उसके 5 दिन उपरांत दूसरी बार सिंचाई कर देनी चाहिए। अगर बारिश नहीं हो पा रही है, तो 8-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। चुकंदर की खेती के लिए 50 किलो यूरिया, 70 किलो डी.ए.पी मतलब डाई-एमोनियम फॉस्फेट और 40 किलो पोटाश प्रति एकड़ खेत में डालें। यदि आप खेत में जैविक खाद डालते हैं तो नतीजा अच्छा आता है। यदि आपके खेत में बोरॉन की कमी है, तो सर्वप्रथम आपको खेत की मृदा का परीक्षण करा लेना चाहिए। बोरॉन की कमी से पौधों की जड़ें कमजोर अथवा टूटने लगती हैं। इससे बचाव के लिए मृदा में बोरिक एसिड अथवा बोरेक्स मिलाएं।

चुकंदर की खेती में रोग और कीट नियंत्रण कैसे करें

चुकंदर की फसल में खरपतवार की रोकथाम करने के लिए 25 से 30 दिनों के उपरांत निराई-गुड़ाई जरूर कर देनी चाहिए। यदि चुकंदर की फसल में रोग लग जाए तो समुचित मात्रा में रसायन का छिड़काव कर फसल का संरक्षण किया जा सकता है। रेड स्पाइडर, एफिड्स, फ्ली बीटल और लीफ खाने वाले कीड़ों से सुरक्षा हेतु 2 मिली मैलाथियान 50 ईसी प्रति 1 लीटर पानी का छिड़काव करके नियंत्रित करें। रोग नियंत्रण हेतु कृषि वैज्ञानिकों की राय अवश्य लें। रोपण से पूर्व बीजों का सही चयन बेहतर परिणाम देता है। साथ ही, कीट प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है।
गुलाबी फलों का उत्पादन कर किसान सेहत के साथ साथ कमाऐं मुनाफा

गुलाबी फलों का उत्पादन कर किसान सेहत के साथ साथ कमाऐं मुनाफा

गुलाबी रंग के फल हमारे शरीर के लिए काफी लाभकारी होते हैं। आज हम आपको कुछ ऐसे ही फलों के विषय में बताने जा रहे हैं। गुलाबी खाद्य पदार्थ, एंथोसायनिन और बीटालेंस जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। यह हमारे शरीर में एंटीऑक्सिडेंट का कार्य करते हैं, जो प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करते हैं। हम अपनी थाली में कई तरह के फलों और सब्जियों का उपयोग करते हैं। परंतु, गुलाबी रंग के खाद्य पदार्थ हमारे शरीर के लिए बेहद ही लाभकारी होता है। ऐसे में आज हम आपको गुलाबी रंग के कुछ फलों के विषय में जानकारी देने जा रहे हैं, जो हमारे शरीर की उत्तम सेहत के लिए आवश्यक होता है। प्राकृतिक रूप से गुलाबी खाद्य पदार्थों में एंथोसायनिन और बीटालेन, फ्लेवोनोइड और एंटीऑक्सिडेंट युक्त यौगिक शम्मिलित होते हैं, जो शरीर को कई प्रकार की बीमारियों से सुरक्षा करता है।

गुलाबी फलों का उत्पादन

चुकंदर

चुकंदर हमारे शरीर का रक्त परिसंचरण को बढ़ाने, रक्तचाप को सुदृढ़ रखने में सहायता करता है। कच्चे चुकंदर के रस का सेवन, सलाद एवं सब्जी के रूप में उपयोग करना चाहिए। यह हमारे शरीर के लिए जरूरी विटामिन, खनिज एवं फोलेट की मात्रा की पूर्ति करता है। इसके अलावा चुकंदर में एंटीऑक्सिडेंट पाए जाते हैं जो कैंसर-रोधी गुणों के लिए जाने जाते हैं।

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अनार

अनार का सेवन हमारी रक्त शर्करा और रक्तचाप को नियंत्रित करता है। यह हमारी पाचन संबंधी समस्याओं के लिए भी लाभदायक होता है। इसके अलावा इन फलों में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण विघमान होते हैं, जो हमें रोगों से बचाता है। अनार का जूस मूत्र संक्रमण के लिए एक निवारक का कार्य करता है।

ड्रैगन फ्रूट

यह अनोखा आकर्षक उष्णकटिबंधीय फल है, इसका सेवन हमारी मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियों से रक्षा करता है। आहार में ड्रैगन फ्रूट को शम्मिलित करने से यह हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को अच्छा बनाता है। साथ ही, हृदय से जुड़ी बीमारियों के लिए भी अच्छा माना जाता है।

बैंगनी पत्तागोभी

यह रंगीन पत्तेदार हरी पत्तागोभी एंटीऑक्सीडेंट का एक शक्तिशाली भंडार होती है, जो हमारे शरीर की सेलुलर क्षति के विरुद्ध एक प्रभावी सुरक्षा प्रदान करती है। इसमें विघमान विटामिन सी एवं कैरोटीन की भरपूर मात्रा के साथ-साथ पर्याप्त फाइबर भी मौजूद होता है, जो हमारे शरीर की प्रतिरक्षा करता है।

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लीची

लीची तांबा, लोहा, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस जैसे खनिज तत्वों से भरपूर होती है। यह हमारे शरीर की हड्डियों को शक्ति प्रदान करता है। यह मोतियाबिंद, मधुमेह, तनाव एवं हृदय रोगों से भी शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं।