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Meri Kheti https://www.merikheti.com/ Kisan ka saathi Fri, 17 May 2024 09:23:00 GMT hi hourly 1 https://merikheti.com/favicon.jpg Meri Kheti https://www.merikheti.com/ 140 140 मैसी फर्ग्यूसन कंपनी के टॉप 5 ट्रैक्टर मॉडल्स https://www.merikheti.com/blog/top-tractor-models-of-massey-ferguson-company Fri, 17 May 2024 09:23:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/top-tractor-models-of-massey-ferguson-company

मैसी फर्ग्यूसन भारत में ट्रैक्टर का जाना माना ब्रांड है। मैसी फर्ग्यूसन कंपनी के ट्रैक्टर किसानों के बीच बहुत लोकप्रिय है। किसान इस कंपनी के ट्रैक्टरों को खरीदना अधिक पसंद करते है। 

इस कंपनी के ट्रैक्टर ईंधन कुशल होते है साथ ही अच्छा काम भी करते है। आज के इस लेख में हम आपको मैसी फर्ग्यूसन के टॉप 5 ट्रैक्टर मॉडल्स के बारे में जानकारी देंगे जिससे की आप आसानी से सभी कार्य समय पर कर सकते है। 

मैसी फर्ग्यूसन कंपनी के टॉप 5 ट्रैक्टर

1. मैसी फर्ग्यूसन 8055 

मैसी फर्ग्यूसन 8055 ट्रैक्टर शक्तिशाली इंजन के साथ में आता है। मैसी फर्ग्यूसन कंपनी का ये ट्रैक्टर किसानों के लिए खास पेशकश है। ये ट्रैक्टर 50 HP के शक्तिशाली इंजन के साथ में आता है। 

इसके इंजन में 3 सिलिंडर आपको मिल जाते है, ट्रैक्टर के इंजन की क्यूबिक कैपेसिटी 3300 CC है। ट्रैक्टर का इंजन 2200 RPM बनाता है। 

मैसी फर्ग्यूसन 8055 ट्रैक्टर में पीटीओ की पावर 46 एचपी दी गयी है। ट्रैक्टर में कफिमेष (फुल्ली कांस्टेंट मेष) टाइप का ट्रांसमिशन आपको मिल जाता है। इस ट्रैक्टर में 8 फॉरवर्ड + 2 रिवर्स गियर्स आपको मिल जाते है। 

आयल इम्मरसेड ब्रेक आपको इस ट्रैक्टर में मिलते है साथ ही ट्रैक्टर पर अच्छा नियंत्रण पाने के लिए पावर स्टीयरिंग इस ट्रैक्टर में आपको मिल जाता है। इस ट्रैक्टर की कीमत 10.70-11.25 लाख रूपए तक है। 

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2. 7250 डीआई पावर अप

मैसी फर्ग्यूसन 7250 पावर एक 2 डब्ल्यूडी ट्रैक्टर है जिसमें 50 एचपी पावर वाला शक्तिशाली इंजन आपको मिल जाता है। इस ट्रैक्टर के इंजन की क्यूबिक कैपेसिटी 2700 सीसी है। 

इस ट्रैक्टर में 3 सिलेंडर हैं जो बेहतर कामकाज प्रदान करते हैं। इसमें 44 पीटीओ एचपी है। मैसी फर्ग्यूसन 7250 पावर अप 8 फॉरवर्ड + 2 रिवर्स गियर्स के साथ आता है, जो 32.2 कि.मी./ प्रति घंटा की फॉरवर्ड स्पीड प्रदान करता है। 

7250 डीआई पावर अप में तेल में डूबे हुए ब्रेक हैं, ट्रैक्टर में ड्यूल ड्राई क्लच है। लंबे समय तक काम करने के लिए इसमें 60 लीटर की ईंधन टैंक क्षमता है। 

इसके अलावा, इसमें कृषि उपकरणों को लोड करने और उठाने के लिए 1800 किलोग्राम हाइड्रोलिक लिफ्टिंग क्षमता है। मैसी फर्ग्यूसन 7250 पावर अप की कीमत 8.01-8.48 लाख रूपए तक है।

3. मैसी फर्ग्यूसन 241 डीआई डायनाट्रैक

मैसी फर्ग्यूसन 241 डीआई डायनाट्रैक अद्भुत डिजाइन, मजबूत बॉडी और आकर्षक लुक के साथ में आता है। यह 42 एचपी और 3 सिलेंडर के साथ में आता है। 

मैसी फर्ग्यूसन 241 डीआई डायनाट्रैक इंजन की क्षमता क्षेत्र में कुशल माइलेज प्रदान करती है। ये ट्रैक्टर 12 फॉरवर्ड + 12 रिवर्स गियरबॉक्स हैं। 

मैसी फर्ग्यूसन 241 डीआई डायनाट्रैक तेल में डूबे हुए ब्रेक के साथ आता है। इस ट्रैक्टर में स्टीयरिंग स्मूद पावर स्टीयरिंग है। 

ये ट्रैक्टर 55 लीटर की ईंधन टैंक क्षमता के साथ आता है। मैसी फर्ग्यूसन 241 डीआई डायनाट्रैक की कीमत  7.73-8.15 लाख रूपए तक है।

4. मैसी फर्ग्यूसन 1035 डीआई

मैसी फर्ग्यूसन ट्रैक्टर 1035 डीआई मॉडल अपने टॉप फीचर्स और प्रदर्शन के लिए सभी किसानों के बीच में लोकप्रिय है। 

इस ट्रैक्टर में 36 HP का शक्तिशाली इंजन आपको मिल जाता है, साथ ही इस ट्रैक्टर का इंजन 2400 CC की Cubic Capacity के साथ में आता है और 2500 आरपीएम जरनेट करता है। 

ट्रैक्टर में 8 फॉरवर्ड + 2 रिवर्स / 6 फॉरवर्ड + 2 रिवर्स ऑप्शन मिल जाते है। इसमें आपको ड्राई डिस्क ब्रेक मिलते है। 

मैसी फर्ग्यूसन 1035 डीआई 6 x 16 आकार के फ्रंट टायर और 12.4 x 28 आकार के रियर टायर के साथ आता है। मैसी फर्ग्यूसन 1035 डीआई में ईंधन टैंक की क्षमता 47 लीटर है।

कंपनी 1035 डीआई मैसी फर्ग्यूसन पर 2 साल या 2000 घंटे की वारंटी प्रदान करता है। मैसी ट्रैक्टर 1035 डीआई की कीमत 6.0-6.28 लाख रूपए तक है।

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5. मैसी फर्ग्यूसन टैफे 30 डीआई ऑर्चर्ड प्लस

मैसी फर्ग्यूसन टैफे 30 डीआई ऑर्चर्ड प्लस एक 30 एचपी का ट्रैक्टर है। ऑर्चर्ड प्लस इंजन की क्षमता 1670 सीसी है और इसमें 2 सिलेंडर हैं। 

मैसी फर्ग्यूसन टैफे 30 डीआई ऑर्चर्ड प्लस में 30 HP एचपी के इंजन के साथ में 26 एचपी पीटीओ पावर मिल जाती है। स्लाइडिंग मेश ट्रांसमिशन इस ट्रैक्टर में आपको मिलता है साथ ही इस ट्रैक्टर में 6 फॉरवर्ड + 2 रिवर्स / 8 फॉरवर्ड + 2 रिवर्स गियर्स आपको मिल जाते है। 

इसकी हाइड्रोलिक उठाने की क्षमता 1100 किलोग्राम है। भारत में मैसी फर्ग्यूसन टैफे 30 डीआई की कीमत 5.61-5.95 लाख रूपए है।

इस लेख में आपने मैसी फर्ग्यूसन के टॉप 5 ट्रैक्टर मॉडल्स के बारे में जाना जिनको खरीद कर आप आपने खेती के कार्य को आसान बना सकते है। 

मेरी खेती पर आपको खेतीबाड़ी और ट्रैक्टर उपकरणों की जानकारी सटीक मिलती है। अगर आप ट्रैक्टरों, उपकरणों या खेतबाड़ी से जुड़ी और अधिक जानकारी पाना चाहते है तो हमारे साथ जुड़े रहे।

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Red Gram Farming: अरहर की खेती कैसे की जाती है? https://www.merikheti.com/blog/red-gram-farming Fri, 17 May 2024 05:07:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/red-gram-farming

अरहर की खेती भारत में एक महत्वपूर्ण खेती है और यह फसल अनेक क्षेत्रों में उगाई जाती है। अरहर खरीफ की प्रमुख फसल है, इसकी खेती ज्यादतर इसी मौसम में की जाती है। 

इसकी दाल की कीमत अच्छी खासी होती है। अरहर की खेती (Red gram farming) कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी आसनी से की जा सकती है, इसलिए इसको कम वर्षा वाले क्षेत्रों की दाल के रूप में भी जाना जाता है। 

भारत में ये अरहर आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। 

आज के इस लेख में हम आपको अरहर की फसल उत्पादन के बारे में विस्तार में जानकारी देंगे। 

भारत में अरहर की खेती (Cultivation of redgram in India)

अरहर भारत की एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। इसे अरहर, TUR, और Red gram के नाम से भी जाना जाता है। 

अरहर की खेती और खपत मुख्य रूप से विकासशील देशों में की जाती है। यह फसल भारत में व्यापक रूप से उगाई जाती है। भारत विश्व में अरहर का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है। 

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अरहर का वानस्पतिक विवरण (Botanical Description of red gram)

अरहर एक दलहनी फसल है इसका वानस्पतिक नाम (Botanical name) Cajanus cajan है। इसकी family यानि की इसका परिवार Leguminosae है। 

अरहर एक दलहनी फसल है, जो की वातावरण की नाइट्रोजन का जमीन में स्थिरीकरण करती है। अरहर के फूल स्व-परागण self-pollinated होते हैं लेकिन इसमें क्रॉस-निषेचन (cross-fertilization) भी होता है।

अरहर के बीज गोल या लेंस के आकार के होते हैं। अरहर की दो प्रजातियाँ (species) होती है। इनको ऊंचाई, बढ़वार की आदत, परिपक्वता का समय, रंग, आकार, भिन्न फली और बीज के आकार के आधार पर दो species में बांटा गया है। ये दो प्रजातियाँ है -

  • Cajanus cajan var. bicolor में देर से पकने वाली, लम्बी झाड़ीदार किस्में शामिल हैं, इसके पौधे और शाखाओं के अंत में फूल लगते हैं। फली अपेक्षाकृत लंबे होती हैं और इनमें 4-5 बीज होते हैं।
  • Cajanus cajan var. flavu इस समूह में छोटी, जल्दी पकने वाली किस्में शामिल हैं और इसमें शाखाओं के साथ कई बिंदुओं पर पौधे और फूल होते है। फलियाँ भी छोटी होती हैं फलियों में 2-3 बीज होते हैं।

अरहर की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी

अरहर की खेती के लिए गर्म तथा आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। इसके लिए मौसम (जून से अक्टूबर) और बरसात के बाद (नवंबर से मार्च) के मौसम में 17 डिग्री C से 22 डिग्री C तापमान की आवश्यकता होती है। 

अरहर फली के विकास के समय ख़राब मौसम के प्रति बहुत संवेदनशील होता है, इसलिए फूल आने के दौरान मानसून और बादलों का मौसम खराब फली निर्माण का कारण बनता है। 

इसकी खेती मुख्य रूप से खरीफ की फसल के रूप में की जाती है। हर प्रकार की जमीनों में इसकी खेती की जा सकती है।

अरहर (Red gram) की खेती के लिए उपजाऊ और बढ़िया जल निकास वाली दोमट जमीन सब से बढ़िया है। मिट्टी का pH 6.5-7.5 तक होना चाहिए।

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अरहर की उन्नत किस्में कौनसी है?

अरहर की अच्छी पैदावार पाने के लिए अच्छी किस्मों की बुवाई करना बहुत आवश्यक है। इसके उन्नत किस्मे इस प्रकार है - ‘Parbhat’, ‘UPAS 120’, ‘T 21’, ‘Pusa Ageti’, ‘Pusa 74’, ‘Pusa 84’, ‘Pant A 1’, ‘Pant A 2’, ‘HPA 1’, ‘TT 5’, ‘AL 15’, ‘Manak’, ‘H 77-216’, ‘Sagar’ (‘H 77-208’), ‘BS 1’, 'Sharda’ (‘S 8’), ‘Mukta’ (‘R 60’) ¾ ‘Sharda’, ‘Mukta’, ‘C 11’, ‘C 36’, ‘BDN 1’, ‘BDN 2’, ‘No.148’, ‘Khargone 2’, ‘T 15-15’, ‘PT 301’, ‘JA 3’, ‘No.84’, ‘No.290-21’, ‘Hyderabad 185’ आदि। 

अरहर की बुवाई के लिए भूमि की तैयारी

अरहर की खेती करने के लिए सबसे पहले भूमि की अच्छे से जुताई आवश्य कर ले। सबसे पहले खेत की plough की सहयता से भूमि की अच्छे से गहरी जुताई कर ले, इसके बाद में हैरो या कल्टीवेटर से भूमि को जोत कर मिलत्ती को भुरभुरा बना ले इसके बाद पता लगाकर खेत की जमीन को बराबर कर ले।

अरहर की बुवाई का समय और बीज की मात्रा

अरहर की बुवाई का समय किस्म के आधार पर तय किया जाता है। जल्दी पकने वाली किस्मों की बुवाई जून के पहले पखवाड़े में की जाती है। मध्यम और देर से पकने वाली किस्मों की बुवाई जून के दूसरे पखवाड़े में की जाती है। सीड ड्रिल या देसी हल या रिज पर डिबलिंग द्वारा लाइन बुवाई की जाती है।

जल्दी पकने वाली किस्मों के लिए 20-25 कि.ग्रा./हेक्टेयर बीज का इस्तेमाल करे। पंक्ति से पंक्ति की दुरी 45-60 से.मी. और पौधे से पौधे की दुरी 10-15 से.मी. रखे। 

मध्यम/देर से पकने वाली किस्मों के लिए 15-20 कि.ग्रा./हेक्टेयर बीज का इस्तेमाल करे। पंक्ति से पंक्ति की दुरी 60-75 और पौधे से पौधे-15-20 से.मी. रखे।

बीज की बुवाई से पहले बीज उपचार अवश्य कर ले इसकी बुवाई के लिए कवकनाशी जैसे - थीरम (2 ग्राम) + कार्बेन्डाजिम (1 ग्राम) या थीरम @ 3 ग्राम या ट्राइकोडर्मा विर्डी 5- 7 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से इस्तेमाल करें।

अरहर की फसल में फ़र्टिलाइज़र और खाद प्रबंधन 

फसल में मृदा परीक्षण के परिणामों के आधार पर उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण करना चाहिए। अरहर की खेती में बुवाई के समय सभी उर्वरक 5 से.मी. की गहराई पर खांचे में ड्रिल किया जाता है। 

बुवाई के समय 25-30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40-50 किलोग्राम P2O5, 30 किलोग्राम K2O प्रति हेक्टेयर बेसल खुराक के रूप में फसल में डालें। 

मध्यम काली मिट्टी और बलुई दोमट मिट्टी में सल्फर 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर डालें। रेतीली मिट्टी में 3 कि.ग्रा. Zn प्रति हेक्टेयर (15 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट हेप्टा हाइड्रेट/9 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट) डालें बेसल के रूप में। 

खड़ी फसल में जिंक की कमी पाए जाने पर 5 किग्रा जिंक सल्फेट + चूना 2.5 किग्रा 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव कर सकते हैं।

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अरहर की खेती में सिंचाई प्रबंधन

अरहर एक गहरी जड़ वाली फसल है, इसलिए सूखे को सहन कर सकती है। लेकिन लंबे समय तक सूखे की स्थिति में तीन बार सिंचाई की जरूरत होती है। 

पहली शाखन अवस्था में (बुवाई के 30 दिनों के बाद), दूसरी पुष्पन अवस्था में (बुवाई के 70 दिनों के बाद) और तीसरी पोडिंग अवस्था में (बुवाई के 110 दिनों के बाद) अरहर सफल होने के लिए उचित जल निकासी की जरूरत होती है। 

मेड़ रोपण खराब उप-सतही जल निकासी वाले क्षेत्रों में काम करता है। यह जड़ों को अधिक वर्षा के दौरान पर्याप्त वातन प्रदान करता है।

अरहर की फसल में खरपतवार नियंत्रण

अरहर की फसल में खरपतवार के लिए पहले 60 दिन महत्वपूर्ण और घातक हैं। दो यांत्रिक निराई होती है: पहली 20 से 25 दिन पर और दूसरी 45 से 50 दिन बाद लेकिन फूल आने से पहले। 

प्रति हेक्टेयर 400 से 600 लीटर पानी में पेंडीमिथालिन 0.75 से 1 कि.ग्रा. a.i. का प्रीइमरजेंस मिलाएं। ये खरपतवारनाशी उगने वाले खरपतवारों को मार डालता है और खेत को पहले 50 दिनों तक खरपतवारों से सुरक्षित रखता है।

फसल की कटाई

  • फसल पकने से पहले कटाई करने से आमतौर पर कम पैदावार होती है, जिसका अनुपात अधिक होता है। 
  • अरहर की कटाई में देरी से फलियाँ टूट जाती हैं और अधिक नुकसान होता है। 
  • प्रतिकूल मौसम की स्थिति यानी बारिश और बादल छाए रहने वाला मौसम भी कटाई के लिए ठीक नहीं होता है।
  • फसल काटने का सबसे अच्छा समय, जब बड़ी (80) प्रतिशत फलियाँ पूरी तरह पक जाती हैं।
  • सही प्रकार के फसल कटाई उपकरण (दरांती) का प्रयोग न करना।
  • कटाई से पहले कीट संक्रमण से बचें।
  • काटने के बाद, यदि मौसम अनुमति देता है, तो कटे हुए तनों को खेत में सूखने के लिए छोड़ दें। 
  • फलियों को छड़ी से पीटकर या पुलमैन थ्रेशर का उपयोग करके थ्रेशिंग की जाती है। बीज और फली का अनुपात आम तौर पर 50-60% होता है। 
  • बीजों में नमी की मात्रा 9-10% तक लाने के लिए साफ बीजों को 3-4 दिनों तक धूप में सुखाना चाहिए। इसके बाद उचित भंडार घर में सुरक्षित रूप से स्टोर करें। ब्रुचिड्स और अन्य भंडारण के आगे विकास से बचने के लिए कीट, मानसून की शुरुआत से पहले और फिर से भंडारण सामग्री को फ्यूमिगेट करने की सिफारिश की जाती है।
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Cardamom Farming: इलायची की खेती कैसे होती है? https://www.merikheti.com/blog/how-is-cardamom-cultivated Thu, 16 May 2024 10:08:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/how-is-cardamom-cultivated

इलायची, जिसे आम तौर पर मसालों की रानी कहा जाता है, दक्षिण भारत में पश्चिमी घाटों पर बड़े-बड़े बरसाती जंगलों का मूल निवासी है। भारत में इसकी खेती लगभग 1,00,000 हेक्टेयर में होती है। 

मुख्य रूप से अधिकांश दक्षिणी राज्यों जैसे तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल में कुल क्षेत्रफल का 60.31 प्रतिशत और 9% हिस्सा है। 

भारत का वार्षिक उत्पादन लगभग 40 हजार मीट्रिक टन है, जिसका लगभग 60 प्रतिशत से अधिक विदेशो में निर्यात किया जाता है, जिससे लगभग 40 मिलियन रुपये की विदेशी मुद्रा मिलती है। 

इलायची भोजन, कन्फेक्शनरी, पेय पदार्थ और शराब जैसी कई तैयारियों को स्वादिष्ट बनाती है। आज के इस लेख में हम इसकी खेती के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे। 

इलायची की खेती के लिए मिट्टी और जलवायु की आवश्यकता

इलायची की खेती के लिए दोमट मिट्टी वाले घने और छायादार स्थान काफी उपयुक्त हैं। 600 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर इसकी फसल की खेती आसनी से की जा सकती है। 

इसके खेत में पर्याप्त जल निकासी व्यवस्था होनी चाहिए। यह प्राकृतिक रूप से अम्लीय, 5.0 से 6.5 पीएच सीमा वाली दोमट मिट्टी में उगाया जाता है। जून से दिसंबर महीने तक का मौसम इसके उत्पादन के लिए बहुत अच्छा माना जाता है।

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इलायची की उन्नत किस्में

इलायची की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए उन्नत किस्मों का अहम् योगदान है। इलायची दो प्रकार की होती है - हरी इलायची और भूरी इलायची। 

भारतीय व्यंजनों में भूरी इलायची का उपयोग बहुत किया जाता है। इसका उपयोग मसालेदार खाने को और अधिक स्वादिष्ट बनाने और इसका स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है। 

इलायची उन्नत किस्में निम्नलिखित है - मालाबार, मुदिगरी 1, मुदिगरी 2, PV 1, PV-3, ICRI 1, ICRI 3, TKD 4, IISR सुवर्ण, IISR विजेता, IISR अविनाश, TDK - 11, CCS-1, सुवासिनी, अविनाश, विजेता - 1, अप्पानगला 2, जलनि (Green gold) आदि। 

इलायची की बुवाई का तरीका?

इलायची की बुवाई पुराने पौधों के सकर्स या बीजों का उपयोग करके किया जाता है। इलायची की बुवाई करने के लिए स्वस्थ और अधिक उपज देने वाले पौधों से बीज एकत्र करें।

बीज दर – 600 ग्राम/हेक्टेयर (ताजा बीज) बीज रखे। इलायची के पौधे तैयार करने के लिए पहले नर्सरी तैयार करनी पड़ती है, अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद, लकड़ी की राख और जंगल की मिट्टी को बराबर मात्रा में मिलाकर क्यारियां तैयार करें। बीजों/सकर्स को क्यारियों में बोयें और महीन बालू की पतली परत से ढक दें।

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इलायची की पौध उगाना का तरीका

बीज क्यारियों को मल्चिंग और छायां प्रदान करनी जरुरी होती है। क्यारियों को नम रखना चाहिए लेकिन क्यारियों बहुत गीला नहीं होना चाहिए। अंकुरण आमतौर पर बुवाई के एक महीने बाद शुरू होता है और तीन महीने तक जारी रहता है। पौध को द्वितीय नर्सरी में 3 से 4 पत्ती अवस्था में रोपित किया जाता है।

दूसरी नर्सरी का निर्माण 

दूसरी नर्सरी का निर्माण करते समय ये ध्यान रखे की जिस जगह आप नर्सरी का निर्माण कर रहे है उस जगह क्यारियों के ऊपर छाया होनी जरुरी है। पौधों की रोपाई 20 x 20 से.मी. की दूरी पर करें। 20 x 20 से.मी. आकार के पॉलीबैग का उपयोग किया जा सकता है।

इलायची को कैसे बोया जाता है?

इलायची की पौध की रोपाई के लिए 60 सें.मी. x 60 सें.मी. x 60 सें.मी. आकार के गड्ढे खोदकर खाद और ऊपरी मिट्टी से भर दें। ढालू क्षेत्रों में कंटूर प्लांटिंग की जा सकती है। ये विधि 18-22 महीने पुराने पौधों की रोपाई के लिए उपयोग किया जाता है।

मुख्य रूप से इलायची की खेती मानसून के मौसम में की जाती है। फसल की वर्षा से ही जल आपूर्ति हो जाती है। अगर गर्मी और वर्षा के बीच का समय लम्बा हो जाता है तो अच्छी ऊपज पाने के लिए स्प्रिंकल के माध्यम से सिंचाई अवश्य करें।

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अच्छी उपज पाने के लिए उर्वरक और खाद प्रबंधन 

फसल में रोपाई से पहले 10 टन प्रति एकड़ गोबर की खाद या कम्पोस्ट का इस्तेमाल करें। 

उर्वरक की बात करें तो अधिक ऊपज प्राप्त करने के लिए फसल में 30 -35 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 -35 किलोग्राम फॉस्फोरस और 60 -65 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की दर से खेत में डालें। 

उर्वरकों को दो बार बराबर मात्रा में फसल में डालें। एक उर्वरकों के भाग को जून या जुलाई में खेत में डालें उर्वरक ड़ालते समय ये अवश्य ध्यान रखें की खेत में प्रचुर मात्रा में नमी हो। दूसरा उर्वरक का भाग अक्टूबर या नवंबर के महीने में डालें।

इलायची का पेड़ कितने साल में फल देता है?

इलायची के पौधे आमतौर पर रोपण के दो साल बाद फल देने लगते हैं। अधिकांश क्षेत्रों में कटाई की चरम अवधि अक्टूबर-नवंबर के दौरान होती है। 

15-25 दिनों के अंतराल पर तुड़ाई की जाती है। उपचार के दौरान अधिकतम हरा रंग प्राप्त करने के लिए पके कैप्सूल को काटा जाता है।

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धान की सही बुवाई को लेकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक रितेश शर्मा जी का साक्षात्कार https://www.merikheti.com/blog/interview-of-senior-agricultural-scientist-ritesh-sharma-regarding-correct-sowing-of-paddy Thu, 16 May 2024 09:53:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/interview-of-senior-agricultural-scientist-ritesh-sharma-regarding-correct-sowing-of-paddy

मेरीखेती की टीम किसानों की समृद्धि को लक्ष्य मानकर निरंतर किसान हित में निःशुल्क किसान पंचायत का आयोजन, मासिक पत्रिका और ऑनलाइन माध्यम से लाभकारी जानकारी किसानों तक पहुँचाने का कार्य करती आ रही है। 

इसी कड़ी में अब गेंहू की फसल कटाई होने के बाद धान की बुवाई की तैयारी करने वाले किसानों के लिए मेरीखेती टीम  ने वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक रितेश शर्मा जी का साक्षात्कार लिया। 

डॉ रितेश शर्मा कृषि वैज्ञानिक होने की वजह से धान की फसल की अच्छी उपज लेने की सभी तरकीबों के बारे में जानते हैं। क्योंकि रितेश शर्मा को कृषि क्षेत्र में वर्षों का अनुभव है। 

आइए किसान भाइयों अपको मेरीखेती की टीम द्वारा लिए गए रितेश शर्मा जी से धान की बुवाई को लेकर किए गए प्रश्नोत्तरी के जानेंगे।

मेरीखेती - किसान भाई धान की बुवाई किस विधि से करें कि उनको अच्छी फसल प्राप्त हो सके?

रितेश शर्मा - धान की बुवाई प्रमुख रूप से नर्सरी विधि और सीधी बिजाई इन दो तरीके से की जाती है। किसान भाई यदि सही दिशानिर्देशन और उपयुक्त मृदा जलवायु में बेहतर किस्म का चयन करके किसी भी विधि से बुवाई करें तो उनको निश्चित शानदार उत्पादन व लाभ प्राप्त हो सकता है। 

मेरीखेती - धान की नर्सरी विधि और सीधी बिजाई विधि में क्या अंतर है?

रितेश शर्मा - धान के बीज से पौध तैयार करने के बाद उसकी रोपाई करना नर्सरी विधि के अंतर्गत आता है। वहीं, गेंहू आदि की भांति खेत में सीधे रूप से धान की बुवाई करना सीधी बुवाई विधि कहलाता है। 

मेरीखेती - धान की बुवाई करते समय किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए ?

रितेश शर्मा - धान की बुवाई करने से पहले धान के बीज की उन्नत प्रजाति का चयन कर उसे एक बाल्टी पानी में डालकर अगर संभव हो सके तो पानी में नमक मिलाकर बीज को कुछ समय के लिए छोड़ देना चाहिए। 

मजबूत और अच्छे बीज बाल्टी की निचली सतह पर रुक जाएंगे बाकी जो भी हल्के या खराब बीज होंगे वो ऊपर आ जाएंगे। ख़राब बीजों को पानी के ऊपर से निकालकर फेंक दें। इसके बाद जो अच्छे बीज को धूप में सुखाने के लिए रख दें। इसके बाद नर्सरी या खेत में इन बीजों की रोपाई करें।

मेरीखेती -  धान के पौधरोपण के समय कितना फासला रखना उचित है ? 

रितेश शर्मा - धान की पोधरोपण के दौरान 20 से.मी. का फासला रखना उत्तम पैदावार के लिए अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, खेत के बीच-बीच में एक पगडंडी के समान खेत खाली होना जरूरी है। 

ताकि खाद उर्वरक देने में फसल को कोई नुकसान ना पहुंचे और मृदा एवं फसलों को अंदर तक सूर्य का प्रकाश मिल सके। इसका सबसे बड़ा लाभ फसल को रोग प्रतिरोधक बनाना भी है। 

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ज्वार की खेती: उपज, प्रबंधन और बेहतर बुआई के तरीके https://www.merikheti.com/blog/sorghum-cultivation-yield-management-and-better-sowing-methods Thu, 16 May 2024 04:57:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/sorghum-cultivation-yield-management-and-better-sowing-methods

ज्वार की फसल खरीफ (वर्षा ऋतु) और रबी (वर्षा ऋतु के बाद) में उगाया जाता है, लेकिन खरीफ का हिस्सा खेती और उत्पादन दोनों के तहत क्षेत्र के मामले में अधिक है। 

रबी की फसल लगभग पूरी तरह से मानव उपभोग के लिए उपयोग की जाती है जबकि खरीफ की फसल मानव उपभोग के लिए बहुत लोकप्रिय नहीं है और बड़े पैमाने पर पशु चारा, स्टार्च और शराब उद्योग के लिए उपयोग की जाती है। 

भारत में ज्वार के तहत केवल 5% क्षेत्र सिंचित है। देश में ज्वार की खेती के तहत 48% से अधिक क्षेत्र महाराष्ट्र और कर्नाटक में है। 

ज्वार की फसल के लिए उत्तम तापमान और जलवायु

मूल रूप से, ज्वार एक उष्णकटिबंधीय फसल है। ज्वार 25°C और 32°C के बीच तापमान में अच्छी तरह से पनपता है लेकिन 16°C से कम तापमान फसल के लिए अच्छा नहीं होता है। 

ज्वार की फसल के लिए लगभग 40 से.मी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। ज्वार अत्यधिक सूखा-सहिष्णु फसल है और शुष्क क्षेत्रों के लिए अनुशंसित है। 

ज्वार की खेती के लिए बहुत अधिक नम और लंबे समय तक शुष्क परिस्थितियां उपयुक्त नहीं होती हैं।

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ज्वार की फसल के लिए मिट्टी की आवश्यकता

ज्वार की फसल मिट्टी की विस्तृत श्रृंखला को अपनाती है लेकिन अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी में अच्छी तरह से बढ़ती है। 

6 से 7.5 की मिट्टी की पीएच सीमा इसकी खेती और बेहतर वृद्धि के लिए आदर्श है। खरपतवार मुक्त बुवाई के लिए मुख्य खेत की जुताई करके उसे अच्छी तरह से समतल कर लेना चाहिए।

ज्वार की फसल की बुवाई के लिए भूमि तैयार कैसे करे?

लोहे के हल से खेत की एक बार (या) दो बार जुताई करें। ज्वार को अच्छी जुताई की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि यह सीधे बोई गई फसल के मामले में अंकुरण और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

ज्वार की फसल की बुवाई और बीज की मात्रा

ज्वार की प्रत्यारोपित फसल

जब पौधे 15 से 18 दिन के हो जाएं तो उन्हें निकाल लें।

एज़ोस्पिरिलम के 5 पैकेट (1000 ग्राम/हेक्टेयर) और फॉस्फोबैक्टीरिया के 5 पैकेट (1000 ग्राम/हेक्टेयर) या 40 लीटर में एज़ोफॉस (2000 ग्राम/हेक्टेयर) के 10 पैकेट के साथ घोल तैयार करें। पानी का और 15-30 मिनट के लिए घोल में रोपाई के जड़ वाले हिस्से को डुबोएं और रोपाई करें।

  • खांचों के माध्यम से पानी जाने दें।
  • हर टीले पर एक पौधा लगाएं।
  • पौध को 3 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर रोपें।
  • मेड़ के ऊपर और नीचे से आधी दूरी पर मेड़ के किनारे पर पौधे रोपें।
  • पंक्ति में पौधों के बीच 15 से.मी. की दूरी बनाए रखें जो 45 से.मी. (15/मी2) अलग हों।

ज्वार सीधी बुवाई की जाने वाली फसल के लिए बीज की मात्रा

  • ज्वार की शुद्ध फसल के मामले में, बीज दर 10 किग्रा/हेक्टेयर बनाए रखें।
  • दलहनी फसल के साथ ज्वार की अंतर फसल की दशा में ज्वार की बीज दर 10 कि.ग्रा./हेक्टेयर तथा दलहनी फसल की दर 10 कि.ग्रा./हेक्टेयर बनाए रखें।
  • ज्वार की शुद्ध फसल के मामले में, बीजों के बीच 15 से.मी. की दूरी के साथ पंक्तियों में बोएं जो 45 सेमी अलग हैं। यदि शूटफ्लाई का हमला होता है, तो साइड शॉट्स को हटा दें और एक स्वस्थ शूट को बनाए रखें।
  • बीजों को उन पंक्तियों के ऊपर बोएं जहां उर्वरक रखे जाते हैं।
  • बीजों को 2 सेंटीमीटर की गहराई पर बोएं और मिट्टी से ढक दें।
  • दलहनों के साथ ज्वार के मामले में दलहनों की एक पंक्ति के साथ बारी-बारी से ज्वार की एक जोड़ी पंक्ति बोएं। ज्वार और दलहनी फसल की कतार के बीच की दूरी 30 से.मी. रखें।

ज्वार की फसल में कतार से कतार और पंक्ति से पंक्ति में पौधों का प्रबंधन 

अगर ज्यादा पौधे उग जाते है तो पौधे से पौधे की दुरी बनाये रखे के लिए पोधो की छटाई करें और जहा बीज नहीं उगे वहा पौधों से खाली जगह भरें। 

बुवाई के 23वें दिन पहली निराई के बाद पौधों के बीच 15 सेंटीमीटर की दूरी बनाए रखें। 

लोबिया को छोड़कर सभी दलहनी फसलों के लिए दलहनी फसल को पौधों के बीच 10 सेंटीमीटर की दूरी पर पतला करें, जिसके लिए पौधों के बीच की दूरी 20 सेंटीमीटर रखी जाती है।

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ज्वार की फसल में उर्वरक और पोषण प्रबंधन

ज्वार की फसल की दो तरीकों से बुवाई की जाती है।

बुवाई के तरीके के हीसाब से ही फसल में पोशाक तत्वों की व्यवस्था या प्रबंधन किया जाता है। ज्वार की बुवाई के दो तरीके है एक तो नर्सरी तैयार करके खेत में पौध रोपण करना और सीधी बुवाई। 

रोपित फसल में पोषण और उर्वरक प्रबंधन

मृदा परीक्षण संस्तुतियों के अनुसार एनपीके उर्वरकों का प्रयोग करें। यदि मृदा परीक्षण की सिफारिशें उपलब्ध नहीं हैं, तो 90 N, 45 P2O5, 45 K2O किग्रा/हेक्टेयर की व्यापक अनुशंसा अपनाएं। 

N @ 50:25:25% 0, 15 और 30 DAS पर लगाएं और रोपण से पहले P2O5 और K2O की पूरी खुराक दें।

मेड़ बोई गई फसल के मामले में, मेड़ के ऊपर से दो तिहाई दूरी पर मेड़ के किनारे 5 से.मी. गहरा एक खांचा खोलें और खाद के मिश्रण को खांचे के साथ रखें और 2 से.मी. तक मिट्टी से ढक दें। 

एज़ोस्पिरिलम का 10 पैकेट (2 कि.ग्रा./हेक्टेयर) और 10 पैकेट (2000 ग्राम/हेक्टेयर) फ़ॉस्फ़ोबैक्टीरिया या 20 पैकेट एज़ोफ़ोस (4000 ग्राम/हेक्टेयर) को 25 कि.ग्रा. एफवाईएम + 25 कि.ग्रा. बुवाई/रोपाई से पहले मिट्टी में मिलाया जा सकता है।

सीधी बोई गई फसल में पोषण और उर्वरक प्रबंधन

जहाँ तक संभव हो, मृदा परीक्षण संस्तुतियों के अनुसार एनपीके उर्वरकों का प्रयोग करें। यदि मृदा परीक्षण की सिफारिशें उपलब्ध नहीं हैं, तो 90 N, 45 P2O5, 45 K2O कि.ग्रा./हेक्टेयर की व्यापक अनुशंसा अपनाएं।

N @ 50:25:25% 0, 15 और 30 DAS पर लगाएं और P2O और K2O5 की पूरी खुराक बुवाई से पहले मूल रूप से लगाएं और यदि बेसल एप्लिकेशन संभव न हो तो उसे 24 घंटे के भीतर टॉप ड्रेसिंग किया जा सकता है।

क्यारी में बोई गई फसल के मामले में, 5 से.मी. की गहराई और 45 से.मी. की दूरी पर रेखाओं को चिह्नित करें। उर्वरक मिश्रण को पंक्तियों के साथ 5 से.मी. की गहराई पर रखें। बिजाई से पहले कतारों को ऊपर से 2 सेंटीमीटर तक ढक दें।

दलहनी फसल (काला चना, मूंग या लोबिया) के साथ मिश्रित फसल के रूप में उगाई गई ज्वार के मामले में 5 से.मी. की गहराई के अलावा 30 से.मी. की दूरी पर खुले खांचे बनाएं।

दो कतारों में जिसमें ज्वार उगाना है, उर्वरक मिश्रण लगायें और 2 से.मी. तक ढक दें।

तीसरी पंक्ति जिसमें दलहनी फसल उगानी है उसे छोड़कर अगली दो कतारों में उर्वरक मिश्रण डालकर 2 से.मी. तक मिट्टी से ढक दें।

जैव-उर्वरकों का प्रयोग: जब एज़ोस्पिरिलम का उपयोग किया जाता है तो सिंचित ज्वार के लिए संस्तुत एन का केवल 75% ही प्रयोग करें।

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ज्वार की फसल में सिंचाई का प्रबंधन

यदि फसल मानसून के समय (जुलाई) में बोई जाती है, तो बारिश के आधार पर 1 से 3 सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है। गर्मी की फसलों में तापमान अधिक होने के कारण 6 से 7 सिंचाई की जा सकती हैं।

हालाँकि, मान लीजिए कि केवल एक सिंचाई उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में, इसे फूल आने के 10 दिनों के अंतराल पर (40-50 दिन) पहले, या डाइथेन एम 45 - 0.2% + बाविस्टिन 0.2% फूल आने के 10 दिनों के अंतराल पर दो बार लगाना चाहिए।

निर्दिष्ट उपज लक्ष्यों के लिए उर्वरक खुराक निर्धारित करने के लिए पश्चिमी और उत्तर पश्चिमी क्षेत्र जैसे अल्फीसोल, इनसेप्टिसोल और वर्टिसोल में मिट्टी परीक्षण आधारित उर्वरक सिफारिश को अपनाया जा सकता है।

ज्वार की फसल में खरपतवार प्रबंधन

बुवाई के 3-5 दिनों के बाद एट्राज़िन @ 0.25 किग्रा/हेक्टेयर और उसके बाद मिट्टी की सतह पर बुवाई के 20-25 दिनों के बाद 2,4-D @ 1 किग्रा/हेक्टेयर लागू करें, बैकपैक/नैपसैक/रॉकर स्प्रेयर का उपयोग करके फ्लैट फैन नोजल के साथ 500 का उपयोग करें। 

यदि शाकनाशियों का उपयोग नहीं किया जाता है, तो 10-15 डीएएस और 30-35 डीएएस पर दो बार हाथ से निराई करें।

3-5 DAS पर PE एट्राज़ीन 0.25 कि.ग्रा./हेक्टेयर और उसके बाद 30-35 DAS पर एक हाथ से निराई करें।

कतार में बोई गई फसल में, 3-5 DAS पर PE एट्राज़ीन @ 0.25 कि.ग्रा./हेक्टेयर और उसके बाद 30-35 DAS पर ट्विन व्हील हो वीडर निराई करें।

रोपित फसल में, पीई एट्राज़ीन @ 0.25 कि.ग्रा./हेक्टेयर 3-5 डीएटी पर और 2,4-डी @ 1 कि.ग्रा./हेक्टेयर 20-25 डीएटी पर डालें।

यदि दलहनी फसल को ज्वार में अंतरफसल के रूप में उगाना है तो एट्राज़ीन का प्रयोग न करें, पीई पेंडीमिथालिन @ 0.75 कि.ग्रा./हेक्टेयर 3-5 डीएएस पर छिड़काव करें।

ज्वार की फसल में रोग और कीट

ज्वार की फसलें कई कीड़ों और बीमारियों से ग्रस्त होती हैं। ज्वार में कीट/पीड़क तना छेदक, प्ररोह मक्खी, और ज्वार मिज हैं।

ज्वार मिज को नियंत्रित करने के लिए कार्बोफ्यूरान/मैलाथियान @ 125 मिली/हेक्टेयर का छिड़काव करें।

प्रारंभिक अवस्था में एन्थ्रेक्नोज रोग को नियंत्रित करने के लिए कार्बेन्डाजिम @ 5 ग्राम/लीटर पानी का छिड़काव करें।

गर्मियों में बोई जाने वाली फसल में प्ररोह मक्खी का प्रकोप बहुत अधिक होता है। इसलिए, बुवाई के समय प्ररोह मक्खी को नियंत्रित करने के लिए इस कार्बोफ्यूरान 3जी @ 3 से 4 कि.ग्रा./हेक्टेयर का प्रयोग करना चाहिए।

तना छेदक कीट से बचाव या नियंत्रण के लिए फसल को जुलाई के मौसम में बोना चाहिए। 

एंडोसल्फान @ 0.05% का छिड़काव 10 से 14 दिनों के अंतराल पर 2 से 3 बार करना भी प्रभावी होता है।

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फसल की कटाई और प्रसंस्करण

फसल की औसत अवधि पर विचार करें और फसल का निरीक्षण करें। जब फसल पक जाती है तो पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और सूख जाती हैं और दाने सख्त और दृढ़ होते हैं।

इस अवस्था में बालियों को अलग-अलग काटकर फसल की कटाई करें।

एक सप्ताह के बाद भूसे को काट लें, इसे सूखने दें और फिर ढेर लगा दें।

लंबी किस्मों के मामले में, तने को जमीन से 10 से 15 सेमी ऊपर काटें और बाद में बालियों को अलग करें और पुआल को ढेर कर दें बाद में बालियों को सुखा लें।

एक यांत्रिक थ्रेशर का उपयोग करके या बालियों के ऊपर एक पत्थर के रोलर को खींचकर या मवेशियों का उपयोग करके और उपज को सुखाकर स्टोर करें।

ज्वार की उपज

भारत दुनिया में ज्वार का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, प्रति हेक्टेयर 1000 किलोग्राम की उपज दुनिया के प्रमुख ज्वार उत्पादक देशों में सबसे कम है। 

विश्व औसत 1435 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। यद्यपि भारत में ज्वार की उपज विश्व औसत से बहुत कम है, यह हाल के दिनों में लगातार बढ़ रहा है।

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मिट्टी जांच क्यों है आवश्यक? जानिए सम्पूर्ण जानकारी https://www.merikheti.com/blog/why-is-soil-testing-necessary Wed, 15 May 2024 08:53:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/why-is-soil-testing-necessary

फसल उत्पादन और मृदा स्वास्थ्य दोनों के लिए संतुलित पौध पोषण बहुत महत्वपूर्ण है। मिट्टी परीक्षण खेत की मिट्टी में उपस्थित विभिन्न प्रमुख और गौण पोषक तत्वों की मात्रा की जानकारी देता है। 

मिट्टी परीक्षण के नतीजों को देखते हुए कृषक बन्धु उर्वरकों का सही मात्रा में उपयोग कर अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

मिट्टी परीक्षण क्या होता है?

मिट्टी परीक्षण का अर्थ है पौधों की मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्ध मात्राओं का रासायनिक परीक्षणों द्वारा आंकलन करना और विभिन्न मृदा विकास विशेषताओं जैसे मृदा लवणीयता, क्षारीयता और अम्लीयता की जांच करना। फसल उत्पादन के लिए मिट्टी परीक्षण बहुत आवश्यक है।

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मिट्टी के कितने परीक्षण होते हैं?

पौधों के सही विकास और वृध्दि के लिए सामान्य रूप से सोलह पोषक तत्व आवश्यक हैं। 

पौधे वायु और पानी से प्रायः पहले तीन पोषक तत्व (कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन) प्राप्त करते हैं, शेष 13 पोषक तत्व नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम, मैग्निशियम और सल्फर) भूमि से प्राप्त होते हैं।

आमतौर पर, ये सभी पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से जमीन में उपलब्ध रहते हैं। खेत में लगातार फसल लगने से मिट्टी से इन सभी आवश्यक तत्वों का बहिष्कार होता रहता है। 

जब पौधों को अच्छी तरह से पोषित नहीं किया जाता, तो फसलों की वृद्धि सही नहीं हो पाती, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और रोगों, कीटों और अन्य रोगों से संक्रमित होने की अधिक संभावना रहती है। 

नतीजतन, फसल उत्पादन कम होता है और अतिरिक्त उर्वरक भी महंगे होते जा रहे हैं। वास्तव में, खेत में इन पोषक तत्वों का उपयोग सिर्फ आवश्यकतानुसार किया जा सकता है और इससे खेती को लाभ मिल सकता है। 

मिट्टी परीक्षण ही खेतो में उर्वरक की सही मात्रा का पता लगा सकता है। इसलिए, उर्वरकों का अधिकतम उपयोग करने और अधिक फसल उत्पादन करने के लिए मिट्टी परीक्षण अनिवार्य है।

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मिट्टी परीक्षण के लाभ क्या है?

  • खेत में खाद और उर्वरक की मात्रा की सिफारिश करने के लिए मिट्टी में पोषक तत्वों के स्तर की जांच करके फसल और किस्म के अनुसार तत्वों की सन्तुलित मात्रा का निर्धारण किया जा सकता है। 
  • मृदा उर्वरता मानचित्र बनाना, यह मानचित्र विभिन्न फसल उत्पादन योजनाओं का निर्धारण करने के लिए महत्वपूर्ण है और प्रत्येक क्षेत्र में उर्वरक उपयोग की जानकारी प्रदान करता है।
  • मृदा की क्षारीयता, अम्लीयता, लवणीयता और मृदा अम्लीयता की पहचान और सुधार करने के लिए सुधारकों की मात्रा और प्रकार की सिफारिश कर कृषि योग्य जमीन बनाने के लिए महत्वपूर्ण सलाह और सुझाव मिलता है।
  • फल के बाग लगाने के लिएभूमि की उपयुक्तता का पता लगाना।

मिट्टी परीक्षण के लिए नमूना कैसे एकत्रीत करे?

खेत में मिट्टी का नमूना जिग-जैग से घूमाकर दस से पंद्रह स्थानों पर निशान लगाकर लेना चाहिए, ताकि सभी क्षेत्रों को शामिल किया जा सके।

खेत में जहा स्थानो का चयन किया गया है उनकी उपरी सतह से घास-फूस, कूडा आदि करकट हटा दे।

हर जगह 15 सें.मी. (6 -9 इंच) गहरा V आकार का गङ्ढा खोदे। गड्डे को साफ करने के बाद, खुरपी से एक तरफ उपर से नीचे तक 2 सेमी मोटी मिट्टी की तह को निकाल ले, फिर इसे ट्रे या साफ बाल्टी में डाल दें।

तैयार मिट्टी को हाथ से अच्छी तरह मिलाकर साफ कपडे पर डालकर गोल ढेर बना लें। अंगूली से ढेर को चार बराबर भागों में बाँध दें। अब बाकी दो हिस्सों की मिट्टी को फिर से अच्छी तरह से मिलाकर गोल बनाओ। जब तक लगभग आधा किलो मिट्टी रह जाती है, इस प्रक्रिया को दोहराया जाना चाहिए। 

सूखे मिट्टी नमूने को एक साफ प्लास्टिक थैली में डाल दें, फिर इसे कपड़े की थैली में डाल दें। नमूने के साथ एक सूचना पत्रक, जिस पर पूरी जानकारी लिखी हो, एक प्लास्टिक की थैली में अंदर और कपड़े की थैली के बाहर बांध दें। 

खेत की मिटटी से तैयार नमूनों को मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला भेजे वहां इसकी जांच होगी।

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पॉवरट्रैक यूरो 50 आता है शानदार इंजन क्षमता के साथ https://www.merikheti.com/blog/powertrac-euro-50-tractor-price-and-specifications Wed, 15 May 2024 05:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/powertrac-euro-50-tractor-price-and-specifications

खेती के कार्यों को करने के लिए ट्रैक्टर का सबसे अधिक योगदान है। ट्रैक्टर से सभी कार्य किसान आसानी से कर सकते है। 

किसान ज्यादातर उन ट्रैक्टरों को खरीदना पसंद करते है जिसमें सभी आधुनिक फीचर्स और शक्तिशाली इंजन भी हो। 

आज के इस लेख में हम आपको एक ऐसे ट्रैक्टर के बारे में बताने वाले है जो की 50 एचपी के शक्तिशाली इंजन के साथ में आता है।

पॉवरट्रैक यूरो 50 की इंजन पावर क्या है?

इस ट्रैक्टर के इंजन की बात करे तो ये ट्रैक्टर शक्तिशाली इंजन के साथ में आता है। पॉवरट्रैक यूरो 50 ट्रैक्टर में आपको 2761 सीसी कैपेसिटी वाला 50 एचपी का इंजन मिलता है। 

इस ट्रैक्टर के इंजन में 3 सिलेंडर आपको मिलते है। ट्रैक्टर के इंजन को ठंडा रखने के लिए इस ट्रैक्टर में कूलैंट कूल्ड (Coolant Cooled) इंजन दिया गया है।

यह ट्रैक्टर Oil bath type एयर फिल्टर के साथ आता है, जो इसके इंजन को धूल मिट्टी से सुरक्षित रखता है। इस ट्रैक्टर का  इंजन 2000 आरपीएम उत्पन्न करता है। 

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पॉवरट्रैक यूरो 50 फीचर्स और स्पेसिफिकेशन्स (Powertrac Euro 50 Features and Specifications)

  • कंपनी ने ट्रैक्टर में 8 Forward + 2 Reverse गियर वाला गियरबॉक्स दिया गया है। 
  • पॉवरट्रैक यूरो 50 ट्रैक्टर Single/Dual क्लच के साथ आता है और ये साइड शिफ्ट टाइप ट्रांसमिशन (Side Shift transmission) के साथ में आता है। 
  • कंपनी के इस ट्रैक्टर की 2.8 से 30.8 kmph फॉरवर्ड स्पीड और 3.6 से 11.1 kmph रिवर्स स्पीड रखी है।
  • यह ट्रैक्टर MRPTO/Dual टाइप पावर टेकऑफ में आता है, जो 540 @1800 आरपीएम उत्पन्न करती है।
  • कंपनी ने अपने इस ट्रैक्टर में Multi Plate Oil Immersed Disc ब्रेक्स दिए है, पॉवरट्रैक यूरो 50 ट्रैक्टर में 2 व्हील ड्राइव आता है।
  • इसमें आपको 6.5 x 16 फ्रंट टायर और 14.9 x 28 रियर टायर देखने को मिल जाते हैं। 
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पॉवरट्रैक यूरो 50 की कीमत क्या है? (Powertrac Euro 50 Price)

इस ट्रैक्टर की कीमत की बात करे तो इस ट्रैक्टर की कीमत 8.10 लाख से 8.40 लाख रूपए है। इस ट्रैक्टर की कीमत में कई स्थानों कर थोड़ा फरक भी आपको देखने को मिल जाते है। 

कंपनी अपने Powertrac Euro 50 Tractor के साथ 5 साल की वारंटी प्रदान करती है।

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मूँग की फसल के घातक रोगों के लक्षण और उनकी रोकथाम https://www.merikheti.com/blog/symptoms-and-prevention-of-fatal-diseases-of-mung-bean-crop Tue, 14 May 2024 04:53:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/symptoms-and-prevention-of-fatal-diseases-of-mung-bean-crop

मूँग की खेती गर्मी के मौसम में भारत में बड़े पैमाने पर की जाती है। किसानों को इस फसल में कई रोगों का सामना करना पड़ता है जिससे की फसल की उपज में बहुत कमी आती है। 

मूंग की फसल में कई ऐसे रोग लगते है जिनसे फसल का उत्पादन आधे से भी कम हो जाता है। अगर किसान समय से इन रोगों की रोकथाम कर लेते है तो इस नुकसान को काफी हद तक ख़त्म किया जा सकता है। 

इस लेख में हम आपको मूंग की फसल की प्रमुख बीमारियों के लक्षण और उनकी रोकथाम के बारे में जानकारी देंगे।   

मूँग की फसल के मुख्य रोग

मूँग की फसल वैसे तो कई रोगों से संक्रमित होती है। यहाँ हम आपको कई ऐसी बीमारियों के बारे में जानकारी देंगे जिससे की आप उन रोगों को समय से पाचन कर उनकी रोकथाम कर सकते है। 

मूँग की फसल में कई रोग लगते है जैसे की - एन्थ्राक्नोज रोग, पाउडरी फफूंदी रोग, पत्ती धब्बा रोग, रस्ट रोग, पीला चितकबरी रोग, सुखी जड़ सड़न रोग इनमे से सबसे खतनाक रोग है।

एन्थ्राक्नोज रोग (anthracnose)

ये रोग मूँग की फसल के हर हिस्से को संक्रमित करता है और पौधे की वृद्धि में दिखाई देता है। परिपत्र, पत्तियों और फलियों पर गहरे मध्य भाग और चमकीले लाल नारंगी किनारों वाले काले, धँसे हुए धब्बे। 

संक्रमण गंभीर होने पर प्रभावित भाग सूख जाते हैं। संक्रमण के कारण बीज बोने के तुरंत बाद अंकुर झुलस जाते हैं या बीजों का अंकुरण नहीं होता है। गंभीर संक्रमण पूरी पत्ती में फैलता है और झुलसा जाता है।

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एन्थ्राक्नोज रोग की रोकथाम के उपाय  

  • बुवाई के लिए सुरक्षित और प्रमाणित मूँग बीज का चयन करें।
  • बीजों को बीमारी से बचाने के लिए बुवाई से पहले 10 मिनट के लिए 54 डिग्री सेल्सियस पर गर्म पानी का उपचार करें।
  • अगर हर साल खेत में बीमारी आती है, तो फसल चक्र का पालन करें।
  • 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति कि.ग्रा. बीजों को उपचारित करें।
  • बुबाई के 40 और 55 दिन पश्चात फफूद नाशक दवा छिड़कें, जैसे मेन्कोजेब 75 डब्लूपी 2.5 ग्राम/ली. या कार्बेन्डाजिम 50 डब्लूपी 1 ग्राम/ली।

पाउडरी फफूंदी रोग (Powdery mildew)

ये मूँग की फसल में लगने वाले घातक रोगों में से एक है। मूँग की फलियों में पाउडरी फफूंदी  बीमारी का प्रकोप गंभीर रूप से देखा जा सकता है। 

पत्तियों और अन्य हरे भागों पर सफेद पाउडर जैसे धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में फीके हो जाते हैं। ये धब्बे आकार में धीरे-धीरे बढ़ते हैं और निचली सतह पर गोलाकार बन जाते हैं। 

जब संक्रमण गंभीर होता है, तो पत्तियों की दोनों सतहें सफेद हो जाती हैं। गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्र सिकुड़कर टूट जाते हैं। 

गंभीर संक्रमण में पत्तियां पीली हो जाती हैं, इसलिए पत्तियां जल्दी गिर जाती हैं। यह रोग भी जबरन परिपक्वता पैदा करता है।

पाउडरी फफूंदी रोग की रोकथाम के उपाय  

  • इस रोग से प्रभावित मूँग के खेत में 10 दिनों के अंतराल पर एनएसकेई @ 5% या नीम तेल @ 3% का दो बार छिड़काव करें। 
  • फसल को रोगों से बचाने के लिए केवल रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का प्रयोग करें। 
  • अगर खेत में रोग का प्रकोप दिखाई देता है तो कार्बेन्डाजिम 200 ग्राम या वेटटेबल सल्फर 600 ग्राम या ट्राइडेमोर्फ 200 ml का छिड़काव प्रति एकड़ की दर से करें। 
  • इस छिड़काव को 15 दिन बाद फिर से दोहराएँ।

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पीला चितकबरी रोग (Yellow mosaic disease) 

इस रोग की शुरुआत में नई पत्तियों की हरी परत पर छोटे पीले धब्बे दिखाई देते हैं। यह जल्द ही सुनहरे पीले या चमकीले पीले मोज़ेक के रूप में विकसित होता है। 

पत्तियों में पीला मलिनकिरण धीरे-धीरे बढ़ता है और अंततः पूरी तरह पीला हो जाता है। संक्रमित पौधे कम उपज देते हैं क्योंकि वे देर से परिपक्व होते हैं और कुछ फूल और फलियाँ धारण करते हैं। 

फलियाँ विकृत और छोटी होती हैं। बीज बनने से पहले पौधा मर जाता है।

पीला चितकबरी रोग की रोकथाम के उपाय 

  • रोग प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों का चयन करें, जैसे Pant Moong-3, Pusa Vishal, Basanti, ML-5, ML337, PDM-54, King TJM-3, K-851, Pant Moong-2, Pusa Vishal, HUM-1 और Basanti।
  • प्रमाणित बीजो का उपयोग करें।
  • जुलाई के पहले सप्ताह तक बीज की बुवाई कतारों में करें, रोगग्रस्त पौधों को उखाडकर नष्ट करें।
  • मिश्रित फसल के लिए दो पंक्तियाँ (60 x 30 सेमी) या ज्वार (45 x 15 सेमी) उगाएँ। 
  • बीजों को थायोमेथोक्सम-70WS या इमिडाक्लोप्रिड-70WS से 4 ग्राम प्रति किग्रा की दर से उपचारित करें।
  • रोग का वाहक सफेद मक्खी कीट है, जिसे नियंत्रित करने के लिए ट्रायजोफॉ 40 ईसी, 2 मि.ली. प्रति लीटर या थायोमेथोक्साम 25 मि.ली. प्रति लीटर का उपयोग किया जाता है।

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पर्ण व्यांकुचन रोग या लीफ क्रिंकल

पर्ण व्यांकुचन रोग, जिसे लीफ क्रिंकल भी कहते हैं, एक महत्वपूर्ण विषाणु जनित रोग है। बीज पर्ण व्यांकुचन रोग को फैलाता है, और कुछ जगहों पर सफेद मक्खी भी इसे फैलाती हैं। 

इसके लक्षण आम तौर पर फसल बोने के तीन से चार सप्ताह में दिखाई देते हैं। इस रोग में दूसरी पत्ती बढ़ने लगती है, झुर्रियां आने लगती हैं और पत्तियों में मरोड़पन आने लगता है। खेत में संक्रमित पौधों को दूर से देखकर ही पहचाना जा सकता है। 

इस रोग के कारण पौधे का विकास रुक जाता है, जिससे सिर्फ नाम की फलियां निकलती हैं। यह बीमारी पौधे की किसी भी अवस्था में फैल सकती है।

पर्ण व्यांकुचन रोग की रोकथाम के उपाय 

  • रोग बीजों से फैलते हैं, इसलिए बीमार पौधों को उखाड़ कर जला कर नष्ट करना चाहिए। 
  • फसल को पर्ण व्यांकुचन रोग (लीफ क्रिंकल) से बचाने के लिए इमिडाक्रोपिरिड को बुवाई के 15 दिन बाद या रोग के लक्षण दिखने पर छिड़काव करें।
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टमाटर की फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों का नियंत्रण कैसे करे, जाने यहां https://www.merikheti.com/blog/how-to-control-major-diseases-of-tomato-crop Mon, 13 May 2024 10:22:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/how-to-control-major-diseases-of-tomato-crop

टमाटर की फसल विशेष रूप से भारतीय खाद्य संस्कृति में महत्वपूर्ण है और यह एक प्रमुख सब्जी है जो विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में उपयोग किया जाता है जैसे की सलाद, सूप, सॉस, और सब्जियों में। 

टमाटर का वास्तविक अनुभव तथा उत्पादन भारी खेती में या छोटे स्तर पर भी किया जा सकता है। यह फल प्राय: लाल, पीला, और हरे रंग का होता है। 

टमाटर की खेती में किसानो को कई कठनाईयो का भी सामना करना पड़ता है, इनमे सबसे प्रमुख है टमाटर की फसल में लगने वाले रोग।

टमाटर की फसल में लगने वाले रोग फसल उत्पादन को बहुत प्रभावित करते है जिससे की उपज में काफी हद तक कमी आ जाती है। 

आज के इस लेख में हम आपको इसकी फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों के बारे में जानकारी देंगे जिससे की आप समय से रोगों की पहचान करके उनका नियंत्रण कर सकते है।

टमाटर से कौन-कौन से रोग होते हैं?

टमाटर की फसल कई रोगों से प्रभावित होती है। टमाटर के सफल उत्पादन के लिए जरुरी है कि उसमे लगने वाले रोगों के बारे में सटीक जानकारी हो ताकि उनका सही तरिके से उपचार करके टमाटर का उत्पादन बढ़ाया जा सके। नीचे आप इस फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों और उनके उपचार के बारे में जानेंगे। 

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आद्र्रगलन या कमरतोड़ रोग (Damping off)

इस रोग का प्रमुख कारक पाइथियम एफैनिडर्मेटम नामक जीवाणु है। कमरतोड़ रोग (Damping off) रोग के लक्षण दो चरणों में होता है। पहले के चरण मे ये रोग नर्सरी में ही शुरू हो जाता है इस चरण में बीज अंकुर भूमि की सतह से ऊपर आने से पहले ही मर जाते है। 

जिससे की नर्सरी में पौधों की बहुत कमी आती है। रोग से प्रभावित युवा रेडिकल और प्लम्यूल मर जाते हैं और पूरी तरह से सड़ जाते हैं।     

पौधे बनने के बाद का चरण - दूसरे चरण में संक्रमण पौधों के तनो पर होता है। जमीनी स्तर पर संक्रमित ऊतक मुलायम हो जाते हैं और पानी से लथपथ हो जाते हैं। 

तने का विगलन  होने से पौधा भूमि की सतह पर लुढ़ककर गिर कर मर जाता है। आरंभ में रोग के लक्षण  कुछ जगहों पर दिखाई पड़ते है तथा 2-3 दिन में ये रोग सारे पौधों या नर्सरी में फ़ैल जाता है।

आद्र्रगलन या कमरतोड़ रोग की रोकथाम के उपाय   

पौधशाला में रोग के को नियंत्रित करने के लिए फोर्मलिन से बुवाई के 15 से 20 दिनों पहले उपचारित करे, तब तक पॉलीथिन की चादरों से ढककर रखें। जब मिट्टी से इस दवा की गंद निकलनी बंद हो जाए तो उसके बाद बीज बोएं।       

इस रोग से बचाव के लिए नर्सरी बेब के लिए ऊंची बेड विधि का इस्तेमाल करे। बेहतर जल निकासी के लिए हल्की, लेकिन बार-बार सिंचाई करें।

कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.2% या बोर्डो मिश्रण 1% के साथ फफूंद कल्चर से बीजोपचार करें, इसके आलावा ट्राइकोडर्मा विराइड (4 ग्राम/किलो बीज) या थिरम (3 ग्राम/किलो बीज) इसका एकमात्र निवारक उपाय है। बादल छाए रहने पर 0.2% मेटालैक्सिल का छिड़काव करें।   

फ्यूजेरियम विल्ट (Fusarium Wilt)

रोग का पहला लक्षण शिराओं का साफ होना और पत्तियों का हरितहीन होना है। नई पत्तियाँ एक के बाद एक मर सकती हैं और कुछ ही दिनों में पूरी पत्तियाँ मुरझाकर नष्ट हो सकती हैं।

रोग के संक्रमण से डंठल और पत्तियाँ झड़ जाती हैं और मुरझा जाती हैं। युवा पौधों में, लक्षण का समाशोधन होता है। शिराओं का टूटना और डंठलों का गिरना इसका मुख्य लक्षण माना जाता है। 

खेत में सबसे पहले निचली पत्तियों का पीला पड़ना और प्रभावित पत्तियां का मुरझा और मर जाना संभव लक्षण है। 

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फ्यूजेरियम विल्ट (Fusarium Wilt) रोग की रोकथाम के उपाय  

  • प्रभावित पौधों को हटाकर नष्ट कर देना चाहिए। 
  • रोग को नियंत्रित करने के लिए कार्बेन्डाजिम (0.1%) से स्पॉट ड्रेंच करें। 
  • रोग को ख़तम करने के लिए अनाज जैसी गैर-मेजबान फसल के साथ फसल चक्र अपनाए।     

पछेती झुलसा रोग

पछेती झुलसा रोग फाइरोफ्थोरा इनफेस्टेन्स नामक कवक से होता है। गर्म, गीले मौसम में टमाटर की पत्तियों और फलों के माध्यम से तेजी से फैलती है, जिससे पतन और क्षय होता है। 

ब्लाइट का प्रारंभिक लक्षण पत्तियों का तेजी से फैलना, पानी जैसा सड़ना है, जो जल्द ही गिर जाते हैं, सिकुड़ जाते हैं और भूरे हो जाते हैं। 

उपयुक्त परिस्थितियों के दौरान, जब रोगज़नक़ पत्ती के ऊतकों के माध्यम से सक्रिय रूप से फैल रहा होता है, तो घावों के किनारे हल्के हरे रंग के दिखाई दे सकते हैं, और पत्तियों के नीचे की तरफ एक महीन सफेद 'कवक' की वृद्धि देखी जा सकती है।   

पछेती झुलसा रोग की रोकथाम के उपाय  

फसल को पिछेती झुलसा रोग से बचाने के लिए स्वस्थ रोगमुक्त पौधों का उपयोग करना चाहिए।

खेत से रोगग्रस्त पौधों को बाहर निकालकर नष्ट कर दें। साथ ही प्रभावित फसल पर 25 ग्राम प्रति लीटर की दर से 4 प्रतिशत मेटालेक्सिल और 64 प्रतिशत मैंकाजेव छिडक़ाव करें।

अगेती झुलसा रोग

अल्टरनेरिया सोलेनाई नामक कवक टमाटर की फसल में यह रोग पैदा करता है। प्रभावित पौधों की पत्तियों पर छोटे काले धब्बे हैं, जो बड़े होकर गोल छल्लेनुमा धब्बों में बदल जाते हैं। फल पर गहरे और शुष्क धब्बे होते हैं। इन धब्बों के बढ़ने से पत्तियां गिर जाती हैं। रोग पौधे के हर हिस्से में फैल सकता है।

अगेती झुलसा रोग की रोकथाम के उपाय

रोग से प्रभावित पौधों को जलाकर नष्ट करना चाहिए ताकि यह रोग अन्य पौधों में ना फैल पाए। 

टमाटर के बीजों को बोने से पहले 75 WP प्रति kg बीजोपचार करना चाहिए। यदि फसल में रोग के लक्षण दिखाई दें तो मैंकोजेब 75 WP 2.5 kg प्रति हेक्टर की दर से 10 दिन के अंतराल पर छिडक़ाव करना चाहिए। 

फसल चक्र को अपनाकर भी इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। 

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लीफ कर्ल रोग

लीफ कर्ल रोग की विशेषता पौधों का गंभीर विकास रुक जाना और नीचे की ओर लुढ़क जाना है। इस रोग के लक्षण पत्तों का सिकुड़ना नई उभरती पत्तियाँ बाद में हल्के पीले रंग की दिखाई देना हैं, व कर्लिंग लक्षण भी दिखाते हैं। 

पुरानी पत्तियाँ चमड़े जैसी और भंगुर हो जाती हैं। नोड्स औरइंटरनोड्स का आकार काफी कम हो जाता है।

संक्रमित पौधे पीले दिखते हैं और बढ़वार कम देते हैं। पार्श्व शाखाएँ झाड़ीदार रूप देती हैं। इस रोग से प्रभावित संक्रमित पौधे बौने रह जाते हैं।

लीफ कर्ल रोग का रोकथाम 

ये रोग सफेद मक्खी के द्वारा फैलाया जाता है इसलिए सफेद मक्खी की निगरानी के लिए 12/हेक्टेयर की दर से पीला चिपचिपा जाल रखें। 

अवरोधक फसलें-अनाज उगाएं, खेत के चारों ओर खरपतवार मेजबान को हटाना नेट हाउस या ग्रीन हाउस में संरक्षित नर्सरी में  सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए रोपाई के 15, 25, 45 दिन बाद इमिडाक्लोप्रिड 0.05% या डाइमेथोएट 0.05% का छिड़काव करे।

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ब्लूबेरी की खेती करके किसान कमा सकते है लाखों का मुनाफा https://www.merikheti.com/blog/blueberry-farming-earn-profit-worth-lakhs-by-cultivating-blueberries Mon, 13 May 2024 04:55:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/blueberry-farming-earn-profit-worth-lakhs-by-cultivating-blueberries

आज के इस लेख में हम आपके लिए एक ऐसे ही फल की खेती के बारे में बताने वाले हैं जिसको सुपर फ़ूड माना जाता है। इसको सुपर फ़ूड मानने का सबसे बढ़ा कारण है इसमें मौजूद औषधीय गुण। इसमें मौजूद औषधीय के कारण ही भारत के साथ-साथ विदेशों में भी इस फल की हमेशा बहुत मांग रहती है।

भारत में ब्लूबेरी की खेती

भारत में ब्लूबेरी की खेती बहुत सीमित है, लेकिन इसके अद्भुत स्वास्थ्य लाभों के कारण व्यावसायिक खेती की बहुत बड़ी संभावना है। 

भारत में सही खेती प्रथाओं के साथ, ब्लूबेरी ने सफलतापूर्वक बढ़ना शुरू कर दिया है। भारत में ब्लूबेरी की खेती का भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल होगा।

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किस प्रकार की जलवायु में की जाती है ब्लूबेरी की खेती 

ब्लूबेरी बहुत सारी जलवायु में उगाया जा सकता है। लेकिन ये गर्म (पूर्ण सूर्य) जलवायु में अच्छा बढ़ते हैं। जब आप खेती करने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो आपको अपने क्षेत्र की जलवायु के लिए खेती करने के लिए अपने निकटतम बागवानी विभाग से जांच करानी चाहिए।

ब्लूबेरी की खेती के लिए मिट्टी

ब्लूबेरी की फसल के लिए बहुत अम्लीय, उपजाऊ, वातित, नम और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी की जरूरत है। वृद्धि और उपज के लिए सर्वोत्तम मिट्टी pH 4.0–5.5 है। 

उच्च pH वाली मिट्टी में थोड़ा सल्फर मिलाकर मिट्टी का pH कम किया जा सकता है। ब्लूबेरी खेती शुरू करने से पहले मिट्टी का विश्लेषण करें।

ब्लूबेरी की उन्नत किस्में

ब्लूबेरी की खेती में कई किस्में उपलब्ध हैं। प्रत्येक कृषक साप्ताहिक रूप से 3 से 4 कटाई की अवधि के लिए उत्पादन करेगा। ब्लूबेरी की किस्में 3 श्रेणियों में बांटा गया है। हाईबश, लोबश और हाइब्रिड हाफ-हाई।

ब्लूबेरी की उन्नत किस्में निम्नलिखित हैं: ड्यूक, टोरो, चैंडलर, चैंटलर, ओनल, मिस्टी नेल्सन, लिगेसी, इलियट, एलिजाबेथ, अर्लेन, रेविएल प्रिंस, कोलंबस प्रीमियर, पाउडर ब्लू क्लाइमेक्स, ब्राइट वेल, ब्लूक्रॉप, ब्लू रे, ब्लूजे।

ब्लूबेरी की खेती के लिए भूमि की तैयारी

भूमि को समतल और जुताई तब तक करते रहना चाहिए जब तक कि वह अच्छी जुताई की अवस्था में न आ जाए। मुख्य खेत को खरपतवार मुक्त बनाना चाहिए। 

पंक्तियों और 3 मीटर गलियारों के बीच पौधे की दूरी 80 सेमी होनी चाहिए। ब्लूबेरी की बुवाई वर्ष के किसी भी समय की जा सकती है पसंदीदा तने की लंबाई 15 से 25 सेमी और 25 से 45 सेमी है। पेड़ लगाने के 2 सप्ताह पहले 10 इंच गहरा गड्ढा खोदा जाना चाहिए। 

साइड-स्प्रेडिंग जड़ें देने के लिए लगभग एक मीटर के पार एक वर्ग खोदना चाहिए। गड्ढों से निकाली गई मिट्टी को लीफ मोल्ड, कोको पीट या कम्पोस्ट के बराबर भागों में मिलाना चाहिए।

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ब्लूबेरी की खेती में छंटाई

ब्लूबेरी के पौधे एक झाड़ी के प्रकार होते हैं और इसके मुकुट से उपजा होता है। आमतौर पर उत्पादक तनों की संख्या 9 से 12 होनी चाहिए। 

5 से 6 साल पुराने बेंत निकालकर हर साल प्रूनिंग करनी चाहिए। ब्लूबेरी झाड़ी को पहले कुछ वर्षों तक फल देने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।

ब्लूबेरी की खेती में पौध संरक्षण

ब्लूबेरी के पौधे कीटों और रोगों के प्रतिरोधी होते हैं। मुख्य समस्या यह है कि ये जामुन पक्षियों के लिए पसंदीदा भोजन हैं, इसलिए पौधों के चारों ओर जाल लगाकर बगीचे में पक्षियों से बचें। विशेष रूप से फलने के समय (जून में) इसकी आवश्यकता होती है।

ब्लूबेरी की खेती में सिंचाई 

खेत में रोपाई के तुरंत बाद पौधों की सिंचाई करें। ब्लूबेरी के पौधों को सप्ताह में एक बार सिंचाई करनी चाहिए। बारिश का पानी नल के पानी से बेहतर होता है क्योंकि यह प्रकृति में अधिक क्षारीय होता है। 

लंबे समय तक शुष्क मौसम की स्थिति में, मिट्टी की नमी धारण क्षमता के आधार पर इसे बार-बार सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है।

ब्लूबेरी की खेती में खाद और उर्वरक

ब्लूबेरी की खेती में खाद के उपयोग के कई संभावित लाभ हैं। भूमि/मिट्टी की तैयारी के समय गाय के गोबर की तरह अच्छी तरह से सड़ी हुई खेत की खाद (FMY) को पूरक किया जाना चाहिए। 

ब्लूबेरी के पौधे अम्लीय मिट्टी में होते हैं, इसलिए एक उच्च एसिड ब्लूबेरी बुश उर्वरकों की तलाश करें जिनमें अमोनियम सल्फेट, अमोनियम नाइट्रेट या सल्फर-लेपित यूरिया हो। इनमें कम पीएच (उच्च एसिड) होता है। पत्तियों के उगने से पहले वसंत ऋतु में उर्वरकों को लगाया जाना चाहिए।

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ब्लूबेरी की खेती में कटाई

ब्लूबेरी के पौधे विकास के दूसरे या तीसरे मौसम से फल देना शुरू कर देंगे। पौधे साल में एक बार जामुन पैदा करते हैं। कटे हुए फलों को ताजा और डिब्बाबंद के रूप में बेचा जा सकता है। ब्लूबेरी की कटाई के बाद, सभी बेंत की टोपी से उत्पादित जामुन को हटा दिया जाना चाहिए।

आमतौर पर, कटाई अगस्त से सितंबर के महीने में शुरू हो जाएगी। जैसे ही वे नीले हो जाएं, ब्लूबेरी न लें और कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करें। जब वे कटनी के लिए तैयार हों, तो वे सीधे तुम्हारे हाथ में पड़ जाएं।

ब्लूबेरी की खेती में उपज

फल की उपज कई कारकों पर निर्भर करती है जैसे कि विविधता (किसान), मिट्टी के प्रकार, सिंचाई और मौसम की स्थिति। आम तौर पर, ब्लूबेरी की खेती में, पहली फसल में प्रति पौधे 1 किलो फल की उम्मीद की जा सकती है। बाद के वर्षों में, ब्लूबेरी का पौधा परिपक्वता के छठे से सातवें वर्ष तक उपज में दोगुना हो जाएगा।

उपज

अधिकतम उपज की उम्मीद एक पौधे से की जा सकती है, जो 10 किलो है और औसत उपज 5 से 6 किलो प्रति पौधे है। ज्यादातर मामलों में, ब्लूबेरी के पौधे 20 से 25 साल तक फल देते हैं।

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मशरूम की कृषि योग्य किस्में, तापमान, उर्वरक, लागत और आय की जानकारी https://www.merikheti.com/blog/cultivable-varieties-temperature-fertilizers-cost-and-income-of-mushrooms Sun, 12 May 2024 05:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/cultivable-varieties-temperature-fertilizers-cost-and-income-of-mushrooms

कृषकों के लिए मशरूम की खेती एक बेहतरीन आय का स्त्रोत है। मशरूम की खेती करने के लिए कम भूमि, पानी और समय की जरूरत होती है। अन्य कृषि उत्पादों के मुकाबले में मशरूम की खेती करने में लागत कम आती है और अच्छी आमदनी हांसिल की जा सकती है।

भारतीय किसान वर्तमान में पारंपरिक खेती से हटकर गैर पारंपरिक खेती की तरफ अपना रुझान कर रहे हैं और इसमें सफलता भी प्राप्त कर रहे हैं। अधिकांश किसान सब्जियों की खेती करना ज्यादा पंसद करते हैं। क्योंकि, इनसे कम समय में अधिक कमाई की जा सकती है। इनमें से एक मशरूम की खेती भी है। 

मशरूम एक अत्यंत लाभकारी खेती है

कृषकों के लिए मशरूम की खेती एक अत्यंत लाभकारी और व्यापक व्यवसाय है। मशरूम की खेती करने के लिए कम भूमि, पानी और समय की जरूरत पड़ती है। 

अन्य कृषि उत्पादों के मुकाबले में मशरूम की खेती करने में खर्चा कम आता है और बेहतरीन आय अर्जित की जा सकती है। मशरूम में विभिन्न तरह के पोषक तत्व, विटामिन्स, खनिज और प्रोटीन्स की भरपूर मात्रा पाई जाती है, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत फायदेमंद है। 

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मशरूम की कृषि योग्य कितनी किस्में हैं?

मशरूम की खेती करने से पूर्व आपको इसकी उन प्रजातियों का चयन करना चाहिए, जिससे कम वक्त में आपकी अच्छी-खासी आय हो सके। इसके अतिरिक्त, आपको इसकी खेती करने से पूर्व अपने नजदीकी बाजार की मांग के अनुरूप मशरूम की पैदावार करनी चाहिए। 

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि संपूर्ण विश्व में मशरूम की कृषियोग्य 70 प्रजातियाँ विघमान हैं। लेकिन, भारत में सफेद बटर मशरूम, शिटाके मशरूम, ढींगरी (ऑयस्टर) मशरूम, पैडीस्ट्रा मशरूम और दूधिया मशरूम किस्मों को उगाया जाता है। इनकी खेती करके किसान अच्छा और मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। 

मशरूम की खेती के लिए उचित तापमान और खाद 

मशरूम की खेती करने के लिए किसानों को निश्चित तापमान का भी ख्याल रखना होता है। इसकी फसल लगाने के लिए 15 से 17 डिग्री सेल्सियस का तापमान काफी शानदार माना जाता है। 

इसकी खेती के लिए फूस के छप्परों का एक सेट निर्मित किया जाता है। साथ ही, इसके नीचे कंपोस्ट खाद का बेड बनाया जाता है। अब इसमें मशरूम के बीज डालकर इसकी खेती की जाती है। 

किसान इसकी खाद को तैयार करने के लिए गेहूं का भूसा, नीम की खली, पोटाश, यूरिया, चोकर और पानी को मिलाकर एक से डेढ़ माह तक सड़ाते हैं। 

जब इसके लिए खाद तैयार होती है, तो मोटी मोटी बेड बनाकर इसमें मशरूम के बीजों को रोपा जाता है। बीज बुवाई के उपरांत इसको ढ़क दिया जाता है और इसके लगभग एक महीने पश्चात मशरूम निकलना शुरू हो जाते हैं।

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मशरूम की खेती से लाखों में होगी आय

किसान भाइयों यदि आप मोटी आय करना चाहते हैं, तो मशरूम की खेती एक शानदार विकल्प माना जाता है। इसकी खेती के लिए कृषकों को लंबे-चौड़े खेत की आवश्यकता नहीं पड़ती है। 

बतादें, कि एक कमरा ही इसके लिए पर्याप्त होता है। कम खर्च और कम जगह के उपरांत भी किसान इसकी खेती करके कुल खर्च का तीन गुना तक सुगमता से कमा सकते हैं। 

एक कमरे में मशरूम की खेती करने पर 50 से 60 हजार रुपए का खर्चा आता है और इससे 3 से 4 लाख रुपए की सुगमता से आय से हो जाती है।

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भिंड़ी की खेती को प्रभावित करने वाले प्रमुख कीट एवं रोग https://www.merikheti.com/blog/pests-and-diseases-affecting-okra-cultivation Sat, 11 May 2024 05:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/pests-and-diseases-affecting-okra-cultivation

भारतीय किसान गेहूं कटाई के पश्चात अतिरिक्त आय करने के लिए सब्जियों की खेती करते हैं। इनमें सबसे ज्यादा खीरा, तोरई, बैंगन और भिंडी जैसी अन्य सब्जियों को उगाने में प्राथमिकता प्रदान करते हैं। लेकिन, भीषण गर्मी और निरंतर बढ़ते तापमान से सब्जियों की फसल को विभिन्न प्रकार के रोग घेर लेते हैं। 

अगर हम गर्मी और बढ़ते तापमान से भिंडी की फसल को प्रभावित करने वाले रोगों की बात करें, तो इसमें चूर्णिल फफूंद रोग, पीला मोजैक, फल छेदक और कटुआ कीट इसकी फसल को बड़ी हानि पहुंचाते हैं। 

यदि इन पर समय से काबू नहीं किया गया, तो इससे पूरी फसल पूर्णतय बर्बाद हो सकती है। कम समयावधि में शानदार कमाई करने के लिए भिंडी की फसल काफी लाभदायक हो सकती है। परंतु, इसकी फसल में लगने वाले रोगों को काबू में रखना अत्यंत आवश्यक है। 

1. चूर्णिल फफूंद रोग

चूर्णिल फफूंद रोग का प्रभाव सूखे मौसम में पत्तियों पर होता है। भिंडी की फसल में इस रोग के लगने से पत्तियों पर सफेद रंग की परत जमनी प्रारंभ हो जाती है। 

साथ ही, पत्तियां धीरे-धीरे नीचे गिरने लग जाती हैं। इस रोग के संक्रमण के पश्चात टेढ़े-मेढ़े फल बनना शुरू हो जाते हैं। चूर्णिल फफूंद रोग को नियंत्रण में रखने के लिए प्रति लीटर पानी में 3 ग्राम सल्फर पाउडर को घोल कर खेतों में इसके मिश्रण का स्प्रे करना चाहिए। 

इसके अतिरिक्त आप इस रोग पर नियंत्रण करने के लिए प्रति लीटर पानी में 6ml कैराथीन को घोलकर भिंडी की फसल पर छिड़काव कर सकते हैं।

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2. पीला मोजैक रोग

भिंडी की फसल में पीला मोजैक रोग सफेद मक्खी के द्वारा फैलता है। इस रोग के चलते पत्तियों की शिराएं पीली पड़ने लग जाती हैं। 

यह रोग भिंडी की फसल में लगने के बाद फल के साथ-साथ पूरे पौधे को पीला कर देता है। किसान पीला मोजैक रोग से भिंडी की फसल को काबू में रखने के लिए प्रति लीटर पानी में 2ml इमिडाक्लोप्रिड को घोलकर खेतों में छिड़काव कर सकते हैं। 

इसके बाद, 15 दिन के अंतराल पर दोबारा से प्रति लीटर पानी में 2ml थाइमेट घोलकर फसलों पर छिड़काव कर देना है।

3. छेदक कीट

भिंडी की फसल में लगने वाले छेदक कीट काफी तीव्रता से फल को हानि पहुंचाते हैं। यह कीट भिंडी के फल के अंदर घुसकर इसमें अंडे दे देती है और तेजी से अपनी तादात बढ़ाती है। 

जब भिंडी की फसल में 5 से 10 प्रतिशत तक फूल निकल जाए, तो किसानों को उस समय प्रति 3 लीटर पानी में 1 ग्राम थियामेथोक्सम को घोलकर फसलों पर छिड़काव करना चाहिए। 

इसके 15 दिनों के पश्चात किसानों को बाकी रोगों से फसल को सुरक्षित रखने के लिए इमिडाक्लोप्रिड या क्युनालफॉस का स्प्रे करना चाहिए। 

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4. कटुआ कीट

कटुआ कीट भिंडी की फसल में लगने के पश्चात काफी तीव्रता से इसको हानि पहुंचाते हैं। ये कीट लगने के बाद भिंडी के पौधे के तने को काटने लग जाता है। 

वहीं, पौधा टूटकर नीचे गिरने लग जाता है। ऐसी स्थिति में किसान इस कीट को नियंत्रण में करने के लिए मिट्टी में मिलाने वाले कीटनाशकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। 

किसान भिंडी की फसल को कटुआ कीट से नियंत्रण के लिए प्रति एकड़ में 10 किलोग्राम के हिसाब से थाइमेट-1 जी और कार्बोफ्यूरान 3जी को मृदा में मिला देना है।

किसान भिंडी की कटाई कब करें?

किसानों को भिंडी की फसल में इन सभी कीटनाशकों का छिड़काव करने के बाद कटाई में सावधानी बरतनी चाहिए। भिंडी की फसल पर कीटनाशक का छिड़काव करने के लगभग 5 से 7 दिनों बाद ही भिंडी की हार्वेस्टिंग करनी चाहिए। ऐसा करने से दवा का प्रभाव काफी कम हो जाता है और मानव स्वास्थ्य को भी किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होता है।

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धान की सही बुवाई को लेकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक रितेश शर्मा जी का साक्षात्कार

धान की सही बुवाई को लेकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक रितेश शर्मा जी का साक्षात्कार

मेरीखेती की टीम किसानों की समृद्धि को लक्ष्य मानकर निरंतर किसान हित में निःशुल्क किसान पंचायत का आयोजन, मासिक पत्रिका और ऑनलाइन माध्यम से लाभकारी जानकारी किसानों तक पहुँचाने का कार्य करती आ रही है। इसी कड़ी में अब गेंहू की फसल कटाई होने के बाद धान की बुवाई की तैयारी करने वाले किसानों के लिए मेरीखेती टीम  ने वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक रितेश शर्मा जी का साक्षात्कार लिया। डॉ रितेश शर्मा कृषि वैज्ञानिक होने की वजह से धान की फसल की अच्छी उपज लेने की सभी तरकीबों के बारे में जानते हैं। क्योंकि रितेश शर्मा को कृषि क्षेत्र में वर्षों का...
मिट्टी जांच क्यों है आवश्यक? जानिए सम्पूर्ण जानकारी

मिट्टी जांच क्यों है आवश्यक? जानिए सम्पूर्ण जानकारी

फसल उत्पादन और मृदा स्वास्थ्य दोनों के लिए संतुलित पौध पोषण बहुत महत्वपूर्ण है। मिट्टी परीक्षण खेत की मिट्टी में उपस्थित विभिन्न प्रमुख और गौण पोषक तत्वों की मात्रा की जानकारी देता है। मिट्टी परीक्षण के नतीजों को देखते हुए कृषक बन्धु उर्वरकों का सही मात्रा में उपयोग कर अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।मिट्टी परीक्षण क्या होता है?मिट्टी परीक्षण का अर्थ है पौधों की मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्ध मात्राओं का रासायनिक परीक्षणों द्वारा आंकलन करना और विभिन्न मृदा विकास विशेषताओं जैसे मृदा लवणीयता, क्षारीयता और अम्लीयता की जांच करना। फसल उत्पादन के लिए मिट्टी परीक्षण बहुत आवश्यक...
टमाटर की फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों का नियंत्रण कैसे करे, जाने यहां

टमाटर की फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों का नियंत्रण कैसे करे, जाने यहां

टमाटर की फसल विशेष रूप से भारतीय खाद्य संस्कृति में महत्वपूर्ण है और यह एक प्रमुख सब्जी है जो विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में उपयोग किया जाता है जैसे की सलाद, सूप, सॉस, और सब्जियों में। टमाटर का वास्तविक अनुभव तथा उत्पादन भारी खेती में या छोटे स्तर पर भी किया जा सकता है। यह फल प्राय: लाल, पीला, और हरे रंग का होता है। टमाटर की खेती में किसानो को कई कठनाईयो का भी सामना करना पड़ता है, इनमे सबसे प्रमुख है टमाटर की फसल में लगने वाले रोग।टमाटर की फसल में लगने वाले रोग फसल उत्पादन को बहुत प्रभावित...
भिंड़ी की खेती को प्रभावित करने वाले प्रमुख कीट एवं रोग

भिंड़ी की खेती को प्रभावित करने वाले प्रमुख कीट एवं रोग

भारतीय किसान गेहूं कटाई के पश्चात अतिरिक्त आय करने के लिए सब्जियों की खेती करते हैं। इनमें सबसे ज्यादा खीरा, तोरई, बैंगन और भिंडी जैसी अन्य सब्जियों को उगाने में प्राथमिकता प्रदान करते हैं। लेकिन, भीषण गर्मी और निरंतर बढ़ते तापमान से सब्जियों की फसल को विभिन्न प्रकार के रोग घेर लेते हैं। अगर हम गर्मी और बढ़ते तापमान से भिंडी की फसल को प्रभावित करने वाले रोगों की बात करें, तो इसमें चूर्णिल फफूंद रोग, पीला मोजैक, फल छेदक और कटुआ कीट इसकी फसल को बड़ी हानि पहुंचाते हैं। यदि इन पर समय से काबू नहीं किया गया, तो इससे...