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Meri Kheti https://www.merikheti.com/ Kisan ka saathi Sun, 03 Mar 2024 12:30:00 GMT hi hourly 1 https://merikheti.com/favicon.jpg Meri Kheti https://www.merikheti.com/ 140 140 ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर क्या है और कितने प्रकार का होता है व इससे क्या-क्या फायदे हैं ? https://www.merikheti.com/blog/tractor-mounted-sprayer-how-many-types-and-its-benefits Sun, 03 Mar 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/tractor-mounted-sprayer-how-many-types-and-its-benefits

भारत में कृषि के लिए विभिन्न प्रकार के कृषि यंत्रों अथवा उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है, जो खेती के कार्यों को आसान बनाते हैं। खेती-किसानी में कृषि उपकरण कृषि संबंधित बहुत सारे कार्यों को सुगम बनाते हैं। इनकी मदद से किसान जिन कार्यों को पूरा करने में को घंटों खफा देते हैं उनको ये कृषि यंत्रों के उपयोग से मिनटों में पूर्ण कर सकते हैं।

इन्हीं उपकरणों में से एक ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर भी है। इन्हीं उपकरणों में से एक ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर (Tractor Mounted Spray) भी है। माउंटेड ट्रैक्टर स्प्रेयर के साथ किसान तकरीबन 90% फीसद तक जल की खपत को कम कर सकते हैं। 

ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर क्या होता है ? 

ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर एक ऐसा कृषि उपकरण है, जो तरल पदार्थों को खेत या बाग में स्प्रे करने में काम आता है. इस अधिकतर उपयोग किसान जल प्रक्षेपण, खरपतवार नाशक, फसल प्रदर्शन सामग्री, कीट रखरखाव रसायन और उत्पादन लाइन सामग्री के लिए करते हैं. 

इसके अवाला, इस कृषि उपकरण से फसलों पर कीटनाशकों, शाकनाशियों और उर्वरकों से भी छिडकाव किया जा सकता है। 

भारतीय कृषि क्षेत्र में ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर कितने प्रकार के होते हैं ? 

  • थ्री पाइंट हिच स्प्रेयर
  • बैकपैक स्प्रेयर
  • बूम स्प्रेयर
  • ट्रक-बेड स्प्रेयर
  • बूमलेस स्प्रेयर नोजल
  • टोइंग, हिच स्प्रेयर
  • मिस्ट स्प्रेयर
  • यूटीवी स्प्रेयर
  • एटीवी स्प्रेयर
  • स्पॉट स्प्रेयर

ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर के क्या-क्या फायदे हैं ?

अगर किसान भाई ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर को खेती के कार्यों के लिए शामिल करते हैं, तो इससे तकरीबन 10 गुना खपत कम होती है। इसके साथ ही 90 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। इस कृषि उपकरण का इस्तेमाल करने से छिड़काव की दक्षता बढ़ती है। 

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किसान खेतों में ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर का इस्तेमाल करके लागत को घटा सकते हैं और इससे पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुँचता है। इसके अतिरिक्त अगर आप एक बेहतरीन ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर खरीदते हैं, तो इससे खेतों में काफी शानदार फिनिशिंग आती है और वीओसी उत्सर्जन भी कम होता है।

महिंद्रा ग्रेपमास्टर बुलेट ++ (Mahindra Grapemaster Bullet++)

महिंद्रा के इस ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर को संचालित करने के लिए ट्रैक्टर की हॉर्स पावर 17.9 kW (24 HP) या फिर इससे ज्यादा होनी चाहिए। इस कृषि उपकरण के लिए ट्रैक्टर की अधिकतम पीटीओ पावर 11.9 kW (16 HP) या उससे अधिक होनी चाहिए। 

इसे मिनी ट्रैक्टर के साथ भी बड़ी सुगमता से संचालित किया जा सकता है। इसमें Manual Control Panel कंट्रोलर प्रदान किए गए हैं और यह 65 LPM Diaphragm टाइप पंप के साथ आता है। इस महिंद्रा ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर का एयर फ्लो तकरीबन 32 m/sec है। कंपनी के इस स्प्रेयर मशीन में 2 Speed + Neutral गियर वाला गियरबॉक्स प्रदान किया गया है। 

भारत में महिंद्रा ग्रेपमास्टर बुलेट ++ की कीमत (Mahindra Grapemaster Bullet++ Price) 2.65 लाख रुपये निर्धारित की गई है।

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कैसा होता है कैसुरीना का पेड़, जानिए सम्पूर्ण जानकारी https://www.merikheti.com/blog/how-is-casuarina-tree-how-to-grow-and-care-for-it Sun, 03 Mar 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/how-is-casuarina-tree-how-to-grow-and-care-for-it

कैसुरीना के पेड़ को देसी पाइन के नाम से भी जाना जाता है। यह फूलो के पौधों की एक प्रजाति है, जो कैसुरिनासी परिवार से सम्बंधित है। यह भारतीय उपमहाद्वीुप और ऑस्ट्रेलिया का मूल निवासी है।

इस पेड़ की पत्तियां शाखाओ के चारो ओर बिखरी हुई होती है। साथ ही इस पेड़ में नर और मादा फूल अलग अलग स्पाइक्स में व्यवस्थित होते है। 

कैसुरीना का पौधा दरारयुक्त रहता है, साथ ही यह पेड़ भूरे काले रंग और पपड़ीदार छाल वाले होते है। इस पेड़ की शाखाये नरम और नीचे की तरफ झुकी हुई होती है। 

हिंदी में कैसुरीना के पेड़ को जंगली सारू के नाम से भी जाना जाता है। 

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कैसुरीना वृक्ष बहुत तेजी से बढ़ने वाला एक सदाबहार वृक्ष है। इस पेड़ की ऊंचाई 40 मीटर होती है, साथ ही इस पेड़ का व्यास यानी चौड़ाई 60 सेंटीमीटर होता है। 

यह पेड़ ज्यादातर समुन्द्र तट पर पाया जाता है, इसके लिए रेतीली मिट्टी को उपजाऊ बताया जाता है। यह पेड़ काल्पनिक होने के साथ साथ दृण भी है, इस वृक्ष की प्राकर्तिक जीवन अवधी 50 वर्ष से भी अधिक होती है। 

भारत में कैसुरीना वृक्ष की खेती 

यह पेड़ दक्षिण पश्चिम और उत्तर पूर्वी दोनों मोनसून में अच्छे से बढ़ती है। दक्षिण भारत में इसकी खेती रेतली समुन्द्र तटों को फिर से प्राप्त करने के लिए की जा रही है। 

लेकिन उत्तरी भारत में इसका उत्पादन ज्यादातर ईंधन के लिए किया जाता है। बागवान इस पेड़ का उत्पादन ज्यादातर बागो की सजावट के लिए करते है।साथ ही हॉट हाउस जैसे जगहों की सजावट के लिए इस पेड़ को लगाया जाता है। 

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यह पेड़ बहुत ही ठोस होता है इसीलिए इसे आइरनवुड के नाम से भी जाना जाता है। यह पेड़ ज्यादातर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रो में रेतीली मिट्टी में उगाया जाता है।  

इस पेड़ की शाखाएँ असमान छाल से ढकी हुई होती है। इस पेड़ की लकड़ी काफी मजबूत होती है, इसीलिए इसका उपयोग बाड़ आदि लगाने के लिए भी किया जाता है। 

कैसुरीना के पेड़ में नाइट्रोजन की मात्रा को स्थिर करने वाली ग्रंथिया भी पायी जाती है। साथ ही यह पेड़ 47 डिग्री से अधिक तापमान को भी सहन कर सकता है। इस वृक्ष पर जो फूल आते है वो आमतौर पर एकलिंगी होते है। 

साल में इस पर दो बार फूल आते है  पहले तो जनवरी से फरवरी की समय अवधी में उसके बाद इसपर 6 महीने बाद ही फूल देखने को मिलते है। 

इसमें नर फूल बेलनाकार के जैसे दिखाई पड़ते है यही मादा फूल शाखा की धुरी में स्तिथ होते है, जिनके घने सिर होते है। यह मादा फूल छोटी कलियों के जैसे दिखते है यह फूल मुड़े हुए होते है और लाल रंग के बालो से ढके हुए होते है।

ज्यादातर इन सिरों को समूह के रूप में देखा जाता है। कुछ समय बाद यह कली शंक के जैसा आकर ग्रहण कर लेती है और इस पर से घने लाल बाल झड़कर निचे गिर जाते है। 

भारत में कैसुरिना पेड़ का उपयोग 

कैसुरीना पेड़ की लकड़ी ठोस होती है, इसीलिए बढ़ई भी इसके साथ काम करने में असमर्थ रहते है। यह पेड़ बीम और पोस्ट के लिए अधिक उपयोगी माना जाता है। 

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ज्यादातर इस पेड़ का उत्पादन ईंधन के लिए किया जाता है, यह दुनिया की सबसे अच्छी जलाऊ लकड़ियों में से एक है। यह पेड़ लम्बे समय तक भूमिगत नहीं रहता है, इस पेड़ को 10 -12 साल पुराना होने पर अपने उपयोग के लिए काट लिया जाता है। आमतौर पर कैसुरिना की छाल का उपयोग मछुआरों के जालों को रंगने के लिए किया जाता है। 

यह पेड़ मिट्टी की उर्वरकता के साथ साथ स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी होता है। यह पेड़ मिट्टी की उत्पादन क्षमता को बनाये रखता है, साथ ही इससे पर्यावरण भी अनुकूल  प्रभाव पड़ते है। 

यह पेड़ फसल चक्र और सिंचाई जैसी गतिविधियों में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है। साथ ही यह पेड़ वन्य जीवो के लिए भी आश्रय प्रदान करता है। 

इस पेड़ की लकड़ी का उपयोग फर्नीचर आदि बनाने के लिए भी किया जाता है। साथ ही यह भूनिर्माण उद्देश्यों के लिए भी उपयोग किया जाता है। यह पेड़ सांस्कृतिक और पारिस्थितिक रूप से हमारे पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण अंग बने हुए है।

यह हमे स्वास्थ्य से लेकर भवन निर्माण और दवा तक के श्रोत प्रदान करता है। इस पेड़ को ऑस्ट्रेलियाई देवदार, आइरनवुड और वीफवूड के नाम से भी जाना जाता है। 

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फसल कटाई करने वाले कंबाइन हार्वेस्टर की संपूर्ण जानकारी https://www.merikheti.com/blog/combine-harvester-machine-features-and-price Sun, 03 Mar 2024 00:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/combine-harvester-machine-features-and-price

कंबाइन हार्वेस्टर एक बेहद ही कुशल कृषि मशीन है, जिसे फसलों की कटाई से संबंधित कई कार्यों को एक साथ करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह मुख्य रूप से अनाज फसलों जैसे मक्का, सोयाबीन, गेहूं और जौ जैसी फसलों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। 

विशेष रूप से कंबाइन हार्वेस्टर मशीन में एक कटिंग मैकेनिज्म, थ्रेशिंग सिस्टम, सेपरेशन सिस्टम, क्लीनिंग सिस्टम, और भंडारण सिस्टम होता है। 

आजकल के आधुनिक कंबाइन हार्वेस्टर सामान्यतः उन्नत तकनीकों से युक्त होते हैं, जैसे जीपीएस नेविगेशन, उपज निगरानी प्रणाली और स्वचालित नियंत्रण। 

कंबाइन हार्वेस्टर के इस्तेमाल ने कटाई के लिए जरूरी श्रम और वक्त को काफी कम करके कृषि में क्रांति कर डाली है। किसान बड़े खेतों को जल्दी और कुशलता से जोत सकते हैं।  

कंबाइन हार्वेस्टर मशीन कैसे काम करता है ?

कंबाइन हार्वेस्टर मशीन में एक रील खड़ी होती है, जिस पर किसान फसलों को रखतें है। इसका कार्य फसल को काटने वाली इकाई तक पहुँचाना है। जिसके अंदर बड़े-बड़े चाकू जैसे कई सारे तेज धारदार ब्लैड होते हैं। 

इन ब्लेड्स की सहायता से कटर फसल को काटता है। कन्वेयर बेल्ट के माध्यम से कटी हुई फसल रेसिंग यूनिट में जाती है। रेसिंग यूनिट में फसल के दाने ड्रेसिंग ड्रम और कंक्रीट क्लीयरेंस की सहायता से अलग हो जाते हैं। 

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कंबाइन हार्वेस्टर में बड़े-बड़े क्लीनिंग सिस्टम्स और ब्लोवर होते हैं, जिनकी सहायता से फसलों से भूसे को अलग किया जाता है। साफ हुआ अनाज स्टोरेज सिस्टम में इकट्ठा हो जाता है।  

कंबाइन हार्वेस्टर मशीन के क्या-क्या फायदे हैं ? 

कंबाइन हार्वेस्टर एक ऐसी मशीन है, जो एक साथ कईं दिशाओं से कृषि कार्यो को आसान बनाती है। इसका इस्तेमाल करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं।

बढ़ी हुई दक्षता: कंबाइन हार्वेस्टर एक ही मशीन में कई ऑपरेशनों को जोड़कर कटाई की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करते हैं। यह कटाई, छटाई, भण्डारण और भी कईं कार्यों को एक साथ कर सकतें है।  

समय की बचत: पारंपरिक मैनुअल या अलग मशीनरी-आधारित कटाई विधियों की तुलना में कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई बहुत तेजी से होती है। किसान फसलों की कुशलता से कटाई कर सकते हैं।  

कम कृषि लागत: एक हार्वेस्टर कईं मशीनो का काम करता है। इसलिए, किसानो को अलग-अलग मशीन खरीदने की ज़रूरत नहीं है।  

गुणवत्ता संरक्षण: कंबाइन हार्वेस्टर को कम से कम नुकसान के साथ फसलों को संभालने और अनाज की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए डिज़ाइन किया गया है। 

कंबाइन हार्वेस्टर कितने प्रकार के होते हैं?

कंबाइन हार्वेस्टर मुख्यत दो प्रकार के होते हैं।

  • स्वचालित कंबाइन हार्वेस्टर

स्वचालित कंबाइन हार्वेस्टर में पूरी मशीनरी फिट रहती है। मशीनरी अपनी ताकत से इंजन व बाकी हिस्सों को संचालित करती है, जिससे फसल की कटाई, कुटाई (दौनी) व दानों की सफाई का कार्य सहजता से होता है।

  • ट्रैक्टर चालित कंबाइन हार्वेस्टर 

ट्रैक्टर चालित कंबाइन हार्वेस्टर मशीन को ट्रैक्टर के साथ जोडकर चलाया जाता है। यह मशीन ट्रैक्टर के पीटीओ से चलती है। ट्रैक्टर से कंबाइन को चलाकर फसल की कटाई की जाती है।

कंबाइन हार्वेस्टर किस आधार पर खरीदना चाहिए 

यदि आप एक लघु या सीमान्त किसान हैं या केवल अपने घर की खेती के लिए हार्वेस्टर खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो आपके लिए मिनी कंबाइन हार्वेस्टर (Combine Harvester)अथवा ट्रैक्टर द्वारा संचालित कंबाइन हार्वेस्टर अधिक उपयोगी रहेगा। साथ ही, आपके लिए छोटे हार्वेस्टर की कीमत भी सही रहेगी।

वहीं, यदि आप अपने घर घरेलू इस्तेमाल के अतिरिक्त कंबाइन हार्वेस्टर से धन भी कमाना चाहते हैं, तो फिर आपको इसके लिए हैवी कंबाइन हार्वेस्टर खरीदना पड़ेगा। 

अब या तो आप स्वचालित कंबाइन हार्वेस्टर खरीदें या फिर ट्रैक्टर चलित कंबाइन हार्वेस्टर में मजबूत और ताकतवर कंबाइन हार्वेस्टर खरीदें।

भारतीय बाजार में कंबाइन हार्वेस्टर की कीमत क्या है ?

कंबाइन हार्वेस्टर की कीमत कटर बार पर निर्भर होती है। इस वक्त भारत में लगभग 20 से ज्यादा प्रसिद्ध कंपनियां कंबाइन हार्वेस्टर का निर्माण कर रही हैं। 

कंबाइन हार्वेस्टर की कीमत अपने फीचर्स और विशेषताओं के मुताबिक 10 लाख* रुपए से लेकर 50 लाख* रुपए के मध्य बाजार में है।

ये भी पढ़ें: खरीफ की फसल की कटाई के लिए खरीदें ट्रैक्टर कंबाइन हार्वेस्टर, यहां मिल रही है 40 प्रतिशत तक सब्सिडी

वही, अगर आप छोटे किसान हैं और सिर्फ घरेलू उपयोग के लिए ही कंबाइन हार्वेस्टर खरीदना चाहते हैं, तो आपके लिए मिनी कंबाइन हार्वेस्टर/ छोटा हार्वेस्टर की कीमत का भी विकल्प खुला है। मिनी कंबाइन हार्वेस्टर की कीमत 5 लाख* रुपए से चालू होती है।

कंबाइन हार्वेस्टर खरीदते वक्त इस बात का जरूर ध्यान रखें !

अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर कंबाइन हार्वेस्टर पर अनुदान की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। अनुदान की दर राज्यों में लगने वाले RTO के चलते अलग-अलग होती है। 

सामान्यत: लघु, सीमांत व महिला किसानों को 50 प्रतिशत व बड़े किसानों को 40 प्रतिशत सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है। अब चाहे वह कंबाइन हार्वेस्टर हो या और कोई कृषि उपकरण हमें उसे खरीदने से पहले यह जरूर जान लेना चाहिए कि उस पर अनुदान मिल रहा है या नहीं।    

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ऐस डीआई 550 एनजी 4डब्ल्यूडी ट्रैक्टर की विशेषताएँ, फीचर्स और कीमत क्या है ? https://www.merikheti.com/blog/ace-di-550-ng-4wd-tractor-features-and-price-50-hp-ka-sabse-sasta-aur-majboot-tractor Sat, 02 Mar 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/ace-di-550-ng-4wd-tractor-features-and-price-50-hp-ka-sabse-sasta-aur-majboot-tractor

ट्रैक्टर को किसानों का मित्र कहा जाता है। क्योंकि, कृषि से जुड़े छोटे से बड़े सभी कार्यों को ट्रैक्टर की मदद से पूरा किया जाता है। ऐस (ACE) कंपनी भारतीय बाजार में अपने शक्तिशाली ट्रैक्टर बनाने के लिए पहचानी जाती है। कंपनी के ट्रैक्टर ईंधन दक्षता (फ़्यूल एफ़िशिएंसी) तकनीक वाले इंजन के साथ आते हैं, जो खेती के समस्त कार्यों को कम से कम ईंधन खपत के साथ समय से पूर्ण कर सकते हैं। अगर आप कृषि कार्य हेतु शक्तिशाली ट्रैक्टर खरीदने का विचार बना रहे हैं, तो आपके लिए ऐस (ACE) डीआई 550 एनजी 4डब्ल्यूडी ट्रैक्टर काफी शानदार विकल्प साबित हो सकता है। कंपनी का यह ट्रैक्टर 2100 आरपीएम के साथ 50 HP पावर उत्पन्न करने वाले 3065 सीसी इंजन में आता है।

ऐस (ACE) डीआई 550 एनजी 4डब्ल्यूडी की क्या-क्या विशेषताऐं हैं ? 

ऐस (ACE) डीआई 550 एनजी 4डब्ल्यूडी ट्रैक्टर में आपको 3065 सीसी क्षमता वाला 3 सिलेंडर में Water Cooled इंजन प्रदान किया जाता है, जो 50 HP पावर उत्पन्न करता है। कंपनी का यह ट्रैक्टर Dry Air Cleaner टाइप एयर फिल्टर के साथ आता है, जो इंजन को धूल मृदा से सुरक्षित रखने में सहयोग करता है। इस ऐस ट्रैक्टर की अधिकतम पीटीओ पावर 42.5 HP है, जो तकरीबन सभी कृषि यंत्रों को संचालित करने के लिए इस ट्रैक्टर को पर्याप्त बनाती है। 

कंपनी का यह ट्रैक्टर 2100 आरपीएम उत्पन्न करने वाले इंजन के साथ आता है। ऐस डीआई 550 एनजी 4डब्ल्यूडी ट्रैक्टर की भार उठाने की क्षमता 1200/1800 किलोग्राम निर्धारित की गई है और इसका समकुल भार 2110 किलोग्राम है। कंपनी ने अपने इस ट्रैक्टर को 3790 MM लंबाई और 1835 MM चौड़ाई के साथ 1960 MM व्हीलबेस में तैयार किया है। ऐस का यह ट्रैक्टर 370 MM ग्राउंड क्लीयरेंस के साथ आता है।

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ऐस डीआई 550 एनजी 4WD के क्या-क्या फीचर्स हैं ?

ACE DI 550 NG 4WD ट्रैक्टर में आपको Single Drop Arm, Power स्टीयरिंग उपलब्ध कराया जाता है, जो उबड़-खबाड़ रास्तों में भी स्मूथ ड्राइव प्रदान करता है। कंपनी के इस ट्रैक्टर में 8 Forward + 2 Reverse गियर वाला गियरबॉक्स आता है। इस ट्रैक्टर में Dual क्लच आता है और इसमें आपको Constant Mesh टाइप ट्रांसमिशन देखने को मिल जाता है। कंपनी ने अपने इस ट्रैक्टर की 2.50 - 32.5 kmph फॉरवर्ड स्पीड और 3.80 - 13.7 kmph रिवर्स स्पीड रखी है। यह ऐस ट्रैक्टर 6 Spline टाइप पावर टेकऑफ के साथ आता है, जो 540 आरपीएम जनरेट करती है। ACE DI 550 NG 4WD ट्रैक्टर 4X4 ड्राइव में आता है, जिससे इसके सभी टायरों को पूरी शक्ति मिलती है। कंपनी के इस ट्रैक्टर में 8 x 18 फ्रंट टायर और 14.9 x 28 , 12 PR रियर टायर प्रदान किए गए हैं।

ऐस डीआई 550 एनजी 4डब्ल्यूडी की कितनी कीमत है  

भारत में ACE DI 550 NG 4WD ट्रैक्टर की एक्स शोरूम कीमत 6.95 लाख से 8.15 लाख रुपये निर्धारित की गई है। इस ऐस 50 एचपी ट्रैक्टर की ऑन रोड प्राइस (ACE 50 HP Tractor On Road Price) समस्त राज्यों में लगने वाले आरटीओ रजिस्ट्रेशन और रोड टैक्स की वजह से अलग हो सकती है। कंपनी अपने ACE DI 550 NG 4WD Tractor के साथ 2000 घंटे या 2 साल की वारंटी प्रदान करती है। 

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जायद में खीरे की इन टॉप पांच किस्मों की खेती से मिलेगा अच्छा मुनाफा https://www.merikheti.com/blog/cultivation-of-these-top-5-varieties-of-cucumber-in-zaid-season Sat, 02 Mar 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/cultivation-of-these-top-5-varieties-of-cucumber-in-zaid-season

किसान भाइयों अब जायद का सीजन आने वाला है। किसान अनाज, दलहन, तिलहन फसलों की खेती की जगह कम वक्त में पकने वाली सब्जियों की खेती से भी अच्छी आमदनी कर सकते हैं।

सब्जी की खेती की मुख्य बात यह है, कि इसकी बाजार में अच्छी कीमत मिल जाती है। दीर्घकालीन फसलों की तुलना में किसान सब्जी की खेती से मोटा मुनाफा उठा सकते हैं। 

वर्तमान में बहुत सारे किसान परंपरागत फसलों के साथ ही सब्जियों की खेती कर अपनी आय बढ़ा रहे हैं। अब ऐसी स्थिति में आप भी फरवरी-मार्च के जायद सीजन में खीरे की खेती करके काफी ज्यादा मुनाफा अर्जित कर सकते हैं।

खीरे की बाजार मांग काफी अच्छी है और इसके भाव भी बाजार में काफी अच्छे मिल जाते हैं। अगर खीरे की उन्नत किस्मों का उत्पादन किया जाए तो इस फसल से काफी शानदार लाभ हांसिल किया जा सकता है।

खीरे की स्वर्ण पूर्णिमा किस्म 

खीरे की स्वर्ण पूर्णिमा किस्म की विशेषता यह है, कि इस प्रजाति के फल लंबे, सीधे, हल्के हरे और ठोस होते हैं। खीरे की यह प्रजाति मध्यम अवधि में तैयार हो जाती है। 

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इसकी बुवाई के लगभग 45 से 50 दिन में इसकी फसल पककर तैयार हो जाती है। किसान इसके फलों की आसानी से तुड़ाई कर सकते हैं। इस किस्म से प्रति हैक्टेयर 200 से 225 क्विंटल तक उपज अर्जित की जा सकती है।

खीरे की पूसा संयोग किस्म 

यह खीरे की हाइब्रिड किस्म है। इसके फल करीब 22 से 30 सेंटीमीटर लंबे होते हैं। इसका रंग हरा होता है। इसमें पीले कांटे भी पाए जाते हैं। इनका गुदा कुरकुरा होता है। खीरे की यह किस्म करीब 50 दिन में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। इस किस्म की खेती से प्रति हैक्टेयर 200 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

पंत संकर खीरा- 1 किस्म 

यह खीरे की संकर किस्म है। इसके फल मध्यम आकार के होते हैं। इसके फलों की लंबाई तकरीबन 20 सेंटीमीटर की होती है ओर इसका रंग हरा होता है। यह किस्म बुवाई के लगभग 50 दिन उपरांत ही तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। खीरे की इस प्रजाति से प्रति हैक्टेयर 300 से 350 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

खीरे की स्वर्ण शीतल किस्म 

खीरे की इस प्रजाति के फल मध्यम आकार के होते हैं। इनका रंग हरा और फल ठोस होता है। इस किस्म से प्रति हैक्टेयर 300 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है। खीरे की यह किस्म चूर्णी फफूंदी और श्याम वर्ण रोग के प्रति अत्यंत सहनशील मानी जाती है।

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खीरे की स्वर्ण पूर्णा किस्म 

यह किस्म मध्यम आकार की किस्म है। इसके फल ठोस होते हैं। इस किस्म की खास बात यह है, कि यह किस्म चूर्णी फफूंदी रोग की प्रतिरोधक क्षमता रखती है। इसकी खेती से प्रति हैक्टेयर 350 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

खीरे की उन्नत किस्मों की बुवाई की प्रक्रिया 

खीरे की उन्नत किस्मों को बुवाई के लिए कार्य में लेना चाहिए। इसके बीजों की बुवाई से पूर्व इन्हें उपचारित कर लेना चाहिए, जिससे कि फसल में कीट-रोग का संक्रमण ना हो। 

बीजों को उपचारित करने के लिए बीज को चौड़े मुंह वाले मटका में लेना चाहिए। इसमें 2.5 ग्राम थाइरम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से मिलाकर घोल बना लें। अब इस घोल से बीजों को उपचारित करें। 

इसके बाद बीजों को छाया में सूखने के लिए रख दें, जब बीज सूख जाए तब इसकी बुवाई करें। खीरे के बीजों की बुवाई थाला के चारों ओर 2-4 बीज 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए। 

इसके अलावा नाली विधि से भी खीरे की बुवाई की जा सकती है। इसमें खीरे के बीजों की बुवाई के लिए 60 सेंटीमीटर चौड़ी नालियां बनाई जाती है। इसके किनारे पर खीरे के बीजों की बुवाई की जाती है। 

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दो नालियों के बीच में 2.5 सेंटीमीटर की दूरी रखी जाती है। इसके अलावा एक बेल से दूसरे बेल के नीचे की दूरी 60 सेमी रखी जाती है। ग्रीष्म ऋतु की फसल के लिए बीजों की बुवाई व बीजों को उपचारित करने से पहले उन्हें 12 घंटे पानी में भिगोकर रखना चाहिए। 

इसके बाद बीजों को दवा से उपचारित करने के बाद इसकी बुवाई करनी चाहिए। बीज की कतार से कतार की दूरी 1 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 50 सेमी रखनी चाहिए। 

किसान खीरे की खेती से कितना कमा सकते हैं ?  

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, एक एकड़ जमीन में खीरे की खेती करके 400 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है। सामान्य तौर पर बाजार में खीरे का भाव 20 से 40 रुपए प्रति किलोग्राम के मध्य होता है। 

ऐसे में खीरे की खेती से एक सीजन में तकरीबन प्रति एकड़ 20 से 25 हजार की लागत लगाकर इससे तकरीबन 80 से एक लाख रुपए तक की आमदनी आसानी से की जा सकती है। 

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जानें किसान राकेश दुबे गन्ने की खेती से वार्षिक 40 लाख का लाभ कैसे उठा रहा है? https://www.merikheti.com/blog/rakesh-dubey-earns-a-profit-of-rs-40-lakh-nnually-from-sugarcane-farming Sat, 02 Mar 2024 00:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/rakesh-dubey-earns-a-profit-of-rs-40-lakh-nnually-from-sugarcane-farming

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर होती है। भारत एक ऐसी भूमि भी है, जहां विश्व में सबसे ज्यादा विभिन्न किस्मों की विभिन्न फसलें उगाई जाती हैं। भारत के अंदर बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती की जाती है।

 परंतु, गन्ना किसानों को सदैव यह शिकायत रहती है, कि वह इससे कोई ज्यादा मुनाफा नहीं प्राप्त कर पाते हैं। परंतु, विभिन्न किसान ऐसे भी हैं, जिन्होंने गन्ने की अहमियत समझी और आज वह उससे मोटा लाभ उठा रहे हैं। 

आज हम आपको एक ऐसे ही सफल किसान के बारे में बताऐंगे जो गन्ने की खेती से वार्षिक 40 लाख रुपये तक अर्जित कर रहे हैं। दरअसल, हम मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जनपद के करताज गांव के निवासी प्रगतिशील किसान राकेश दुबे के बारे में जो कि तकरीबन 50 एकड़ भूमि में विगत कई वर्षों से खेती कर रहे हैं। 

किसान राकेश दुबे ने बताया कि उनके समस्त फॉर्म सर्टिफाइड हैं। उन्होंने 90 के दशक में बीएससी करने के पश्चात खेती प्रारंभ की थी। तब से लेकर आज तक ये सिलसिला ऐसे ही जारी है।

राकेश दुबे ने नौकरी की जगह खेती का मार्ग पकड़ा  

किसान राकेश दुबे ने बताया कि उन्होंने जानवरों के चारे वाले जमीन से खेती को करना शुरू किया। इसमें सफलता मिलने के बाद उनके मन में खेती के प्रति और भी रूझान बढ़ा। उस समय उन्हें लगा की खेती भी जीवन जीने का अच्छा साधन हो सकता है। 

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इसी के चलते शहर की नौकरी व बिजनेस से उनका दिमाग हट गया। मालूम हो कि मौजूदा वक्त में राकेश दुबे एक प्रगतिशील किसान की श्रेणी में पहुंच गए हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें आज बहुत ही गर्व है, कि वह एक किसान हैं।

गुड़ के द्वारा विभिन्न प्रकार के उत्पाद तैयार करते हैं - राकेश दुबे   

राकेश दुबे ने बताया कि "वह विशेष रूप से अपने खेत में गन्ने की खेती करते हैं। राकेश दुबे के मुताबिक, वह एक सीजन में लगभग 25-30 एकड़ में गन्ने की खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास कुशल मंगल नाम का एक ब्रांड भी है, जिसमें गुड़ के विभिन्न प्रकार के उत्पाद बनाए जाते हैं। 

किसान राकेश दुबे के अनुसार, जब वह गन्ने से गुड़ बना रहे थे, तो उनके क्षेत्र में इसके लिए किसी भी तरह की कोई सुविधा नहीं थी। जिसको भी अपने खेत में उस समय गन्ना उगाना होता था, तो उसे अपनी गन्ना पेराई की मशीन खुद लगानी होती थी। खुद ही गुड़ बनाना होता था तभी किसान गन्ने की खेती कर सकते थे।"

प्रगतिशील किसान राकेश दुबे वार्षिक कितना लाभ उठा रहा है  

उन्होंने आगे बताया कि "हमने गुड़ को एक नए ढ़ंग से बनाना शुरू किया। पहले हमने 50 ग्राम, 100 ग्राम और अब हम गुड को एक छोटी टॉफी के आकार में बनाकर बाजार में बेच रहे हैं। इसके अलावा हमने कई तरह के मसाले वाले गुड़, औषधीय वाले गुड़ को तैयार करके बेचा है। 

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उन्होंने बताया कि जब हमारे गुड़ की बाजार में एक पहचान बनने लगी, तो लोग इसकी कॉपी करके अपने नाम से बेचने लगें। इसी के चलते हमने अपने गुड़ की मार्केट में एक अलग पहचान बनाने के लिए एक नाम दिया। इसके बाद से ही हमने ब्रांडिंग, ट्रेडमार्क और लेवल आदि कार्यों को करना प्रारंभ कर दिया।

"अगर लागत और मुनाफे की बात की जाए, तो "किसान राकेश दुबे ने बताया कि उनकी सालाना लागत लगभग 15 से 20 लाख रुपये तक होती है। वहीं, सालाना मुनाफा लागत से दोगुना हो जाता है।"

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योगी सरकार ने गेहूं की एमएसपी बढ़ाकर 1 मार्च से 15 जून तक खरीद शुरू की https://www.merikheti.com/blog/up-yogi-govt-hike-msp-of-wheat-and-started-purchasing-march-1-to-june-15 Fri, 01 Mar 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/up-yogi-govt-hike-msp-of-wheat-and-started-purchasing-march-1-to-june-15

रबी सीजन की फसलों की कटाई का समय आ गया है। देश भर की मंडियों में गेंहू की आवक शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश में 1 मार्च से गेहूं की सरकारी खरीद चालू होकर 15 जून तक चलेगी। 

योगी सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,275 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। योगी सरकार ने निर्देश दिया है, कि कृषकों को किसी तरह की दिक्कत-परेशानी नहीं होनी चाहिए।

योगी सरकार के प्रवक्ता का कहना है, कि गेहूं की बिक्री के लिए कृषकों को खाद्य एवं रसद विभाग के पोर्टल, विभाग के मोबाइल ऐप यूपी किसान मित्र पर पंजीकरण-नवीनीकरण कराना आवश्यक है। 

किसान भाइयों से यह अनुरोध किया गया है, कि गेहूं को ओसाकर मिट्टी, कंकड़, धूल इत्यादि को साफ करके अच्छे तरीके से सुखाकर ही क्रय केंद्र पर बिक्री के लिए लेकर जाऐं।

बटाईदार भी इस बार पंजीकरण कराकर फसल बेच सकते हैं 

इस साल बटाईदार कृषकों द्वारा भी पंजीकरण कराते हुए गेहूं की बिक्री की जा सकेगी। गेहूं खरीद के लिए किसानों का खाद्य एवं रसद विभाग के पोर्टल पर पहली जनवरी 2024 से ऑनलाइन पंजीयन शुरू है। 

अब तक 1,09,709 किसानों ने पंजीकरण करा लिया है। रविवार और बाकी अवकाशों को छोड़कर 15 जून तक क्रय केंद्रों पर रोजाना गेहूं खरीद सुबह 9 से शाम 6 बजे तक चलेगी।

सरकार ने निर्देश दिया है, कि किसानों को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो। इसकी तैयारी भी कर ली गई है। किसी भी विषम परिस्थितियों के लिए विभाग ने टोल फ्री नंबर 18001800150 जारी किया है। 

किसान भाई किसी भी समस्या के समाधान के लिए किसान जिला खाद्य विपणन अधिकारी या तहसील के क्षेत्रीय विपणन अधिकारी या ब्लॉक के विपणन अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं। 

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खाद्य विभाग और अन्य क्रय एजेंसियों के कुल 6,500 क्रय केंद्र स्थापित करने की योजना है। विभाग ने गेहूं के मूल्य भुगतान पीएफएमएस के माध्यम से सीधे किसानों के आधार लिंक खाते में 48 घंटे के अंदर करने की व्यवस्था बनाई है।

मुख्यमंत्री योगी ने एक्स पर किसानों को बधाई दी  

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक्स पर ट्वीट कर लिखा- "प्रिय अन्नदाता किसान बंधुओ ! उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2024-25 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹2,275 प्रति कुंतल निर्धारित किया है। 

गेहूं का मूल्य भुगतान PFMS के माध्यम से 48 घंटे के अंदर सीधे आप लोगों के आधार लिंक खाते में करने की व्यवस्था की गई है। मुझे प्रसन्नता है, कि बटाईदार किसान भी इस वर्ष पंजीकरण कराकर अपने गेहूं की बिक्री कर सकेंगे। 

1 मार्च यानी कल से 15 जून, 2024 तक गेहूं खरीद के दौरान आप लोगों को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो, यह हमारी प्राथमिक वरीयता है। आप सभी की समृद्धि और खुशहाली डबल इंजन सरकार की शीर्ष प्राथमिकता है। आप सभी को बधाई !"

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पीएम किसान की 16वीं किस्त खाते में नहीं आई तो यह करें किसान ? https://www.merikheti.com/blog/pm-kisan-samman-nidhi-16th-installment-not-credited-in-your-account-then-follow-these-step Fri, 01 Mar 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/pm-kisan-samman-nidhi-16th-installment-not-credited-in-your-account-then-follow-these-step

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 फरवरी बुधवार को देश भर के करोड़ों किसान भाइयों के खाते में पीएम किसान सम्मान निधि योजना (PM Kisan Samman Nidhi Yojana) की धनराशि ट्रांसफर की है। पीएम मोदी ने यह धनराशि डीबीटी के माध्यम से किसानों के खातों में हस्तांतरित की है। 

परंतु, कुछ ऐसे भी कृषक हैं, जिन्हें धनराशि हांसिल नहीं हो पाई है। अभी तक जिन किसान भाइयों के खाते में रुपये नहीं पहुंचे हैं। वह यहां बताए गए तरीकों को अपना सकते हैं।

दरअसल, किसानों के खाते में धनराशि नहीं आने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इसमें एक मुख्य वजह बैंक खाते का आधार से लिंक ना होना भी है। साथ ही साथ ई-केवाईसी (E-KYC) नहीं होने के चलते भी ये धनराशि आपके बैंक अकाउंट में नहीं पहुंची है। 

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अगर आपने सभी आवश्यक कार्य पूर्ण कर लिए थे। लेकिन, फिर भी अकाउंट में धनराशि नहीं आई है तो आप अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। बतादें, कि आपकी तरफ से की गई एक छोटी सी गलती के कारण आपकी किस्त के रुपये अटक सकते हैं और आप योजना के लाभ से वंचित रह सकते हैं।

इन किसानों की किस्त अटक सकती है 

पीएम किसान योजना (PM Kisan Yojana) के अंतर्गत किसान भाइयों को वर्षभर में 6 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। किसानों के बैंक खाते में ये धनराशि प्रत्येक 4 माह के अंतराल में 2-2 हजार रुपये करके 3 किस्तों में भेजी जाती है। 

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यदि आपके खातों में भी धनराशि नहीं आई है, तो आप सबसे पहले अपना स्टेटस की जांच करें। आवेदन पत्र में भरी गई डिटेल्स में जैसे लिंग (Gender) की गलती, नाम की गलती, आधार कार्ड विवरण (Details) दर्ज करने में गलती हुई है तो आपकी किस्त अटक सकती है।

किसानों को यहां से मिलेगी मदद

अगर आपने समस्त डिटेल्स अच्छी तरह से भरी हैं। पीएम किसान योजना की धनराशि आपके अकाउंट में नहीं पहुंची है तो सबसे पहले आधिकारिक ईमेल आईडी pmkisan-ict@gov.in पर संपर्क साध सकते हैं। 

इसके अतिरिक्त पीएम किसान योजना (PM Kisan Yojana) के हेल्पलाइन नंबर 155261/1800115526/011-23381092 पर भी संपर्क साध सकते हैं।

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भीषण गर्मी में लू से बचाने वाले तरबूज-खरबूज की बागवानी https://www.merikheti.com/blog/watermelon-and-melon-to-protect-from-heat-wave-in-scorching-heat Fri, 01 Mar 2024 00:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/watermelon-and-melon-to-protect-from-heat-wave-in-scorching-heat

भीषण गर्मी में लू की लपटों से बचाने के लिए मौसमी फल रामबाण का कार्य करते हैं। भीषण गर्मी से जनजीवन अस्‍त-व्‍यस्‍त हो जाता है। दोपहर में ही सूर्य की तल्ख किरणें शरीर को झुलसा देती हैं। गर्मियों में 46.8 डिग्री तापमान में दोपहर में थोड़ी दूरी चलने पर ही प्यास की वजह से गला सूखने लगता है। 

ऐसी स्थिति में खीरा, ककड़ी व तरबूज का सेवन करना बेहद फायदेमंद साबित होता है। गर्मियों के दिनों हर चौराहे-तिराहे पर आपको इसकी दुकानें भी दिखाई देनी लगेंगी। यहां एक बात और जान लें कि इन मौसमी फलों का सेवन शरीर के लिए अत्यंत लाभदायक है। यह गर्मियों के दिनों लू इत्यादि का भी खतरा काफी कम करते हैं।

काले रंग का तरबूज 

प्रयागराज में थोक फल मार्केट मुंडेरा मंडी में इन दिनों मौसमी फल दिखते हैं। मंडी के थोक कारोबारी श्याम सिंह का कहना है, कि छोटे तरबूज तीन प्रकार के होते हैं। काले रंग का तरबूज सबसे अच्छा और स्वाद में मीठा होता है। क्योंकि, यह देशी प्रजाति का है। 

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हरे रंग का तरबूज काफी कम मीठा होता है। यह हाइब्रिड किस्म का है। हरे और धानी रंग का तरबूज अभी नहीं आ रहा है। इसका सेवन करने से प्यास भी काफी कम लगती है। अब जून तक इसकी बाजार में   खूब मांग बढ़ेगी।

तरबूज की बुवाई का समय 

तरबूज की बुवाई का सीजन दिसंबर से जनवरी माह में चालू हो जाता है। मार्च में इसकी हार्वेस्टिंग होती है। लेकिन, कुछ क्षेत्रों में इसकी बुवाई का वक्त मध्य फरवरी वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में यह मार्च-अप्रैल में बोया जाता है। तरबूज के रस की चाशनी गर्मियों में अत्यंत स्वादिष्ट एवं ठंडी होती है। 

इस फल में चूना, फास्फोरस और कुछ विटामिन ए, बी, सी जैसे खनिज विघमान होते हैं। इस वजह से बाजार में इनकी खूब मांग रहती हैं। ऐसी स्थिति में इस रबी सीजन में तरबूज की खेती कृषकों के लिए फायदे का सौदा सिद्ध हो सकती है।

मृदा एवं जलवायु 

तरबूज और खरबूज की फसल के लिए मध्यम काली जल निकासी वाली मृदा उपयुक्त होती है। तरबूज के लिए मृदा का स्तर 5.5 से 7 तक अच्छा होता है। तरबूज की फसल को गर्म और शुष्क मौसम एवं भरपूर धूप की जरूरत होती है। बतादें, कि 24 डिग्री सेल्सियस से 27 डिग्री सेल्सियस का तापमान बेल की बढ़ोतरी के लिए आदर्श है।

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उर्वरक और पानी 

तरबूज एवं खरबूज दोनों ही फसलों के लिए 50 किलो एन, 50 किलो पी और 50 किलो के रोपण से पहले और 1 किलो रोपण के उपरांत दूसरे हफ्ते में 50 किलो एन दिया जाना चाहिए। 

बेल के विकास के दौरान 5 से 7 दिनों के समयांतराल पर और फलने के बाद 8 से 10 दिनों के अंतराल पर फसल की सिंचाई करें। गर्मी के मौसम में तरबूज को सामान्य तौर पर 15-17 सिंचाई की जरूरत होती है।

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खेती-किसानी पर जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के उपाय https://www.merikheti.com/blog/how-to-reduce-the-negative-effects-of-climate-change Thu, 29 Feb 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/how-to-reduce-the-negative-effects-of-climate-change

खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अध्ययन के मुताबिक, 2050 तक विश्व की जनसंख्या लगभग 9 अरब हो जाएगी। अब ऐसे में खाद्यान्न की आपूर्ति और मांग के मध्य अंतर को कम करने के लिए मौजूदा खाद्यान्न उत्पादन को दोगुना करने की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए भारत जैसे कृषि प्रधान देशों को अभी से नये उपाय खोजने होंगे। 

हमारी कृषि व्यवस्था को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाने के बहुत सारे उपाय हैं, जिन्हें अपनाकर कुछ हद तक कृषि पर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। साथ ही, पर्यावरण मैत्री तरीकों का इस्तेमाल करके कृषि को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप किया जा सकता है। कुछ प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं। 

वर्षा जल का उचित प्रबंधन जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम करेगा  

वातावरण के तापमान में बढ़ोतरी के साथ-साथ फसलों में सिंचाई की ज्यादा जरूरत पड़ती है। अब ऐसी स्थिति में जमीन का संरक्षण व वर्षा जल को इकठ्ठा करके सिंचाई के लिए उपयोग में लाना एक उपयोगी कदम सिद्ध हो सकता है। 

वाटर शेड प्रबंधन के जरिए हम वर्षा जल को संचित करके सिंचाई के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे एक ओर हमें सिंचाई में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर भू-जल पुनर्भरण में भी मददगार साबित होगा।

जैविक एवं मिश्रित कृषि से जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम होगा 

रासायनिक खेती से हरित गैसों में काफी बढ़ोतरी होती है, जो वैश्विक तापमान में सहयोगी होती हैं। इसके अतिरिक्त रासायनिक खाद व कीटनाशकों के इस्तेमाल से जहाँ एक तरफ मृदा की उत्पादकता कम होती है, वहीं दूसरी ओर मानव स्वास्थ्य को भी भोजन के माध्यम से हानि पहुँचाती है। 

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अतः इसलिए जैविक कृषि की तकनीकों पर ज्यादा बल देना चाहिए। एकल कृषि के स्थान पर मिश्रित (समग्रित) कृषि काफी लाभदायक होती है। मिश्रित कृषि में विविध फसलों का उत्पादन किया जाता है, जिससे कि उत्पादकता के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने की संभावना बहुत कम हो जाती है।

फसल उत्पादन में विभिन्न आधुनिक तकनीकों का विकास

जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को मंदेनजर रखते हुए ऐसे बीज एवं नवीन किस्मों का विकास किया जाए जो नये मौसम के अनुकूल हों। हमें फसलों के प्रारूप और उनके बीज बोने के वक्त में भी परिवर्तन करना होगा। 

ऐसी किस्मों को विकसित करना होगा जो अधिक तापमान, सूखे तथा बाढ़ जैसी संकटमय परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता रखती हों। पारंपरिक ज्ञान और नवीन तकनीकों के समन्वयन और समावेशन द्वारा मिश्रित खेती तथा इंटरक्रोपिंग करके जलवायु परिवर्तन के संकटों से जूझा जा सकता है।

जलवायु स्मार्ट कृषि (क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर) बेहद मददगार   

भारत में जलवायु स्मार्ट कृषि (Climate smart Agriculture-CSA) विकसित करने की ठोस कवायद की गयी है, जिसके लिए राष्ट्रीय परियोजना भी जारी की गई है। दरअसल, जलवायु स्मार्ट कृषि जलवायु परिवर्तन की तीन परस्पर चुनौतियों से लड़ने का प्रयास करती है। 

उत्पादकता और आय बढाना, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होना तथा कम उत्सर्जन करने में योगदान करना। उदाहरण के तौर पर सिंचाई की बात करें तो जल के समुचित उपयोग के लिए सूक्ष्म सिंचाई (माइक्रो इरिगेशन) को लोकप्रिय बनाना है। 

भारत सरकार द्वारा इस दिशा में उठाए गए अहम कदम  

भारत में सबसे पहले जलवायु परिवर्तन के प्रति स्वयं को अनुकूल बनाने और सतत विकास मार्ग के द्वारा आर्थिक एवं पर्यावरणीय लक्ष्यों को एक साथ हासिल करने का प्रयास किया गया है। 

इसको लेकर प्रधानमन्त्री ने 2008 में जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना जारी की है। जलवायु परिवर्तन पर निर्मित आठ राष्ट्रीय एक्शन प्लान में से एक (राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन) कृषि क्षेत्र पर भी केंद्रित है।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन / National Mission for Sustainable Agriculture-NMSA

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन वर्ष 2008 में शुरू किया गया। यह मिशन ‘अनुकूलन’ पर आधारित है। इस मिशन द्वारा भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक प्रभावी एवं अनुकूल बनाने के लिए कार्यनीति बनाई गई। 

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इस मिशन के उद्देश्यों में कुछ विशेष बातों पर विशेष ध्यान दिया गया है, जैसे, कृषि से अधिक उत्पादन प्राप्त करना, टिकाऊ खेती पर जोर देना, प्राकृतिक जल-स्रोतों व मृदा संरक्षण पर ध्यान देना, फसल व क्षेत्रानुसार पोषक प्रबंधन करना, भूमि-जल गुणवत्ता बरकरार रखना तथा शुष्क कृषि को बढ़ावा देना इत्यादि। 

इसके साथ ही वैकल्पिक कृषि पद्धति को भी अपनाया जाएगा और इसके अंतर्गत जोखिम प्रबंधन, कृषि संबंधी ज्ञान सूचना व प्रौद्योगिकी पर विशेष बल दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, मिशन को परंपरागत ज्ञान और अभ्यास प्रणालियों, सूचना प्रौद्योगिकी, भू-क्षेत्रीय और जैव प्रौद्योगिकियों के सम्मिलन व एकीकरण से सहायता मिलेगी।

जलवायु अनुरूप कृषि पर राष्ट्रीय पहल / National Innovations in Climate Resilient Agriculture: NICRA

यह राष्ट्रीय पहल भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ( ICAR) का एक नेटवर्क प्रोजेक्ट है, जोकि फरवरी 2011 में आया था। इस प्रोजेक्ट का मकसद रणनीतिक अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शन द्वारा जलवायु परिवर्तन एवं जलवायु दुर्बलता के प्रति भारतीय कृषि की सहन क्षमता को बढ़ाना है। इसको ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को उच्च प्राथमिकता पर रखा है। 

  1. रणनीतिक अनुसंधान (Strategic Research)
  2. प्रौद्योगिकी प्रतिपादन ( Technology Demonstration)
  3. प्रायोजित एवं प्रतियोगी अनुदान (Sponsored and Competitive grants)
  4. क्षमता निर्माण (Capacity Building)

इसके प्रमुख बिन्दुओं में भारतीय कृषि (फसल, पशु इत्यादि) को जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति सक्षम बनाना, जलवायु सह्य कृषि अनुसंधान में लगे वैज्ञानिकों व दूसरे हितधारको की क्षमता का विकास करना तथा किसानों को वर्तमान जलवायु संकट के अनुकूलन हेतु प्रौद्योगिकी पैकेज का प्रदर्शन कर दिखाने का उद्देश्य रखा गया है।

अतः कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन वैश्विक और भारतीय कृषि व्यवस्था पर वृहद स्तर पर प्रभाव डालता है। ऊपर दिये गए सुझावों व तकनीकों को अपनाकर कृषि व्यवस्था को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है। 

ऐसा करना आज के समय की जरूरत है वर्ना आगामी समय में इसके घातक परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। इसी दिशा में अर्थात भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूल और सक्षम बनाने में भारत सरकार की तरफ से की गई कोशिशें भी सराहनीय हैं। 

इस प्रकार कृषि को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से संरक्षण देने के लिए हमें मिल-जुलकर पर्यावरण मैत्री तरीकों को वरीयता देनी होगी। ताकि हम अपने प्राकृतिक संसाधन को बचा सकें एवं कृषि व्यवस्था को अनुकूल बना सकें।

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गर्मियों के दिनों में गाय, भैंस के घटते दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने के अचूक उपाय https://www.merikheti.com/blog/how-can-cattle-farmers-increase-the-milk-production-of-cows-and-buffaloes-during-summer Thu, 29 Feb 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/how-can-cattle-farmers-increase-the-milk-production-of-cows-and-buffaloes-during-summer

आने वाले दिनों में भीषण गर्मी का प्रकोप देखने को मिलेगा। भीषण गर्मी के चलते मनुष्य ही नहीं जानवर भी काफी प्रभावित होंगे। दरअसल, गर्मियों के दिनों सामान्य तौर पर खाने में अरूचि पैदा हो जाती है। ऐसा मानव और जानवर दोनों में होता है। 

पशु गर्मियों में कम चारा खाना शुरू कर देते हैं, जिसका दूध की मात्रा पर सीधा असर पड़ता है। गाय हो अथवा भैंस गर्मियों में सर्दियों के मुकाबले कम दूध देना शुरू कर देती है। इस वजह से पशुपालकों का लाभ कम होने लगता है। दुधारू मवेशियों द्वारा कम दूध देने की शिकायत को लेकर पशुपालक काफी चिंतित रहते हैं। 

अधिकांश पशुपालक अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में पशुओं को इंजेक्शन देना चालू कर देते हैं, जिससे पशुओं की सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। साथ ही, दूध की क्वालिटी में भी गिरावट आ जाती है। 

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ऐसे में पशुपालकों को गाय का दूध बढ़ाने के प्राकृतिक उपाय जिसमें घरेलू चीजों के उपयोग से तैयार की गई दवाई का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे दुग्ध उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ पशु के स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। मुख्य बात यह है, कि यह सब चीजें आपको बड़ी सुगमता से बाजार में प्राप्त हो जाएंगी।

पशुओं को चारे में मिलाकर लहसुन खिलाएं

अगर गाय-भैंस के चारे में लहसुन का मिश्रण कर दिया जाए तो पशुओं का दूध काफी बढ़ जाता है। वैज्ञानिक प्रमाण के आधार पर ऐसा बताया जाता है, कि अगर मवेशियों को चारे में लहसुन को मिलाकर खाने के लिए दिया जाए तो वह जुगाली करते समय जो मुंह से मीथेन गैस छोड़ती हैं, वे कम छोड़ेंगी। इससे ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में काफी मदद मिलेगी। ऐसा वैज्ञानिकों का मानना है। 

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वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग को प्रभावित करने वाली मीथेन गैस का 4 प्रतिशत हिस्सा पशुओं की जुगाली के दौरान मुंह से निकलने वाली गैसों का है। अगर पशुओं को उनके चारे में लहसुन मिलाकर खाने को दें तो वे कम मात्रा में मीथेन गैस का उत्सर्जन करेगी, जिससे ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में काफी मदद मिलेगी। 

लहसुन का काढ़ा बनाकर पशुओं को पिलाएं

पशु की डिलीवरी के 4-5 दिन के पश्चात पशु को लहसुन का काढ़ा अवश्य पिलाना चाहिए। इससे भी दूध की मात्रा काफी बढ़ जाती है। इसके लिए 125 ग्राम लहसुन, 125 ग्राम चीनी अथवा शक्कर और 2 किलो ग्राम दूध को मिलाकर पशु को दें। इससे पशु की दूध देने की क्षमता काफी बढ़ जाएगी।

जई का चारा भोजन के रूप में खिलाएं

लहसुन के अतिरिक्त पशुओं को जई का चारा भी खिलाया जा सकता है। ये भी उतना ही पोष्टिक होता है, जितना लहसुन। इसके इस्तेमाल से भी पशुओं की दूध देने की मात्राकाफी बढ़ जाती है। इसमें क्रूड प्रोटीन की मात्रा 10-12% फीसद तक होती है। जई से साइलेज भी बनाया जा सकता है, जिसको आप दीर्घ काल तक पशुओं को खिला सकते हैं।

दवा के लिए जरूरी सामग्री व उसकी मात्रा 

तारामीरा, मसूर की दाल, चने की दाल, अलसी, सौंफ, सोयाबीन, यह सभी चीजें 100 ग्राम की मात्रा में लें। मोटी इलायची के दाने 50 ग्राम, सफेद जीरा 20 ग्राम, दवा बनाने की विधि उपरोक्त सभी चीजों को देसी घी में उबालकर इसका एक किलो काढा बनाकर पशु को खिलाएं, इस दवा के सेवन से पशुओं की पाचन शक्ति काफी बढ़ेगी। इससे उन्हें भूख भी ज्यादा लगेगी। जब पशु ज्यादा खाता है, तो उसकी दूध देने की मात्रा भी काफी बढ़ जाती है।  

जीरा व सौंफ से निर्मित दवा

आधा किलो सफेद जीरा और एक किलो सौंफ को पीस कर रख लें। अब प्रतिदिन इसकी एक या दो मुट्‌ठी मात्रा आधा किलो दूध के साथ पशुओं को दें। इससे पशु के दूध देने की मात्रा काफी बढ़ जाएगी।

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जड़ी-बूंटियों से निर्मित दवा

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि उपरोक्त दवाओं के अतिरिक्त पशुपालक आयुर्वेदिक में इस्तेमाल में लाई जाने वाली जड़ी बूटियां जैसे- मूसली, शतावरी, भाकरा, पलाश और कम्बोजी आदि को भी मिलाकर पशुओं को दे सकते हैं।

विशेष- उपरोक्त में दिए गए घरेलू नुस्खे अथवा उपायों को अपनाने से पूर्व एक बार पशु चिकित्सक का मशवरा जरूर लें। आपको यह सलाह दी जाती है, कि किसी भी औषधि या नुस्खे का उपयोग पशु चिकित्सक की देखरेख में ही करें।  

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जायद सीजन में इन फसलों की बुवाई कर किसान अच्छा लाभ उठा सकते हैं https://www.merikheti.com/blog/zaid-season-farmers-can-avail-good-benefits-by-sowing-these-crops Thu, 29 Feb 2024 00:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/zaid-season-farmers-can-avail-good-benefits-by-sowing-these-crops

रबी की फसलों की कटाई का समय लगभग आ ही गया है। अब इसके बाद किसान भाई अपनी जायद सीजन की फल एवं सब्जियों की बुवाई शुरू करेंगे। 

बतादें, कि गर्मियों में खाए जाने वाले प्रमुख फल और सब्जियां जायद सीजन में ही उगाए जाते हैं। इन फल-सब्जियों की खेती में पानी की खपत बहुत ही कम होती है। परंतु, गर्मियां आते ही बाजार में इनकी मांग काफी बढ़ जाती है। 

उदाहरण के लिए सूरजमुखी, तरबूज, खरबूज, खीरा, ककड़ी सहित कई फसलों की उपज लेने के लिए जायद सीजन में बुवाई करना लाभदायक माना जाता है। यह मध्य फरवरी से चालू होता है। 

उसके बाद मार्च के समापन तक फसलों की बुवाई कर दी जाती है। फिर गर्मियों में भरपूर उत्पादन हांसिल होता है। मई, जून, जुलाई, जब भारत गर्मी के प्रभाव से त्रस्त हो जाता है। उस समय शायद सीजन की यह फसलें ही पानी की उपलब्धता को सुनिश्चित करती हैं। 

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खीरा मानव शरीर को स्वस्थ भी रखता है। इस वजह से बाजार में इनकी मांग अचानक से बढ़ जाती है, जिससे किसानों को भी अच्छा-खासा मुनाफा प्राप्त होता है। शीघ्र ही जायद सीजन दस्तक देने वाला है। 

ऐसे में किसान खेतों की तैयारी करके प्रमुख चार फसलों की बिजाई कर सकते हैं। ताकि आने वाले समय में उनको बंपर उत्पादन प्राप्त हो सके।

सूरजमुखी 

सामान्य तौर पर सूरजमुखी की खेती रबी, खरीफ और जायद तीनों ही सीजन में आसानी से की जा सकती है। लेकिन जायद सीजन में बुवाई करने के बाद फसल में तेल की मात्रा कुछ ज्यादा बढ़ जाती है। किसान चाहें तो रबी की कटाई के पश्चात सूरजमुखी की बुवाई का कार्य कर सकते हैं।

वर्तमान में देश में खाद्य तेलों के उत्पादन को बढ़ाने की कवायद की जा रही है। ऐसे में सूरजमुखी की खेती करना अत्यंत फायदे का सौदा साबित हो सकता है। बाजार में इसकी काफी शानदार कीमत मिलने की संभावना रहती है।

तरबूज 

विभिन्न पोषक तत्वों से युक्त तरबूज तब ही लोगों की थाली तक पहुंचता है, जब फरवरी से मार्च के मध्य इसकी बुवाई की जाती है। यह मैदानी इलाकों का सर्वाधिक मांग में रहने वाला फल है। 

खास बात यह है, की पानी की कमी को पूरा करने वाला यह फल काफी कम सिंचाई एवं बेहद कम खाद-उर्वरक में ही तैयार हो जाता है। 

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तरबूज की मिठास और इसकी उत्पादकता को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से तरबूज की खेती करने की सलाह दी जाती है। यह एक बागवानी फसल है, जिसकी खेती करने के लिए सरकार अनुदान भी उपलब्ध कराती है। इस प्रकार कम खर्चे में भी तरबूज उगाकर शानदार धनराशि कमाई जा सकती है। 

खरबूज

तरबूज की तरह खरबूज भी एक कद्दूवर्गीय फल है। खरबूज आकार में तरबूज से थोड़ा छोटा होता है। परंतु, मिठास के संबंध में अधिकांश फल खरबूज के समक्ष फेल हैं। पानी की कमी एवं डिहाइड्रेशन को दूर करने वाले इस फल की मांग गर्मी आते ही बढ़ जाती है।

खरबूज की खेती से बेहतरीन उत्पादकता प्राप्त करने के लिए मृदा का उपयोग होना अत्यंत आवश्यक है। हल्की रेतीली बलुई मृदा खरबूज की खेती के लिए उपयुक्त मानी गई है। किसान भाई चाहें तो खरबूज की नर्सरी तैयार करके इसके पौधों की रोपाई खेत में कर सकते हैं।

खेतों में खरबूज के बीज लगाना बेहद ही आसान होता है। अच्छी बात यह है, कि इस फसल की खेती के लिए भी ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। असिंचित इलाकों में भी खरबूज की खेती से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। 

खीरा 

गर्मियों में खीरा का बाकी फलों से अधिक उपयोग होता है। खीरा की तासीर काफी ठंडी होने की वजह से सलाद से लेकर जूस के तौर पर इसका सेवन किया जाता है। शरीर में पानी की कमी को पूरा करने वाला यह फल भी अप्रैल-मई से ही मांग में रहता है। 

मचान विधि के द्वारा खीरा की खेती करके शानदार उत्पादकता प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार कीट-रोगों के प्रकोप का संकट बना ही रहता है। फसल भूमि को नहीं छूती, इस वजह से सड़न-गलन की संभावना कम रहती है। नतीजतन फसल भी बर्बाद नहीं होती है। 

खीरा की खेती के लिए नर्सरी तैयार करने की राय दी जाती है। किसान भाई खीरा को भी रेतीली दोमट मृदा में उगाकर शानदार उपज प्राप्त कर सकते हैं। 

खीरा की बीज रहित किस्मों का चलन काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है। किसान भाई यदि चाहें तो खीरा की उन्नत किस्मों की खेती करके मोटा मुनाफा अर्जित कर सकते हैं।

ककड़ी 

खीरा की भांति ककड़ी की भी अत्यंत मांग रहती है। इसका भी सलाद के रूप में सेवन किया जाता है। उत्तर भारत में ककड़ी का बेहद चलन है। खीरा और ककड़ी की खेती तकरीबन एक ही ढ़ंग से की जाती है। किसान चाहें तो खेत के आधे भाग में खीरा और आधे भाग में ककड़ी उगाकर भी अतिरिक्त आमदनी उठा सकते हैं।

अगर मचान विधि से खेती कर रहे हैं, तो भूमि पर खरबूज और तरबूज उगा सकते हैं। शायद सीजन का मेन फोकस गर्मियों में फल-सब्जियों की मांग को पूर्ण करना है। 

साथ ही, इन चारों फल-सब्जियों की मांग बाजार में बनी रहती है। इसलिए इनकी खेती भी किसानों के लाभ का सौदा सिद्ध होगी। 

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