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Meri Kheti https://www.merikheti.com/ Kisan ka saathi Mon, 26 Feb 2024 12:30:00 GMT hi hourly 1 https://merikheti.com/favicon.jpg Meri Kheti https://www.merikheti.com/ 140 140 जानिए इफको (IFFCO) ने किस सूची में प्रथम स्थान दर्ज कर भारत का गौरव बढ़ाया https://www.merikheti.com/blog/iffco-ranks-first-among-the-300-cooperative-societies-in-the-world-in-making-chemical-fertilizers Mon, 26 Feb 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/iffco-ranks-first-among-the-300-cooperative-societies-in-the-world-in-making-chemical-fertilizers

भारतीय किसानों के लिए उनकी कृषि हेतु रासायनिक खादों का निर्माण करने वाली इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (IFFCO) को देश का हर व्यक्ति जानता है। 

वही, सहकारी क्षेत्र की रासायनिक खाद बनाने वाली इस कंपनी को पुनः दुनिया की शीर्ष 300 सहकारी संगठनों की सूची में पहला स्थान मिला है। यह रैंकिंग प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर कारोबार के अनुपात पर आधारित है।

इसी अनुपात पर बनायी गई दुनिया की शीर्ष 300 सहकारी संस्थाओं की सूची में इफको विश्व की नं. 1 सहकारी संस्था के तौर पर उभर कर सामने आई है। यह दर्शाता है, कि इफको राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान अदा कर रहा है।

इफको को किस सूची में पहला स्थान हांसिल हुआ है 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंटरनेशन कोओपरेटिव एलायंस (International Cooperative Alliance) एक संगठन है। यह एक गैर सरकारी कोओपरेटिव संगठन है, जिसकी स्थापना साल 1885 में हुई है। 

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इसी इंटरनेशनल कोआपरेटिव एलायंस (ICA) की 12वीं वार्षिक वर्ल्ड कोआपरेटिव मॉनीटर (WCM) रिपोर्ट के 2023 संस्करण के अनुसार देश के सकल घरेलू उत्पाद एवं आर्थिक विकास में इफको के कारोबारी योगदान को दर्शाया गया है। 

कुल कारोबार के मामले में इफको पिछले वित्तीय वर्ष के अपने 97वें स्थान के मुकाबले 72वें स्थान पर पहुंच गया है। अपनी 35,500 सदस्य सहकारी समितियों, 25,000 पैक्स और 52,400 प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्रों के साथ इफको 'आत्मनिर्भर भारत' और 'आत्मनिर्भर कृषि' की ओर अग्रसर सहकार से समृद्धि का सशक्त उदाहरण है।

इफको विगत कई वर्षों से शीर्ष स्थान पर कायम बना हुआ है 

इफको ने विगत कई वर्षों से अपना शीर्ष स्थान बरकरार बनाए रखा है, जो इफको और इसके प्रबंधन के सहकारी सिद्धांतों में अटूट भरोसे का प्रमाण है। 

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इसे देश में मजबूत सहकारी आंदोलन के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसे केंद्र द्वारा सहकारिता मंत्रालय के गठन और श्री अमित शाह जी, माननीय गृह एवं सहकारिता मंत्री, भारत सरकार के कुशल नेतृत्व से गति मिली है। 

मंत्रालय द्वारा की गई पहल से अनुकूल माहौल बना है और भारत में सहकारिता आंदोलन को फलने-फूलने में मदद मिली है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ध्येय "सहकार से समृद्धि" से प्रेरणा लेते हुए और विभिन्न फसलों पर वर्षों की कड़ी मेहनत, अनुसंधान और प्रयोग की बदौलत इफको ने किसानों के लिए दुनिया का पहला नैनो यूरिया और नैनो डीएपी विकसित किया।

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अमरूद की खेती से जुड़ी विस्तृत जानकारी https://www.merikheti.com/blog/amrood-ki-kheti-farmers-can-earn-good-profits-by-cultivating-guava Mon, 26 Feb 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/amrood-ki-kheti-farmers-can-earn-good-profits-by-cultivating-guava

भारत के अंदर अमरूद की फसल आम, केला और नीबू के बाद चौथे स्थान पर आने वाली व्यावसायिक फसल है। भारत में अमरुद की खेती की शुरुआत 17वीं शताब्दी से हुई। अमेरिका और वेस्ट इंडीज के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र अमरुद की उत्पत्ति के लिए जाने जाते हैं। अमरूद भारत की जलवायु में इतना घुल मिल गया है, कि इसकी खेती बेहद सफलतापूर्वक की जाती है। 

वर्तमान में महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू, बिहार और  उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त इसकी खेती पंजाब और हरियाणा में भी की जा रही है। पंजाब में 8022 हेक्टेयर के भू-भाग परअमरूद की खेती की जाती है और औसतन पैदावार 160463 मीट्रिक टन है। इसके साथ ही भारत की जलवायु में उत्पादित अमरूदों की मांग विदेशों में निरंतर बढ़ती जा रही है, जिसके चलते इसकी खेती व्यापारिक रूप से संपूर्ण भारत में भी होने लगी है।

अमरूद का स्वाद और पोषक तत्व

अमरुद का स्वाद खाने में ज्यादा स्वादिष्ट और मीठा होता है। अमरुद के अंदर विभिन्न औषधीय गुण भी विघमान होते हैं। इस वजह से इसका इस्तेमाल दातों से संबंधी रोगों से निजात पाने के लिए भी किया जाता है। बागवानी में अमरूद का अपना एक अलग ही महत्व है। अमरूद फायदेमंद, सस्ता और हर जगह मिलने की वजह से इसे गरीबों का सेब भी कहा जाता है। अमरुद के अंदर विटामिन सी, विटामिन बी, कैल्शियम, आयरन और फास्फोरस जैसे पोषक तत्व विघमान होते हैं।

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अमरुद से कितना लाभ अर्जित होता है

अमरुद से जेली, जूस, जैम और बर्फी भी बनायीं जाती हैं। अमरुद के फल की अच्छे से देख-रेख कर इसको ज्यादा समय तक भंडारित किया जा सकता है। किसान भाई अमरुद की एक बार बागवानी कर तकरीबन 30 साल तक उत्पादन उठा सकते हैं। किसान एक एकड़ में अमरूद की बागवानी से 10 से 12 लाख रूपए वार्षिक आय सुगमता से कर सकते हैं। यदि आप भी अमरूद की बागवानी करने का मन बना रहे हैं तो यह लेख आपके लिए अत्यंत लाभकारी है। क्योंकि, हम इस लेख में आपको अमरुद की खेती के बारे में जानकारी देंगे।

अमरूद की व्यापारिक उन्नत किस्में 

पंजाब पिंक: इस किस्म के फल बड़े आकार और आकर्षक सुनहरी पीला रंग के होते हैं। इसका गुद्दा लाल रंग का होता है, जिसमें से काफी अच्छी सुगंध आती है। इसके एक पौधा का उत्पादन वार्षिक तकरीबन 155 किलोग्राम तक होता है।

इलाहाबाद सफेदा: इसका फल नर्म और गोल आकार का होता है। इसके गुद्दे का रंग सफेद होता है, जिस में से आकर्षक सुगंध आती है। एक पौधा से तकरीबन सालाना पैदावार 80 से 100 किलोग्राम हो सकती है।

ओर्क्स मृदुला: इसके फल बड़े आकार के, नर्म, गोल और सफेद गुद्दे वाले होते हैं। इसके एक पौधे से वार्षिक 144 किलोग्राम तक फल हांसिल हो जाते हैं।

सरदार:  इसे एल 49 के नाम से भी जाना जाता है। इसका फल बड़े आकार और बाहर से खुरदुरा जैसा होता है। इसका गुद्दा क्रीम रंग का होता है। इसका प्रति पौधा वार्षिक उत्पादन 130 से 155 किलोग्राम तक होती है।

श्वेता: इस किस्म के फल का गुद्दा क्रीमी सफेद रंग का होता है। फल में सुक्रॉस की मात्रा 10.5 से 11.0 फीसद होती है। इसकी औसतन पैदावार 151 किलो प्रति वृक्ष होती है। 

पंजाब सफेदा: इस किस्म के फल का गुद्दा क्रीमी और सफेद होता है। फल में शुगर की मात्रा 13.4% प्रतिशत होती है और खट्टेपन की मात्रा 0.62 प्रतिशत होती है।

अन्य उन्नत किस्में: इलाहाबाद सुरखा, सेब अमरूद, चित्तीदार, पंत प्रभात, ललित इत्यादि अमरूद की उन्नत व्यापारिक किस्में है। इन सभी किस्मों में टीएसएस की मात्रा इलाहबाद सफेदा और एल 49 किस्म से ज्यादा होती है। 

अमरूद की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु 

भारतीय जलवायु में अमरूद इस तरह से घुल मिल गया है, कि इसकी खेती भारत के किसी भी हिस्से में अत्यंत सफलतापूर्वक सुगमता से की जा सकती है। अमरूद का पौधा ज्यादा सहिष्णु होने की वजह इसकी खेती किसी भी प्रकार की मिट्टी एवं जलवायु में बड़ी ही आसानी से की जा सकती है। अमरुद का पौधा उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाला होता है।

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इसलिए इसकी खेती सबसे अधिक शुष्क और अर्ध शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में की जाती है। अमरुद के पौधे सर्द और गर्म दोनों ही जलवायु को आसानी से सहन कर लेते हैं। किन्तु सर्दियों के मौसम में गिरने वाला पाला इसके छोटे पौधों को नुकसान पहुंचाता है। इसके पौधे अधिकतम 30 डिग्री तथा न्यूनतम 15 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है। वहीं, पूर्ण विकसित पौधा 44 डिग्री तक के तापमान को भी सहन कर सकता है।

खेती के लिए भूमि का चुनाव

जैसा कि उपरोक्त में आपको बताया कि अमरूद का पौधा उष्ण कटिबंधीय जलवायु का पौधा हैं। भारतीय जलवायु के अनुसार इसकी खेती हल्की से भारी और कम जल निकासी वाली किसी भी तरह की मृदा में सफलतापूर्वक की जा सकती है। परंतु, इसकी बेहतरीन व्यापारिक खेती के लिए बलुई दोमट से चिकनी मिट्टी को सबसे अच्छा माना जाता है। क्षारीय मृदा में इसके पौधों पर उकठा रोग लगने का संकट होता है। 

इस वजह से इसकी खेती में भूमि का पी.एच मान 6 से 6.5 के बीच होना चाहिए। इसकी शानदार पैदावार लेने के लिए इसी तरह की मिट्टी के खेत का ही इस्तेमाल करें। अमरूद की बागवानी गर्म एवं शुष्क दोनों जलवायु में की जा सकती है। देश के जिन इलाकों में एक साल के अंदर 100 से 200 सेमी वर्षा होती है। वहां इसकी आसानी से सफलतापूर्वक खेती की जा सकती है।

अमरूद के बीजों की बुवाई की प्रक्रिया

अमरूद की खेती के लिए बीजों की बुवाई फरवरी से मार्च या अगस्त से सितंबर के महीने में करना सही है। अमरुद के पौधों की रोपाई बीज और पौध दोनों ही तरीकों से की जाती है। खेत में बीजों की बुवाई के अतिरिक्त पौध रोपाई से शीघ्र उत्पादन हांसिल किया जा सकता है। यदि अमरुद के खेत में पौध रोपाई करते हैं, तो इसमें पौधरोपण के वक्त 6 x 5 मीटर की दूरी रखें। अगर पौध को वर्गाकार ढ़ंग से लगाया गया है, तो इसके पौध की दूरी 15 से 20 फीट तक रखें। पौध की 25 से.मी. की गहराई पर रोपाई करें। 

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इससे पौधों और उसकी शाखाओं को फैलने के लिए काफी अच्छी जगह मिल जायेगी। अमरूद के एक एकड़ खेत वाली भूमि में तकरीबन 132 पौधे लगाए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त यदि इसकी खेती की बुवाई बीजों के जरिए से कर रहे हैं, तो फासला पौध रोपाई के मुताबिक ही होगा और बीजों को सामान्य गहराई में बोना चाहिए।

बिजाई का ढंग - खेत में रोपण करके, कलम लगाकर, पनीरी लगाकर, सीधी बिजाई करके इत्यादि तरीके से बिजाई कर सकते हैं।

अमरूद के बीजों से पौध तैयार (प्रजनन) करने की क्या प्रक्रिया है  

चयनित प्रजनन में अमरूद की परंपरागत फसल का इस्तेमाल किया जाता है। फलों की शानदार उपज और गुणवत्ता के लिए इसे इस्तेमाल में ला सकते हैं। पन्त प्रभात, लखनऊ-49, इलाहाबाद सुर्ख, पलुमा और अर्का मिरदुला आदि इसी तरह से विकसित की गई है। इसके पौधे बीज लगाकर या एयर लेयरिंग विधि द्वारा तेयार किए जाते हैं। सरदार किस्म के बीज सूखे को सहने लायक होते हैं और इन्हें जड़ों द्वारा पनीरी तैयार करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए पूर्णतय पके हुए फलों में से बीज तैयार करके उन्हें बैड या नर्म क्यारियों में अगस्त से मार्च के माह में बिजाई करनी चाहिए। 

बतादें, कि क्यारियों की लंबाई 2 मीटर और चौड़ाई 1 मीटर तक होनी चाहिए। बिजाई से 6 महीने के पश्चात पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाती है। नवीन अंकुरित पनीरी की चौड़ाई 1 से 1.2 सेंटीमीटर और ऊंचाई 15 सेंटीमीटर तक हो जाने पर यह अंकुरन विधि के लिए इस्तेमाल करने के लिए तैयार हो जाती है। मई से जून तक का वक्त कलम विधि के लिए उपयुक्त होता है। नवीन पौधे और ताजी कटी टहनियों या कलमें अंकुरन विधि के लिए उपयोग की जा सकती हैं।

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जायद में भिंडी की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए क्या करें https://www.merikheti.com/blog/bhindi-ki-kheti-what-to-do-to-increase-the-production-capacity-of-ladyfinger-in-zaid Mon, 26 Feb 2024 00:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/bhindi-ki-kheti-what-to-do-to-increase-the-production-capacity-of-ladyfinger-in-zaid

भिंडी की खेती जायद मौसम में की जाती है। भिंडी की खेती करना आसान और उपयुक्त है। भिंडी का वैज्ञानिक नाम ऐलेबमोस्कस एस्कुलेंटेश  है। भिंडी गर्म मौसम की सब्जी है इसे इंग्लिश में ओकरा के नाम से भी जाना जाता है। इसमें बहुत से पोषक तत्व होत्ते है जो हमारे स्वास्थ को स्वस्थ बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करते है। 

अधिक उपज वाली किस्मों का चयन करें 

किसान भिंडी का उत्पादन करने के लिए बेहतर किस्मों का चयन करें। भिंडी की अधिक उपज देने वाली फसलें काशी क्रांति, काशी प्रगति, अर्का अनामिका और परभड़ी क्रांति है। इन किस्मों का उत्पादन कर किसान ज्यादा लाभ कमा सकता है। 

पौधों की वृद्धि और उपज के लिए आवश्यक जलवायु 

पौधों के अच्छे विकास के लिए उपयुक्त जलवायु रहना आवश्यक है। भिंडी गर्मी का पौधा है यह लम्बे समय तक ठन्डे मौसम को सहन नहीं कर सकती। भिंडी की खेती किसी भी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है लेकिन इसके लिए ज्यादा उपयुक्त बुलई दोमट मिट्टी को माना जाता है। 

खेत में जलनिकासी का भी अच्छा प्रबंध होना चाहिए। भिंडी की खेती के लिए पी एच स्तर 5 -6.5 के बीच में बेहतर बताया जाता है। 

पौधे के आकर और उपज को अधिक करने के लिए पौधे से पौधे की दूरी

भिंडी के पौधों को एक दूसरे के बहुत करीब लगाया जाता है। भिंडी की बुवाई पंक्तियों में की जाती है, जिसकी दूरी 12 -24 इंच होनी चाहिए। भिंडी के पौधे में होने वाली खरपतवार को नियंत्रण करने के लिए उसमे समय समय पर नराई का काम किया जाना चाहिए। भिंडी की के विकास के लिए भरपूर मात्रा में सूरज की रोशनी आवश्यकता रहती है। 

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भिंडी के उत्पादन को बढ़ाने के लिए आहार प्रबंधन 

भिंडी की खेती में वृद्धि करने के लिए किसान गोबर खाद का प्रयोग कर सकते है। भिंडी की खेती के लिए खेत को तैयार करते वक्त उसमे उर्वरक खादों का भी उपयोग किया जा सकता है। साथ ही भिंडी की बुवाई के 4 -6 सप्ताह बाद खेत में जैविक उर्वरको का छिड़काव किया जा सकता है। 

बीज उपचार 

भिंडी के अच्छे और बेहतर उत्पादन के लिए अच्छी किस्मों का चयन करना ज्यादा जरूरी है। इसके अलावा भिंडी की बुवाई का काम करने से पहले बीज का अच्छे से उपचार कर ले कही बीज रोग ग्रस्त तो नहीं है। 

यदि बीज रोग ग्रस्त रहता है तो फसल अच्छी नहीं होगी। बीज उपचार के लिए किसान 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर बीज को 6 घंटे तक उसमे भिगोकर रखे। समय पूरा हो जाने के बाद बीज को छाया में सूखा ले। 

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रोग नियंत्रण 

भिंडी की फसल में रोगो को नियंत्रित करने के लिए किसान फसल चक्र को भी अपना सकता है। इससे पौधे में कम रोग लगते है और उत्पादन भी बढ़ता है। 

फसल की रोजाना निरीक्षण करें, ऐसा करने से फसल में लगने वाले रोगो को रोका जा सकता है। कीटों की रोकथाम के लिए भिंडी पर स्पिनोसेड का छिड़काव किया जा सकता है। 

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पेठा की खेती से जुड़ी विस्तृत जानकारी https://www.merikheti.com/blog/Pumpkin-farming-complete-information-farmer-earn-lakhs-of-rupees-in-low-cost-from-petha-cultivation Sun, 25 Feb 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/Pumpkin-farming-complete-information-farmer-earn-lakhs-of-rupees-in-low-cost-from-petha-cultivation

पेठा की खेती कद्दू वर्गीय फसल के रूप में की जाती है। इसको कुम्हड़ा, कूष्माण्ड और काशीफल के नाम से भी जानते हैं। इसके पौधे लताओं के रूप में फैलते हैं। इसकी कुछ प्रजातियों में फल 1 से 2 मीटर लंबे पाए जाते हैं और फलों पर हल्के सफेद रंग की पाउडर नुमा परत नजर आती है। 

पेठा के कच्चे फलों से सब्जी और पके हुए फलों को पेठा बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। पेठा (कद्दू) का मुख्य रूप से उपयोग पेठा बनाने के लिए ही किया जाता है। सब्जी के लिए इसका काफी कम उपयोग किया जाता है।

अब इसके अतिरिक्त इससे च्यवनप्राश भी निर्मित किया जाता है, जिसका सेवन करने से मानसिक ताकत बढ़ती है, और छोटी -मोटी बीमारियां भी आसपास नहीं फटकती हैं। 

पेठा कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली फसल है, जिस वजह से किसान भाई पेठा की खेती करना ज्यादा पसंद करते हैं। अगर आप भी पेठा की खेती करने की सोच रहे हैं, तो इस लेख में आपको पेठा की खेती कैसे होती है (Pumpkin Farming in Hindi) इसके बारे में जानकारी दी जा रही है।

भारत में पेठा (कद्दू) की खेती कहाँ की जाती है ? 

भारत में पेठा की खेती मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश राज्य में की जाती है। इसके अलावा पेठा की खेती पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान सहित लगभग भारत भर में ही की जा रही है।

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पेठा की खेती के लिए उपयुक्त मृदा, जलवायु एवं तापमान

पेठा की खेती किसी भी उपजाऊ मृदा में आसानी से की जा सकती है। इसकी शानदार पैदावार के लिए दोमट मृदा को उपयुक्त माना जाता है। उचित जल निकासी वाली जमीन में इसकी खेती बड़ी सहजता से की जाती है। इसकी खेती में भूमि का P.H. मान 6 से 8 के बीच होना चाहिए।

पेठा की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु की जरूरत होती है। गर्मी और वर्षा का मौसम इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त होता है। लेकिन, ज्यादा ठण्डी जलवायु इसकी खेती के लिए अच्छी नहीं होती है। क्योकि, ठंड के मौसम में इसके पौधे अच्छे से विकास नहीं कर पाते है।

पेठा के पौधे शुरू में सामान्य तापमान पर अच्छे से विकास करते हैं तथा 15 डिग्री तापमान पर बीजों का अंकुरण ठीक प्रकार से होता है। बीज अंकुरण के पश्चात पौध विकास के लिए 30 से 40 डिग्री तापमान की जरूरत होती है। ज्यादा तापमान में पेठा का पौधा अच्छे से विकास नहीं कर पाता है।

पेठा की उन्नत प्रजातियां निम्नलिखित हैं 

कोयम्बटूर

कोयम्बटूर किस्म के पौधों को पछेती फसल के लिए उगाया जाता है। इसके फलों से सब्जी और मिठाई दोनों ही बनायी जाती हैं। इसके पौधों में निकलने वाले फल का औसतन वजन 7KG से 8KG के करीब होता है। 

बतादें, कि यह क़िस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 300 क्विंटल तक की उपज प्रदान करती है।

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सी. ओ. 1

पेठा की इस किस्म को तैयार होने में 120 दिन का समय लग जाता है। इसके एक फल का औसतन वजन 7 से 10 KG तक होता है। इस हिसाब से यह प्रति हेक्टेयर में 300 क्विंटल का उत्पादन दे देती है। 

काशी धवल

पेठा की यह किस्म बीज रोपाई के 120 दिन के बाद उत्पादन देना चालू कर देती है। इस प्रजाति के पौधों को ज्यादातर गर्मियो के मौसम में उगाया जाता है, जिसमें निकलने वाले फल का वजन 12 KG तक होता है। 

यह किस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 500 से 600 क्विंटल का उत्पादन दे देती है।

पूसा विश्वास

पेठा की इस क़िस्म का पौधा अधिक लम्बा पाया जाता है, जिसे तैयार होने में 120 दिन का समय लग जाता है। इसका एक फल तक़रीबन 5 KG का होता है। यह किस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 250 से 300 क्विंटल का उत्पादन दे देती है।

काशी उज्ज्वल

इस किस्म को तैयार होने में 110 से 120 दिन का समय लग जाता है। इसमें निकलने वाले फल गोल आकार के होते है, जिसका वजन 12KG के आसपास होता है। यह किस्म प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 550 से 600 क्विंटल का उत्पादन दे देती है।

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अर्को चन्दन

अर्को चन्दन क़िस्म के पौधों को कटाई के लिए तैयार होने में 130 दिन का समय लग जाता है। इसके कच्चे फलों को सब्जी बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। यह किस्म प्रति हेक्टेयर में 350 क्विंटल का उत्पादन देने के लिए जानी जाती है। 

इसके अतिरिक्त भी पेठा की विभिन्न उन्नत क़िस्मों को भिन्न-भिन्न जलवायु और अलग-अलग क्षेत्रों पर ज्यादा उपज देने के लिए विकसित किया गया है, जो इस प्रकार है :- कोयम्बटूर 2, सी एम 14, संकर नरेन्द्र काशीफल- 1, नरेन्द्र अग्रिम, पूसा हाइब्रिड, नरेन्द्र अमृत, आई आई पी के- 226, बी एस एस- 987, बी एस एस- 988, कल्यानपुर पम्पकिन- 1 आदि।

पेठा के खेत की तैयारी एवं उवर्रक की मात्रा 

बतादें, कि सर्वप्रथम खेत की मृदा पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर दी जाती है। इससे खेत में उपस्थित पुरानी फसल के अवशेष पूर्णतय समाप्त हो जाते हैं। जुताई के उपरांत खेत को ऐसे ही खुला छोड़ दें। 

इससे खेत की मृदा में सूर्य की धूप बेहतर रूप से लग जाती है। खेत की प्रथम जुताई के बाद उसमें प्राकृतिक खाद के तौर पर 12 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को प्रति हेक्टेयर के मुताबिक देना होता है। 

खाद को खेत में डालने के बाद दो से तीन तिरछी जुताई कर दी जाती है। इससे खेत की मृदा में गोबर की खाद अच्छी तरीके से मिल जाती है। इसके पश्चात खेत में पानी लगा दिया जाता है। 

जब खेत का पानी सूख जाता है, तो उसकी एक बार फिर से रोटावेटर लगाकर जुताई कर दी जाती है। इससे खेत की मृदा काफी भुरभुरी हो जाती है। 

मिट्टी के भुरभुरा हो जाने के बाद खेत को एकसार कर दिया जाता है। इसके पश्चात खेत में पौध रोपाई के लिए 3 से 4 मीटर की दूरी पर धोरेनुमा क्यारियों को निर्मित कर लिया जाता है। 

इसके अतिरिक्त यदि आप रासायनिक खाद का उपयोग करना चाहते हैं, तो उसके लिए आपको 80 KG डी.ए.पी. की मात्रा का छिड़काव प्रति हेक्टेयर के मुताबिक खेत की अंतिम जुताई के वक्त करना होता है। 

इसके बाद 50 KG नाइट्रोजन की मात्रा को पौध सिंचाई के साथ देना होता है।

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आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर खेती से करोड़ों कमा रहा किसान https://www.merikheti.com/blog/madhusudan-farmer-earn-crores-from-farming-using-modern-techniques Sun, 25 Feb 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/madhusudan-farmer-earn-crores-from-farming-using-modern-techniques

आजकल युवा खेती किसानी को घाटे का सौदा समझ कर बड़े बड़े शहरों में नौकरी करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है खेती किसानी भी आय का अच्छा जरिया है। यदि किसान खेती करते समय आधुनिक तकनीकों का सकुशल उपयोग करें, तो वह आसानी से मोटा मुनाफा कमा सकते हैं। 

सफल किसान की इस खबर में आज हम आपको मध्य प्रदेश के एक ऐसे किसान की कहानी बताएंगे, जिन्होंने खेती में आधुनिक तकनीकों के महत्तव को समझा और अब वह वार्षिक खेती से करोड़ों रुपये की कमाई कर रहे हैं। 

वर्तमान में भारत में बहुत सारे किसान ऐसे हैं, जो गजब की खेती कर रहे हैं। यह गजब की खेती इसलिए है, क्योंकि खेती के तरीकों में परिवर्तन करके शानदार मुनाफा अर्जित किया जा सकता है। 

परंतु, कुछ किसान इससे कई गुना आगे बढ़ गए हैं। कहां, हम लाखों की बात करतें और देश में कई किसान ऐसे भी हैं, जो मात्र एक या दो फसलों के माध्यम से वार्षिक करोड़ों की आय कर रहे हैं। 

जी हां, सफल किसान की इस सीरीज में आज हम आपको एक ऐसे ही किसान की कहानी बताएंगे, जो सब्जियों की खेती करके सालाना करोड़ों का मुनाफा कमा रहे हैं। हम बात कर रहे हैं प्रगतिशील किसान मधुसूदन धाकड़ की, जो मध्य प्रदेश के हरदा जनपद के शिवबा गांव के मूल निवासी हैं।

खुद तैयार की सब्जियों की नर्सरी

यदि इनकी शिक्षा की बात करें, तो इन्होंने 10वीं तक की पढाई की है। किसान मधुसूदन बीते 15 साल से सब्जियों की खेती करते आ रहे हैं। सब्जियों में वह टमाटर, तीखी मिर्च, शिमला मिर्च और अदरक की खेती करते हैं। 

साथ ही, किसान मधुसूदन सब्जियों की खेती करीब 200 एकड़ भूमि पर करते हैं। इन समस्त सब्जियों की नर्सरी किसान मधुसूदन धाकड़ स्वयं ही तैयार करते हैं। इसके लिए वह कम से कम 20 लाख पौधे तैयार करते हैं। 

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इस कार्य के लिए उन्हें कहीं से भी किसी भी तरह की कोई आर्थिक तौर पर सहायता नहीं मिली है।

सैकड़ों क्विंटल सब्जियों की पैदावार

अगर मंडीकरण की बात की जाए तो किसान मधुसूदन धाकड़ के अनुसार, वह अपनी सब्जियों की बिक्री भारत के भिन्न-भिन्न राज्यों की मंडियों में करते हैं। साथ ही, कई राज्यों के व्यापारी उनकी सब्जियों को खरीदने के लिए स्वयं उनके खेत पर आते हैं। 

यदि उपज की बात करें, तो शिमला मिर्च की पैदावार तीन से चार सौ क्विंटल प्रति एकड़ हो जाती है। लेकिन, वहीँ तीखी मिर्च का उत्पादन 150 से 200 क्विंटल प्रति एकड़ हो जाता है। वहीं, अदरक की उपज 100 से 110 क्विटल प्रति एकड़ हो जाती है। 

वहीं, टमाटर का उत्पादन- 1000-1200 कैरेट प्रति एकड़ हो जाता है।

मधुसूदन वार्षिक करोड़ों का लाभ उठा रहे हैं 

यदि लागत और मुनाफे की बात की जाए तो किसान मधुसूदन धाकड़ के मुताबिक, टमाटर में डेढ़ लाख रुपये प्रति एकड़ तक खर्चा हो जाता है। साथ ही, अदरक में लागत दो लाख रुपये प्रति एकड़ के करीब आती है। इसी प्रकार शिमला मिर्च में खर्चा दो लाख रुपये प्रति एकड़ तक आ जाता है। 

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वहीं, तीखी मिर्च में लागत एक लाख रुपये प्रति एकड़ तक पहुँच जाती है। साथ ही, प्रगतिशील किसान मधुसूदन धाकड़ ने बताया कि वह समस्त फसलों से वार्षिक तीन से चार करोड़ रुपये तक मुनाफा उठा लेते हैं। 

किसानों के लिए मधुसूदन का संदेश

किसान मधुसूदन धाकड़ ने किसानों के लिए संदेश दिया है, कि देश के किसानों को अपनी परंपरागत खेती के अलावा, अन्य नई तकनीकों की खेती को भी अपनाना चाहिए। किसानों को खेती में निरंतर अपडेट रहना चाहिए और समय के मुताबिक खेती को भी बदलते रहना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि जिस तरह से किसान अपनी जिंदगी में परिवर्तन करते हैं, ठीक उसी तरह से खेती में भी लगातार बदलाव करना चाहिए। 

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जायद सीजन में इन सब्जियों की खेती करना होगा लाभकारी https://www.merikheti.com/blog/during-zaid-season-these-vegetable-cultivation-will-be-beneficial Sun, 25 Feb 2024 00:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/during-zaid-season-these-vegetable-cultivation-will-be-beneficial

अब जायद यानी की रबी और खरीफ के मध्य में बोई जाने वाली सब्जियों की बुवाई का बिल्कुल सही समय चल रहा है। इन फसलों की बुवाई फरवरी से लेकर मार्च माह तक की जाती है। 

इन फसलों में विशेष रूप से खीरा, ककड़ी, लौकी, तुरई, भिंडी, अरबी, टिंडा, तरबूज और खरबूजा शामिल हैं। ऐसे किसान भाई जिन्होंने अपने खेतों में पत्ता गोभी, गाजर, फूल गोभी, आलू और ईख बोई हुई थी और अब इन फसलों के खेत खाली हो गए हैं। 

किसान इन खाली खेतों में जायद सब्जियों की बुवाई कर सकते हैं। किसान इन फसलों का फायदा मार्च, अप्रैल, मई में मंडियों मे बेच कर उठा सकते हैं। कृषकों को इससे काफी शानदार आर्थिक लाभ होगा।

सब्जियों की बुवाई की विधि 

सब्जियों की बुवाई सदैव पंक्तियों में करें। बेल वाली किसी भी फसल जैसे लौकी, तुरई, टिंडा एक फसल के पौधे अलग-अलग जगह न लगाकर एक ही क्यारी में बुवाई करें। 

लौकी की बेल लगा रहे हैं तो इनके बीच में अन्य कोई बेल जैसे: करेला, तुरई आदि न लगाऐं। क्योंकि मधु मक्खियां नर व मादा फूलों के बीच परागकण का कार्य करती हैं, तो किसी दूसरी फसल की बेल का परागकण लौकी के मादा फूल पर न छिड़क सकें।

वह केवल लौकी की बेलों का ही परागकण परस्पर अधिक से अधिक छिड़क सकें, जिससे ज्यादा से ज्यादा फल प्राप्त हो सकें।

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बेल वाली सब्जियों में किन बातों का ध्यान रखें 

बेल वाली सब्जियां जैसे कि लौकी, तुरई, टिंडा इत्यादि अधिकतर फल छोटी अवस्था में ही गल कर झड़ने लग जाते हैं। ऐसा इन फलों में पूर्ण परागण और निषेचन नहीं हो पाने के चलते होता है। मधु मक्खियों के भ्रमण को प्रोत्साहन देकर इस समस्या से बचा जा सकता है। 

बेल वाली सब्जियों की बिजाई के लिए 40-45 सेंटीमीटर चौड़ी और 30 सेंटीमीटर गहरी लंबी नाली का निर्माण करें। पौधे से पौधे की दूरी लगभग 60 सेंटीमीटर रखते हुए नाली के दोनों किनारों पर सब्जियों के बीज का रोपण करें। 

बेल के फैलने के लिए नाली के किनारों से करीब 2 मीटर चौड़ी क्यारियां बनाएं। यदि स्थान की कमी हो तो नाली के सामानांतर लंबाई में ही लोहे के तारों की फैंसिग लगाकर बेल का फैलाव कर सकते हैं। 

रस्सी के सहारे बेल का छत या किसी बहुवर्षीय पेड़ पर भी फैलाव कर सकते हैं।

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पूसा कृषि विज्ञान मेला किसानों के "दिल्ली चलो मार्च" के चलते हुआ स्थगित https://www.merikheti.com/blog/pusa-mela-postponed-due-to-farmers-protest-delhi-chalo-march Sat, 24 Feb 2024 14:31:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/pusa-mela-postponed-due-to-farmers-protest-delhi-chalo-march

भारत कृषि से संबंधित तकनीकी नवाचारों और सबसे नवीन खेती प्रणालियों का प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली में 28 फरवरी से 1 मार्च, 2024 तक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का पूसा कृषि विज्ञान मेले का आयोजन होने जा रहा था। 

 जो कि "दिल्ली चलो मार्च" के चलते कुछ कारणों की वजह से स्थगित कर दिया गया है। यह मेला न केवल किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म प्रदान करता है, बल्कि आगामी समय की खेती के लिए नए दिशा-निर्देश प्रदान करेगा। 

पूसा का वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने कहा है, कि जैसे ही मेला की तिथि सुनिश्चित होगी, तुरंत किसानों को सूचित कर दिया जाएगा। 

पूसा मेले की विभिन्न निम्नलिखित विशेषताएं 

  1. तकनीकी प्रदर्शनियां: इस मेले में कृषि तकनीकों के प्रदर्शन का एक विशेष आकर्षण है। नवीनतम किसान यंत्र, स्मार्ट खेती तकनीक, बीज विकास और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों पर प्रदर्शन होगा। 
  2. विभिन्न विषयों पर सेमिनार और कार्यशालाएं: विभिन्न खेती से संबंधित विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा सेमिनार और कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी जो किसानों को नई तकनीकों और अनुसंधानों से अवगत कराएंगी। 
  3. किसान-उद्यमी मिलन सभा: इस मेले में किसानों और उद्यमियों के बीच एक मिलन सभा आयोजित की जाएगी, जो उन्हें अपने अनुसंधान और उत्पादों को एक दूसरे के साथ साझा करने का एक अच्छा अवसर प्रदान करेगी। 
  4. आर्थिक योजनाएं और समर्थन: सरकार के प्रति किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, इस मेले में विभिन्न योजनायें और समर्थन कार्यक्रम भी होंगे। 
  5. बीज की ऑनलाइन बुकिंग: इस साल बीजों की ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था की गई है। किसान पूसा संस्थान की अधिकारिक वेबसाइट www.iari.res.in पर जाकर अपनी जरूरत के हिसाब से बीजों की बुकिंग और पेमेंट कर सकते हैं।

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सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों के लिए इसरो (ISRO) ने उठाया महत्वपूर्ण कदम https://www.merikheti.com/blog/isro-took-important-steps-for-the-farmers-of-drought-affected-areas Sat, 24 Feb 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/isro-took-important-steps-for-the-farmers-of-drought-affected-areas

सूखाग्रस्त इलाकों के किसान भाइयों के लिए एक अच्छी खबर है। दरअसल, नीति आयोग ने भारतभर में कृषि वानिकी को प्रोत्साहन देने के लिए इसरो उपग्रहों के डेटा का उपयोग करके एक नया भुवन-आधारित पोर्टल जारी किया है। 

इसरो के अनुसार, यह पोर्टल कृषि वानिकी के लिए अनुकूल जमीन की पहचान करने वाले जिला-स्तरीय डेटा तक सार्वभौमिक पहुंच की स्वीकृति देता है। प्रारंभिक आकलनों में मध्य प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान कृषि वानिकी उपयुक्तता के लिए सबसे बड़े राज्यों के तौर पर उभरे हैं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने नीति आयोग के साथ मिलकर भारत के बंजर क्षेत्रों में हरियाली की योजना तैयार की है। सैटेलाइट डाटा और कृषि वानिकी के माध्यम से भारत में वन क्षेत्र में सुधार किया जाएगा। 

योजना के अंतर्गत इसरो के जियोपोर्टल भुवन पर उपलब्ध सैटेलाइट डाटा के माध्यम से कृषि वानिकी उपयुक्तता सूचकांक (एएसआई) स्थापित करने के लिए बंजर भूमि, भूमि उपयोग भूमि कवर, जल निकाय, मृदा कार्बनिक कार्बन और ढलान जैसे विषयगत भू-स्थानिक आंकड़ों को इकट्ठा किया जा रहा है।

प्रारंभिक आकलनों में मध्य प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान कृषि वानिकी उपयुक्तता के लिए सबसे बड़े राज्यों के तौर पर उभरे हैं। जानकारी के अनुसार, नीति आयोग ने 12 फरवरी को भुवन-आधारित ग्रो-पोर्टल जारी किया है। 

ग्रीनिंग एंड रेस्टोरेशन ऑफ वेस्टलैंड विद एग्रोफॉरेस्ट्री (ग्रो) कहे जाने वाले इस पोर्टल के जरिये देश में कृषि वानिकी के साथ-साथ बंजर भूमि को हरा-भरा करना और उसकी पुनरुद्धार की संभावनाओं को तलाशा जा रहा है।

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इस पोर्टल के जरिये राज्य और जिला-स्तरीय कृषि-वानिकी डाटा सभी के लिए उपलब्ध है. यह डाटा कृषि व्यवसायियों, गैर-सरकारी संस्थाओं, स्टार्ट-अप और शोधकर्ताओं को भी इस क्षेत्र में पहलों के लिए आमंत्रित करता है। 

इसरो का कहना है, कि ”एक विश्लेषण से पता चला कि भारत की लगभग 6.18% और 4.91% भूमि क्रमशः कृषि वानिकी के लिए अत्यधिक और मध्यम रूप से उपयुक्त है। 

राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना कृषि वानिकी उपयुक्तता के लिए शीर्ष बड़े आकार के राज्यों के रूप में उभरे, जबकि जम्मू और कश्मीर, मणिपुर और नागालैंड मध्यम आकार के राज्यों में सर्वोच्च स्थान पर रहे।”

नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद के अनुसार, कृषि वानिकी भारत को लकड़ी के उत्पादों के आयात को कम करने, कार्बन पृथक्करण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने और इष्टतम भूमि उपयोग को प्रोत्साहन देने में सहयोग कर सकती है। 

कृषि वानिकी के माध्यम से परती और बंजर भूमि का रूपांतरण करके उन्हें उत्पादक बनाया जा सकता है। 

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भंडारण करते वक्त अनाज में लगने वाले कीट और उनकी रोकथाम https://www.merikheti.com/blog/pests-affecting-grains-during-storage-and-their-prevention Sat, 24 Feb 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/pests-affecting-grains-during-storage-and-their-prevention

फसल की कटाई के बाद सबसे महत्वपूर्ण कार्य फसल भंडारण का है। किसान वैज्ञानिक विधि का उपयोग कर फसल को संरक्षित कर सकते है। ज्यादातर फसल में लगने वाले मुख्य कीटों का कारण नमी का होना है। अनाज के भंडारण में लगने वाले मुख्य कीट लेपिडोप्टेरा और कोलिओप्टेरा आर्डर के होते है। 

1 सुरसुरी 

यह कीट भूरे काले रंग का होता है। इसके सूंड़ के आकर का सिर आगे की ओर झुका हुआ होता है। सुरसुरी कीट की लम्बाई 2 -4 मिमी होती है। सुरसुरी के पंखो के ऊपर हल्के धब्बेनुमा की रचना होती है। 

अनाज के भण्डारण को प्रोढ़ और सूंडी दोनों ही क्षति पहुँचाती है। यह सूंडी सामान्यता अनाज को अंदर से खाकर खोखला बना देती है। 

2 खपड़ा बीटल

यह प्रोढ़ कीट स्लेटी भूरे रंग का होता है। इस कीट का शरीर अंडाकार का होता है, सिर छोटा और सिकुड़ने वाला होता है। यह सूंडी बारीक रोएं से भरपूर होती है। 

खपड़ा बीटल कीट की लंबाई 2 -2.5 मिमी होता है। इस कीट को आसानी से फसल में पहचाना जा सकता है। सूंडी का प्रकोप ज्यादातर अनाज के भ्रूड़ पर देखा जाता है। 

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3 अनाज का छोटा बेधक 

यह कीट अनाज को खाकर अंदर से खोखला बना देता है। इस कीट की लंबाई 3 मिमी होती है, और यह कीट दिखने में गहरे भूरे रंग के होते है। प्रोढ़ और कीट दोनों ही फसल को क्षति पहुँचाते है, यह कीट उड़ने में भी सक्षम होती है। 

यह कीट अनाज को अंदर से खोखला करके आटे में परिवर्तित कर देते है। यह भंडारगृह का नाशीकीट है। 

4 अनाज का पतंगा 

यह कीट 5 -7 मिमी लम्बे होते है। यह कीट सुनहरे भूरे रंग के उड़ने वाले पतंगे रहते है। इस पतंगे का आख़िरी सिरा नुकीला और बालयुक्त होता है। 

इस कीट के आगे वाले पंख हल्के पीले और पिछले वाले पंख भूरे रंग के होते है। यह कीट दाने के भीतर छिद्र करके अनाज को खाती है, और विकसित होकर प्रोढ़ के रूप में बहार निकलती है। 

5 आटे का लाल भृंग 

यह कीट ज्यादातर अनाज, आटा और संसाधित अनाज का कीट है। यह कीट लाल भूरे रंग का होता है और यह लगभग 3 मिमी लंबा होता है। यह कीट चलने और उड़ने में काफी तेज होते है। 

इस कीट के वक्ष, सिर और उदर स्पष्ट होते है। इसके ऐंटीनी झुके हुए होते है और ऐंटीनी के ऊपर तीन खंड मिलकर एक मोटा भाग विकसित करते है। 

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6 दालों का भृंग 

प्रोढ़ कीट का शरीर भूरे रंग का होता है। यह प्रोढ़ कीट लगभग 3.2 मिमी लंबा होता है। प्रोढ़ कीट का शरीर आगे की ओर नुकीला और पीछे से चौड़ा होता है। यह सूंडी अनाज के दानों में छिद्र करके उन्हें  खा जाती है। 

7 कटारी दाँतो वाला अनाज का भृंग 

यह कीट लगभग 1/8 इंच लम्बे होते है। इस कीट के धड़के दोनों किनारों पर आरीनुमा 6 दांत होते हैं। यह कीट आसानी से पहचाना जा सकता है। यह गाढ़े भूरे रंग के चपटे कीट होते हैं। 

कीट प्रकोप के पूर्व प्रबंधन 

  1. गोदामों में अनाज का भण्डारण करने से पहले, गोदामों की अच्छे से सफाई कर ले। 
  2. भंडारित किये जाने वाले अनाज को अच्छे से धूप में सूखा ले, याद रहे अनाज में नमी न हो। अनाज का भण्डारण करने से पहले, अनाज की नमी की जांच कर ले। 
  3. अनाज ढोने वाले वाहनों की साफ़ सफाई पर विशेष रूप से ध्यान दे। 
  4. अनाज का भण्डारण करते वक्त पुरानी बोरियों का उपयोग न करें, उसकी जगह पर नई बोरियों का उपयोग करें। या फिर पुरानी बोरियों को 0.01त्न साइपरमेथ्रिन 25 ईसी को पानी में मिलाकर बोरियों को आधा घंटे तक उसमे भिगों दें। बोरियों को छाया में सुखाने के बाद तब उसमे फसल का भण्डारण करें। 
  5. अनाज से भरी बोरियों को सीधे निचे भूमि पर न रखे। बोरियों को हमेशा दीवार से सटा कर रखें। 
  6. अनाज को गोदामों में कीट रहित करने के लिए 0.5त्न मैलाथियान 50 ईसी को पानी में मिलाकर छिड़काव करें। 
  7. भंडारित अनाज को सुरक्षित रखने के लिए कपूर, सरसो के तेल और नीम की पत्तियों के पाउडर का उपयोग भी किया जा सकता हैं। 

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कीट प्रकोप के पश्चात उपाय 

ज्यादा नमी वाले दिनों में 15 -20 दिन के अंतराल पर फसल में कीट प्रकोप की जाँच करते रहे। या फिर समय समय अनाज को धुप दिखाकर उसमे से नमी को भी दूर कर सकते हैं। 

एल्यूमिनियम फॉस्फाइड की एक गोली को एक टन अनाज में डालें और कुछ दिनों के लिए हवाबंद कर दें। ध्यान रहें, हवा अवरोधी भंडारों में इस गोली का उपयोग करें। 

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जलवायु परिवर्तन किस प्रकार से कृषि को प्रभावित करता है ? https://www.merikheti.com/blog/how-does-climate-change-affect-agriculture Sat, 24 Feb 2024 00:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/how-does-climate-change-affect-agriculture

आजकल जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक मुद्दा बनकर सामने आ रहा है। जलवायु परिवर्तन किसी देश विशेष या राष्ट्र से संबंधित अवधारणा नहीं है। जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक अवधारणा है, जो समस्त पृथ्वी के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। 

जलवायु परिवर्तन से भारत समेत संपूर्ण विश्व में बाढ़, सूखा, कृषि संकट एवं खाद्य सुरक्षा, बीमारियां, प्रवासन आदि का खतरा बढ़ा है। परंतु, भारत का एक बड़ा तबका (लगभग 60 प्रतिशत आबादी) आज भी कृषि पर निर्भर है, और इसके प्रभाव के प्रति सहज है। इसलिए कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित दस शीर्ष देशों में शम्मिलित है। जलवायु की बदलती परिस्थितियां कृषि को सर्वाधिक प्रभावित कर रहीं हैं। क्योंकि, दीर्घ काल में ये मौसमी कारक जैसे वर्षा, तापमान, आर्द्रता आदि पर निर्भर करती है। 

अतः इस लेख में हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि जलवायु परिवर्तन कृषि को कैसे प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन कृषि को निम्नलिखित तरह से प्रभावित कर सकता है

कृषि उपज में गिरावट 

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से विश्व कृषि इस सदी में गंभीर गिरावट का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (IPCC) के मुताबिक, वैश्विक कृषि पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव नकारात्मक होगा। 

हालांकि कुछ फसलें इससे काफी लाभान्वित होंगी किन्तु फसल उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक होगा।

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भारत में 2010-2039 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 4.5 प्रतिशत से 9 प्रतिशत के बीच उत्पादन के गिरने की आशंका है। एक शोध के मुताबिक, अगर वातावरण का औसत तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो इससे गेहूं का उत्पादन 17 प्रतिशत तक कम हो सकता है। 

इसी प्रकार 2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने से धान का उत्पादन भी 0.75 टन प्रति हेक्टेयर कम होने की संभावना है।

कृषि के अनुकूल परिस्थितियों में कमी

जलवायु परिवर्तन के चलते तापमान के उच्च अक्षांश (high latitude) की ओर खिसकने से निम्न अक्षांश (low latitude) प्रदेशों में कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। 

भारत के जल स्रोत तथा भंडार बड़ी तीव्रता से सिकुड़ रहे हैं, जिससे किसानों को परंपरागत सिंचाई के तौर तरीका छोडकर पानी की खपत कम करने वाले आधुनिक तरीके एवं फसलों का चयन करना होगा। 

ग्लेशियर के पिघलने से विभिन्न बड़ी नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र में दीर्घावधिक तौर पर कमी आ सकती है, जिससे कृषि एवं सिंचाई में जलाभाव से गुजरना पड़ सकता है। 

एक रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रदूषण, भू-क्षरण और सूखा पड़ने से पृथ्वी के तीन चौथाई भूमि भाग की गुणवत्ता कम हो गई है।

जलवायु परिवर्तन से औसत तापमान में वृद्धि

जलवायु परिवर्तन की वजह से पिछले कई दशकों में तापमान में इजाफा हुआ है। औद्योगीकरण की शुरुआत से अब तक पृथ्वी के तापमान में तकरीबन 0.7 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो चुकी है। 

कुछ ऐसे पौधे होते हैं, जिन्हें एक विशेष तापमान की जरूरत होती है। वायुमंडल का तापमान बढ़ने पर उनकी पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जैसे जौ, आलू, गेंहू और सरसो आदि इन फसलों को कम तापमान की जरूरत होती है। 

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वहीं, तापमान में इजाफा होना इनके लिए काफी हानिकारक होता है। इसी तरह ज्यादा तापमान बढ़ने से मक्का, ज्वार और धान इत्यादि फसलों का क्षरण हो सकता है। 

क्योंकि, ज्यादा तापमान की  वजह से इन फसलों में दाना नहीं बनता या कम बनता है। इस तरह तापमान की वृद्धि इन फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

वर्षा के काल चक्र में परिवर्तन 

भारत का दो तिहाई कृषि क्षेत्र बरसात पर आश्रित है और कृषि की उत्पादकता वर्षा एवं इसकी मात्रा पर निर्भर होती है। वर्षा की मात्रा व तरीकों में परिवर्तन से मृदा क्षरण और मृदा की नमी पर असर पड़ता है। 

जलवायु की वजह तापमान में वृद्धि से वर्षा में गिरावट होती है, जिससे मिट्टी में नमी खत्म होती जाती है। इसके अलावा तापमान में कमी और वृद्धि होने का असर वर्षा पर पड़ता है, जिसके कारण भूमि में अपक्षय और सूखे की संभावनाएँ अधिक हो जाती हैं।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव कुछ वर्षों से गहन रूप से प्रभावित कर रहे हैं। मध्य भारत 2050 तक शीत वर्षा में 10 से 20 प्रतिशत तक कमी का अनुभव करेगा।

पश्चिमी अर्धमरुस्थलीय क्षेत्र द्वारा सामान्य वर्षा की अपेक्षा ज्यादा वर्षा प्राप्त करने की संभावना है। इसी प्रकार मध्य पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि एवं वर्षा में कमी से चाय की फसल में कमी हो सकती है।

कार्बन डाइऑक्साइड में बढ़ोतरी 

कार्बन डाइऑक्साइड गैस वैश्विक तापमान में करीब 60 प्रतिशत की हिस्सेदारी करती है। कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में बढ़ोतरी से व तापमान में वृद्धि से पेड़-पौधों तथा कृषि पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 

पिछले 30-50 वर्षों के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा करीब 450 पीपीएम (प्वाइंट्स पर मिलियन) तक पहुँच गयी है। हालांकि, कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि कुछ फसलों जैसे गेहूं तथा चावल के लिए लाभदायक है। 

क्योंकि ये प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को तीव्र करती है और वाष्पीकरण के द्वारा होने वाली हानियों को कम करती है। परंतु, इसके बावजूद भी कुछ मुख्य खाद्यान्न फसलें जैसे गेंहू की पैदावार में काफी गिरावट आई है, जिसका कारण कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि यानी तापमान में वृद्धि ही है।

कीट एवं रोगों का संकट बढ़ना 

जलवायु परिवर्तन की वजह से कीटों और रोगाणुओं में वृद्धि होती है। गर्म जलवायु में कीट-पतंगों की प्रजनन क्षमता काफी बढ़ जाती है, जिससे कीटों की तादात काफी बढ़ जाती है और इसका कृषि पर बड़ा दुष्प्रभाव पड़ता है। 

साथ ही, कीटों और रोगाणुओं को रोकने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल भी कहीं ना कहीं कृषि फसल के लिए हानिकारक ही होता है।

हालांकि, कुछ ज्यादा सूखा-सहिष्णु फसलों को जलवायु परिवर्तन से लाभ हुआ है। ज्वार की उपज, जिसका खाद्यान्न के रूप में उपयोग दुनिया में विकासशील भारत के अधिकांश लोग करते हैं। 

1970 के दशक के पश्चात पश्चिमी, दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में तकरीबन 0.9% फीसद की वृद्धि हुई है। उप सहारा अफ्रीका में 0.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 

वहीं, यदि कुछ फसलों को छोड़ दिया जाए तो, कुल फसल उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव नकारात्मक ही पड़ता है।

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पीएम किसान सम्मान निधि की 16 वीं किस्त इस तारीख को किसानों के खाते में पहुंचेगी https://www.merikheti.com/blog/pm-kisan-samman-nidhi-16-installment-will-reach-the-accounts-of-farmers-on-28-february Fri, 23 Feb 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/pm-kisan-samman-nidhi-16-installment-will-reach-the-accounts-of-farmers-on-28-february

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से संबंधित लाखों कृषकों के लिए खुशी का समाचार है। पीएम किसान योजना की 16 वीं किस्त की तारीख जारी हो गई है। 

किसानों को इसी माह योजना की 16वीं किस्त जारी कर दी जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस माह के आखिर में लाखों कृषकों के खाते में पीएम किसान योजना के 2000 रुपये हस्तांतरित करेंगे। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि पीएम किसान की आधिकारिक वेबसाइट पर आगामी किस्त की तारीख जारी हो गई है। 

आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, 28 फरवरी, 2024 को किसानों के खाते में पीएम किसान योजना का पैसा जारी कर दिया जाएगा।

जानिए किन किसानों को नहीं मिलेगी योजना की धनराशि 

ऐसा नहीं है, कि समस्त किसानों के खाते में योजना की किस्त की धनराशि आएगी। धनराशि केवल उन्हीं कृषकों के खाते में आएगी, जिन्होंने ई-केवाईसी (PM Kisan e-KYC) करवाई होगी। 

दरअसल, पीएम किसान योजना के लिए ई-केवाईसी करवाना बेहद अनिवार्य है। यदि कोई किसान ई-केवाईसी नहीं करवाता है, तो उसे योजना का फायदा नहीं मिलेगा। ऐसे में इस बार जिन किसानों ने ई-केवाईसी नहीं करवाई होगी, उन्हें 16 वीं किस्त की धनराशि हस्तांतरित नहीं की जाएगी। 

बतादें, कि ई-केवाईसी की प्रक्रिया काफी आसान होती है। सरकार ने प्रोसेस की प्रक्रिया कृषकों को ध्यान में रखते हुए बनाई है, ताकि किसान सुगमता से अपनी ई-केवाईसी कर सकें।

योजना का लाभ लेने के लिए ई-केवाईसी कैसे करें ?

किसान बड़ी सुगमता से पीएम किसान पोर्टल पर जाकर ओटीपी आधारित ई-केवाईसी कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कृषकों को बायोमेट्रिक आधारित ई-केवाईसी का विकल्प भी दिया गया है। 

इसके लिए किसान नजदीकी सीएससी केंद्र पर जाकर अपनी ई-केवाईसी करवा सकते हैं। अगर आप भी सरकार की इस योजना का फायदा प्राप्त करना चाहते हैं, तो आज ही पीएम किसान योजना की आधिकारिक वेबसाइट जाकर पंजीकरण कराऐं।

ये भी पढ़ें: पीएम किसान सम्मान निधि योजना की किस्त को किस प्रकार देख सकते हैं ?

केंद्र सरकार 6 हजार रुपये की आर्थ‍िक सहायता प्रदान करती है 

बतादें, कि केंद्र सरकार ने क‍िसानों को आर्थ‍िक सहायता देने के ल‍िए पीएम क‍िसान सम्‍मान न‍िध‍ि योजना जारी की थी। इस योजना के अंतर्गत क‍िसानों को साल भर में 6 हजार रुपये द‍िए जाते हैं। 

यह धनराशि 2-2 हजार रुपये की क‍िस्त में प्रदान की जाती है, जो हर चार महीने पर सीधे क‍िसानों के खाते में भेजी जाती है। 

समस्या होने पर पीएम किसान हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करें 

पीएम क‍िसान सम्‍मान न‍िध‍ि योजना से संबंधित किसी भी तरह की समस्या होने पर किसान हेल्पलाइन नंबर- 155261 या 1800115526 (टोल फ्री) या फिर 011-23381092 के जरिए संपर्क कर सकते हैं। 

इसके अतिरिक्त ईमेल कर pmkisan-ict@gov.in पर संपर्क कर सकते हैं।

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मंडियों में इस बार गेहूं का MSP से ज्यादा भाव मिलने की संभावना https://www.merikheti.com/blog/gehun-ka-mandi bhav-wheat-is-likely-to-get-more-than-msp Fri, 23 Feb 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/gehun-ka-mandi bhav-wheat-is-likely-to-get-more-than-msp

गेहूं की कीमतों में वृद्धि निरंतर होती जा रही है। गेहूं की खेती करने वाले कृषकों के लिए 2023 की अपेक्षा 2024 शानदार मुनाफा दिलाने वाला वर्ष सिद्ध हो सकता है। 

हम यह बात इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि मंडियों में गेहूं की नई फसल की आवक जल्द शुरू होने वाली है और इसी बीच गेहूं की कीमतों में निरंतर उछाल देखने को मिल रहा है। 

भारत की अधिकांश मंडियों में गेहूं का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य मतलब कि MSP से भी अधिक चल रहा है। कीमतों में आए उछाल को देख किसान भी काफी खुश दिखाई दे रहे हैं। 

किसानों को आशा है, कि कीमतों में ये वृद्धि निरंतर जारी रहेगी। गेंहू किसानों को मार्च-अप्रैल में आने वाली नई फसल का काफी अच्छा भाव मिलेगा।

कीमतों में किसी तरह की कोई गिरावट की आशंका नहीं है 

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि कृषि विशेषज्ञों के अनुसार भी गेहूं की कीमतों में तेजी का ये आलम आगे भी ज्यों का त्यों बने रहने की संभावना है। जानकारों ने कहा कि मार्च-अप्रैल में गेहूं की नई फसल आते ही पहले तो भाव तेजी से चढ़ेगा। 

परंतु, उसके बाद हल्की गिरावट भी देखने को मिल सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जहां गेहूं की घरेलू मांग काफी अच्छी है, तो वहीं निर्यात बाजार में भी भारत के गेहूं की बड़े पैमाने पर मांग है। 

इस वजह से गेंहू की कीमतों में गिरावट आने की फिलहाल कोई संभावना नहीं है।

ये भी पढ़ें: जानिए गेहूं की बुआई और देखभाल कैसे करें

भारत की विभिन्न मंडियों में गेंहू का रेट 

अगर गेहूं के भाव की बात करें तो फिलहाल भिन्न-भिन्न राज्यों में गेहूं के भाव अलग-अलग निर्धारित किए गए हैं। हालांकि, देश की अधिकांश मंडियों में गेहूं का भाव MSP से भी ऊपर चल रहा है। 

वर्तमान में केंद्र सरकार गेहूं पर 2275 रुपये की एमएसपी प्रदान कर रही है। वहीं, गेहूं का औसतन भाव 2,275 रुपये प्रति क्विंटल के तकरीबन बना हुआ है। केंद्रीय कृष‍ि व क‍िसान कल्याण मंत्रालय के एगमार्कनेट पोर्टल के अनुसार, बुधवार (21 फरवरी) को कर्नाटक की मंडियों में गेहूं को सबसे शानदार भाव मिला।

कर्नाटक की बीदर और शिमोगा मंडी में गेहू 4500 रुपये/क्विंटल के भाव में बिका है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश की जोबट मंडी में गेहूं को 4400 रुपये/क्विंटल का भाव मिला है। 

जबकि, आष्टा मंडी दाम 3881 रुपए/क्विंटल रहा है। इसके अतिरिक्त गुजरात की जेतपुर मंडी में गेहूं 3150 रुपये/क्विंटल और कर्नाटक की मैसूर मंडी में 3450 रुपये/क्विंटल के भाव पर बिका।

ये भी पढ़ें: केंद्र सरकार ने गेंहू के भावों को नियंत्रण करने के लिए जारी की यह योजना

गेंहू की बंपर आवक होने की संभावना 

भारत में इस बार गेहूं की बंपर पैदावार होने की भी संभावना है। केंद्र सरकार भी पैदावार में बढ़ोतरी होने की बात कह चुकी है। साथ ही, बाजार जानकारों का कहना है, कि गेहूं की कीमतों में फिलहाल कोई बड़ी गिरावट की आशंका नहीं है।

हालांकि, इसमें कुछ कमी अथवा वृद्धि भी संभावित है। परंतु, यह ज्यादा होने की संभावना नहीं है। गेहूं के दाम तेजी से बढ़ते रहेंगे, जब तक मंडियों में नई फसल न आ जाए। 

नई फसल के आते ही दामों में कमी की संभावना है। हालांकि, गेंहू की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा ही रहेंगी। 

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