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Meri Kheti https://www.merikheti.com/ Kisan ka saathi Sat, 24 Feb 2024 14:31:00 GMT hi hourly 1 https://merikheti.com/favicon.jpg Meri Kheti https://www.merikheti.com/ 140 140 पूसा कृषि विज्ञान मेला किसानों के "दिल्ली चलो मार्च" के चलते हुआ स्थगित https://www.merikheti.com/blog/pusa-mela-postponed-due-to-farmers-protest-delhi-chalo-march Sat, 24 Feb 2024 14:31:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/pusa-mela-postponed-due-to-farmers-protest-delhi-chalo-march

भारत कृषि से संबंधित तकनीकी नवाचारों और सबसे नवीन खेती प्रणालियों का प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली में 28 फरवरी से 1 मार्च, 2024 तक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का पूसा कृषि विज्ञान मेले का आयोजन होने जा रहा था। 

 जो कि "दिल्ली चलो मार्च" के चलते कुछ कारणों की वजह से स्थगित कर दिया गया है। यह मेला न केवल किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म प्रदान करता है, बल्कि आगामी समय की खेती के लिए नए दिशा-निर्देश प्रदान करेगा। 

पूसा का वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने कहा है, कि जैसे ही मेला की तिथि सुनिश्चित होगी, तुरंत किसानों को सूचित कर दिया जाएगा। 

पूसा मेले की विभिन्न निम्नलिखित विशेषताएं 

  1. तकनीकी प्रदर्शनियां: इस मेले में कृषि तकनीकों के प्रदर्शन का एक विशेष आकर्षण है। नवीनतम किसान यंत्र, स्मार्ट खेती तकनीक, बीज विकास और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों पर प्रदर्शन होगा। 
  2. विभिन्न विषयों पर सेमिनार और कार्यशालाएं: विभिन्न खेती से संबंधित विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा सेमिनार और कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी जो किसानों को नई तकनीकों और अनुसंधानों से अवगत कराएंगी। 
  3. किसान-उद्यमी मिलन सभा: इस मेले में किसानों और उद्यमियों के बीच एक मिलन सभा आयोजित की जाएगी, जो उन्हें अपने अनुसंधान और उत्पादों को एक दूसरे के साथ साझा करने का एक अच्छा अवसर प्रदान करेगी। 
  4. आर्थिक योजनाएं और समर्थन: सरकार के प्रति किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, इस मेले में विभिन्न योजनायें और समर्थन कार्यक्रम भी होंगे। 
  5. बीज की ऑनलाइन बुकिंग: इस साल बीजों की ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था की गई है। किसान पूसा संस्थान की अधिकारिक वेबसाइट www.iari.res.in पर जाकर अपनी जरूरत के हिसाब से बीजों की बुकिंग और पेमेंट कर सकते हैं।

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सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों के लिए इसरो (ISRO) ने उठाया महत्वपूर्ण कदम https://www.merikheti.com/blog/isro-took-important-steps-for-the-farmers-of-drought-affected-areas Sat, 24 Feb 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/isro-took-important-steps-for-the-farmers-of-drought-affected-areas

सूखाग्रस्त इलाकों के किसान भाइयों के लिए एक अच्छी खबर है। दरअसल, नीति आयोग ने भारतभर में कृषि वानिकी को प्रोत्साहन देने के लिए इसरो उपग्रहों के डेटा का उपयोग करके एक नया भुवन-आधारित पोर्टल जारी किया है। 

इसरो के अनुसार, यह पोर्टल कृषि वानिकी के लिए अनुकूल जमीन की पहचान करने वाले जिला-स्तरीय डेटा तक सार्वभौमिक पहुंच की स्वीकृति देता है। प्रारंभिक आकलनों में मध्य प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान कृषि वानिकी उपयुक्तता के लिए सबसे बड़े राज्यों के तौर पर उभरे हैं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने नीति आयोग के साथ मिलकर भारत के बंजर क्षेत्रों में हरियाली की योजना तैयार की है। सैटेलाइट डाटा और कृषि वानिकी के माध्यम से भारत में वन क्षेत्र में सुधार किया जाएगा। 

योजना के अंतर्गत इसरो के जियोपोर्टल भुवन पर उपलब्ध सैटेलाइट डाटा के माध्यम से कृषि वानिकी उपयुक्तता सूचकांक (एएसआई) स्थापित करने के लिए बंजर भूमि, भूमि उपयोग भूमि कवर, जल निकाय, मृदा कार्बनिक कार्बन और ढलान जैसे विषयगत भू-स्थानिक आंकड़ों को इकट्ठा किया जा रहा है।

प्रारंभिक आकलनों में मध्य प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान कृषि वानिकी उपयुक्तता के लिए सबसे बड़े राज्यों के तौर पर उभरे हैं। जानकारी के अनुसार, नीति आयोग ने 12 फरवरी को भुवन-आधारित ग्रो-पोर्टल जारी किया है। 

ग्रीनिंग एंड रेस्टोरेशन ऑफ वेस्टलैंड विद एग्रोफॉरेस्ट्री (ग्रो) कहे जाने वाले इस पोर्टल के जरिये देश में कृषि वानिकी के साथ-साथ बंजर भूमि को हरा-भरा करना और उसकी पुनरुद्धार की संभावनाओं को तलाशा जा रहा है।

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इस पोर्टल के जरिये राज्य और जिला-स्तरीय कृषि-वानिकी डाटा सभी के लिए उपलब्ध है. यह डाटा कृषि व्यवसायियों, गैर-सरकारी संस्थाओं, स्टार्ट-अप और शोधकर्ताओं को भी इस क्षेत्र में पहलों के लिए आमंत्रित करता है। 

इसरो का कहना है, कि ”एक विश्लेषण से पता चला कि भारत की लगभग 6.18% और 4.91% भूमि क्रमशः कृषि वानिकी के लिए अत्यधिक और मध्यम रूप से उपयुक्त है। 

राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना कृषि वानिकी उपयुक्तता के लिए शीर्ष बड़े आकार के राज्यों के रूप में उभरे, जबकि जम्मू और कश्मीर, मणिपुर और नागालैंड मध्यम आकार के राज्यों में सर्वोच्च स्थान पर रहे।”

नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद के अनुसार, कृषि वानिकी भारत को लकड़ी के उत्पादों के आयात को कम करने, कार्बन पृथक्करण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने और इष्टतम भूमि उपयोग को प्रोत्साहन देने में सहयोग कर सकती है। 

कृषि वानिकी के माध्यम से परती और बंजर भूमि का रूपांतरण करके उन्हें उत्पादक बनाया जा सकता है। 

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भंडारण करते वक्त अनाज में लगने वाले कीट और उनकी रोकथाम https://www.merikheti.com/blog/pests-affecting-grains-during-storage-and-their-prevention Sat, 24 Feb 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/pests-affecting-grains-during-storage-and-their-prevention

फसल की कटाई के बाद सबसे महत्वपूर्ण कार्य फसल भंडारण का है। किसान वैज्ञानिक विधि का उपयोग कर फसल को संरक्षित कर सकते है। ज्यादातर फसल में लगने वाले मुख्य कीटों का कारण नमी का होना है। अनाज के भंडारण में लगने वाले मुख्य कीट लेपिडोप्टेरा और कोलिओप्टेरा आर्डर के होते है। 

1 सुरसुरी 

यह कीट भूरे काले रंग का होता है। इसके सूंड़ के आकर का सिर आगे की ओर झुका हुआ होता है। सुरसुरी कीट की लम्बाई 2 -4 मिमी होती है। सुरसुरी के पंखो के ऊपर हल्के धब्बेनुमा की रचना होती है। 

अनाज के भण्डारण को प्रोढ़ और सूंडी दोनों ही क्षति पहुँचाती है। यह सूंडी सामान्यता अनाज को अंदर से खाकर खोखला बना देती है। 

2 खपड़ा बीटल

यह प्रोढ़ कीट स्लेटी भूरे रंग का होता है। इस कीट का शरीर अंडाकार का होता है, सिर छोटा और सिकुड़ने वाला होता है। यह सूंडी बारीक रोएं से भरपूर होती है। 

खपड़ा बीटल कीट की लंबाई 2 -2.5 मिमी होता है। इस कीट को आसानी से फसल में पहचाना जा सकता है। सूंडी का प्रकोप ज्यादातर अनाज के भ्रूड़ पर देखा जाता है। 

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3 अनाज का छोटा बेधक 

यह कीट अनाज को खाकर अंदर से खोखला बना देता है। इस कीट की लंबाई 3 मिमी होती है, और यह कीट दिखने में गहरे भूरे रंग के होते है। प्रोढ़ और कीट दोनों ही फसल को क्षति पहुँचाते है, यह कीट उड़ने में भी सक्षम होती है। 

यह कीट अनाज को अंदर से खोखला करके आटे में परिवर्तित कर देते है। यह भंडारगृह का नाशीकीट है। 

4 अनाज का पतंगा 

यह कीट 5 -7 मिमी लम्बे होते है। यह कीट सुनहरे भूरे रंग के उड़ने वाले पतंगे रहते है। इस पतंगे का आख़िरी सिरा नुकीला और बालयुक्त होता है। 

इस कीट के आगे वाले पंख हल्के पीले और पिछले वाले पंख भूरे रंग के होते है। यह कीट दाने के भीतर छिद्र करके अनाज को खाती है, और विकसित होकर प्रोढ़ के रूप में बहार निकलती है। 

5 आटे का लाल भृंग 

यह कीट ज्यादातर अनाज, आटा और संसाधित अनाज का कीट है। यह कीट लाल भूरे रंग का होता है और यह लगभग 3 मिमी लंबा होता है। यह कीट चलने और उड़ने में काफी तेज होते है। 

इस कीट के वक्ष, सिर और उदर स्पष्ट होते है। इसके ऐंटीनी झुके हुए होते है और ऐंटीनी के ऊपर तीन खंड मिलकर एक मोटा भाग विकसित करते है। 

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6 दालों का भृंग 

प्रोढ़ कीट का शरीर भूरे रंग का होता है। यह प्रोढ़ कीट लगभग 3.2 मिमी लंबा होता है। प्रोढ़ कीट का शरीर आगे की ओर नुकीला और पीछे से चौड़ा होता है। यह सूंडी अनाज के दानों में छिद्र करके उन्हें  खा जाती है। 

7 कटारी दाँतो वाला अनाज का भृंग 

यह कीट लगभग 1/8 इंच लम्बे होते है। इस कीट के धड़के दोनों किनारों पर आरीनुमा 6 दांत होते हैं। यह कीट आसानी से पहचाना जा सकता है। यह गाढ़े भूरे रंग के चपटे कीट होते हैं। 

कीट प्रकोप के पूर्व प्रबंधन 

  1. गोदामों में अनाज का भण्डारण करने से पहले, गोदामों की अच्छे से सफाई कर ले। 
  2. भंडारित किये जाने वाले अनाज को अच्छे से धूप में सूखा ले, याद रहे अनाज में नमी न हो। अनाज का भण्डारण करने से पहले, अनाज की नमी की जांच कर ले। 
  3. अनाज ढोने वाले वाहनों की साफ़ सफाई पर विशेष रूप से ध्यान दे। 
  4. अनाज का भण्डारण करते वक्त पुरानी बोरियों का उपयोग न करें, उसकी जगह पर नई बोरियों का उपयोग करें। या फिर पुरानी बोरियों को 0.01त्न साइपरमेथ्रिन 25 ईसी को पानी में मिलाकर बोरियों को आधा घंटे तक उसमे भिगों दें। बोरियों को छाया में सुखाने के बाद तब उसमे फसल का भण्डारण करें। 
  5. अनाज से भरी बोरियों को सीधे निचे भूमि पर न रखे। बोरियों को हमेशा दीवार से सटा कर रखें। 
  6. अनाज को गोदामों में कीट रहित करने के लिए 0.5त्न मैलाथियान 50 ईसी को पानी में मिलाकर छिड़काव करें। 
  7. भंडारित अनाज को सुरक्षित रखने के लिए कपूर, सरसो के तेल और नीम की पत्तियों के पाउडर का उपयोग भी किया जा सकता हैं। 

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कीट प्रकोप के पश्चात उपाय 

ज्यादा नमी वाले दिनों में 15 -20 दिन के अंतराल पर फसल में कीट प्रकोप की जाँच करते रहे। या फिर समय समय अनाज को धुप दिखाकर उसमे से नमी को भी दूर कर सकते हैं। 

एल्यूमिनियम फॉस्फाइड की एक गोली को एक टन अनाज में डालें और कुछ दिनों के लिए हवाबंद कर दें। ध्यान रहें, हवा अवरोधी भंडारों में इस गोली का उपयोग करें। 

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जलवायु परिवर्तन किस प्रकार से कृषि को प्रभावित करता है ? https://www.merikheti.com/blog/how-does-climate-change-affect-agriculture Sat, 24 Feb 2024 00:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/how-does-climate-change-affect-agriculture

आजकल जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक मुद्दा बनकर सामने आ रहा है। जलवायु परिवर्तन किसी देश विशेष या राष्ट्र से संबंधित अवधारणा नहीं है। जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक अवधारणा है, जो समस्त पृथ्वी के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। 

जलवायु परिवर्तन से भारत समेत संपूर्ण विश्व में बाढ़, सूखा, कृषि संकट एवं खाद्य सुरक्षा, बीमारियां, प्रवासन आदि का खतरा बढ़ा है। परंतु, भारत का एक बड़ा तबका (लगभग 60 प्रतिशत आबादी) आज भी कृषि पर निर्भर है, और इसके प्रभाव के प्रति सहज है। इसलिए कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित दस शीर्ष देशों में शम्मिलित है। जलवायु की बदलती परिस्थितियां कृषि को सर्वाधिक प्रभावित कर रहीं हैं। क्योंकि, दीर्घ काल में ये मौसमी कारक जैसे वर्षा, तापमान, आर्द्रता आदि पर निर्भर करती है। 

अतः इस लेख में हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि जलवायु परिवर्तन कृषि को कैसे प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन कृषि को निम्नलिखित तरह से प्रभावित कर सकता है

कृषि उपज में गिरावट 

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से विश्व कृषि इस सदी में गंभीर गिरावट का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (IPCC) के मुताबिक, वैश्विक कृषि पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव नकारात्मक होगा। 

हालांकि कुछ फसलें इससे काफी लाभान्वित होंगी किन्तु फसल उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक होगा।

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भारत में 2010-2039 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 4.5 प्रतिशत से 9 प्रतिशत के बीच उत्पादन के गिरने की आशंका है। एक शोध के मुताबिक, अगर वातावरण का औसत तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो इससे गेहूं का उत्पादन 17 प्रतिशत तक कम हो सकता है। 

इसी प्रकार 2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने से धान का उत्पादन भी 0.75 टन प्रति हेक्टेयर कम होने की संभावना है।

कृषि के अनुकूल परिस्थितियों में कमी

जलवायु परिवर्तन के चलते तापमान के उच्च अक्षांश (high latitude) की ओर खिसकने से निम्न अक्षांश (low latitude) प्रदेशों में कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। 

भारत के जल स्रोत तथा भंडार बड़ी तीव्रता से सिकुड़ रहे हैं, जिससे किसानों को परंपरागत सिंचाई के तौर तरीका छोडकर पानी की खपत कम करने वाले आधुनिक तरीके एवं फसलों का चयन करना होगा। 

ग्लेशियर के पिघलने से विभिन्न बड़ी नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र में दीर्घावधिक तौर पर कमी आ सकती है, जिससे कृषि एवं सिंचाई में जलाभाव से गुजरना पड़ सकता है। 

एक रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रदूषण, भू-क्षरण और सूखा पड़ने से पृथ्वी के तीन चौथाई भूमि भाग की गुणवत्ता कम हो गई है।

जलवायु परिवर्तन से औसत तापमान में वृद्धि

जलवायु परिवर्तन की वजह से पिछले कई दशकों में तापमान में इजाफा हुआ है। औद्योगीकरण की शुरुआत से अब तक पृथ्वी के तापमान में तकरीबन 0.7 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो चुकी है। 

कुछ ऐसे पौधे होते हैं, जिन्हें एक विशेष तापमान की जरूरत होती है। वायुमंडल का तापमान बढ़ने पर उनकी पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जैसे जौ, आलू, गेंहू और सरसो आदि इन फसलों को कम तापमान की जरूरत होती है। 

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वहीं, तापमान में इजाफा होना इनके लिए काफी हानिकारक होता है। इसी तरह ज्यादा तापमान बढ़ने से मक्का, ज्वार और धान इत्यादि फसलों का क्षरण हो सकता है। 

क्योंकि, ज्यादा तापमान की  वजह से इन फसलों में दाना नहीं बनता या कम बनता है। इस तरह तापमान की वृद्धि इन फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

वर्षा के काल चक्र में परिवर्तन 

भारत का दो तिहाई कृषि क्षेत्र बरसात पर आश्रित है और कृषि की उत्पादकता वर्षा एवं इसकी मात्रा पर निर्भर होती है। वर्षा की मात्रा व तरीकों में परिवर्तन से मृदा क्षरण और मृदा की नमी पर असर पड़ता है। 

जलवायु की वजह तापमान में वृद्धि से वर्षा में गिरावट होती है, जिससे मिट्टी में नमी खत्म होती जाती है। इसके अलावा तापमान में कमी और वृद्धि होने का असर वर्षा पर पड़ता है, जिसके कारण भूमि में अपक्षय और सूखे की संभावनाएँ अधिक हो जाती हैं।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव कुछ वर्षों से गहन रूप से प्रभावित कर रहे हैं। मध्य भारत 2050 तक शीत वर्षा में 10 से 20 प्रतिशत तक कमी का अनुभव करेगा।

पश्चिमी अर्धमरुस्थलीय क्षेत्र द्वारा सामान्य वर्षा की अपेक्षा ज्यादा वर्षा प्राप्त करने की संभावना है। इसी प्रकार मध्य पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि एवं वर्षा में कमी से चाय की फसल में कमी हो सकती है।

कार्बन डाइऑक्साइड में बढ़ोतरी 

कार्बन डाइऑक्साइड गैस वैश्विक तापमान में करीब 60 प्रतिशत की हिस्सेदारी करती है। कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में बढ़ोतरी से व तापमान में वृद्धि से पेड़-पौधों तथा कृषि पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 

पिछले 30-50 वर्षों के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा करीब 450 पीपीएम (प्वाइंट्स पर मिलियन) तक पहुँच गयी है। हालांकि, कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि कुछ फसलों जैसे गेहूं तथा चावल के लिए लाभदायक है। 

क्योंकि ये प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को तीव्र करती है और वाष्पीकरण के द्वारा होने वाली हानियों को कम करती है। परंतु, इसके बावजूद भी कुछ मुख्य खाद्यान्न फसलें जैसे गेंहू की पैदावार में काफी गिरावट आई है, जिसका कारण कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि यानी तापमान में वृद्धि ही है।

कीट एवं रोगों का संकट बढ़ना 

जलवायु परिवर्तन की वजह से कीटों और रोगाणुओं में वृद्धि होती है। गर्म जलवायु में कीट-पतंगों की प्रजनन क्षमता काफी बढ़ जाती है, जिससे कीटों की तादात काफी बढ़ जाती है और इसका कृषि पर बड़ा दुष्प्रभाव पड़ता है। 

साथ ही, कीटों और रोगाणुओं को रोकने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल भी कहीं ना कहीं कृषि फसल के लिए हानिकारक ही होता है।

हालांकि, कुछ ज्यादा सूखा-सहिष्णु फसलों को जलवायु परिवर्तन से लाभ हुआ है। ज्वार की उपज, जिसका खाद्यान्न के रूप में उपयोग दुनिया में विकासशील भारत के अधिकांश लोग करते हैं। 

1970 के दशक के पश्चात पश्चिमी, दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में तकरीबन 0.9% फीसद की वृद्धि हुई है। उप सहारा अफ्रीका में 0.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 

वहीं, यदि कुछ फसलों को छोड़ दिया जाए तो, कुल फसल उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव नकारात्मक ही पड़ता है।

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पीएम किसान सम्मान निधि की 16 वीं किस्त इस तारीख को किसानों के खाते में पहुंचेगी https://www.merikheti.com/blog/pm-kisan-samman-nidhi-16-installment-will-reach-the-accounts-of-farmers-on-28-february Fri, 23 Feb 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/pm-kisan-samman-nidhi-16-installment-will-reach-the-accounts-of-farmers-on-28-february

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से संबंधित लाखों कृषकों के लिए खुशी का समाचार है। पीएम किसान योजना की 16 वीं किस्त की तारीख जारी हो गई है। 

किसानों को इसी माह योजना की 16वीं किस्त जारी कर दी जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस माह के आखिर में लाखों कृषकों के खाते में पीएम किसान योजना के 2000 रुपये हस्तांतरित करेंगे। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि पीएम किसान की आधिकारिक वेबसाइट पर आगामी किस्त की तारीख जारी हो गई है। 

आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, 28 फरवरी, 2024 को किसानों के खाते में पीएम किसान योजना का पैसा जारी कर दिया जाएगा।

जानिए किन किसानों को नहीं मिलेगी योजना की धनराशि 

ऐसा नहीं है, कि समस्त किसानों के खाते में योजना की किस्त की धनराशि आएगी। धनराशि केवल उन्हीं कृषकों के खाते में आएगी, जिन्होंने ई-केवाईसी (PM Kisan e-KYC) करवाई होगी। 

दरअसल, पीएम किसान योजना के लिए ई-केवाईसी करवाना बेहद अनिवार्य है। यदि कोई किसान ई-केवाईसी नहीं करवाता है, तो उसे योजना का फायदा नहीं मिलेगा। ऐसे में इस बार जिन किसानों ने ई-केवाईसी नहीं करवाई होगी, उन्हें 16 वीं किस्त की धनराशि हस्तांतरित नहीं की जाएगी। 

बतादें, कि ई-केवाईसी की प्रक्रिया काफी आसान होती है। सरकार ने प्रोसेस की प्रक्रिया कृषकों को ध्यान में रखते हुए बनाई है, ताकि किसान सुगमता से अपनी ई-केवाईसी कर सकें।

योजना का लाभ लेने के लिए ई-केवाईसी कैसे करें ?

किसान बड़ी सुगमता से पीएम किसान पोर्टल पर जाकर ओटीपी आधारित ई-केवाईसी कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कृषकों को बायोमेट्रिक आधारित ई-केवाईसी का विकल्प भी दिया गया है। 

इसके लिए किसान नजदीकी सीएससी केंद्र पर जाकर अपनी ई-केवाईसी करवा सकते हैं। अगर आप भी सरकार की इस योजना का फायदा प्राप्त करना चाहते हैं, तो आज ही पीएम किसान योजना की आधिकारिक वेबसाइट जाकर पंजीकरण कराऐं।

ये भी पढ़ें: पीएम किसान सम्मान निधि योजना की किस्त को किस प्रकार देख सकते हैं ?

केंद्र सरकार 6 हजार रुपये की आर्थ‍िक सहायता प्रदान करती है 

बतादें, कि केंद्र सरकार ने क‍िसानों को आर्थ‍िक सहायता देने के ल‍िए पीएम क‍िसान सम्‍मान न‍िध‍ि योजना जारी की थी। इस योजना के अंतर्गत क‍िसानों को साल भर में 6 हजार रुपये द‍िए जाते हैं। 

यह धनराशि 2-2 हजार रुपये की क‍िस्त में प्रदान की जाती है, जो हर चार महीने पर सीधे क‍िसानों के खाते में भेजी जाती है। 

समस्या होने पर पीएम किसान हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करें 

पीएम क‍िसान सम्‍मान न‍िध‍ि योजना से संबंधित किसी भी तरह की समस्या होने पर किसान हेल्पलाइन नंबर- 155261 या 1800115526 (टोल फ्री) या फिर 011-23381092 के जरिए संपर्क कर सकते हैं। 

इसके अतिरिक्त ईमेल कर pmkisan-ict@gov.in पर संपर्क कर सकते हैं।

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मंडियों में इस बार गेहूं का MSP से ज्यादा भाव मिलने की संभावना https://www.merikheti.com/blog/gehun-ka-mandi bhav-wheat-is-likely-to-get-more-than-msp Fri, 23 Feb 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/gehun-ka-mandi bhav-wheat-is-likely-to-get-more-than-msp

गेहूं की कीमतों में वृद्धि निरंतर होती जा रही है। गेहूं की खेती करने वाले कृषकों के लिए 2023 की अपेक्षा 2024 शानदार मुनाफा दिलाने वाला वर्ष सिद्ध हो सकता है। 

हम यह बात इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि मंडियों में गेहूं की नई फसल की आवक जल्द शुरू होने वाली है और इसी बीच गेहूं की कीमतों में निरंतर उछाल देखने को मिल रहा है। 

भारत की अधिकांश मंडियों में गेहूं का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य मतलब कि MSP से भी अधिक चल रहा है। कीमतों में आए उछाल को देख किसान भी काफी खुश दिखाई दे रहे हैं। 

किसानों को आशा है, कि कीमतों में ये वृद्धि निरंतर जारी रहेगी। गेंहू किसानों को मार्च-अप्रैल में आने वाली नई फसल का काफी अच्छा भाव मिलेगा।

कीमतों में किसी तरह की कोई गिरावट की आशंका नहीं है 

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि कृषि विशेषज्ञों के अनुसार भी गेहूं की कीमतों में तेजी का ये आलम आगे भी ज्यों का त्यों बने रहने की संभावना है। जानकारों ने कहा कि मार्च-अप्रैल में गेहूं की नई फसल आते ही पहले तो भाव तेजी से चढ़ेगा। 

परंतु, उसके बाद हल्की गिरावट भी देखने को मिल सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जहां गेहूं की घरेलू मांग काफी अच्छी है, तो वहीं निर्यात बाजार में भी भारत के गेहूं की बड़े पैमाने पर मांग है। 

इस वजह से गेंहू की कीमतों में गिरावट आने की फिलहाल कोई संभावना नहीं है।

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भारत की विभिन्न मंडियों में गेंहू का रेट 

अगर गेहूं के भाव की बात करें तो फिलहाल भिन्न-भिन्न राज्यों में गेहूं के भाव अलग-अलग निर्धारित किए गए हैं। हालांकि, देश की अधिकांश मंडियों में गेहूं का भाव MSP से भी ऊपर चल रहा है। 

वर्तमान में केंद्र सरकार गेहूं पर 2275 रुपये की एमएसपी प्रदान कर रही है। वहीं, गेहूं का औसतन भाव 2,275 रुपये प्रति क्विंटल के तकरीबन बना हुआ है। केंद्रीय कृष‍ि व क‍िसान कल्याण मंत्रालय के एगमार्कनेट पोर्टल के अनुसार, बुधवार (21 फरवरी) को कर्नाटक की मंडियों में गेहूं को सबसे शानदार भाव मिला।

कर्नाटक की बीदर और शिमोगा मंडी में गेहू 4500 रुपये/क्विंटल के भाव में बिका है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश की जोबट मंडी में गेहूं को 4400 रुपये/क्विंटल का भाव मिला है। 

जबकि, आष्टा मंडी दाम 3881 रुपए/क्विंटल रहा है। इसके अतिरिक्त गुजरात की जेतपुर मंडी में गेहूं 3150 रुपये/क्विंटल और कर्नाटक की मैसूर मंडी में 3450 रुपये/क्विंटल के भाव पर बिका।

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गेंहू की बंपर आवक होने की संभावना 

भारत में इस बार गेहूं की बंपर पैदावार होने की भी संभावना है। केंद्र सरकार भी पैदावार में बढ़ोतरी होने की बात कह चुकी है। साथ ही, बाजार जानकारों का कहना है, कि गेहूं की कीमतों में फिलहाल कोई बड़ी गिरावट की आशंका नहीं है।

हालांकि, इसमें कुछ कमी अथवा वृद्धि भी संभावित है। परंतु, यह ज्यादा होने की संभावना नहीं है। गेहूं के दाम तेजी से बढ़ते रहेंगे, जब तक मंडियों में नई फसल न आ जाए। 

नई फसल के आते ही दामों में कमी की संभावना है। हालांकि, गेंहू की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा ही रहेंगी। 

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इस राज्य में पॉलीहाउस और शेड नेट पर 50% प्रतिशत सब्सिड़ी दी जा रही है https://www.merikheti.com/blog/bihar-government-provide-50-percent-subsidy-on-polyhouse-and-shednet Fri, 23 Feb 2024 00:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/bihar-government-provide-50-percent-subsidy-on-polyhouse-and-shednet

केंद्र और राज्य सरकार अपने अपने स्तर से कृषकों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए विभिन्न प्रयास करती रहती हैं। खेती किसानी के विकास और किसानों की आमदनी को दोगुना करने के उद्देश्य से सरकार आए दिन नई-नई योजनाओं को जारी करती रहती है। 

अब इसी कड़ी में बिहार सरकार किसानों के लिए एक और नई योजना लेकर आई है। दरअसल, सरकार ने संरक्षित खेती द्वारा बागवानी विकास योजना के अंतर्गत पॉलीहाउस और शेड नेट की व्यवस्था  उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है।

सरकार पॉलीहाउस और शेड नेट के माध्यम से खेती करने पर किसानों को अच्छा खासा अनुदान मुहैय्या करा रही है। सरकार के इस निर्णय से किसानों की आमदनी के साथ-साथ उत्पादन में भी इजाफा होगा। 

योजना के अंतर्गत कितना अनुदान दिया जाएगा ?

योजना की जानकारी बिहार कृषि विभाग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा की है। कृषि विभाग की पोस्ट के अनुसार, सरकार संरक्षित खेती द्वारा वार्षिक बागवानी विकास योजना के अंतर्गत पॉलीहाउस और शेड नेट की मदद से खेती करने पर कृषकों को 50 प्रतिशत तक का अनुदान प्रदान कर रही है।

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इसमें किसानों को प्रति वर्ग मीटर की इकाई लगाने के लिए 935 रुपये के खर्च में से 50 फीसद मतलब 467 रुपये दिए जाएंगे तथा शेड नेट के लिए प्रति वर्ग मीटर की इकाई 710 रुपये में से 50% फीसद यानी 355 रुपये दिए जाएंगे। 

पॉलीहाउस और शेड नेट किसानों के लिए कैसे फायदेमंद है ? 

यदि आप भी एक किसान हैं और पॉलीहाउस और शेड नेट तकनीक को अपनाकर खेती करने की सोच रहे हैं, तो इससे आपको बेहद लाभ होने वाला है। दरअसल, खेती की ये तकनीक फसलों को कीटों के हमलों से बचाती है। 

इस तकनीक का इस्तेमाल करने से कीट आक्रमण में 90% प्रतिशत तक की कमी आती है। पॉलीहाउस और शेड नेट तकनीक के जरिए आप वर्षों-वर्ष सुरक्षित तरीके से खेती कर सकते हैं। 

योजना का फायदा लेने के लिए कैसे करें आवेदन ?

योजना का लाभ उठाने के लिए सबसे पहले बागवानी विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं। होम पेज पर उद्यान निदेशालय अंतर्गत संचालित योजनाओं का लाभ लेने के लिए Online Portal के ऑप्शन पर क्लिक करें।

वहां संरक्षित खेती द्वारा बागवानी विकास योजना के लिए आवेदन पर क्लिक करें। इसके बाद आपके सामने नए पेज पर कुछ नियम और शर्तें आएंगी। 

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अब इन नियम और शर्तों को ध्यानपूर्वक पढ़कर जानकारी से सहमत वाले ऑप्शन पर क्लिक करें। ऐसा करते ही आपके सामने आवेदन फॉर्म खुल जाएगा। अब मांगी गई सभी आवश्यक जानकारी को ध्यानपूर्वक भरें। 

इसके बाद आवश्यक दस्तावेजों को अपलोड करें। दस्तावेज अपलोड करते ही सबमिट के ऑप्शन पर क्लिक करें। इस प्रकार आप सफलतापूर्वक इस योजना के तहत ऑनलाइन आवेदन हो जाएगा। 

किसान अधिक जानकारी के लिए यहां करें संपर्क

योजना से संबंधित ज्यादा जानकारी के लिए किसान भाई बिहार कृषि विभाग, बागवानी निदेशालय की ऑफिशियल वेबसाइट पर विजिट कर सकते हैं। 

इसके अलावा, स्थानीय जनपद के उद्यान विभाग के सहायक निदेशक से भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। 

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मौसम विभाग ने मार्च माह में गेहूं और सरसों की फसल के लिए सलाह जारी की है https://www.merikheti.com/blog/wheat and mustard crops imd advisory in the month of March Thu, 22 Feb 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/wheat and mustard crops imd advisory in the month of March

गेहूँ की फसल के लिए एडवाइजरी

  1. किसानों को सलाह दी जाती है कि वे आगे बारिश के पूर्वानुमान के कारण खेतों में सिंचाई न करें/उर्वरक न डालें।
  2. उन्हें सलाह दी जाती है कि वे अपने खेत पर नियमित निगरानी रखें क्योंकि यह मौसम गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग
  3. विकास के लिए अनुकूल है।
  4. किसानों को सलाह दी जाती है कि वे खेतों में सिंचाई न करें/उर्वरक न डालें। आगे बारिश के पूर्वानुमान के कारण अन्य कृषि संबंधी अभ्यास करें।
  5. पीली रतुआ की उपस्थिति के लिए गेहूं की फसल का नियमित सर्वेक्षण करें।
  6. नए लगाए गए और छोटे पौधों के ऊपर बाजरा या ईख की झोपड़ी बनाएं और इसे पूर्व-दक्षिण दिशा में खुला रखें ताकि पौधों को सूरज की रोशनी मिल सके।
  7. किसानों को गेहूं की बुआई की तकनीक जीरो टिलेज, हैप्पी सीडर या अन्य फसल अवशेष प्रबंधन अपनाने की भी सलाह दी जाती है।
  8. नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस की पूरी मात्रा, पोटाश तथा जिंक सल्फेट को बुआई के समय छिड़कें।
  9. किसानों को यह भी सलाह दी जाती है, कि वे तीसरी और चौथी पत्ती पर 0.5% जिंक सल्फेट के साथ 2.5% यूरिया का छिड़काव करें। पौधों का रंग पीला हो जाता है जो जिंक की कमी के लक्षण दर्शाता है।    
  10. गेहूं की बुआई के 30-35 दिन बाद "जंगली पालक" सहित गेहूं में सभी चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए मेटसल्फ्यूरॉन (एल्ग्रिप जी.पा या जी. ग्रैन) का 8.0 ग्राम (उत्पाद + सहायक) प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें। हवा बंद होने पर फ्लैट फैन नोजल का उपयोग करके 200-250 लीटर पानी में मिलकर स्प्रे करें।

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सरसों की फसल के लिए एडवाइजरी    

  1. सिंचाई के दौरान पतला पानी ही डालें और खेत में पौधों में पानी जमा न होने दें।
  2. किसानों को यह भी सलाह दी जाती है, कि वे अपने खेत की नियमित निगरानी करते रहें। क्योंकि यह मौसम इसके लिए अनुकूल है। सफेद रतुआ रोग का विकास और सरसों में एफिड का प्रकोप। पौधे का संक्रमित भाग घटना की प्रारंभिक अवस्था में नष्ट कर दें। 
  3. देश के जिन हिस्सों में तना सड़न रोग प्रति वर्ष होता है, वहां 0.1% की दर से कार्बेन्डाजिम का पहला छिड़काव करना चाहिए। स्प्रे बिजाई के 45-50 दिन पश्चात करें। कार्बेन्डाजिम का दूसरा छिड़काव 0.1 फीसद की दर से 65-70 दिन के बाद करें।  
  4. किसान भाई अपने खेतों की लगातार निगरानी करते रहें। जब यह पुष्टि हो जाए कि सफेद रतुआ रोग ने खेतों में दस्तक दे दी है, तो 250-300 लीटर पानी में 600-800 ग्राम मैन्कोजेब (डाइथेन एम-45) मिलाएं और 15 दिनों के समयांतराल पर प्रति एकड़ 2-3 बार छिड़काव करें।

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ग्लैमर की चकाचौंध को छोड़ 5 साल से खेती कर रहे मशहूर एक्टर की दिलचस्प कहानी https://www.merikheti.com/blog/famous-actor-rajesh-kumar-has-been-doing-farming-for-5-years Thu, 22 Feb 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/famous-actor-rajesh-kumar-has-been-doing-farming-for-5-years

आपने ये तो बहुत बार सुना और पढ़ा होगा कि किसी ने अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर खेती किसानी शुरू की। लेकिन, क्या आपने सुना है, कि कोई टीवी एक्टर अपने ग्लेमर के पीक पर पहुंचकर खेती किसानी का रुख करे। जी हाँ, आज हम आपको एक ऐसे ही मशहूर एक्टर की कहानी सुनाऐंगें, जिसने कि अपने कामयाब एक्टिंग करियर को छोड़कर किसान बनने का फैसला लिया। उन्होंने खुद इसके पीछे की वजह का चौंकाने वाला खुलासा किया है। 

एक्टिंग को ग्लैमर की दुनिया भी कहा जाता है और अगर कोई इस दुनिया में रच-बस जाए तो उसका इससे बाहर निकलना काफी कठिन हो जाता है। लेकिन एक एक्टर ऐसा भी है, जिसने एक्टिंग में एक कामयाब करियर होने के बावजूद इस दुनिया को अलविदा कह दिया और किसान बनकर खेती करने लगा। इस एक्टर ने पांच सालों तक गांव में रहकर खेती की और फसल उगाई।

ग्लैमर की दुनिया से खेती का रुख 

ग्लैमर की दुनिया छोड़ किसान बनने वाले इस एक्टर का नाम राजेश कुमार है। राजेश ने 'साराभाई वर्सेज साराभाई' में रोसेश बनकर खूब नाम कमाया। इसके अलावा वे 'यम किसी से कम नहीं', 'नीली छतरी वाले', 'ये मेरी फैमिली' जैसे शो में दिखाई दिए और अब हाल ही में रिलीज हुई फिल्म तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया में दिखाई दिए हैं। लेकिन इससे पहले राजेश 5 सालों तक बिहार में खेती करते रहे।

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मैं अगली पीढ़ी के लिए क्या कर रहा हूं?

मीडिया एजेंसी को दिए एक इंटरव्यू में राजेश ने कहा- '2017 में, टीवी पर मैं अपने एक्टिंग करियर की ऊंचाईयों पर था, जब मैंने खेती करने का फैसला किया। जब मैं टीवी करने का पूरा लुत्फ उठा रहा था, तो मेरा दिल मुझसे लगातार पूछ रहा था कि एंटरटेनमेंट के कुछ टेप छोड़ने के अलावा, मैं अगली पीढ़ी के लिए क्या कर रहा हूं?'

राजेश ने किस वजह से एक्टिंग से ब्रेक लिया ?

ग्लैमर की दुनिया छोड़ किसान का पेशा अपनाने के बारे में पूछने पर राजेश ने कहा, 'मैं समाज में योगदान देने के लिए कुछ खास या एक्स्ट्रा नहीं कर रहा था। मेरे बच्चे मुझे कैसे याद रखेंगे? एक्टिंग आपने अपने लिए की, अपनी सेफ्टी के लिए की, अपनी कमाई के लिए की। मैंने मन में सोचा कि मैं अपने पीछे कोई कदमों के निशान कैसे छोड़ूंगा? तभी मैं अपने होम टाउन वापस गया और फसलें उगाईं।'

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खेती करने के दौरान कई चुनौतियों का सामना किया 

राजेश कुमार ने आगे कहा कि जब पांच साल तक वे खेती करते रहे तो कई आउटलेट्स ने कहा कि उन्होंने किसान बनने के लिए एक्टिंग छोड़ दी या फिर उनके पास पैसे नहीं थे। हालांकि, उन्होंने इस दौरान कई चुनौतियों का सामना किया और अपनी एजुकेशन के बलबूते सभी मुश्किलों से बाहर आ पाए। 

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करेले बोने की इस शानदार विधि से किसान कर रहा लाखों का मुनाफा https://www.merikheti.com/blog/sowing-bitter-gourd-is-making-farmers-rich-and-profits-worth-lakhs-through-this-wonderful-method Thu, 22 Feb 2024 00:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/sowing-bitter-gourd-is-making-farmers-rich-and-profits-worth-lakhs-through-this-wonderful-method

आजकल हर क्षेत्र में काफी आधुनिकीकरण देखने को मिला है। किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए करेला की खेती बेहद शानदार सिद्ध हो सकती है। दरअसल, जो करेला की खेती से प्रतिवर्ष 20 से 25 लाख रुपये की शानदार आमदनी कर रहे हैं। हम जिस सफल किसान की हम बात कर रहे हैं, वह उत्तर प्रदेश के कानुपर जनपद के सरसौल ब्लॉक के महुआ गांव के युवा किसान जितेंद्र सिंह है। यह पिछले 4 वर्षों से अपने खेत में करेले की उन्नत किस्मों की खेती (Cultivation of Varieties of bitter gourd) करते चले आ रहे हैं।

किसान जितेंद्र सिंह के अनुसार, पहले इनके इलाके के कृषक आवारा और जंगली जानवरों की वजह से अपनी फसलों की सुरक्षा व बचाव नहीं कर पाते हैं। क्योंकि, किसान अपने खेत में जिस भी फसलों की खेती करते थे, जानवर उन्हें चट कर जाते थे। ऐसे में युवा किसान जिंतेद्र सिंह ने अपने खेत में करेले की खेती करने के विषय में सोचा। क्योंकि, करेला खाने में काफी कड़वा होता है, जिसके कारण जानवर इसे नहीं खाते हैं।

करेला की खेती से संबंधित कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं ?  

किसानों के लिए करेला की खेती (Bitter Gourd Cultivation) से अच्छा मुनाफा पाने के लिए इसकी खेती जायद और खरीफ सीजन में करें। साथ ही, इसकी खेती के लिए बलुई दोमट या दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है।

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किसान करेले की बुवाई (Sowing of Bitter Gourd) को दो सुगम तरीकों से कर सकते हैं। एक तो सीधे बीज के माध्यम से और दूसरा नर्सरी विधि के माध्यम से किसान करेले की बिजाई कर सकते हैं। अगर आप करेले की खेती (Karele ki kheti) नदियों के किनारे वाले जमीन के हिस्से पर करते हैं, तो आप करेल की अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

करेले की उन्नत किस्में इस प्रकार हैं ?

करेले की खेती से शानदार उपज हांसिल करने के लिए कृषकों को करेले की उन्नत किस्मों (Varieties of Bitter Gourd) को खेत में रोपना चाहिए। वैसे तो बाजार में करेले की विभिन्न किस्में उपलब्ध हैं। परंतु, आज हम कुछ विशेष किस्मों के बारे में बताऐंगे, जैसे कि- हिसार सलेक्शन, कोयम्बटूर लौंग, अर्का हरित, पूसा हाइब्रिड-2, पूसा औषधि, पूसा दो मौसमी, पंजाब करेला-1, पंजाब-14, सोलन हरा और सोलन सफ़ेद, प्रिया को-1, एस डी यू- 1, कल्याणपुर सोना, पूसा शंकर-1, कल्याणपुर बारहमासी, काशी सुफल, काशी उर्वशी पूसा विशेष आदि करेला की उन्नत किस्में हैं। 

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किसान किस विधि से करेले की खेती कर रहा है ?

युवा किसान जितेंद्र सिंह अपने खेत में करेले की खेती ‘मचान विधि’ (Scaffolding Method) से करते हैं। इससे उन्हें काफी अधिक उत्पादन मिलती है। करेले के पौधे को मचान बनाकर उस पर चढ़ा देते हैं, जिससे बेल निरंतर विकास करती जाती है और मचान के तारों पर फैल जाती है। उन्होंने बताया कि उन्होंने खेत में मचान बनाने के लिए तार और लकड़ी अथवा बांस का इस्तेमाल किया जाता है। यह मचान काफी ऊंचा होता है। तुड़ाई के दौरान इसमें से बड़ी ही सुगमता से गुजरा जा सकता है। करेले की बेलें जितनी अधिक फैलती हैं उससे उतनी ही अधिक उपज हांसिल होती है। वे बीघा भर जमीन से से ही 50 क्विंटल तक उत्पादन उठा लेते हैं। उनका कहना है, कि मचान बनाने से न तो करेले के पौधे में गलन लगती है और ना ही बेलों को क्षति पहुँचती है।

करेले की खेती से कितनी आय की जा सकती है ?

करेले की खेती से काफी शानदार उत्पादन करने के लिए किसान को इसकी उन्नत किस्मों की खेती करनी चाहिए। जैसे कि उपरोक्त में बताया गया है, कि युवा किसान जितेंद्र सिंह पहले अपने खेत में कद्दू, लौकी और मिर्ची की खेती किया करते थे, जिसे निराश्रित पशु ज्यादा क्षति पहुंचाते थे। इसलिए उन्होंने करेले की खेती करने का निर्णय लिया है। वहीं, आज के समय में किसान जितेंद्र 15 एकड़ में करेले की खेती कर रहे हैं और शानदार मुनाफा उठा रहे हैं। जितेंद्र के मुताबिक, उनका करेला सामान्य तौर पर 20 से 25 रुपये किलो के भाव पर आसानी से बिक जाता है। साथ ही, बहुत बार करेला 30 रुपये किलो के हिसाब से भी बिक जाता है। अधिकांश व्यापारी खेत से ही करेला खरीदकर ले जाते हैं। 

उन्होंने यह भी बताया कि एक एकड़ खेत में बीज, उर्वरक, मचान तैयार करने के साथ-साथ अन्य कार्यों में 40 हजार रुपये की लागत आती है। वहीं, इससे उन्हें 1.5 लाख रूपये की आमदनी सरलता से हो जाती है। जितेंद्र सिंह तकरीबन 15 एकड़ में खेती करते हैं। ऐसे में यदि हिसाब-किताब लगाया जाए, तो वह एक सीजन में करेले की खेती से तकरीबन 15-20 लाख रुपये की आय कर लेते हैं। 

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किसान आंदोलन: क्या है एम.एस स्वामीनाथन का C2+50% फॉर्मूला ? https://www.merikheti.com/blog/farmers-protest-what-is-ms-swaminathan-c2-plus-50-percent-formula Wed, 21 Feb 2024 12:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/farmers-protest-what-is-ms-swaminathan-c2-plus-50-percent-formula

भारत सरकार ने हाल ही में महान कृषि वैज्ञानिक एम.एस स्वामीनाथन को मरणोपरांत किसानों के लिए दिए गए योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया है। आज फसलों के लिए MSP कानून की मांग कर रहे किसान एम.एस स्वामीनाथन के C2+50% फॉर्मूले के अंतर्गत एमएसपी की धनराशि का भुगतान करने की मांग कर रहे हैं।

देशभर के किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी का कानून बनाने सहित 12 मांगों के समर्थन में दिल्ली कूच कर रहे हैं। किसानों के लिए कई जगह सीमाओं को सील कर दिया गया है। यह पहली बार नहीं है, कि किसान सड़कों पर उतरें हैं। किसान हमेशा से अपनी मांगों को आंदोलन के माध्यम से उठाते आ रहे हैं। किसान एम एस स्वामीनाथन आयोग की एमएसपी पर की गई सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। चलिए जानते हैं, स्वामीनाथन आयोग और उसकी सिफारिशों के बारे में। 

नवंबर 2004 में 'नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स' एक आयोग बना था  

किसानों की समस्याओं के अध्ययन के लिए नवंबर 2004 में मशहूर कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया था। इसे 'नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स' कहा गया था। दिसंबर 2004 से अक्टूबर 2006 तक इस कमेटी ने सरकार को छह रिपोर्ट सौंपी। इनमें कई सिफारिशें की गई थीं।

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स्वामीनाथन आयोग ने अपनी सिफारिश में किसानों की आय बढ़ाने के लिए उन्हें उनकी फसल लागत का 50 फीसदी ज्यादा देने की सिफारिश की थी। इसे C2+50% फॉर्मूला कहा जाता है। आंदोलनकारी किसान इसी फार्मूले के आधार पर MSP गारंटी कानून लागू करने की मांग कर रहे हैं।

स्वामीनाथन का C2+50% फॉर्मूला क्या है ?

मालूम हो कि स्वामीनाथन आयोग ने इस फार्मूले की गणना करने के लिए फसल लागत को तीन हिस्सों यानी A2, A2+FL और C2 में बांटा था। A2 लागत में फसल का उत्पादन करने में सभी नकदी खर्चे को शामिल किया जाता है। इसमें खाद, बीज, पानी, रसायन से लेकर मजदूरी इत्यादि सभी लागत को जोड़ा जाता है। 

A2+FL कैटगरी में कुल फसल लागत के साथ-साथ किसान परिवार की मेहनत की अनुमानित लागत को भी जोड़ा जाता है। जबकि C2 में नकदी और गैर नकदी लागत के अलावा जमीन का लीज रेंट और उससे जुड़ी चीजों पर लगने वाले ब्याज को भी शामिल किया जाता है। स्वामीनाथन आयोग ने C2 की लागत को डेढ़ गुना यानी C2 लागत के साथ उसका 50 फीसदी खर्च जोड़कर एमएसपी देने की सिफारिश की थी। अब किसान इसी फॉर्मूले के अंतर्गत उन्हें एमएसपी देने की मांग कर रहे हैं। हालांकि, सरकार और किसानों के बीच फिलहाल इस मुद्दे का कोई हल निकलता नहीं दिख रहा है। 

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अप्रैल माह के कृषि सम्बन्धी आवश्यक कार्य https://www.merikheti.com/blog/important-agricultural-related-work-in-the-month-of-april Wed, 21 Feb 2024 06:30:00 GMT https://www.merikheti.com/blog/important-agricultural-related-work-in-the-month-of-april

अप्रैल माह में ज्यादातर कार्य फसल की कटाई से सम्बंधित होते है। इस माह में किसान रबी फसलों की कटाई कर दूसरी फसलों की बुवाई करते है। इस माह में कृषि से सम्बंधित किये जाने वाले आवश्यक कार्य कुछ इस प्रकार है। 

रबी फसलों की कटाई 

गेहूँ, मटर, चना, जौ और मसूर आदि की फसल की कटाई का कार्य इस माह में ही किया जाता है। इन फसलों की कटाई सही समय पर होना बेहद जरूरी है। यदि फसल की कटाई सही समय पर नहीं होती है, तो फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता पर काफी बुरा प्रभाव पड़ेगा। देर से कटाई करने पर फलियाँ और बालियाँ टूटकर गिरने लगती है। इसके अलावा चिड़ियों और चूहों के द्वारा भी इस फसल को नुक्सान पहुँचाया जा  सकता है। 

फसल की कटाई का कार्य किसान स्वयं भी कर सकता है, या फिर मशीनों द्वारा भी इसकी कटाई करवा सकते है। कुछ किसान हँसिया द्वारा फसल की कटाई करवाते है, क्योंकि इसमें भूसे और दाने का बहुत कम नुक्सान होता है। कंबाइन द्वारा फसल की कटाई आसान होती है, और इसमें हँसिया के मुकाबले बहुत ही कम समय लगता है, और धन की भी बचत होती है। 

कंबाइन से कटाई करने के लिए फसल में 20 % नमी होना जरूरी है। यदि फसल की कटाई दरांती आदि से की जा रही है तो फसल को अच्छे से सुखा ले, उसके बाद कटाई प्रारम्भ करें। फसल को लम्बे समय तक खेत में एकट्ठा करके न रखें। फसल को शीघ्र ही थ्रेसर आदि से निकलवा लें। 

हरी खाद के लिए फसलों की बुवाई 

अप्रैल माह में किसानों द्वारा भूमि की उपजाऊ क्षमता को बढ़ाने के लिए हरी खाद वाली फसलों की बुवाई की जाती है। हरी खाद की फसलों में ढेंचा को भी शामिल किया जाता है। ढेंचा की बुवाई का कार्य अप्रैल माह के अंत तक कर देना चाहिए। ढेंचा की खेती से मिट्टी में पोषक तत्वों की उपस्तिथी बनी रहती है। 

ये भी पढ़ें: हरी खाद मृदा व किसान को देगी जीवनदान

चना और सरसों की कटाई 

अप्रैल के महीने में सरसों, आलू और चना की कटाई हो जाती है। इन सभी फसलों की कटाई के बाद किसान उसमें तुरई, खीरा, टिण्डा, करेला और ककड़ी जैसी सब्जियां भी उगा सकता है। ध्यान रखें बुवाई करते वक्त पौधे से पौधे की दूरी 50 सेंटीमीटर से 100 सेंटीमीटर के बीच में रखें। यदि इन सभी सब्जियों की बुवाई कर दी गई हो, तो सिंचाई का विशेष रूप से ध्यान रखें। फसल के अधिक उत्पादन के लिए हाइड्रोजाइड और ट्राई आयोडो बेन्जोइक एसिड को पानी में मिलाकर छिड़काव करें। 

मूली और अदरक की बुवाई 

रबी फसलों की कटाई के बाद इस माह में मूली और अदरक की बुवाई की जाती है। मूली की आर आर डब्ल्यू और पूसा चेतकी किस्म इस माह में उगाई जा सकती है। अदरक की बुवाई करने से पहले बीज उपचार कर लें।  बीज उपचार के लिए बाविस्टीन नामक दवा का उपयोग करें। 

ये भी पढ़ें: इस प्रकार से अदरक की खेती करने पर होगा जबरदस्त मुनाफा

टमाटर की फसल में लगने वाला कीट 

टमाटर की बुवाई का कार्य अप्रैल माह से पहले ही कर दिया जाता है। अप्रैल माह में टमाटर की फसल को फल छेदक रोगों से बचाने के लिए मैलाथियान रासायनिक दवा को 1 मिली पानी में मिला कर छिड़काव कर दें। लेकिन छिड़काव करने से पहले पके फलों को तोड़ लें। छिड़काव करने के बाद फलों की 3 - 4 दिनों तक तुड़ाई न करें। 

भिन्डी की फसल 

वैसे तो भिन्डी के पौधो में ग्रीष्मकालीन से ही फल लगने शुरू हो जाते है। नरम और कच्चे फलों को उपयोग के लिए तोड़ लिया जाता है। भिन्डी में लगने वाले फलों को 3-4 दिन के अंतराल पर तोड़ लेना चाहिए। यदि फलो की देरी से तुड़ाई होती है, तो फल कड़वे और कठोर रेशेदार हो जाते है। 

कई बार भिन्डी के पौधे की पत्तियां पीली पड़ने लगती है, और फलों का आकर भी छोटा हो जाता है। भिन्डी की फसल में यह रोग पीला मोजेक विषाणु द्वारा होता है। इस रोग से फसल को बचाने के लिए रोग ग्रस्त पौधो को उखाड़कर फेक दें या फिर रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग कर इस फसल को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। 

प्याज और लहसुन की खुदाई 

अप्रैल माह में प्याज और लहसुन की खुदाई शुरू कर दी जाती है। प्याज और लहसुन की खुदाई करने से 15 -20 दिन पहले ही सिंचाई का काम बंद कर देना चाहिए। जब पौधा अच्छे से सूख जाए तभी उसकी खुदाई करें। पौधा सूखा है या नहीं इसकी पहचान किसान पौधे के सिरे को तोड़कर कर सकता है। 

ये भी पढ़ें: भोपाल में किसान है परेशान, नहीं मिल रहे हैं प्याज और लहसुन के उचित दाम

शिमला मिर्च की देख रेख 

शिमला मिर्च की फसल में 8 -10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। फसल में खरपतवार को कम करने के लिए  निराई और गुड़ाई का काम भी करते रहना चाहिए। शिमला मिर्च की खेती को कीटों के प्रकोप से बचाने के लिए रोगेर 30 ई सी को पानी में मिलाकर छिड़काव करें। कीट का ज्यादा प्रकोप होने पर 10 -15 दिन के अंतराल पर फिर से छिड़काव कर सकते है। 

बैंगन की फसल 

बैंगन की फसल में निरंतर निगरानी रखे, बैंगन की फसल में तना और फल छेदक कीटों की ज्यादा संभावनाएं रहती है। इसीलिए फसल को कीटों से बचाने के लिए कीटनाशक दवाइयों का उपयोग करें।

कटहल की फसल 

गलन जैसे रोगों की वजह से कटहल की खेती खराब हो सकती है। इसकी रोकथाम के लिए जिंक कार्बामेट के घोल का छिड़काव करें। 

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पूसा कृषि विज्ञान मेला किसानों के

पूसा कृषि विज्ञान मेला किसानों के "दिल्ली चलो मार्च" के चलते हुआ स्थगित

भारत कृषि से संबंधित तकनीकी नवाचारों और सबसे नवीन खेती प्रणालियों का प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली में 28 फरवरी से 1 मार्च, 2024 तक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का पूसा कृषि विज्ञान मेले का आयोजन होने जा रहा था।  जो कि "दिल्ली चलो मार्च" के चलते कुछ कारणों की वजह से स्थगित कर दिया गया है। यह मेला न केवल किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म प्रदान करता है, बल्कि आगामी समय की खेती के लिए नए दिशा-निर्देश प्रदान करेगा। पूसा का वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने कहा है, कि जैसे ही मेला की तिथि सुनिश्चित होगी, तुरंत किसानों को...
सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों के लिए इसरो (ISRO) ने उठाया महत्वपूर्ण कदम

सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों के लिए इसरो (ISRO) ने उठाया महत्वपूर्ण कदम

सूखाग्रस्त इलाकों के किसान भाइयों के लिए एक अच्छी खबर है। दरअसल, नीति आयोग ने भारतभर में कृषि वानिकी को प्रोत्साहन देने के लिए इसरो उपग्रहों के डेटा का उपयोग करके एक नया भुवन-आधारित पोर्टल जारी किया है। इसरो के अनुसार, यह पोर्टल कृषि वानिकी के लिए अनुकूल जमीन की पहचान करने वाले जिला-स्तरीय डेटा तक सार्वभौमिक पहुंच की स्वीकृति देता है। प्रारंभिक आकलनों में मध्य प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान कृषि वानिकी उपयुक्तता के लिए सबसे बड़े राज्यों के तौर पर उभरे हैं।भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने नीति आयोग के साथ मिलकर भारत के बंजर क्षेत्रों में हरियाली की...
जलवायु परिवर्तन किस प्रकार से कृषि को प्रभावित करता है ?

जलवायु परिवर्तन किस प्रकार से कृषि को प्रभावित करता है ?

आजकल जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक मुद्दा बनकर सामने आ रहा है। जलवायु परिवर्तन किसी देश विशेष या राष्ट्र से संबंधित अवधारणा नहीं है। जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक अवधारणा है, जो समस्त पृथ्वी के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। जलवायु परिवर्तन से भारत समेत संपूर्ण विश्व में बाढ़, सूखा, कृषि संकट एवं खाद्य सुरक्षा, बीमारियां, प्रवासन आदि का खतरा बढ़ा है। परंतु, भारत का एक बड़ा तबका (लगभग 60 प्रतिशत आबादी) आज भी कृषि पर निर्भर है, और इसके प्रभाव के प्रति सहज है। इसलिए कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।सर्वेक्षण...
पीएम किसान सम्मान निधि की 16 वीं किस्त इस तारीख को किसानों के खाते में पहुंचेगी

पीएम किसान सम्मान निधि की 16 वीं किस्त इस तारीख को किसानों के खाते में पहुंचेगी

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से संबंधित लाखों कृषकों के लिए खुशी का समाचार है। पीएम किसान योजना की 16 वीं किस्त की तारीख जारी हो गई है। किसानों को इसी माह योजना की 16वीं किस्त जारी कर दी जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस माह के आखिर में लाखों कृषकों के खाते में पीएम किसान योजना के 2000 रुपये हस्तांतरित करेंगे। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि पीएम किसान की आधिकारिक वेबसाइट पर आगामी किस्त की तारीख जारी हो गई है। आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, 28 फरवरी, 2024 को किसानों के खाते में पीएम किसान योजना का पैसा जारी कर दिया...
मौसम विभाग ने मार्च माह में गेहूं और सरसों की फसल के लिए सलाह जारी की है

मौसम विभाग ने मार्च माह में गेहूं और सरसों की फसल के लिए सलाह जारी की है

गेहूँ की फसल के लिए एडवाइजरीकिसानों को सलाह दी जाती है कि वे आगे बारिश के पूर्वानुमान के कारण खेतों में सिंचाई न करें/उर्वरक न डालें।उन्हें सलाह दी जाती है कि वे अपने खेत पर नियमित निगरानी रखें क्योंकि यह मौसम गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोगविकास के लिए अनुकूल है।किसानों को सलाह दी जाती है कि वे खेतों में सिंचाई न करें/उर्वरक न डालें। आगे बारिश के पूर्वानुमान के कारण अन्य कृषि संबंधी अभ्यास करें।पीली रतुआ की उपस्थिति के लिए गेहूं की फसल का नियमित सर्वेक्षण करें।नए लगाए गए और छोटे पौधों के ऊपर बाजरा या ईख...
ग्लैमर की चकाचौंध को छोड़ 5 साल से खेती कर रहे मशहूर एक्टर की दिलचस्प कहानी

ग्लैमर की चकाचौंध को छोड़ 5 साल से खेती कर रहे मशहूर एक्टर की दिलचस्प कहानी

आपने ये तो बहुत बार सुना और पढ़ा होगा कि किसी ने अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर खेती किसानी शुरू की। लेकिन, क्या आपने सुना है, कि कोई टीवी एक्टर अपने ग्लेमर के पीक पर पहुंचकर खेती किसानी का रुख करे। जी हाँ, आज हम आपको एक ऐसे ही मशहूर एक्टर की कहानी सुनाऐंगें, जिसने कि अपने कामयाब एक्टिंग करियर को छोड़कर किसान बनने का फैसला लिया। उन्होंने खुद इसके पीछे की वजह का चौंकाने वाला खुलासा किया है। एक्टिंग को ग्लैमर की दुनिया भी कहा जाता है और अगर कोई इस दुनिया में रच-बस जाए तो उसका इससे बाहर निकलना काफी...