खजूर की खेती भारत में अब केवल सीमित क्षेत्रों तक ही नहीं रह गई है, बल्कि यह धीरे-धीरे किसानों के लिए एक लाभकारी और टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रही है। खजूर एक ऐसा फल है जिसकी मांग देश और विदेश दोनों बाजारों में लगातार बढ़ रही है। स्वाद के साथ-साथ इसके औषधीय और पोषण संबंधी गुण इसे खास बनाते हैं। खजूर में प्राकृतिक शर्करा, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, पोटेशियम, मैग्नीशियम और आयरन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ हृदय, मस्तिष्क और हड्डियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं। यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से खेती करें, उपयुक्त मिट्टी और जलवायु का चयन करें और आधुनिक तकनीकों को अपनाएं, तो खजूर की खेती कम लागत में लंबे समय तक स्थिर और अच्छी आमदनी देने वाली फसल साबित हो सकती है।
खजूर के पौधों के अच्छे विकास और अधिक उत्पादन के लिए मिट्टी का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस फसल के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि इसमें जल निकास की व्यवस्था बेहतर होती है। खेत की मिट्टी का pH स्तर 7 से 8 के बीच होना चाहिए, जिससे पौधों की जड़ें मजबूत बनती हैं और पोषक तत्वों का अवशोषण सही ढंग से होता है।
खेत की तैयारी के समय रासायनिक उर्वरकों की बजाय गोबर की खाद और अन्य जैविक खादों का प्रयोग करना अधिक लाभकारी रहता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और पौधों की बढ़वार प्राकृतिक रूप से बेहतर होती है। अच्छी तैयारी वाले खेत में खजूर के पौधे जल्दी स्थापित हो जाते हैं और समय से पहले फल देना शुरू कर देते हैं।
आज के समय में खजूर की खेती (Palm farming) में टिश्यू कल्चर तकनीक किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। पारंपरिक पौधों की तुलना में टिश्यू कल्चर से तैयार पौधे अधिक समान, रोग-मुक्त और तेज़ी से बढ़ने वाले होते हैं। सामान्यतः खजूर के पौधे 4 साल में फल देना शुरू करते हैं, लेकिन टिश्यू कल्चर तकनीक अपनाने पर यही पौधे लगभग 3 साल में ही उत्पादन देने लगते हैं।
इससे किसानों को अपने निवेश की भरपाई जल्दी हो जाती है और उन्हें कम समय में लाभ मिलना शुरू हो जाता है। यही कारण है कि अब अधिकतर प्रगतिशील किसान इस आधुनिक तकनीक की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
सही देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ खजूर का पेड़ कई दशकों तक फल देता है। शुरुआती वर्षों में उत्पादन थोड़ा कम होता है, लेकिन जैसे-जैसे पेड़ परिपक्व होता है, पैदावार में निरंतर वृद्धि होती जाती है। पहले 8–10 वर्षों में एक पेड़ से औसतन 70–80 किलो खजूर प्राप्त किया जा सकता है। 15 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते एक पेड़ से 100 से 200 किलो तक फल उत्पादन संभव हो जाता है। इस तरह खजूर की खेती एक दीर्घकालिक निवेश है, जिसमें समय के साथ-साथ उत्पादन और मुनाफा दोनों बढ़ते जाते हैं।
भारत के कई हिस्सों में खजूर की खेती सफलतापूर्वक की जा रही है, खासकर शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में। गुजरात खजूर उत्पादन में देश का अग्रणी राज्य है, जहां कच्छ जिले की खजूर को GI टैग भी प्राप्त है। राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर और चूरू जैसे जिलों में खजूर की खेती बड़े पैमाने पर हो रही है। पंजाब और हरियाणा में भी अब किसान इस फसल को अपनाकर अच्छी आमदनी कमा रहे हैं। इसके अलावा तमिलनाडु, महाराष्ट्र के सोलापुर क्षेत्र और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में भी खजूर की खेती से किसानों को बेहतरीन परिणाम मिल रहे हैं।
खजूर की खेती (khajur ki kheti) किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की पूरी क्षमता रखती है। एक परिपक्व खजूर का पेड़ सालाना लगभग 20,000 से 50,000 रुपये तक की आमदनी दे सकता है, जो बाजार भाव और गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
यदि एक एकड़ भूमि में लगभग 70 खजूर के पेड़ लगाए जाएं, तो किसान सालाना 6 लाख से 12 लाख रुपये तक की कमाई कर सकते हैं। कम रख-रखाव, लंबी उत्पादन अवधि और बढ़ती बाजार मांग के कारण खजूर की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसल बनती जा रही है।
खजूर की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि यह स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी फसल है। सही मिट्टी, अनुकूल जलवायु, टिश्यू कल्चर तकनीक और जैविक खादों के प्रयोग से किसान कम समय में अधिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। देश के विभिन्न राज्यों में बढ़ती मांग को देखते हुए यह फसल आने वाले समय में किसानों के लिए स्थायी और सुरक्षित आय का मजबूत माध्यम बन सकती है।
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