बदलते मौसम और बढ़ते तापमान ने पिछले कुछ वर्षों में देशभर में गेहूं उत्पादन को गहराई से प्रभावित किया है। लगातार बढ़ती गर्मी के कारण किसानों को न केवल पैदावार में कमी का सामना करना पड़ता है, बल्कि गुणवत्ता पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (CCSHAU), हिसार के वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आए हैं। विश्वविद्यालय के गेहूं एवं जौ अनुभाग के वैज्ञानिकों ने एक नई पछेती गेहूं किस्म “WH 1309” विकसित की है, जो न केवल अधिक पैदावार देने में सक्षम है बल्कि गर्मी के प्रति अत्यधिक सहनशील भी है। यह किस्म हरियाणा राज्य बीज उप-समिति द्वारा अनुशंसित की जा चुकी है और आने वाले वर्षों में किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
देशभर में गेहूं की उत्पादकता और गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए कृषि वैज्ञानिक लगातार शोध और सुधार के प्रयास कर रहे हैं। WH 1309 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह किस्म विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है जहां धान की कटाई देर से होती है या खेतों में नमी अधिक रहती है, जिसके कारण गेहूं की बुवाई समय पर नहीं हो पाती। ऐसे किसान जो दिसंबर के अंत या जनवरी की शुरुआत में बुवाई करते हैं, उनके लिए यह किस्म अत्यंत उपयोगी है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बी.आर. काम्बोज के अनुसार, हरियाणा में लगभग 15 से 20 प्रतिशत क्षेत्र में गेहूं की बिजाई में देर होती है, और इन परिस्थितियों में WH 1309 किसानों के लिए “गेम चेंजर” साबित हो सकती है। इसकी खासियत यह है कि देरी से बोने पर भी यह किस्म उच्च उत्पादन क्षमता बनाए रखती है और अन्य सामान्य किस्मों की तुलना में अधिक अनुकूल परिणाम देती है।
मार्च महीने में जब तापमान अचानक बढ़ने लगता है, तो पारंपरिक गेहूं की किस्मों में अनाज भरने की प्रक्रिया पर विपरीत असर पड़ता है। परिणामस्वरूप उत्पादन घट जाता है और किसानों को नुकसान झेलना पड़ता है। WH 1309 किस्म को इस समस्या को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है। इसमें उच्च आनुवंशिक ऊष्मा सहनशीलता (Genetic Heat Tolerance) है, जिससे यह बढ़े हुए तापमान में भी स्थिर उपज बनाए रखती है। यही कारण है कि इसे “भविष्य की फसल” कहा जा सकता है, जो आने वाले वर्षों में बदलते जलवायु परिदृश्य में किसानों की सुरक्षा कवच बनेगी।
विश्वविद्यालय द्वारा किए गए फील्ड ट्रायल में WH 1309 ने अपनी क्षमता का शानदार प्रदर्शन किया है। सिंचित परिस्थितियों में इस किस्म ने औसतन 55.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज दी, जबकि अधिकतम उपज 64.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंची। हरियाणा के विभिन्न जिलों में किए गए परीक्षणों में इस किस्म की औसत उपज 54.3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रही, जो प्रसिद्ध किस्म WH 1124 से करीब 12.7 प्रतिशत अधिक है।
यह किस्म जनवरी के पहले सप्ताह तक बोई जा सकती है और उस स्थिति में भी किसान 40 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक की पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। इसके दाने बड़े, भरपूर, चमकदार और समान आकार के होते हैं, जिससे बाजार में इसका भाव अन्य किस्मों से बेहतर मिलता है। उच्च गुणवत्ता के कारण यह गेहूं न केवल घरेलू उपभोग बल्कि निर्यात के लिए भी उपयुक्त है।
WH 1309 की एक और बड़ी विशेषता यह है कि यह किस्म पीले और भूरे रतुएं (Rust Diseases) जैसे आम रोगों के प्रति प्रतिरोधक है। इससे किसानों को फफूंदी-नाशक दवाओं पर कम खर्च करना पड़ता है और फसल सुरक्षित रहती है। इसके अलावा यह किस्म लवणीय मिट्टी और हल्के जलभराव वाले क्षेत्रों में भी अच्छी तरह विकसित हो जाती है।
इस किस्म को जैविक खेती के लिए भी उपयुक्त माना गया है क्योंकि इसे कम रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक की आवश्यकता होती है। इससे किसानों की खेती लागत घटती है, और उपज की गुणवत्ता भी प्राकृतिक रहती है — जो आज के उपभोक्ताओं की मांग के अनुरूप है।
अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग के अनुसार, WH 1309 की बिजाई का आदर्श समय 1 दिसंबर से 20 दिसंबर तक है। सही समय पर बुवाई करने से फसल अधिक मजबूत होती है और उत्पादन अधिक मिलता है।
बीज दर: 125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
उर्वरक अनुशंसा (प्रति हेक्टेयर):
इन सिफारिशों का पालन कर किसान न केवल उपज बढ़ा सकते हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता को भी संतुलित रख सकते हैं।
कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. एस.के. पाहुजा के अनुसार, WH 1309 किस्म कई दृष्टि से अन्य गेहूं किस्मों से अलग और श्रेष्ठ है। इसमें बालियाँ लगभग 83 दिनों में निकल आती हैं और फसल करीब 123 दिनों में पूरी तरह पक जाती है, जिससे किसान अगले सीजन के लिए समय पर खेत तैयार कर सकते हैं।
यह गेहूं पौष्टिकता और स्वाद दोनों में बेहतरीन है, जिससे यह चपाती, बेकरी उत्पाद और अन्य आटे के उत्पादों के लिए अत्यंत उपयुक्त साबित होता है।
WH 1309 किस्म के विकास में विश्वविद्यालय के अनेक वैज्ञानिकों का योगदान रहा है, जिनके अथक परिश्रम से यह सफल परिणाम प्राप्त हुआ। इस शोध टीम में प्रमुख रूप से शामिल हैं –
डॉ. विक्रम सिंह, एम.एस. दलाल, ओ.पी. बिश्नोई, दिव्या फोगाट, योगेंद्र कुमार, हर्ष सोमवीर, वाई.पी.एस. सोलंकी, राकेश कुमार, गजराज दहिया, आर.एस. बेनीवाल, भगत सिंह, रेणु मुंजाल, प्रियंका, पवन कुमार और शिखा।
इन वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयासों ने हरियाणा के किसानों के लिए एक ऐसी किस्म विकसित की है जो उच्च उपज, बेहतर गुणवत्ता और टिकाऊ खेती की दिशा में नई उम्मीद जगाती है।
WH 1309 गेहूं किस्म किसानों के लिए एक आधुनिक, टिकाऊ और लाभदायक विकल्प है। यह फसल न केवल बदलते जलवायु की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है, बल्कि किसानों को अधिक उपज और बेहतर मुनाफा भी प्रदान करती है। इसकी रोग प्रतिरोधकता, गुणवत्ता, और गर्मी सहनशीलता इसे अन्य किस्मों से अलग बनाती है।
ऐसे नवाचार और वैज्ञानिक शोध भारतीय कृषि को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। WH 1309 जैसी किस्में यह प्रमाण हैं कि यदि विज्ञान और परिश्रम का सही मेल हो, तो बदलते मौसम में भी किसान समृद्धि की नई कहानी लिख सकते हैं।
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