मानसून का मौसम कृषि के लिए जितना लाभदायक माना जाता है, पशुपालकों के लिए उतना ही संवेदनशील समय भी होता है। लगातार बारिश, अधिक नमी, तापमान में उतार-चढ़ाव और गंदगी के कारण गाय-भैंसों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस मौसम में पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है, जिससे वे विभिन्न संक्रामक और पाचन संबंधी बीमारियों की चपेट में आसानी से आ सकते हैं।
इसका सीधा असर दूध उत्पादन, प्रजनन क्षमता और पशुपालकों की आय पर पड़ता है। यदि समय रहते पशुओं के रहने के स्थान, खानपान और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो अधिकांश समस्याओं से आसानी से बचा जा सकता है। पशुपालन विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के दौरान थोड़ी-सी सावधानी भी पशुओं को स्वस्थ रखने और डेयरी व्यवसाय को लाभदायक बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
बारिश के मौसम में खेतों में हरे चारे की उपलब्धता बढ़ जाती है, लेकिन केवल हरा चारा ही पर्याप्त नहीं होता। अधिक गीला, सड़ा-गला या फफूंद लगा चारा पशुओं के लिए नुकसानदायक हो सकता है और इससे अपच, गैस, दस्त तथा अन्य पाचन संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए हमेशा ताजा और साफ हरा चारा ही खिलाएं।
इसके साथ सूखा भूसा, संतुलित पशु आहार, दाना और आवश्यक पोषक तत्वों का समुचित मिश्रण भी देना चाहिए। दूध देने वाले पशुओं को उनकी उत्पादन क्षमता के अनुसार ऊर्जा और प्रोटीन युक्त आहार उपलब्ध कराना जरूरी है। साथ ही नियमित रूप से मिनरल मिक्सचर और नमक देने से कैल्शियम, फॉस्फोरस और अन्य आवश्यक खनिजों की कमी नहीं होती, जिससे दूध उत्पादन बेहतर बना रहता है और पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है।
मानसून में पशुशाला की साफ-सफाई सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। लगातार बारिश के कारण पशुशाला में पानी भरने, कीचड़ बनने और नमी बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसी स्थिति बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और परजीवियों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है। इसलिए पशुशाला में उचित जल निकासी की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि बारिश का पानी जमा न हो।
फर्श को नियमित रूप से साफ करें और जहां संभव हो वहां सूखा बिछावन जैसे भूसा या सूखी घास बिछाएं। पशुशाला में पर्याप्त हवा और प्राकृतिक रोशनी का प्रवेश भी जरूरी है, जिससे नमी कम रहे और दुर्गंध पैदा न हो। स्वच्छ और सूखा वातावरण पशुओं को संक्रमण से बचाने के साथ-साथ उन्हें आराम भी प्रदान करता है।
कई पशुपालक यह सोचते हैं कि बारिश के मौसम में पशुओं को पानी की आवश्यकता कम हो जाती है, जबकि यह धारणा पूरी तरह गलत है। दूध देने वाली गाय और भैंसों को प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में साफ और ताजा पानी मिलना बेहद आवश्यक है। दूषित, गंदा या बारिश का जमा हुआ पानी पिलाने से दस्त, पेट का संक्रमण, लीवर संबंधी समस्याएं और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
ऐसे संक्रमण दूध उत्पादन को भी प्रभावित करते हैं। इसलिए पानी की टंकियों, बर्तनों और नाद की नियमित सफाई करें तथा पीने का पानी हमेशा स्वच्छ रखें। यदि संभव हो तो दिन में कई बार पानी बदलें। पर्याप्त पानी मिलने से पशुओं का पाचन तंत्र बेहतर रहता है, शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है और दूध उत्पादन भी संतुलित बना रहता है।
मानसून के दौरान थनों में संक्रमण यानी मैस्टाइटिस का खतरा काफी बढ़ जाता है। गंदे और गीले वातावरण में बैक्टीरिया तेजी से फैलते हैं और दूध निकालते समय थनों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इसलिए दूध निकालने से पहले और बाद में थनों को गुनगुने पानी या साफ कपड़े से अच्छी तरह साफ करना चाहिए।
आवश्यकता होने पर स्वीकृत कीटाणुनाशक घोल का उपयोग भी किया जा सकता है। दूध निकालने वाले व्यक्ति के हाथ भी पूरी तरह साफ होने चाहिए। दुग्ध दोहन के दौरान स्वच्छ बर्तनों का उपयोग करें और दूध निकालने के बाद थनों को सूखा रखें। इससे मैस्टाइटिस की संभावना कम होती है, दूध की गुणवत्ता बेहतर रहती है और पशु लंबे समय तक स्वस्थ रहता है।
बारिश के मौसम में पशुओं में कई प्रकार की बीमारियां तेजी से फैल सकती हैं। यदि पशु अचानक चारा कम खाने लगे, सुस्त दिखाई दे, तेज बुखार हो, दस्त की समस्या हो, खुरों में घाव दिखाई दें या दूध उत्पादन अचानक कम हो जाए, तो इसे सामान्य बदलाव मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय रहते पशु चिकित्सक से संपर्क करना सबसे सही कदम होता है।
कई बार शुरुआती उपचार से गंभीर बीमारी को रोका जा सकता है और उपचार का खर्च भी कम आता है। स्वयं दवा देने की बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना अधिक सुरक्षित रहता है। नियमित स्वास्थ्य जांच और पशुओं के व्यवहार पर नजर रखने से बीमारी का पता जल्दी चल जाता है और समय पर इलाज मिलने से पशु जल्दी स्वस्थ हो जाता है।
मानसून के दौरान खुरपका-मुंहपका, गलघोटू, लंगड़ा बुखार और अन्य संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए सभी पशुओं का निर्धारित समय पर टीकाकरण कराना बेहद आवश्यक है। इसके साथ ही नियमित अंतराल पर कृमिनाशक दवा (डीवॉर्मिंग) देने से शरीर के अंदर मौजूद परजीवियों का प्रभाव कम होता है और पोषक तत्वों का सही उपयोग हो पाता है।
बाहरी परजीवियों जैसे किलनी, जूं और मक्खियों से बचाव के लिए भी आवश्यक दवाओं और स्वच्छता का सहारा लेना चाहिए। पशुशाला के आसपास मच्छरों और मक्खियों की संख्या कम रखने के लिए सफाई बनाए रखें। नियमित टीकाकरण और कृमिनाशन से पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है, जिससे उनका स्वास्थ्य और दूध उत्पादन दोनों बेहतर बने रहते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ और तनावमुक्त पशु हमेशा बेहतर उत्पादन देता है। इसलिए मानसून के दौरान गाय-भैंसों को लंबे समय तक खुले में बारिश में नहीं बांधना चाहिए। उन्हें सूखे, हवादार और सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए, जहां नमी कम हो और पर्याप्त आराम मिल सके। अत्यधिक शोर, भीड़, मच्छर और मक्खियों से भी पशुओं को बचाना आवश्यक है।
नियमित रूप से शरीर की सफाई, खुरों की देखभाल, समय पर भोजन, स्वच्छ पानी और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार प्रबंधन करने से पशु स्वस्थ रहते हैं। छोटी-छोटी सावधानियां जैसे साफ बिछावन, संतुलित आहार, नियमित टीकाकरण और बीमारी के शुरुआती लक्षणों पर तुरंत उपचार न केवल दूध उत्पादन में गिरावट को रोकते हैं, बल्कि डेयरी व्यवसाय की लाभप्रदता भी बढ़ाते हैं। मानसून के पूरे मौसम में यदि पशुपालक इन उपायों का पालन करें, तो गाय-भैंसों का स्वास्थ्य बेहतर रहेगा, उत्पादन स्थिर रहेगा और उनकी आय पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
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