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आत्मनिर्भर

राजस्थान के सीताराम सेंगवा बागवानी से कमा रहे हैं लाखों का मुनाफा

राजस्थान के सीताराम सेंगवा बागवानी से कमा रहे हैं लाखों का मुनाफा

पूरा विश्व आज जल के अभाव से प्रभावित है, किसानों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव हो रहा है। राजस्थान के ज्यादातर क्षेत्रों में जल की कमी के बावजूद भी कई किसान फसलों से अच्छी खासी पैदावार प्राप्त कर रहे हैं। इन किसानों में जोधपुर के सीताराम सेंगवा भी सम्मिलित हैं। ४२ वर्षीय सीताराम सेंगवा ने २२ की आयु से खेती शुरू कर एक बड़ी उपलब्धी हासिल की है। कृषि एवं बागवानी में नाम व धन अर्जन के बाद वो संतुष्ट हैं कि उन्होंने सरकारी नौकरी की जगह कृषि को प्राथमिकता दी है। किसान सीताराम सेंगवा खेती के लिए ड्रिपस्प्रिंकलर सिंचाई के माध्यम से बूंद-बूंद जल का उपयोग कर उम्दा किस्म के पौधे तैयार कर रहे हैं। फिलहाल उनके द्वारा नर्सरी में तैयार उम्दा पौधे पुरे देश में लगाये जा रहे हैं। उनकी इस सफलता में भाकृअनुप - केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (ICAR – Central Arid Zone Research Institute) के वैज्ञानिकों का भी सहयोग रहा है। यही कारण है कि आज कृषि में मुनाफा एवं बागवानी का नुस्खा उपयोग कर सीताराम सेंगवा २० लाख वार्षिक आय अर्जित कर रहे हैं।


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सीताराम सेंगवा राजस्थान राज्य के जोधपुर जनपद की भोपालगढ़ तहसील के पालड़ी राणावतन गांव में कृषि कार्य कर रहे हैं। सीताराम सेंगवा ने २५ बीघा खेत के साथ बेहतरीन पौधों की नर्सरी स्थापित की है। वह अपनी पत्नी, बेटों एवं बेटियों के सहयोग से आज बेहतर आजीविका के लिए अच्छा मुनाफा कर पा रहे हैं। एक वक्त वह भी था जब विघालय से शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत उनके सारे मित्र सरकारी नौकरी की तैयारी में जुट गए थे। लेकिन सन २००१ में भी सीताराम ने खेती को ही प्राथमिकता दी थी। आज सीताराम सेंगवा २२ वर्ष की आयु से खेती के सफर में सफलता हासिल कर राज्य सरकार एवं वैज्ञानिकों से विभिन्न प्रकार के सम्मान भी प्राप्त कर चुके हैं।

तरह तरह की किस्म के पौधे हैं सीताराम सेंगवा की नर्सरी में

सीताराम सेंगवा २०१८ से पूर्व केवल पारंपरिक खेती ही करते थे, लेकिन वर्ष २०१८ में काजरी की वैज्ञानिक अर्चना वर्मा के द्वारा बागवानी सम्बंधित प्रशिक्षण लेने के उपरांत नर्सरी का कार्य भी आरम्भ कर दिया था। कृषि के साथ-साथ नर्सरी प्रबंधन में वैज्ञानिक तकनीकों की सहायता से सीताराम सेंगवा ने हजारों उम्दा किस्म के पौधे तैयार किए। आज उनकी नर्सरी में चंदन के २ हजार, शीशम के ३ हजार, बेर के १० हजार, ताइवान पपीते के ५ हजार, सहजन के १० हजार, आंवला के ३ हजार, अमरूद के २५००, अनार के ३ हजार, गोभी के २० हजार, टमाटर के २० हजार, बैंगन के २० हजार, खेजड़ी के ७ हजार, गूगल धूप के १५००, करोंदा के २ हजार, नीम के २ हजार, मालाबार नीम के ५ हजार एवं नींबू के ५ हजार उम्दा किस्म के पौधे बिक्री हेतु उपलब्ध हैं। उन्नत बीजों से उत्पादित ये पौधे ही सीताराम सेंगवा के सफल होने की वजह हैं। यही वजह है कि पिछले वर्ष उन्होंने ७० से ८० हजार पौधे विक्रय किये हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा एवं राजस्थान के जालौर, सीकर,जोधपुर, बाड़मेर, बीकानेर, नागौर व बालोतरा के किसान भी बेहतरीन किस्म के पौधे खरीदने के लिए आते रहते हैं। सीताराम सेंगवा केवल उम्दा किस्म के पौधे उत्पादित करने के साथ साथ ही होम डिलीवरी की माध्यम से लेने वाले के पास भी पहुँचाते हैं।


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सीताराम सेंगवा ने स्वयं आत्मनिर्भर बन अन्य किसानों के लिए भी रोजगार का अवसर प्रदान किया

सीताराम सेंगवा कृषि एवं बागवानी के माध्यम से आत्मनिर्भर बन पाए हैं, साथ ही गांव के कई किसानों व महिलों को भी रोजगार के अवसर प्रदान कर रहे हैं। कृषि क्षेत्र में उनका यह सफर बेहद संघर्षमय एवं चुनौतीपूर्ण रहा है। खेती में सीताराम सेंगवा के सराहनीय योगदान के लिए काजरी संस्थान ने उनकी सराहना करते हुए सम्मानित किया है। विभिन्न उपलब्धियां हासिल करने के उपरांत सीताराम को गर्व है कि वह एक सफल किसान हैं। सीताराम कहते हैं कि उनके अधिकतर मित्रगण सरकारी नौकरी में कार्यरत हैं, लेकिन वे मेरे कार्य की काफी सराहना करते हैं। सीताराम के मित्रों का कहना है कि सीताराम द्वारा खेती करने का निर्णय सही व उत्तम था। साथ ही, सीताराम का भी यही मत है कि नौकरी की अपेक्षा उनके द्वारा कृषि को प्राथमिकता देना बेहतरीन निर्णय था।
आत्मनिर्भर भारत/आत्मनिर्भर किसान

आत्मनिर्भर भारत/आत्मनिर्भर किसान

आज हर कोई आत्मनिर्भर भारत की बात कर रहा है, भारत की 70%जनसंख्या गावों में निवास करती है और वहां की जो जनता है वो कृषि पर निर्भर है.गांव की जनता हमेशा से ही आत्मनिर्भर रही  है चाहे आप बात दूध की करो, सब्जी की करो, या आप फल की बात करो.पहले गावों में एक प्रचलन था की लोग अपनी फसल के बदले में दूसरे से कोई भी उत्पादित फसल का अदल बदल कर लेते थे. जैसे आपके यहां मूंग की दाल है और मेरे यहाँ उड़द की दाल है तो दोनों आपस में बदल लेते थे जिससे मेरे पास मूंग आ जाती थी और आपके पास उड़द.

गांव में आज भी लोग कुछ वस्तुओं का आदान प्रदान करते है.

सब्जी में आत्मनिर्भर:

वैसे तो किसान के पास जमीन होती है जिसमे वो सब्जी उगा लेता है लेकिन इसमें उसकी सहायता घर के बच्चे और महिलाएं भी कराती है, जब किसान अपने भूसा को बुर्जी में भर देता है तो बारिश का समय होने पर घर की महिलाएं कद्दू ,काशीफल और परमल के बीज बुर्जी और बिटोड़े के आप पास लगा दते है जिससे उन्हें
सर्दियों में घर की सब्जी वो भी बिना किसी रासायनिक खाद या दवा के बिना मिलती रहती है और इसको वो अपने आस पड़ोस में बाटते भी रहते है. जिससे की सभी को सब्जी की आपूर्ति हो जाती है और किसान को इसके लिए पैसे भी खर्च नहीं करने पड़ते है और वो किसी पर इसके लिए निर्भर भी नहीं रहता है.

दूध में आत्मनिर्भर :

आजकल कोरोना के कठिन समय में एक किसान ही ऐसा है जो न भूखा सोया है और न ही उसने अपने आसपास किसी को भूखे पेट सोने दिया है. किसान के घर कम से कम एक देसी गाय तो मिल जाएगी जो की उसकी और उसके परिवार की दूध और घी की पूर्ती कराती है. इस कठिन समय में सब ने किसान का साथ छोड़ दिया लेकिन उसने कभी भी किसी से कोई शिकायत नहीं की. उसने अपने दूध को अपने घर रखा और उसका घी निकाल के मठ्ठा बिना कोई शुल्क लिए लोगों को पिलाया ( ब्रांडेड 400 ग्राम की थैली 12 रुपये की आती है )

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अनाज में आत्मनिर्भर:

एक जमाना था जब भारत को दूसरे देशों के गेंहूं पर निर्भर रहना होता था और गेंहूं की रोटी तभी बनती थी जब कोई खास रिश्तेदार आया हो. (जिसने ऐसा वक्त देखा हो कमेंट जरूर करें ) और बाहर के देशों की क्वालिटी कितनी घटिया होती थी. लेकिन आज हम अन्य देशों को गेंहूं और दूसरे खाधान्य निर्यात कर रहे हैं और अपने यहाँ भी सरप्लस अनाज रहता है. किसान ने खेती में नई नई टेक्नोलॉजीज प्रयोग में लेके अनाज की उपज कई गुना बढ़ा ली है. आज हम किसान को अन्नदाता बोलते हैं तो ऐसे ही नहीं बोलते इसमें किसान ने करके दिखाया है की उसे जरा सा सपोर्ट मिले तो वो बहुत कुछ कर सकता है.

आवश्यकता है किसान को आगे बढ़ने की:

आज हमारे देश को अपने भण्डारण क्षमता को बढ़ने की जरूरत है इसके लिए हमें ईमानदारी से किसान को सपोर्ट करना पड़ेगा.आज भी किसान को कोई ऋण नहीं मिल पाता है.उसका कारन कुछ भी हो लेकिन हम को इस तिलिस्म को तोड़ना होगा और वास्तव में किसान को सब्सिडी और ऋण का लाभ वो भी काम ब्याज पर देना होगा. इसके साथ साथ हमें किसान से सम्बंधित उद्योगों को बढ़ाना होगा. सरकार को चाहिए की किसान को सब्सिड़ी और लोन किसान मेला का आयोजन करके देना चाहिए जिससे की ज्यादा से ज्यादा किसानों को इसका फायदा मिल सके...
खाद-बीज के साथ-साथ अब सहकारी समिति बेचेंगी आरओ पानी व पशु आहार

खाद-बीज के साथ-साथ अब सहकारी समिति बेचेंगी आरओ पानी व पशु आहार

खाद-बीज के साथ-साथ अब सहकारी समिति बेचेंगी आरओ पानी व पशु आहार - सहकारिता विभाग ने शासन को भेजा प्रस्ताव

मथुरा।
सहकारिता विभाग ने अपनी शाखाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक योजना तैयार की है। आत्मनिर्भर भारत योजना के अंतर्गत सहकारी समितियों को आत्मनिर्भर बनाने की पहल की जा रही है। सहकारिता विभाग प्रस्ताव तैयार करके शासन को भेजा है। इस प्रस्ताव में सहकारी समितियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए समिति पर खाद-बीज के साथ-साथ आरओ पानी व पशु आहार बेचने की योजना तैयार की जा रही है। सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक रवीन्द्र कुमार द्वारा समितियों को आत्मनिर्भर बनाने और अन्य व्यवसायों के लिए प्रेरित करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है। आत्मनिर्भर भारत योजना के अंतर्गत कृषि अवस्थापना निधि से प्रथम चरण में मथुरा जनपद की 6 समितियों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। इस योजना के तहत सहकारी समितियों पर अब खाद-बीज के साथ-साथ आरओ पानी व पशु आहार उचित मूल्यों पर मिलेगा।

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सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक रवीन्द्र कुमार ने बताया कि सहकारी समितियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पहले आरओ पानी व पशु आहार बेचने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसके तहत शुरुआत में 6 सहकारी समितियों का चयन किया गया है। इसके बाद पूरे जनपद की 78 सहकारी समितियों को आत्मनिर्भर बनाने की योजना है। इसमें किसान स्वंय सहायता समूह, क्षेत्रीय सहकारी समितियों, कोल्ड स्टोरेज, कोल्ड पैन को चार प्रतिशत की मासिक ब्याज दर से बैंकों को ऋण दिलाया जाएगा। जिसमें कृषि उपकरण, ट्रैक्टर, कल्टीवेटर, मेज व हैरों आदि खरीदे जा सकेंगे। इसके अलावा नाबार्ड के सहयोग से इस योजना में सहकारिता विभाग 17 गोदाम बनाएगा। उन्होंने बताया कि इस योजना का मूल उद्देश्य सहकारी समितियों को स्वाबलंबी बनाना है। जिससे ज्यादा से ज्यादा किसान व ग्रामीण समितियों से जुड़े रहें।

इन समितियों का किया गया है चयन :

- सहकारी समितियों को आत्मनिर्भर बनाने की योजना के अंतर्गत पहले चरण के लिए चौमुहां, बेरी, देवीआटस, सहपऊ, सेही और वृंदावन सहकारी समितियों को चयनित किया गया है। जल्दी जी शासन से स्वीकृति मिलने के बाद इन समितियों पर आरओ पानी व पशु आहार की बिक्री होगी। ------ लोकेन्द्र नरवार
शहर में रहने वाले लोगों के लिए आयी, बिहार सरकार की ‘छत पर बाग़बानी योजना’, आप भी उठा सकते हैं फ़ायदा

शहर में रहने वाले लोगों के लिए आयी, बिहार सरकार की ‘छत पर बाग़बानी योजना’, आप भी उठा सकते हैं फ़ायदा

बढ़ते शहरीकरण और जमीन की उर्वरा क्षमता में कमी आने की वजह से पिछले 4 से 5 वर्षों में रूफटॉप गार्डन (Roof / Terrace gardening) यानी छत पर बागवानी विधि का इस्तेमाल काफी तेजी से बढ़ा है। इसी बढ़ते हुए प्रभाव को मध्यनजर रखते हुए बिहार सरकार के बागवानी विभाग ने भी बिहार के शहरों में रहने वाले लोगों के लिए 'छत पर बागवानी योजना' नाम से नई परियोजना शुरू कर शहरों में बागबानी की उपज को बढ़ाने के लिए कमर कस ली है।

क्या है रूफटॉप गार्डन ?

रूफटॉप गार्डन मुख्यतः बड़े अपार्टमेंट और शहरों में बने घरों की छत पर बने हुए गार्डन होते हैं, जो सामन्यतः डेकोरेशन में इस्तेमाल होने के अलावा घर में रहने वाले स्थानीय लोगों के लिए भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करता है। कई प्रकार के हाइड्रोलॉजिकल फायदे (Hydrological benefit) होने के अलावा, रूफटॉप गार्डन की मदद से घर के तापमान को भी नियंत्रित किया जा सकता है तथा छत पर होने वाली बारिश के पानी (Rain Water Harvesting) का भी बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।

क्या है बिहार सरकार की 'छत पर बागवानी योजना' का मुख्य उद्देश्य ?

कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले बागवानी विभाग की वेबसाइट के अनुसार इस योजना को मुख्यतः शहरी क्षेत्रों में बने घरों की छत पर फूल और फल तथा सब्जियां उगा कर दैनिक जीवन में इस्तेमाल करने योग्य बनाना है। महाराष्ट्र, गुजरात तथा कर्नाटक जैसे राज्यों में छत पर बागवानी से जुड़ी योजनाओं की सफलता के बाद बिहार सरकार का यह प्रयास 'आत्मनिर्भर भारत' की राह पर एक प्रबल कदम है। वर्तमान में इस योजना में बिहार के 4 जिले पटना, गया तथा मुजफ्फरपुर और भागलपुर को शामिल किया गया है। पटना के पटना सदर और फुलवारी तथा गया के बोधगया तथा मानपुर प्रखंडो में इस योजना को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चलाया जाएगा। पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद इसे मुजफ्फरपुर के मुशहरी और भागलपुर के जगदीशपुर तथा नाथनगर जैसे प्रखंडों के निवासियों के लिए भी उपलब्ध करवाया जाएगा।


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क्या है योजना की पात्रता ?

बिहार सरकार की इस योजना का फायदा उठाने के लिए केवल वही लोग पात्र है, जिनके पास शहरी इलाकों में अपना खुद का घर हो या फिर वो किसी प्राइवेट अपार्टमेंट में किराए के फ्लैट में रहते हैं या उनका खुद का फ्लैट हो। यदि किसी व्यक्ति के पास स्वयं का मकान है तो छत पर 300 स्क्वायर फीट की खाली जगह होनी चाहिए, साथ ही यह क्षेत्र किसी कानूनी लड़ाई में सम्मिलित नहीं होना चाहिए। यदि आवेदक अपार्टमेंट के निवासी है तो उन्हें अपार्टमेंट की पंजीकृत सोसाइटी से अनापत्ति प्रमाण पत्र (No objection Certificate) लेने की आवश्यकता होगी। यदि आपके पास अपना खुद का मकान है, तो एक इकाई में अधिकतम 75% तक क्षेत्रफल में ही योजना का लाभ दिया जाएगा। पिछड़ी जातियों का खासतौर पर ध्यान रखते हुए किसी भी जिले में योजना के लिए प्राप्त सभी आवेदनों में से 16% आवेदन अनुसूचित जाति और 1% अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए आरक्षित किए जाएंगे। इसके अलावा बिहार सरकार के कृषि और बागवानी में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने के फ्लैगशिप प्रोजेक्ट के तहत, कुल भागीदारी में से 30% आवेदन महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाएंगे।


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योजना का लाभ उठाने की संपूर्ण प्रक्रिया :

ऊपर बताए गए चार जिलों में रहने वाले आवेदकों को सबसे पहले उद्यान निदेशालय की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया पूरी करनी होगी। नीचे दिए गये लिंक की मदद से आप सीधे ही आवेदन कर सकते हैं :- यहाँ क्लिक कर सीधे कर सकते हैं आवेदन योजना का लाभ लेने के इच्छुक लोगों को ध्यान रखना होगा कि संपूर्ण प्रक्रिया ऑनलाइन ही संपादित होगी और इस प्रक्रिया में आवेदक को नाम और जाति संबंधित सभी जानकारियां देने के अलावा, योजना के कार्यान्वयन करने वाली कंपनी की जानकारी भी उपलब्ध करवानी होगी। यदि कोई भी व्यक्ति इस योजना के लिए अलग से पैसे की मांग करता है तो उसकी शिकायत वेबसाइट पर ही उपलब्ध शिकायत निवारण पोर्टल (Grievance redressal portal) पर कर सकते हैं। एक बार आवेदन जमा हो जाने के बाद आपको एक रसीद दी जाएगी, इस प्राप्त रसीद में एक बैंक खाता संख्या और अन्य प्रकार के विवरण दिए जाएंगे। योजना का लाभ प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को दिए गए बैंक खाते में 25000 रुपए की एकमुश्त राशि जमा करवानी होगी। इस बात का ध्यान रखें कि आगे की संपूर्ण प्रक्रिया इस राशि के जमा होने के बाद ही हो पाएगी। यदि कोई व्यक्ति अपने घर की छत पर इस योजना का फायदा उठाना चाहता है तो वह अधिकतम 2 इकाइयों के लिए आवेदन कर सकता है और एक अपार्टमेंट या एक सोसायटी में रहने वाले लोग अधिकतम 5 इकाइयों का आवेदन कर सकते हैं।


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एक इकाई योजना में निम्न उपकरणों और सुविधाओं को शामिल किया गया है :

  • जैविक बाग (organic garden) बनाने के लिए 4 किट
  • ट्रे (Tray) के साथ आने वाली प्लास्टिक की पीएसटी
  • 10 फ्रूट बैग (Fruit Bag)
  • 10 फ्रूट प्लांट्स (Fruit Plants)
  • सैपलिंग (sapling) में इस्तेमाल आने वाली 3 ट्रे
  • हाथ से इस्तेमाल किया जाने वाला एक स्प्रे
  • खुदाई और निराई गुड़ाई करने के लिए 2 खुरपी
इसके अलावा एक बार बागान बनने के बाद कृषि से जुड़े विशेषज्ञों की जानकारियां और ट्रेनिंग जैसी खास सुविधाएं भी उपलब्ध करवाई जाएगी। आशा करते हैं कि Merikheti.com के द्वारा उपलब्ध करवाई गई यह जानकारी, 'छत पर बागवानी' करने के विषय में इच्छुक व्यक्तियों को पसंद आई होगी और खास तौर पर बिहार के निवासी, सरकार की इस स्कीम का फायदा उठाकर आने वाले समय में अच्छा मुनाफा कमाने के साथ ही जैविक सब्जियों का इस्तेमाल भी कर पाएंगे।
आर्थिक तंगी के चलते महिला किसान ने शुरू की मशरूम की खेती, आज कमा रही लाखों का मुनाफा

आर्थिक तंगी के चलते महिला किसान ने शुरू की मशरूम की खेती, आज कमा रही लाखों का मुनाफा

महिला किसान संगीता कुमारी ने बताया है, कि बिहार जैसे गरीब राज्य में महिलाओं को भी आत्मनिर्भर होना बेहद आवश्यक है। वर्तमान में राज्य सरकार राज्य की बहुत सारी महिलाएं जीविका से जुड़कर अपनी नई पहचान बना रही हैं। साथ ही खेती से अच्छी खासी आमदनी भी कर रही हैं। बिहार राज्य में महिलाएं भी वर्तमान में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। अब चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो अथवा खेती-किसानी का। आज हर क्षेत्र में महिलाएं अपना स्थान बना रही हैं। इस लेख में आज हम आपको एक ऐसी महिला के बारे में जानकारी देंगे, जो कि सब्जी की खेती से लाखों रुपये की आमदनी कर रही है। आज कल इस महिला किसान की चर्चा जनपद के सभी क्षेत्रों में हो रही है। मुख्य बात यह है, कि यह महिला किसान जैविक विधि के माध्यम से हरी सब्जियों की खेती करती है। यही कारण है, कि उनसे सब्जी खरीदने के लिए अन्य गांव से भी काफी लोग आते हैं।

 

महिला किसान का नाम संगीता कुमारी है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इस महिला किसान का संगीता कुमारी नाम है। यह पटना जिला स्थित अथमलगोला प्रखंड के फुलेरपुर गांव की मूल निवासी हैं। वर्तमान में संगीता कुमारी जीरो टिलेज की सहायता से मशरूम और आलू समेत बाकी हरी सब्जियों की भी खेती कर रही हैं। वहीं, इसके साथ साथ वह अन्य महिलाओं को भी खेती करने का प्रशिक्षण दे रही हैं। संगीता कुमारी का कहना है, कि "पहले मेरे पास घर का खर्च चलाने के लिए पैसों कि किल्लत रहती थी। मेरे पास समय पर एक हजार रुपये भी नहीं रहते थे। परंतु, जब से मैंने सब्जी की खेती की है, उनकी आर्थिक स्थिति बदल गई है। आज संगीता खेती की बदौलत वार्षिक दो लाख से ज्यादा की आमदनी कर रही हैं। इससे उनका परिवार भी काफी खुशहाल हो गया है। 

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महिला किसान संगीता ने शुरू की मशरूम की खेती

महिला किसान संगीता कुमारी एक बीघा जमीन में मशरूम, आलू और बाकी फसलों की खेती करती हैं। साथ ही, जीविका में मुख्यमंत्री के पद पर भी कार्यरत हैं। संगीता कुमारी के मुताबिक तो वर्ष 2015 में उनकी पुत्री की शादी हुई। इसके उपरांत उनके घर की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गई। अब ऐसी स्थिति में उनके पति ने एक स्कूल में 1500 रुपये महीने पर एक नौकरी चालू कर दी। परंतु, इतने कम पैसे में घर का खर्च तक चलाना कठिन था। ऐसी स्थिती में 2016 में जीविका से जुड़कर संगीता ने 2019 में मशरूम समेत अन्य सब्जियों की खेती करने का प्रशिक्षण लिया। इसके उपरांत उन्होंने घर आकर मशरूम की खेती शुरू कर दी। 

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महिला किसान संगीता को कितनी आमदनी हो रही है

प्रथम बार में उन्होंने मशरूम बेचकर 10 हजार रुपये की आमदनी करी है। साथ ही, जीरो टिलेज विधि के माध्यम से दो कट्ठे में आलू की पैदावार की है। इससे 40 मन से ज्यादा आलू की पैदावार हुई। संगीता कुमारी आगे बताती हैं, कि ये एक बीघा में आलू की खेती के साथ टमाटर, गोभी, मिर्च, बैंगन समेत अन्य सब्जियों का भी उत्पादन करती हैं। इससे उनको वर्ष में 2 लाख रुपये से ज्यादा की आमदनी हो रही है।