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लीची : लीची के पालन के लिए अभी से करे देखभाल

लीची : लीची के पालन के लिए अभी से करे देखभाल

सन;1780 मे पहली बार भारत देश मे दस्तक देने वाला फल लीची , जिसकी जरूरत आज भी शहरी और ग्रामीण बाजारों में काफी तेज़ी मे है। लीची एक मात्र ऐसा फल है जो हमारे शरीर को डी हाइड्रेशन यानी की पानी की कमी की पूर्ति करता है।इसी कारण भारत के पश्चिमी इलाको मे इसकी मांग बहुत है। इसी के साथ साथ इसमें विटामिन सी होता है, जो हमारे शरीर मे कैल्शियम की कमी की पूर्ति करता है। इसमें केरोटिन और नियोसीन भी होता है जो शरीर मे इम्यूनिटी को बढ़ाता हैं। ये भी पढ़े: सामान्य खेती के साथ फलों की खेती से भी कमाएं किसान: अमरूद की खेती के तरीके और फायदे भारत मे लीची का उत्पादन सबसे ज्यादा त्रिपुरा मे होता है। इसके अलावा अन्य राज्य झारखंड , पश्चिम बंगाल , बिहार , उतरप्रदेस और पंजाब मे। भारत मे किसानों के लिए लीची की फसल से अच्छा मुनाफा होता है ,लेकिन साथ ही साथ अच्छी देखभाल भी करनी पड़ती है।लीची की फसल को तैयार होने मे काफी समय लगता है , इसलिए किसानों को काफी परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है । ऐसे मे किसानों को संपूर्ण फसल को तैयार करने मे लागत खर्चा भी ज्यादा लगता है।

लीची के पालन के लिए सिंचाई और खाद उर्वरक का इस प्रकार करे इस्तेमाल :

insect pest in litchi लीची की फसल के लिए हमेशा आपको थाला विधि से ही सिंचाई करनी चाहिए। हमें केवल तब तक सिंचाई करनी है ,जब तक पौधों मे फूल आना न लग जाए। उसके बाद हमें नवंबर माह से फरवरी माह तक लीची की फसल की सिंचाई नहीं करनी चाहिए। लीची के पौधों को पानी देने का सबसे अच्छा समय शाम का होता है , क्योंकि इससे दिन की गर्मी की वजह से वाष्पीकरण भी नहीं होता है और पौधों को अच्छी तरह से जल की पूर्ति भी होती हैं।
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इसके अलावा अच्छी खाद और उर्वरक का इस्तेमाल करें और साथ ही साथ पौधे के आस पास बिल्कुल भी खरपतवार ना रहने दे। खरपतवार सभी प्रकार की फसलों के लिए सबसे खतरनाक होता है। इस से बचाव के लिए समय समय पर लीची के पौधों के आस पास ध्यान रखे और खरपतवार बिल्कुल भी न रहने दे। जब पौधे 6 से 7 माह के हो जाते है, तो उसके बाद आप पौधों मे फव्वारे के द्वारा पानी की छटाई अवस्य रूप से करे। अप्रैल महीने से लेकर नवंबर महीने तक लीची के पौधे की पूर्ण रूप से सिंचाई करे । इस समय तेज गर्मी के कारण पौधों को पानी की पूर्ति सही ढंग से नहीं करवाने पर संपूर्ण फसल पर बहुत असर पड़ता है।

लीची के पौधों की इस प्रकार करे कांट - छांट और रख - रखाव :

production of litchi crops लीची के पौधों की रख - रखाव करना सबसे महत्वपूर्ण काम होता है ,क्योंकि इसके बिना पूरी फसल भी खराब हो सकती है । इसके लिए आप गर्मी और सर्दी की ऋतू मे जब पोधा 4-5 साल का होता है, तो इस समय उसकी अवांछित टहनियों और साखाओ को हटा देना चाहिए । इससे जो भी कीट पतंग और मकड़िया बिना धूप पहुंचने के कारण शाखाओं में छिप जाती हैं वे नष्ट हो जाएंगी। ये भी पढ़े: केले की खेती की सम्पूर्ण जानकारी इससे पौधे का अच्छे से भरण-पोषण होगा और फसल की उपज भी अच्छी होगी। फलों की तुड़ाई करने के बाद आप पौधे की जितनी भी रोग ग्रसित ,अवांछित, खराब टहनियों और पत्तियों को हटा दे। संपूर्ण खेत के चारों तरफ से बाढ करना बहुत जरूरी है,इससे आसपास के पशु फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे। साथ ही साथ इससे फसल की उपज मे भी इजाफा होगा।

लीची की फसल मे आने वाली समस्याओं का इस प्रकार करे समाधान :

litchi farming लीची की फसल का सही से रखरखाव और अच्छी उपज के लिए किसानों को काफी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है,जिनके बारे मे आज हम आपको बताएंगे की किस प्रकार आप इन समस्याओं से निदान पा सकते है। एक अच्छी फसल का उत्पादन कर सकते हैं तो चलिए जानते है इनके बारे मे
  1. लीची के फलों का फटना और छोटा होने से बचाव :- लीची के पौधों को गर्म और तेज हवाओं के कारण इनके फलों पर इसका सबसे ज्यादा असर दिखाई देता है क्योंकि इससे फल फटना तथा छोटा होना शुरू हो जाते है। ऐसे मे आप  बोरेक्स  ( 5ग्राम लिटर ) या बोरिक अम्ल (4 ग्रा./ली.) के घोल का 2-3 बार छिड़काव करें । इससे फसल की अच्छी पैदावार होगी।फलों के फटने की समस्या भी दूर हो जायेगी ।
  2. लीची मे मकड़ी का लग जाने से बचाव : लीची मे अगर एक बार मकड़ी लग जाती है, तो पूरी फसल को बर्बाद कर देती है। यह मकड़ी लीची के पौधों की टहनियां ,पत्ते और फलों को चुस्ती रहती है। जिसके कारण पूरा पौधा कमजोर पड़ जाता है और नष्ट हो जाता है। इससे बचाव के लिए आप सितंबर और अक्टूबर माह मे केलथेन या फ़ॉसफामिडान (1.25 मि.ली./लीटर) का घोल बनाकर 10- 15 दिन का अंतराल लेकर छिड़काव करें।
  3. लीची के फलों को झड़ने से रोकने के सुझाव :लीची के फलों का झड़ना संपूर्ण फसल के लिए काफी नुकसानदायक होता है। ऐसा पानी की कमी और किटों के कारण होता है।इससे बचाव के लिए आप पौधे मे फल लगने के मात्र सप्ताह भर के अंदर - अंदर क्रॉनिक्सएक्स 2 मिलीलीटर / 4. 8 लीटर या फिर आप ए एन ए 20 मिलीग्राम प्रति लीटर के घोल का बारी-बारी से छिड़काव करें। इससे फलों का झड़ना बंद हो जाएगा।

लीची के पौधे का पूर्ण विकास और प्रबंध इस प्रकार करें :

Litchi farmers लीची के पौधे का संपूर्ण तरह से विकास होने मे 15 से 20 साल तक का समय लगता है। ऐसे मे पौधे का पूर्ण विकास और सही रखरखाव होना बहुत ही जरूरी होता है।अच्छी उपजाऊ जमीन और अच्छी जलवाष्प का होना भी काफी आवश्यक होता है।
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लीची के पौधों को लगाते समय प्रति पौधे के बीच मे 5 मीटर की दूरी होनी चाहिए। किसान भाई प्रत्येक एक हेक्टर में 90 से 200 लीची के पौधे लगाएं। लीची के पौधों का अच्छे से विकास करने के लिए उनको क्रमबद्ध कतारों मे जरूर लगाए। नियमित रूप से सिंचाई और समय-समय पर पौधों की जरूरत के अनुसार खाद और उर्वरक का छिड़काव करना ना भूलें।

भारत मे लीची का बढ़ता हुआ आयात इस प्रकार :

litchi production in india भारतीय बाजार की तुलना मे अंतरराष्ट्रीय बाजार मे नवंबर माह से लेकर मार्च माह तक काफी ज्यादा लीची की मांग होती है। भारत मे लीची का फल जुलाई महीने तक संपूर्ण रूप से तैयार होकर बाजार मे उपलब्ध होता है। ऐसे समय पर अंतरराष्ट्रीय बाजार मे लीची की मांग बढ़ जाती है। भारत से निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा एपीडी कार्यक्रम की भी प्रमुख भूमिका है। भारत से सबसे ज्यादा लीची का निर्यात सऊदी अरेबिया संयुक्त अरब अमीरात, ओमान , कुवैत  ,बेल्जियम  ,बांग्लादेश और नार्वे जैसे देशों को होता है।
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भारतीय बाजार मे लीची की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में काफी कम है , लेकिन पिछले कुछ सालों मे इसकी कीमत मे इजाफा हुआ है। साथ ही साथ भारत सरकार द्वारा किसान भाइयों के लिए फसलों की रखरखाव और जानकारी के लिए कई सारे कार्यक्रम भी किए जाते हैं। इसके अलावा लॉकडाउन लगने के कारण किसानों को लीची की फसल को भारतीय बाजार मे बेचने के लिए काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा लेकिन आने वाले सालों मे लीची का आयात बहुत ज्यादा बढ़ने वाला है। अतः हमारे द्वारा बताए गए इन सभी सुझाव समस्याओं एवं उनके निदान जो की लीची की फसल के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होते है। साथ ही साथ इसके अलावा किसान भाई समय-समय पर लीची के पौधों का उचित रखरखाव और खाद रूप का छिड़काव करते रहे।
लीची की वैरायटी (Litchi varieties information in Hindi)

लीची की वैरायटी (Litchi varieties information in Hindi)

दोस्तों आज हम बात करेंगे लीची के विषय में लीची की वैरायटी कितने प्रकार की होती है।लीची से हमें कितने प्रकार के लाभ हो सकते हैं और लीची के महत्वपूर्ण विषय के बारे में जिससे हमें लीची से संबंधित सभी प्रकार की जानकारियां प्राप्त हो जाए।लीची से जुड़ी आवश्यक जानकारियों को प्राप्त करने के लिए हमारी पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहे।

लीची

लीची एक ऐसा फल है जो स्वाद में सबसे अलग है लीची की बढ़ती मांग दुनियाभर में प्रचलित है। लीची ना सिर्फ स्वादिष्ट बल्कि या विटामिन से भी भरी हुई होती है। यदि आपको अब तक इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि लीची को पैदावार करने वाला देश चीन है। लेकिन ऐसा नहीं है कि लीची सिर्फ चीन में ही पैदा होती है भारत भी इस की पैदावार की श्रेणी में आता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार लीची करीबन एक लाख टन से भी ज्यादा उत्पादन भारत देश में होता है।

इसकी अच्छी क्वालिटी की मांग स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी बड़े पैमाने में बढ़ चढ़कर इसकी मांगे होती है।फल के रूप में लीची का सेवन वैसे तो किया जाता है, लेकिन विभिन्न प्रकार के जूस या तरल पदार्थ में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। जैसे लीची का शरबत बनाना, जैम आदि का उपयोग करना, नेक्टर, कार्बोनेटेड और भी कई पिए जाने वाले पदार्थों में लीची का उपयोग किया जाता है।

भारत देश में लीची कहां पाई जाती है

भारत देश में विभिन्न ऐसे राज्य और क्षेत्र है, जहां पर लीची का उत्पादन काफी मात्रा में होता है। उनमें से एक बिहार क्षेत्र है जहां पर लीची का उत्पादन होता है। मुजफ्फरपुर तथा दरभंगा  जिलो में लीची की काफी भारी मात्रा में पैदावार होती है, तथा बिहार के क्षेत्र पश्चिमबंगाल ,असम और भारत के उत्तराखंड तथा पंजाब लीची की पैदावार करने वाले क्षेत्र है।

लीची की खेती के लिए कैसे जलवायु उपयुक्त हैं

लीची के लिए उपयुक्त जलवायु जनवरी और फरवरी के महीने में आसमान खुला - खुला साफ रहता है,तो इस बीच काफी शुष्क हवाएं चलती है। जिससे लीची में बेहतर मंजरी यानी( नया कल्ला) बनती है।लीची उत्पादन के लिए सबसे अच्छी जलवायु समशीतोष्ण की होती है। जलवायु के इस प्रभाव से लीची के फल काफी अच्छे आते हैं। लीची मार्च और अप्रैल के महीने में काफी अच्छी तरह से विकसित होती है, क्योंकि कम गर्मी पड़ने से इसकी गुणवत्ता अच्छी होती है तथा लीची के गूदे का अच्छा विकास होता है। लीची के फूल जनवरी-फरवरी में खिलते हैं तथा मई-जून में यह पूरी तरह से विकसित होकर तैयार हो जाती हैं।

विशिष्ट जलवायु लीची की खेती के लिए बहुत ही उपयोगी होती है। लीची की खेती करने वाले मुख्य देश है: जैसे देहरादून की घाटी, उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र, उत्तरी बिहार, झारखंड प्रदेश,आदि इन क्षेत्रों में लीची की पैदावार काफी आसानी के साथ भारी मात्रा में लीची का उत्पादन होता है।

लीची की खेती के लिए मिट्टी का चुनाव

लीची की खेती के लिए किसान जिस मिट्टी का चुनाव किसान करते हैं ,जिससे लीची की फसल काफी अच्छी हो वह मिट्टी अम्लीय एवं लेटराइट होती है। गहरी बलुई दोमट मिट्टी जिसकी क्षमता जल धारण करने के लिए अधिक हो वह लीची की खेती के लिए बहुत ही उपयोगी साबित होती है। परंतु ध्यान रखने योग्य बातें जलभराव वाले क्षेत्र लीची उत्पादन के लिए बिल्कुल भी सही नहीं होते हैं। लीची की खेती जल निकास युक्त जमीन में करना बहुत लाभदायक होता है।

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लीची की वैरायटी

यदि हम बात करें लीची की वैरायटी की, तो भारत में काफी कम मात्रा में लीची की ( वैरायटी /किस्म) पाई जाती हैं।इसका मुख्य कारण यह हो सकता है,कि किसान इस की खेती या बुआई करने में काफ़ी देरी कर देते हैं। इन्हीं कारणों की वजह से यह काफी कम मात्रा में पाई जाती है।कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार कुछ वर्षों में किसानों ने अपनी जी तोड़ मेहनत के बल पर कई अनेक प्रकार की लीची की किस्मों की खेती की है।किसानों ने लीची की पैदावार को बढ़ाने के लिए इनकी अनेक प्रकार की किस्मों की काफी सहायता भी ली है।

लीची की कुछ प्रमुख किस्म इस प्रकार है

किसानों द्वारा दी गई जानकारियों के अनुसार  इनकी कुछ किस्मों का हमें ज्ञात हुआ है जो निम्न प्रकार है;

  1. कलकतिया लीची

 दोस्तों जानते हैं कलकतिया लीची कि जो खाने में ही बहुत ही ज्यादा स्वादिष्ट होती है और इनकी जो बीज होती है वह आकार में काफी बड़ी होती है। या कलकतिया लीची की बहुत ही अच्छी किस्म है। कलकतिया लीची के फल जुलाई के महीने में आते हैं। कलकतिया लीची की किस्म पूरी तरह से पकने में काफी लंबा टाइम लेते हैं। कलकतिया लीची लगभग 23 ग्राम की होती है बात करें इन के छिलकों की तो यह दिखने में हल्की मोती रंग के नज़र आते हैं। लोग इस कलकतिया लीची की किस्म को बड़े ही चाव के साथ खाना पसंद करते हैं।

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  1. लीची की देहरादून किस्म

 देहरादून के फल लोगों में बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय होते हैं, देहरादून के फल लोग बहुत ही ज़्यादा पसंद करते हैं। लीची की या किस्म बहुत ही जल्दी समय में फल देती है। लीची कि यह किस्म जून के महीने में तोड़ने के लायक हो जाती है।इसके फल काफी तेजी से पकना शुरू कर देते हैं। लीची की यह किस्म की रंगत दिखने में लोगों को अपनी ओर बहुत ही आकर्षित करती हैं। इनमें दरारे जल्दी आ जाती है और छिलके फटने लगते है। लीची की देहरादून  किस्म बहुत पौष्टिक होती है।

  1. लीची की रोज सेंटेड किस्म

लीची की या किस्म खाने में मीठी होती है, दिखने में या एक गुलाब के तरह होती है।यह लीची की किस्म जून के महीने में पूरी तरह से पक जाती हैं।जब यह लीची पक जाती है तो दिखने में एकदम हृदय के आकार की प्रतीत होती है। बात करें, इसके भार की तो लगभग 18 ग्राम की होता है। इनके छिलके बैगनी रंग के साथ बहुत ही पतला भी होते है। लीची की रोज सेंटेड किस्म बहुत भी पौष्टिक होती हैं।

  1. लीची की अर्ली लार्ज रेड किस्म

 लीची की अर्ली लार्ज रेड किस्म का बीज  आकार बड़ा होता है। लीची की इस किस्म की खेती जून के महीने में होती है। इस लीची का भार 20 से 50 ग्राम का होता है। इस लीची के छिलके काफी हल्के होते हैं या दिखने में लाल रंग के होते हैं। इसमें मौजूद शर्करा 10 प्रतिशत पाया जाता है। तथा लीची की इस किस्म में लगभग 43% अम्लता मौजूद होता है।

लीची की किस्मों से जुड़ी कुछ आवश्यक बातें

लीची की किस्मों से जुड़ी कुछ आवश्यक बातें शाही लीची तथा बेदाना और चाइना लीची कि किस्म बहुत ही उपयोगी मानी जाती है।शाही लीची की खेती बेदाना की तुलना में काफी मात्रा में की जाती है।क्योंकि शाही लीची पूर्ण रुप से गुणवत्ता से भरी हुई होती है और इस में कई तरह के पौष्टिक तत्व भी मौजूद होते हैं। 

दोस्तों हम उम्मीद करते हैं कि आपको हमारा लीची की वैरायटी का आर्टिकल काफी पसंद आया होगा।हमने अपने इस आर्टिकल में लीची  की वैरायटी तथा लीची से जुड़ी सभी प्रकार की जानकारियों की पूरी डिटेल हमारे इस आर्टिकल में मौजूद है। यदि आप हमारी दी गई जानकारी से संतुष्ट है तो हमारे इस आर्टिकल को ज्यादा से ज्यादा अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया पर शेयर करें। धन्यवाद।

खुशखबरी: बिहार के मुजफ्फरपुर के अलावा 37 जिलों में भी हो पाएगा अब लीची का उत्पादन

खुशखबरी: बिहार के मुजफ्फरपुर के अलावा 37 जिलों में भी हो पाएगा अब लीची का उत्पादन

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि बिहार राज्य के अंदर सबसे ज्यादा मुजफ्फरपुर जनपद में लीची (Lychee; Litchi chinensis) का उत्पादन किया जाता है। मुजफ्फरपुर जनपद में 12 हजार हेक्टेयर भूमि में लीची का उत्पादन किया जा रहा है। बिहार के कृषकों के लिए एक अच्छी बात है, कि वर्तमान में बिहार के मुजफ्फरपुर के साथ बाकी जनपदों में भी कृषक लीची का उत्पादन कर सकते हैं। बिहार में करीब 5005441 हैक्टेयर जमीन लीची उत्पादन हेतु अनुकूल है। ऐसी स्थिति में यदि मुजफ्फरपुर के अतिरिक्त अन्य जनपद के कृषक भी लीची का उत्पादन करना चालू करते हैं। तब यह लीची का उत्पादन उनके लिए एक अच्छे आय के स्त्रोत की भूमिका अदा करेगा।

मुजफ्फरपुर के अलावा और भी जगह लीची का उत्पादन किया जाता है

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, मुजफ्फरपुर भारत भर में शाही लीची के उत्पादन के मामले में मशहूर है। साथ ही, लोगों का मानना है, कि केवल मुजफ्फरपुर की मृदा ही लीची की खेती के लिए बेहतर होती है। हालाँकि,अब ये सब बातें काफी पुरानी हो चुकी हैं। एक सर्वेक्षण के चलते यह सामने आया है, कि बिहार के 37 जनपदों के अंदर लीची का उत्पादन किया जा सकता है। इसका यह मतलब है, कि इन 37 जनपदों में लीची के उत्पादन हेतु जलवायु एवं मृदा दोनों ही अनुकूल हैं। सर्वे के अनुसार, इन 37 जनपदों के अंतर्गत 5005441 हेक्टेयर का रकबा लीची उत्पादन हेतु अनुकूल है। साथ ही, 2980047 हेक्टेयर भूमि बाकी फसलों हेतु लाभकारी है। ये भी पढ़े: अब सरकार बागवानी फसलों के लिए देगी 50% तक की सब्सिडी, जानिए संपूर्ण ब्यौरा

केवल बिहार राज्य में देश का 65 प्रतिशत लीची उत्पादन होता है

जानकारी के लिए बतादें, कि बिहार में लीची का सर्वाधिक उत्पादन किया जाता है। बिहार में किसान भारत में समकुल लीची की पैदावार का 65 फीसद उत्पादन करते हैं। परंतु, बिहार राज्य में भी सर्वाधिक मुजफ्फरपुर में शाही लीची का उत्पादन होता है। जानकारी के लिए बतादें कि 12 हजार हेक्टेयर के रकबे में लीची का उत्पादन किया जा रहा है। परंतु, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर की तरफ से किए गए सर्वेक्षण के उपरांत बिहार राज्य में लीची के क्षेत्रफल में बढ़ोत्तरी देखी जाएगी। राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, राज्य में 1,53,418 हेक्टेयर रकबा लीची के उत्पादन हेतु सर्वाधिक अनुकूल है।

ये मुजफ्फरपुर से भी अधिक लीची उत्पादक जनपद हैं

सर्वेक्षण के मुताबिक, पश्चिम चंपारण, मधुबनी, कटिहार, अररिया, बांका, औरंगाबाद, जमुई, पूर्णिया, पूर्वी चंपारण, मधेपुरा और सीतामढ़ी में मुजफ्फरपुर से भी ज्यादा लीची का उत्पादन हो सकता है। इन जनपदों की मृदा और जलवायु मुजफ्फरपुर से भी ज्यादा लीची उत्पादन हेतु अनुकूल है। अगर इन समस्त जनपदों में लीची का उत्पादन चालू किया जाए तो भारत में भी चीन से ज्यादा लीची की पैदावार होने लगेगी। साथ ही, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास के मुताबिक, तो किसान अधिकांश पारंंपरिक धान- गेहूं की भांति फसलों का उत्पादन करते हैं। इसकी वजह से प्रति हेक्टेयर में 50 हजार रुपये की आय होती है। हालांकि, लीची की खेती में परिश्रम के साथ- साथ लागत की भी ज्यादा जरूरत होती है। वहीं यदि किसान धान-गेहूं के स्थान पर लीची का उत्पादन करते हैं, तो उनको कम खर्चा में काफी अधिक लाभ मिलेगा। साथ ही, उत्पादकों को खर्चा भी काफी कम करना होगा।
लीची की इस किस्म से बंपर पैदावार और आमदनी हो सकती है

लीची की इस किस्म से बंपर पैदावार और आमदनी हो सकती है

बिहार राज्य में सर्वाधिक लीची का उत्पादन किया जाता है। यहां वर्ष 2021-22 में 308.1 मीट्रिक टन लीची की पैदावार हुई थी। बिहार राज्य के लीची उत्पादक किसान भाइयों के लिए एक बड़ी खबर है। राज्य सरकार लीची की नवीन किस्म का उत्पादन करने वाले किसानों को प्रोत्साहित कर रही है। विशेष बात यह है, कि सरकार द्वारा राज्य में लीची की पैदावार में वृद्धि करने हेतु यह कदम उठाया गया है। दरअसल, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र द्वारा एक ऐसी किस्म तैयार की है, जिसका उत्पादन करने पर लीची का उत्पादन काफी बढ़ जाएगा। इससे प्रदेश में लीची की पैदावार को बढ़ावा मिलेगा। मीड़िया खबरों के मुताबिक, बिहार राज्य में अकेले 43 फीसदी लीची का उत्पादन किया जाता है। मुजफ्फरपुर की शाही लीची तो अपने स्वाद की वजह से पूरे विश्व में मशहूर है। यही कारण है, कि बिहार सरकार विशेषकर लीची की प्रजाति गंडकी योगिता, गंडकी लालिमा एवं गंडकी संपदा की खेती करने के लिए किसानों को बढ़ावा दिया जा रहा है। वहीं, बिहार के कृषि मंत्री कुमार सर्वजीत ने बताया है, कि राज्य सरकार और एनआरसीएल (मुजफ्फरपुर) लीची उत्पादन, गुणवत्ता एवं भंडारण में सुधार करने हेतु एकजुट होकर कार्य कर रही है। यह भी पढ़ें: खुशखबरी: बिहार के मुजफ्फरपुर के अलावा 37 जिलों में भी हो पाएगा अब लीची का उत्पादन मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध शाही लीची को जीआई टैग प्राप्त हो चुका है। यह अपनी अनोखी सुगंध की वजह से जानी जाती है। इसके अंदर ज्यादा रस एवं सामान्य से छोटी गुठली विघमान रहती है।

18 से 23 फीसद फसल क्षतिग्रस्त हो चुकी है

बतादें, कि लीची एक नॉन-क्लिमैक्ट्रिक फल है। नॉन-क्लिमैक्ट्रिक फलों की विशेषता यह है, कि यह सिर्फ पेड़ पर लगे रहने के दौरान ही पकते हैं। अगर पेड़ से उसको तोड़ लिया जाए, तो इसका पकना समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में पके हुए लीची के फलों को ही पेड़ों से तोड़ा जाता है। साथ ही, ऐसे में इसके जल्दी खराब होने की संभावना रहती है। इसलिए इसको दीर्घ काल तक भंडारित नहीं किया जा सकता है। साथ ही, इसकी कटाई के उपरांत 18 से 23 फीसद तक फसलों को हानि पहुँचती है। यही कारण है, कि सरकार किसानों से लीची की नई किस्म का उत्पादन करने की अपील कर रही है।

2021-22 में लीची की पैदावार 308.1 मीट्रिक हुई थी

अधिकारियों के मुताबिक, गंडकी संपदा लीची काफी समय में पकती है। यह जून माह के बीच तक पक कर तैयार हो जाती है। गंडकी सम्पदा लीची का वजन 35-42 ग्राम तक होता है। इसका गूदा मलाईदार-सफेद, मुलायम एवं रसदार होता है। इसकी सुगंध भी काफी अच्छी होती है। इसके एक पेड़ से 140 किलो तक लीची अर्जित कर सकते हैं। इसी प्रकार ‘गंडकी योगिता’ भी धीमी गति से उगती है, जो गर्मी की लहरों को झेल सकती है। बिहार में साल 2021-22 में लीची उत्पादन 308.1 मीट्रिक हुआ था। वहीं, साल 2020-21 में 308 मीट्रिक टन पैदावार हुई थी। बतादें कि शाही लीची को 2018 में जीआई टैग हांसिल होने से इसकी संपूर्ण विश्व में मांग बढ़ गई है।
विदेशों में लीची का निर्यात अब खुद करेंगे किसान, सरकार ने दी हरी झंडी

विदेशों में लीची का निर्यात अब खुद करेंगे किसान, सरकार ने दी हरी झंडी

लीची बिहार की एक प्रमुख फसल है। पूरे राज्ये में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। बिहार के मुजफ्फरपुर को लीची उत्पादन का गढ़ माना जाता है। यहां की लीची विश्व प्रसिद्ध है, इसलिए इस लीची की देश के साथ विदेशों में भी जबरदस्त मांग रहती है। लीची को लोग फल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। साथ ही इससे जैम बनाया जाता है और महंगी शराब का निर्माण भी किया जाता है। जिससे दिन प्रतिदिन बिहार की लीची की मांग बढ़ती जा रही है। बढ़ती हुई मांग को देखते हुए सरकार ने प्लान बनाया है कि अब किसान खुद ही अपनी लीची की फसल का विदेशों में निर्यात कर सेकेंगे। अब किसानों को अपनी फसल औने पौने दामों पर व्यापारियों को नहीं बेंचनी पड़ेगी। अगर भारत में लीची के कुल उत्पादन की बात करें तो सबसे ज्यादा लीची का उत्पादन बिहार में ही किया जाता है। यहां पर उत्पादित शाही लीची की विदेशों में जमकर डिमांड रहती है। इसलिए सरकार ने कहा है कि किसान अब इस लीची को खुद निर्यात करके अच्छा खास मुनाफा कमा सकेंगे। इसके लिए सरकार ने मुजफ्फरपुर जिले के चार प्रखंडों में 6 कोल्ड स्टोरेज और 6 पैक हाउस का निर्माण करवाया है। इसके साथ ही 6 पैक हाउस को निर्देश दिए गए हैं कि वो किसानों की यथासंभव मदद करें। इन 6 पैक हाउस में प्रतिदिन 10 टन लीची की पैकिंग की जाएगी, जिसका सीधे विदेशों में निर्यात किया जाएगा।

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बिहार लीची एसोसिएशन के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह ने बताया है कि निर्यात का काम बिहार लीची एसोसिएशन देखेगी, तथा इस काम में किसानों की यथासंभव मदद की जाएगी। उन्होंने बताया कि पहले मुजफ्फरपुर में मात्र एक प्रोसेसिंग यूनिट की व्यवस्था थी, लेकिन अब मांग बढ़ने के कारण सरकार ने जिले में 6 प्रोसेसिंग यूनिट लगवा दी हैं। अगर भविष्य में कोल्ड स्टोरेज और पैक हाउस की मांग बढ़ती है तो उसकी व्यवस्था भी की जाएगी। जिससे किसान बेहद आसानी से अपने उत्पादों को विदेशों में निर्यात कर पाएंगे। बिहार के कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया है कि इस प्रोजेक्ट को बागवानी मिशन के तहत लॉन्च किया गया है। जिससे किसानों को अपने उत्पादों को मनचाहे बाजार में एक्सपोर्ट करने में मदद मिले। लीची की प्रोसेसिंग यूनिट लगाने पर 4 लाख रुपये का खर्च आता है, जिसमें 50 फीसदी सब्सिडी सरकार देती है। ऐसे में अगर किसान चाहें तो खुद ही लीची की प्रोसेसिंग यूनिट लगा सकते हैं और खुद के साथ अन्य किसानों की भी मदद कर सकते हैं। उत्पादन को देखते हुए आने वाले दिनों में जिलें में लीची की प्रोसेसिंग यूनिट्स में बढ़ोत्तरी होगी।

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कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया है कि वर्तमान में मुजफ्फरपुर के मानिका, सरहचियां, बड़गांव, गंज बाजार और आनंदपुर में कोल्ड स्टोरेज और पैक हाउस खोले गए हैं। जहां लीची को सुरक्षित रखा जा सकेगा। इनका उद्घाटन आगामी 19 मई को किया जाएगा। किसानों को मदद करने के लिए बिहार लीची एसोसिएशन, भारतीय निर्यात बैंक और बिहार बागवानी मिशन तैयार हैं। ये किसानों को यथासंभव मदद उपलब्ध करवाएंगे, ताकि मुजफ्फरपुर की लीची का विदेशों में बड़ी मात्रा में निर्यात हो सके।
गुलाबी फलों का उत्पादन कर किसान सेहत के साथ साथ कमाऐं मुनाफा

गुलाबी फलों का उत्पादन कर किसान सेहत के साथ साथ कमाऐं मुनाफा

गुलाबी रंग के फल हमारे शरीर के लिए काफी लाभकारी होते हैं। आज हम आपको कुछ ऐसे ही फलों के विषय में बताने जा रहे हैं। गुलाबी खाद्य पदार्थ, एंथोसायनिन और बीटालेंस जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। यह हमारे शरीर में एंटीऑक्सिडेंट का कार्य करते हैं, जो प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करते हैं। हम अपनी थाली में कई तरह के फलों और सब्जियों का उपयोग करते हैं। परंतु, गुलाबी रंग के खाद्य पदार्थ हमारे शरीर के लिए बेहद ही लाभकारी होता है। ऐसे में आज हम आपको गुलाबी रंग के कुछ फलों के विषय में जानकारी देने जा रहे हैं, जो हमारे शरीर की उत्तम सेहत के लिए आवश्यक होता है। प्राकृतिक रूप से गुलाबी खाद्य पदार्थों में एंथोसायनिन और बीटालेन, फ्लेवोनोइड और एंटीऑक्सिडेंट युक्त यौगिक शम्मिलित होते हैं, जो शरीर को कई प्रकार की बीमारियों से सुरक्षा करता है।

गुलाबी फलों का उत्पादन

चुकंदर

चुकंदर हमारे शरीर का रक्त परिसंचरण को बढ़ाने, रक्तचाप को सुदृढ़ रखने में सहायता करता है। कच्चे चुकंदर के रस का सेवन, सलाद एवं सब्जी के रूप में उपयोग करना चाहिए। यह हमारे शरीर के लिए जरूरी विटामिन, खनिज एवं फोलेट की मात्रा की पूर्ति करता है। इसके अलावा चुकंदर में एंटीऑक्सिडेंट पाए जाते हैं जो कैंसर-रोधी गुणों के लिए जाने जाते हैं।

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अनार

अनार का सेवन हमारी रक्त शर्करा और रक्तचाप को नियंत्रित करता है। यह हमारी पाचन संबंधी समस्याओं के लिए भी लाभदायक होता है। इसके अलावा इन फलों में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण विघमान होते हैं, जो हमें रोगों से बचाता है। अनार का जूस मूत्र संक्रमण के लिए एक निवारक का कार्य करता है।

ड्रैगन फ्रूट

यह अनोखा आकर्षक उष्णकटिबंधीय फल है, इसका सेवन हमारी मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियों से रक्षा करता है। आहार में ड्रैगन फ्रूट को शम्मिलित करने से यह हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को अच्छा बनाता है। साथ ही, हृदय से जुड़ी बीमारियों के लिए भी अच्छा माना जाता है।

बैंगनी पत्तागोभी

यह रंगीन पत्तेदार हरी पत्तागोभी एंटीऑक्सीडेंट का एक शक्तिशाली भंडार होती है, जो हमारे शरीर की सेलुलर क्षति के विरुद्ध एक प्रभावी सुरक्षा प्रदान करती है। इसमें विघमान विटामिन सी एवं कैरोटीन की भरपूर मात्रा के साथ-साथ पर्याप्त फाइबर भी मौजूद होता है, जो हमारे शरीर की प्रतिरक्षा करता है।

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लीची

लीची तांबा, लोहा, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस जैसे खनिज तत्वों से भरपूर होती है। यह हमारे शरीर की हड्डियों को शक्ति प्रदान करता है। यह मोतियाबिंद, मधुमेह, तनाव एवं हृदय रोगों से भी शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं।