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वानिकी

भारत के वनों के प्रकार और वनों से मिलने वाले उत्पाद

भारत के वनों के प्रकार और वनों से मिलने वाले उत्पाद

प्राकृतिक वनस्पतियों में विविधता के मामले में भारत विश्व के कुछ गिनती के देशों में शामिल है। हिमालय की ऊंचाइयों से लेकर पश्चिमी घाट और अंडमान तथा निकोबार दीप समूह पर पाई जाने वाली वनस्पतियां भारत के लोगों को अच्छा वातावरण उपलब्ध करवाने के अलावा कई प्रकार के फायदे पहुंचाती है। भारत में पाए जाने वाले जंगल भी इन्हीं वनस्पतियों की विविधताओं के हिस्से हैं।

क्या होते हैं जंगल/वन (Forest) ?

एक परिपूर्ण और बड़े आक्षेप में बात करें तो मैदानी भागों या हिल (Hill) वाले इलाकों में बड़े क्षेत्र पर, पेड़ों की घनी आबादी को जंगल कहा जाता है। दक्षिण भारत में पाए जाने वाले जंगलों से, उत्तर भारत में मिलने वाले जंगल और पश्चिम भारत के जंगल में अलग तरह की विविधताएं देखी जाती है।

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भारत में पाए जाने वाले जंगलों के प्रकार :

जलवायु एवं अलग प्रकार की वनस्पतियों के आधार पर भारतीय वन सर्वेक्षण संस्थान (Forest Survey of India - FSI) के द्वारा भारतीय वनों को 5 भागों में बांटा गया है :

सामान्यतः भारत के दक्षिणी हिस्से में पाए जाने वाले इस प्रकार के वन उत्तरी पूर्वी राज्य जैसे असम और अरुणाचल प्रदेश में भी फैले हुए हैं।

इस प्रकार के वनों के विकास के लिए वार्षिक वर्षा स्तर 200 सेंटीमीटर से अधिक होना चाहिए और वार्षिक तापमान लगभग 22 डिग्री सेंटीग्रेड होना चाहिए।

इस प्रकार के वनों में पाए जाने वाले पौधे लंबी उचाई तक बढ़ते हैं और लगभग 60 मीटर तक की ऊंचाई प्राप्त कर सकते हैं।

इन वनों में पाए जाने वाले पेड़ पौधे वर्ष भर हरे-भरे रहते हैं और इनकी पत्तियां टूटती नहीं है, इसीलिए इन्हें सदाबहार वन कहा जाता है

भारत में पाए जाने वाले सदाबहार वनों में रोजवुड (Rosewood), महोगनी (Mahogany) और ईबोनी (ebony) जैसे पेड़ों को शामिल किया जा सकता है। उत्तरी पूर्वी भारत में पाए जाने वाले चीड़ (Pine) के पेड़ भी सदाबहार वनों की विविधता के ही एक उदाहरण हैं।

भारत के कुल क्षेत्र में इस प्रकार के वनों की संख्या सर्वाधिक है, इन्हें मानसून वन भी कहा जाता है। इस प्रकार के वनों के विकास के लिए वार्षिक वर्षा 70 से 200 सेंटीमीटर के बीच में होनी चाहिए।

पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट के कुछ इलाकों के अलावा उड़ीसा और हिमालय जैसे राज्यों में पाए जाने वाले वनों में, शीशम, महुआ तथा आंवला जैसे पेड़ों को शामिल किया जाता है। पर्णपाती वन उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षेत्रों में भी पाए जाते हैं, जिनमें तेंदू, पलाश तथा अमलतास और बिल्व तथा खैर के पेड़ों को शामिल किया जा सकता है।

इस प्रकार के वनों में पाए जाने वाले पेड़ों की एक और खास बात यह होती है, कि मानसून आने से पहले यह पेड़ अपनी पत्तियों को गिरा देते हैं और जमीन में बचे सीमित पानी के इस्तेमाल से अपने आप को जीवित रखने की कोशिश करते हैं, इसीलिए इन्हें पतझड़ वन भी कहा जाता है।

  • उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन (Tropical Thorn Forest) :

50 सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उगने वाले कांटेदार वनों को सामान्यतः वनों की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाता है, क्योंकि इनमें घास और छोटी कंटीली झाड़ियां ज्यादा होती है।

पंजाब, हरियाणा और राजस्थान तथा गुजरात के कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इन वनों को देखा जाता है। बबूल पेड़ और नीम तथा खेजड़ी के पौधे इस श्रेणी में शामिल किए जा सकते हैं।

  • पर्वतीय वन (Montane Forest) :

हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाले इस प्रकार के वन अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर उगने में सहज होते हैं, इसके अलावा दक्षिण में पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट के कुछ इलाकों में भी यह वन पाए जाते हैं।

वनीय विज्ञान के वर्गीकरण के अनुसार इन वनों को टुंड्रा (Tundra) और ताइगा (Taiga) कैटेगरी में बांटा जाता है।

1000 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले यह पर्वतीय जंगल, पश्चिमी बंगाल और उत्तराखंड के अलावा तमिलनाडु और केरल में भी देखने को मिलते हैं।

देवदार (Cedrus Deodara) के पेड़ इस प्रकार के वनों का एक अनूठा उदाहरण है। देवदार के पेड़ केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही देखने को मिलते हैं। देवदार के पेड़ों का इस्तेमाल विनिर्माण कार्यों में किया जाता है।

विंध्या पर्वत और नीलगिरी की पहाड़ियों में उगने वाले पर्वतीय वनों को 'शोला' नाम से जाना जाता है।

  • तटीय एवं दलदली वन (Littoral and Swamp Forest) :

वेटलैंड वाले क्षेत्रों में पाए जाने वाले इस प्रकार के वन उड़ीसा की चिल्का झील (Chilka Lake) और भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय पार्क के आस पास के क्षेत्रों के अलावा सुंदरवन डेल्टा क्षेत्र और राजस्थान, गुजरात और कच्छ की खाड़ी के आसपास काफी संख्या में पाए जाते हैं।

यदि बात करें इन वनों की विविधता की तो भारत में विश्व के लगभग 7% दलदली वन पाए जाते है, इन्हें मैंग्रोव वन (Mangrove forest) भी कहा जाता है।

वर्तमान समय में भारत में वनों की स्थिति :

भारतीय वन सर्वेक्षण के द्वारा जारी की गयी इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2021 (Forest Survey of India - STATE OF FOREST REPORT 2021) के अनुसार, साल 2019 की तुलना में भारतीय वनों की संख्या में 1500 स्क्वायर किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई है और वर्तमान में भारत के कुल क्षेत्रफल के लगभग 21.67 प्रतिशत क्षेत्र में वन पाए जाते हैं। "इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2021" से सम्बंधित सरकारी प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) रिलीज़ का दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें मध्य प्रदेश राज्य फॉरेस्ट कवर के मामले में भारत में पहले स्थान पर है। पर्यावरण के लिए एक बेहतर विकल्प उपलब्ध करवाने वाले वन क्षेत्र पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में सहयोग के अलावा किसानों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकते है।

कृषि वानिकी से आएगी समृद्धि

कृषि वानिकी से आएगी समृद्धि

खेती अब घाटे का सौदा होती जा रही है।कारण यह है कि खेती की लागत कई गुना बढ़ी है और किसान को उनके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।खेती में यदि मुनाफा बढ़ाना है तो किसानों को कृषि वानिकी को अपनाना पड़ेगा। यह दो तरह की हो सकती है। फलदार वृक्षों की और व्यावसायिक उपयोग में आने वाले पौधों को लगाकर खेती की आमदनी बढ़ाई जा सकती है। 

कृषि वानिकी को खेती के साथ कई तरह से अपनाया जा सकता है। सबसे सरल तरीका खेतों की मेड़ों पर पौधों को रोक कर वानिकी कार्य करके किया जा सकता है। इसमें कृषि भूमि का एक अंश भी उपयोग में नहीं आता और कुछ साल बाद लाखों रुपए की इकट्ठी आए पौधों से हो जाती है। दूसरे तरीके से की गई मानी की मैं खेत के अंदर नियत दूरी पर ट्रैक्टर से खेत को जोतने लायक जगह छोड़कर पौधे लगाए जाते हैं।इनमें इमारती लकड़ी के अलावा फल वृक्षों को भी लगाया जा सकता है।

मेनू पर पॉपुलर जैसे लंबे बढ़ने वाले पौधे लगाकर बगैर किसी अतिरिक्त खर्चे के आए बढ़ाई जा सकती है। फल वृक्षों को लगाने के लिए कृषि इस समय अपने जनपद के जिला उद्यान अधिकारी कार्यालय से संपर्क कर वहां से और दैनिक मिशन एवं राष्ट्रीय कृषि विकास योजना जैसी योजनाओं में निशुल्क पौधे और उन्हें लगाने की धनराशि भी प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा बाल लगाने के लिए निर्धारित धनराशि खर्चे के लिए सरकार द्वारा दी जाती है।

अमरूद और आंवला के पौधे लगाकर 3 साल तक बाग तैयार होने तक से फसली खेती भी की जा सकती है। इसके अलावा पपीता नींबू करौदा आदि के पौधों को भी खेती के साथ लगाया जा सकता है। पौधे लगाने के लिए मई जून के महीने में 1 मीटर गहरा और 1 मीटर चौड़ा गड्ढा उचित दूरी पर पंक्ति में खुद देना चाहिए। गड्ढे में निकली डेढ़ फिट मिट्टी को एक तरफ और नीचे की डेटशीट मिट्टी को दूसरी तरफ डालना चाहिए।कुछ दिन बाद धूप में अच्छी तरह से कई होने के उपरांत गड्ढे से खुद ही गई ऊपरी डेढ़ फीट मिट्टी में गोबर की खाद मिलाकर गड्ढे को आधा भर देना चाहिए। यदि क्षेत्र में दिमाग की समस्या हो तो वह की खाद के साथ दीमक मारने की दवा मिला देनी चाहिए। इसके बाद जैसे ही बरसात शुरू हो 1-2 बरसात होने के बाद पौधे रोप देने चाहिए। जुलाई के पहले हफ्ते में मानसूनी बारिश के बाद पौधे रोपने से पौधे तत्काल जम जाते हैं। उनकी मृत्यु दर बेहद कम हो जाती है। 

  क्या होता है लाभ

  • वानिकी से खेती से अतिरिक्त आय मिलती है।
  • खेत से ही चारा लकड़ी आदि मिल जाता है।
  • खेती के साथ पौधे लगाने से मृदा सुधार होता है।
  • पौधों को कभी भी काट छांट कर आर्थिक तंगी दूर की जा सकती है।
  • फौजी फसल को प्राकृतिक आपदाओं से बचाने का काम करते हैं।
  • मीणा पर पौधे लोगों से मीणा कटान से होने वाले आपसी झगड़े नहीं होते।

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने आसियान भारत बैठक में एलान किया है कि पोषक अनाज उत्पादों को प्रोत्साहित करेगा भारत

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने आसियान भारत बैठक में एलान किया है कि पोषक अनाज उत्पादों को प्रोत्साहित करेगा भारत

खेती और वानिकी के संबंध में 7वीं आसियान भारत मंत्रीस्तरीय बैठक (एआईएमएमएएफ;AIMMAF - ASEAN-India Ministerial Meeting held on Agro-Forestry) बुधवार 26-अक्टूबर 2022 को वर्चुअल माध्यम से सम्पन्न हुई। बैठक दौरान लाओ पीडीआर, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, वियतनाम, थाईलैंड, ब्रुनेई दारुस्सलाम, कंबोडिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर के कृषि मंत्रियों की भी मौजूदगी रही। साथ ही, केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता की पुनःवृत्ती की, जिसमें भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में आसियान को केंद्र बिंदु में माना है। इसके साथ ही उन्होंने क्षेत्र में मजबूत और उन्नत विकास सुनिश्चित करने के लिए कृषि विकास के लिए आसियान के साथ गहनता से क्षेत्रीय सहयोग पर ध्यान दिया। [embed]https://twitter.com/nstomar/status/1585234444600102914?[/embed] आसिआना बैठक में, आसियान-भारत सहयोग की मध्यावधि कार्ययोजना (साल 2021-2025) के चलते विभिन्न कार्यक्रम एवं गतिविधियों के कार्यप्रणाली की प्रगति का निरीक्षण किया। बैठक में केंद्रीय मंत्री ने पोषक खाद्य के रूप में मिलेट (पोषक-अनाज; Millets) एवं अंतरराष्ट्रीय पोषक-अनाज वर्ष 2023 (इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स (आईवायओएम/IYoM)) के महत्व का वर्णन करते हुए आसियान सदस्य देशों से निवेदन किया है कि वे मिलेट के पैदावार, प्रसंस्करण, उपभोग एवं मूल्य संवर्धन की वृद्धि में भारत के प्रयासों में सहयोगिक भूमिका अदा करें।
इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स (IYoM) 2023 योजना का सरकारी दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें
साथ ही, केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि लोगों के स्वास्थ्य और पोषण के लिए पोषक-अनाज के उत्पादों को भारत प्रोत्साहित करेगा। पोषक-अनाज पौष्टिक, कम संसाधन आवश्यकता वाले एवं ज्यादा वातानुकूलित कृषि-खाद्य प्रणालियों के निर्माण में बेहद सहायक साबित होते हैं। वहीं, बैठक में, आसियान भारत संबंधों की 30वीं वर्षगांठ का भी धूम धाम से स्वागत हुआ। बैठक में, कृषि एवं वानिकी में आसियान-भारत सहयोग की सराहना की गयी।


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आसियान भारत के सहयोग की कटिबद्धता की चर्चा की गयी

बैठक के दौरान में कहा गया है कि आसियान और भारत में सुरक्षित तथा पौष्टिक कृषि उत्पादों का सुगम प्रवाह निर्धारित करके कोविड-19 महामारी के अभूतपूर्व प्रभाव को समाप्त करने के लिए, महामारी के बाद किए जाने वाले रिकवरी उपायों के कार्यान्वयन हेतु आसियान-भारत सहयोग के तहत निरंतर उपाय सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने डिजिटल कृषि, प्रकृति-हितैषी कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, वैल्यू चेन, कृषि विपणन खाद्य सुरक्षा, पोषण, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन एवं क्षमता निर्माण में आसियान के साथ भारत के सहयोग को बढ़ाने में पूर्ण सहमती जताई है। Source : PIB (Press Information Bureau - Government of India) https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1870992
जानें भारत में पौराणिक काल से की जाने वाली कृषि के बारे में, कमाएं कम खर्च में अधिक मुनाफा

जानें भारत में पौराणिक काल से की जाने वाली कृषि के बारे में, कमाएं कम खर्च में अधिक मुनाफा

परमाकल्चर' कृषि को 'कृषि का स्वर्ग' कहा जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, इसकी वजह फसल, मवेशी, पक्षी, मछलियां, झाड़ी, पेड़ एक पारितंत्र का निर्माण कर देते हैं। न्यूनतम व्यय करके किसानों की आमदनी बढ़ोत्तरी करने की उम्दा रणनीति है। खेती-किसानी में हुए समय समय पर नवीन परिवर्तन देखे जा रहे हैं। इस क्षेत्र में प्रयासरत कृषि वैज्ञानिकों के आविष्कार एवं कुछ किसानों के नवाचार का परिणाम है। वर्तमान में भारत भी कृषि के क्षेत्र में बहुत मजबूती से उभर कर सामने आ रहा है, यहां कृषि संबंधित काफी दिक्कतें तो हैं, साथ ही समाधान भी निकल लिया जाता है। आजकल कृषकों के समक्ष सबसे बड़ी दिक्क्त यह है कि उनको किसी भी फसल के उत्पादन हेतु काफी खर्च करना पड़ता है, जिसकी वजह से किसान समुचित लाभ अर्जित नहीं कर पते हैं। लेकिन किसानों की खेती में दिलचस्पी होने के लिए लाभ अहम भूमिका निभाता है। विदेशी किसानों के समक्ष यह चुनौती नहीं है, क्योंकि विदेशी किसान 'परमाकल्चर' कृषि पर कार्यरत हैं। इस इको-सिस्टम के अंतर्गत पशु, पक्षी, मछली, फसल, झाडियां, पेड़-पौधे आपस में ही एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। एक तरह से देखें तो भारत की एकीकृत कृषि प्रणाली के समरूप, जिसके अंतर्गत खेती-किसानी सहित पशु चारा उत्पादन, सिंचाई, बागवानी, वानिकी, पशुपालन, मुर्गी पालन, मछली पालन, खाद निर्माण इत्यादि का कार्य एक स्थाई भूमि पर किया जाता है। इसको स्थाई कृषि अथवा परमाकल्चर के नाम से जाना जाता है। एक बार आरंभ में व्यय करना आवश्यक होता है, उसके उपरांत इस इकोसिस्टम के माध्यम से आपस में प्रत्येक वस्तु की आपूर्ति होती रहती है एवं न्यूनतम व्यय में अत्यधिक पैदावार अर्जित कर सकते हैं।

परमाकल्चर फार्मिंग से हो सकता है अच्छा मुनाफा

यदि किसान चाहे तो स्वयं के खेत को परमाकल्चर में परिवर्तित कर सकता है। लघु किसानों हेतु तो यह उपाय वरदान वरदान के समरूप है। कम भूमि द्वारा बेहद लाभ अर्जित करने हेतु परमाकल्चर द्वारा बेहतरीन लाभ कमाया जा सकता है क्योंकि यह काफी अच्छा विकल्प होता है। इस कृषि पद्धति के अंतर्गत सर्वाधिक ध्यान जल के प्रबंधन एवं मृदा की संरचना को अच्छा बनाने हेतु रहता है। मृदा की संरचना यदि उत्तम रही तो 1 एकड़ भूमि द्वारा भी लाखों में लाभ लिया जा सकता है। परमाकल्चर कृषि आमदनी का बेहतरीन स्त्रोत होने के साथ साथ पर्यावरण संरक्षण एवं जैवविविधता हेतु भी बहुत ज्यादा लाभदायक होती है।
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परमाकल्चर के सबसे बेहतरीन बात यह है, कि इसके लिए किसी प्रकार का अतिरिक्त निवेश नहीं किया जाता है। विशेषरूप से किसानों के समीप गांव में हर तरह के संसाधन उपलब्ध होते हैं। परमाकल्चर की सहायता से किसान को कम व्यय में भिन्न-भिन्न प्रकार का उत्पादन (उत्पादन में विविधता) एवं अधिकाँश मात्रा में उत्पादन अर्जन करने में काफी सहायता प्राप्त होती है। परमाकल्चर को पैसा बचाकर, पैसा कमाने वाला सिस्टम भी कहा जाता है, क्योंकि पशुओं के अवशिष्ट द्वारा खाद-उर्वरक निर्मित किए जाते हैं, जिससे कि रसायनिक उर्वरकों पर किए जाने वाला व्यय बच जाता है। जिससे पशुओं को खेत से बहुत सारी फसलों के अवशेष खाने हेतु मिल जाते हैं, जो दूध के उत्पादन में भूमिका निभाता है। जल का समुचित प्रबंधन करने से सिंचाई हेतु किए जाने वाला व्यय बच जाता है। साथ ही, इसी जल के अंदर मछली पालन भी किया जा सकता है। जिसके हेतु खेत के एक भाग में तालाब निर्मित किया जाता है, जहां बारिश का जल इकत्रित किया जाता है। इस कृषि पद्धति से कोई हानि नहीं होती है। अगर किसान खेत को परमाकल्चर के जरिए सृजन करें तो पर्यावरण सहित किसान की प्रत्येक जरूरत खेत की चारदीवारी में ही पूर्ण हो सकती है।

भारत एक ऐसा देश है जहां परमाकल्चर कृषि पौराणिक काल से की जाती है

वर्तमान के आधुनिक दौर में मशीन, तकनीक एवं विज्ञान द्वारा खेती के ढ़ांचे को परिवर्तित करके रख दिया है, परंतु आज भी भारत ने अपनी परंपरागत विधियों द्वारा विश्वभर में अपना लोहा मनवाने का कार्य किया है। वर्तमान में भी देश कृषि उत्पादन में सबसे आगे है, साथ ही, भारत अनेकों देशों की खाद्य आपूर्ति को पूर्ण करने में अहम भूमिका निभाता है। देश द्वारा उच्च स्तरीय पैमाने पर कृषि खाद्य उत्पादों का निर्यात किया जा रहा है। आज हम भले ही कृषि क्षेत्र में एडवांस रहने हेतु विदेशी कल्चर एवं विधियों का प्रयोग कर रहे हों। परंतु, बहुत से ऐसी चीजें भी मौजूद हैं, जिनको विदेश में रहने वाले लोगों ने भी भारत से प्रेरित होकर आरंभ किया है। उन्हीं में से एक परमाकल्चर भी है। हो सकता है, आपको यह सुनने में अजीब सा अनुभव हो, परंतु भारत के लिए परमाकल्चर किसी नई विधि का का नाम नहीं है। देश में इस कृषि पद्धति को वैदिक काल से ही उपयोग में लिया जा रहा है। क्योंकि भारत ने आरंभ से ही जैव विविधता एवं पर्यावरण संरक्षण का कार्य करते हुए खाद्य आपूर्ति को सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि मध्य के कुछ दशकों में कृषि के क्षेत्र में तीव्रता से बहुत ज्यादा परिवर्तन देखने को मिले हैं, परिणामस्वरूप हम अपने ही महत्त्व को विस्मृत करते जा रहे हैं।
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आपको जानकारी के लिए बतादें कि परमाकल्चर की भाँति कृषि भारत में युगों-युगों से चलती आ रही है। इस कृषि में किसान परंपरागत विधि से उत्पादन करते हैं। पर्यावरण संतुलन हेतु खेत के चारों तरफ वृक्ष लगाए जाते हैं। पशुओं को पाला जाता है, जिनसे खेतों में जुताई की जा सके। इन पशुओं को खेतों से उत्पन्न चारा खिलाया जाता है, बदले में पशु दूध व गोबर प्रदान करते हैं। दूध का किसान अपने व्यक्तिगत कार्य में उपयोग करते हैं अथवा बेचकर धन कमाते हैं वहीं दूसरी तरफ गोबर का उपयोग खेती करने हेतु खाद निर्माण में किया जाता है। इस प्रकार से एक-दूजे की जरूरतें पूर्ण होती रहती हैं, वो भी किसी बाहरी अतिरिक्त व्यय के बिना ही। साथ ही, आपस में संतुलन भी कायम रहता है। आजकल कृषि करने हेतु बीज खरीदने के चलन में वृद्धि हुई है, जो कि जलवायु परिवर्तन के अनुरूप है। जबकि प्राचीन काल में फसल द्वारा बीजों को बचाकर आगामी बुवाई हेतु एकत्रित करके रखा जाता था, यही वजह है, कि पौराणिक काल से ही कृषि एक संतुलन का कार्य था ना कि किसी खर्च का।
10 रुपये की फिक्स डिपॉजिट पर मिलेंगे पेड़, किसानों की होगी बंपर कमाई

10 रुपये की फिक्स डिपॉजिट पर मिलेंगे पेड़, किसानों की होगी बंपर कमाई

इन दिनों देश में खेती किसानी को भी मुनाफे वाले व्यवसायों में गिना जाने लगा है, क्योंकि अब देश के किसान आधुनिक तरीकों से खेती करके कम समय में अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं। अब किसान पारंपरिक खेती के अलावा पेड़ों की खेती की तरफ भी आकर्षित हो रहे हैं। अगर किसान धैर्य बनाए रखें तो कई ऐसे पेड़ हैं जो समय के साथ किसानों को बंपर मुनाफा प्रदान करते हैं। किसानों की आय बढ़ाने को ध्यान में रखते हुए बिहार राज्य के वन विभाग ने एक नई योजना लॉन्च की है, जिसे 'कृषि वानिकी योजना' कहा जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत वन विभाग की तरफ से किसानों को मात्र 10 रुपये की सिक्योरिटी डिपोजिट पर पौधे दिए जा रहे हैं। 3 साल बाद यह सिक्योरिटी डिपोजिट 6 गुना अधिक अनुदान के साथ किसानों को वापस कर दी जाएगी। इस योजना का उद्देश्य खेतों में फसलों के साथ बड़े स्तर पर पेड़ लगाना है, जिसके लिए सरकार लगातार प्रयत्नशील है। ये भी पढ़े: इन 8 योजनाओं से बढ़ेगी किसानों की स्किल, सरकार दे रही है मौका ट्विटर पर जारी 'मुख्यमंत्री कृषि वानिकी योजना' के नोटिफिकेशन में कहा गया है कि इस योजना के अंतर्गत 10 रुपये प्रति पौधा सिक्योरिटी डिपोजिट देकर वन विभाग की नर्सरी से 25 से अधिक पौधे खरीदने होंगे। अगर तीन साल बाद 50 फीसदी पौधे जीवित रहते हैं तो किसान को प्रति पौधा 60 रुपये का अनुदान दिया जाएगा। साथ ही जमा किया गया सिक्योरिटी डिपोजिट भी किसान को वापस कर दिया जाएगा।

इस योजना से ये होंगे लाभ

इस योजना के अंतर्गत पेड़ लगाने से किसानों को अतिरिक्त आय होगी। इसके साथ ही शीशम, अमरूद, गंभीर, आंवला, महोगनी, सागौन, पीपल, जामुन, कचनार, गुलमोहर, आम नीलगिरी, नीम, कदम, बहेड़ा, पलास आदि के पेड़ों की संख्या भी बढ़ेगी। ये पेड़ आगे चलकर पर्यावरण संरक्षण में भी अपना योगदान देंगे।

इस योजना के तहत लाभ उठाने के लिए ऐसे करें आवेदन

इस योजना का लाभ उठाने के लिए बिहार राज्य का निवासी होना आवश्यक है। इसके लिए किसान भाई अपने जिले के कृषि विभाग या वन विभाग के कार्यालय में जाकर आवेदन कर सकते हैं। आवेदन के साथ किसानों को मांगे गए दस्तावजों की फोटो कॉपी लगानी होगी। जिसके बाद अधिकारियों के द्वारा वेरिफिकेशन किया जाएगा। वेरिफिकेशन पूरा होने के बाद पौधे किसानों को दे दिए जाएंगे। साथ ही समय समय पर इन पौधों का निरीक्षण भी किया जाएगा। 3 साल बाद यदि 50 फीसदी पौधे सुरक्षित रहते हैं तो अनुदान और सिक्योरिटी डिपॉजिट की राशि किसान के खाते में जमा कर दी जाएगी। इसके अलावा अधिक जानकारी बिहार के वन विभाग की वेबसाइट  https://forestonline.bihar.gov.in से प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही 0612-2226911 पर फोन के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।
सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों के लिए इसरो (ISRO) ने उठाया महत्वपूर्ण कदम

सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों के लिए इसरो (ISRO) ने उठाया महत्वपूर्ण कदम

सूखाग्रस्त इलाकों के किसान भाइयों के लिए एक अच्छी खबर है। दरअसल, नीति आयोग ने भारतभर में कृषि वानिकी को प्रोत्साहन देने के लिए इसरो उपग्रहों के डेटा का उपयोग करके एक नया भुवन-आधारित पोर्टल जारी किया है। 

इसरो के अनुसार, यह पोर्टल कृषि वानिकी के लिए अनुकूल जमीन की पहचान करने वाले जिला-स्तरीय डेटा तक सार्वभौमिक पहुंच की स्वीकृति देता है। प्रारंभिक आकलनों में मध्य प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान कृषि वानिकी उपयुक्तता के लिए सबसे बड़े राज्यों के तौर पर उभरे हैं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने नीति आयोग के साथ मिलकर भारत के बंजर क्षेत्रों में हरियाली की योजना तैयार की है। सैटेलाइट डाटा और कृषि वानिकी के माध्यम से भारत में वन क्षेत्र में सुधार किया जाएगा। 

योजना के अंतर्गत इसरो के जियोपोर्टल भुवन पर उपलब्ध सैटेलाइट डाटा के माध्यम से कृषि वानिकी उपयुक्तता सूचकांक (एएसआई) स्थापित करने के लिए बंजर भूमि, भूमि उपयोग भूमि कवर, जल निकाय, मृदा कार्बनिक कार्बन और ढलान जैसे विषयगत भू-स्थानिक आंकड़ों को इकट्ठा किया जा रहा है।

प्रारंभिक आकलनों में मध्य प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान कृषि वानिकी उपयुक्तता के लिए सबसे बड़े राज्यों के तौर पर उभरे हैं। जानकारी के अनुसार, नीति आयोग ने 12 फरवरी को भुवन-आधारित ग्रो-पोर्टल जारी किया है। 

ग्रीनिंग एंड रेस्टोरेशन ऑफ वेस्टलैंड विद एग्रोफॉरेस्ट्री (ग्रो) कहे जाने वाले इस पोर्टल के जरिये देश में कृषि वानिकी के साथ-साथ बंजर भूमि को हरा-भरा करना और उसकी पुनरुद्धार की संभावनाओं को तलाशा जा रहा है।

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इस पोर्टल के जरिये राज्य और जिला-स्तरीय कृषि-वानिकी डाटा सभी के लिए उपलब्ध है. यह डाटा कृषि व्यवसायियों, गैर-सरकारी संस्थाओं, स्टार्ट-अप और शोधकर्ताओं को भी इस क्षेत्र में पहलों के लिए आमंत्रित करता है। 

इसरो का कहना है, कि ”एक विश्लेषण से पता चला कि भारत की लगभग 6.18% और 4.91% भूमि क्रमशः कृषि वानिकी के लिए अत्यधिक और मध्यम रूप से उपयुक्त है। 

राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना कृषि वानिकी उपयुक्तता के लिए शीर्ष बड़े आकार के राज्यों के रूप में उभरे, जबकि जम्मू और कश्मीर, मणिपुर और नागालैंड मध्यम आकार के राज्यों में सर्वोच्च स्थान पर रहे।”

नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद के अनुसार, कृषि वानिकी भारत को लकड़ी के उत्पादों के आयात को कम करने, कार्बन पृथक्करण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने और इष्टतम भूमि उपयोग को प्रोत्साहन देने में सहयोग कर सकती है। 

कृषि वानिकी के माध्यम से परती और बंजर भूमि का रूपांतरण करके उन्हें उत्पादक बनाया जा सकता है।