प्राकृतिक खेती ही सबसे श्रेयस्कर : ‘सूरत मॉडल’

0

प्राकृतिक खेती का सूरत मॉडल

गुजरात के सूरत में प्राकृतिक खेती के विषय पर एक सम्मलेन का आयोजन हुआ, जिसको विडियो कान्फरेंसिंग के द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संबोधित करते हुए ‘सूरत मॉडल’ से सीख लेने को कहा.

प्रधानमन्त्री मोदी ने कहा कि “हर पंचायत के 75 किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने में सूरत की सफलता पूरे देश के लिए एक मिसाल बनने जा रही है।” “आजादी के 75 साल के निमित्त, देश ने ऐसे अनेक लक्ष्यों पर काम करना शुरू किया है, जो आने वाले समय में बड़े बदलावों का आधार बनेंगे। अमृतकाल में देश की गति–प्रगति का आधार सबका प्रयास की वो भावना है, जो हमारी इस विकास यात्रा का नेतृत्व कर रही है।”

“जब आप प्राकृतिक खेती करते हैं तो आप धरती माता की सेवा करते हैं, मिट्टी की क्वालिटी, उसकी उत्पादकता की रक्षा करते हैं। जब आप प्राकृतिक खेती करते हैं, तो आप प्रकृति और पर्यावरण की सेवा करते हैं। जब आप प्राकृतिक खेती से जुड़ते हैं, तो आपको गौमाता की सेवा का सौभाग्य भी मिलता है।”

आखिर प्रधानमंत्री क्यों प्राकृतिक खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं. सूरत के हर पंचायत से 75 किसानों को इस पद्धति से खेती करने के लिए चुना गया है. वर्तमान में 550 से अधिक पंचायतों के 40 हजार से ज्यादा किसान प्राकृतिक कृषि को अपना चुके हैं.

क्या है प्राकृतिक खेती (Natural Farming) ?

प्राकृतिक खेती प्राचीन परंपरागत खेती है. यह भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है. इसमें रासायनिक कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है. प्रकृति में पाए जाने वाले तत्वों से ही खेती की जाती है. उन्हीं को खेती में कीटनाशक के रूप में काम में लिया जाता है. कीटनाशकों के रूप में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फ़सल अवशेष और प्रकृति में उपलब्ध खनिज जैसे- रॉक फास्फेट, जिप्सम आदि द्वारा पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं. प्राकृतिक खेती में प्रकृति में उपलब्ध जीवाणुओं, मित्र कीट और जैविक कीटनाशक द्वारा फ़सल को हानिकारक जीवाणुओं से बचाया जाता है.

ये भी पढ़ें: प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए अब यूपी में होगा बोर्ड का गठन

क्यों है प्राकृतिक खेती की आवश्यकता ?

खेती में हानीकारक कीटनाशकों के उपयोग के कारन लगातार हानी देखने को मिल रहा है. वही खेती की लागत भी बढ़ रही है. रासायनिक खेती से जमीन के प्रकृति में बदलाव हो रहा है. रासायनिक खेती के उत्पादन के प्रयोग से नित्य नई बिमारीयों से लोग ग्रसित हो रहे हैं. प्राकृतिक खेती से उपजाये खाने पीने की चीजों में खनिज तत्वों, जैसे जिंक व आयरन की मात्रा अधिक पाई जाती है, जो मानव शारीर के लिए लाभदायक होता है. रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से जहाँ खाद्य पदार्थ अपनी गुणवत्ता खो देती हैं वहीं इसका सेवन हानिकारक होता है. मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम होती जाती है.

भारत खाद्य पदार्थों के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है, लेकिन अगर इन समस्याओं का समाधान नहीं निकाला जायेगा,तो भविष्य में खाद्य सुरक्षा कमजोर हो सकती है.

ये भी पढ़ें: देश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, 30 फीसदी जमीन पर नेचुरल फार्मिंग की व्यवस्था

भारत की भौगोलिक विविधता के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों में मिट्टी और मौसम भी अलग अलग है. इसी के कारण परंपरागत खेती भी भिन्न भिन्न प्रकार से किये जाते हैं. प्रकृति के अनुकूल खेती से हम मिट्टी, पानी, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को संरक्षित कर सकेंगे. इसके प्रचार प्रसार के लिए प्राप्त अनुभवों को किसानों तक ले जाने की आवश्यकता है. इसमे हमारे कृषि वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने भी इसकी चर्चा करते हुये कहा कि गंगा नदी की सफाई के लिए चल रहे नमामि गंगे कार्यक्रम के साथ प्राकृतिक खेती को भी जोड़ा गया है. इसके तहत नदी के दोनों किनारे प्राकृतिक खेती के लिए पांच किलोमीटर का गलियारा बनाया जा रहा है. केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर परंपरागत खेती को बढ़ावा देने के लिए अधिक सक्रियता की आवश्यकता है.

Leave A Reply

Your email address will not be published.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. AcceptRead More