जलवायु परिवर्तन कृषि क्षेत्र को किस प्रकार से प्रभावित करता है

By: Merikheti
Published on: 18-Dec-2023

आज के दौर में जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक मुद्दे के तौर पर उभर कर आया है। जलवायु परिवर्तन कोई एक देश अथवा राष्ट्र से जुड़ी अवधारणा नहीं है, अपितु यह एक वैश्विक अवधारणा है, जो समस्त पृथ्वी के लिए चिंता का वजह बनती जा रही है। देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन से भारत समेत संपूर्ण विश्व में सूखा, बाढ़, कृषि संकट और खाद्य सुरक्षा, बीमारियां, प्रवासन इत्यादि का संकट बढ़ा है। परंतु, भारत का एक बड़ी तादात (लगभग 60 फीसद आबादी) आज भी कृषि पर आश्रित है। साथ ही, इसके प्रभाव के प्रति सुभेद्य है, इस वजह से कृषि पर जलवायु परिवर्तन के परिणामों को देखना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021 के मुताबिक, भारत जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित दस शीर्ष देशों में शम्मिलित है। जलवायु की बदलती परिस्थितियां कृषि को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहीं हैं। क्योंकि, दीर्घावधि में ये मौसमी कारक जैसे आर्द्रता, तापमान और वर्षा इत्यादि पर निर्भर करती है। अतः इस लेख में हम आपको बताऐंगे कि जलवायु परिवर्तन कृषि को कैसे प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन से उत्पादन में काफी गिरावट आई है 

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से विश्व कृषि इस सदी में गंभीर गिरावट का सामना कर रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (IPCC) के मुताबिक, वैश्विक कृषि पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव नकारात्मक होगा। हालांकि, कुछ फसल इससे लाभान्वित भी होंगी, परंतु फसल उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन का कुल प्रभाव सकारात्मक से अधिक नकारात्मक होगा। भारत में 2010-2039 के मध्य जलवायु परिवर्तन की वजह से तकरीबन 4.5 फीसद से 9 फीसद के मध्य उत्पादन के गिरने की संभावना है। एक शोध के अनुसार, अगर वातावरण का औसत तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो इससे गेहूं की पैदावार 17 प्रतिशत तक कम हो सकता है। इसी प्रकार 2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने से धान का उत्पादन भी 0.75 टन प्रति हेक्टेयर कम होने की संभावना है।

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कृषि लायक भूमि में काफी कमी आई है 

जलवायु परिवर्तन की वजह से तापमान के उच्च अक्षांश की और खिसकने से निम्न अक्षांश प्रदेशों में कृषि क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। भारत के जल स्रोत तथा भंडार तीव्रता से सिकुड़ रहे हैं, जिससे कृषकों को परंपरागत सिंचाई के तरीके छोड़कर पानी की खपत कम करने वाले आधुनिक विधियां एवं फसलों का चयन करना होगी। ग्लेशियर के पिघलने से विभिन्न बड़ी नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र में दीर्घावधिक तौर से कमी आ सकती है, जिससे कृषि एवं सिंचाई में जलभराव से गुजरना पड़ सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण प्रदूषण, भू-क्षरण एवं सूखा पड़ने से धरती के तीन चौथाई भूमि हिस्से की गुणवत्ता कम हो गई है।

जलवायु परिवर्तन से तापमान में बढ़ोतरी होती है 

जलवायु परिवर्तन की वजह से विगत कई दशकों में तापमान में इजाफा हुआ है। औद्योगीकरण की शुरुआत से अब तक पृथ्वी के तापमान में तकरीबन 0.7 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो चुकी है। कुछ पौधे ऐसे होते हैं, जिन्हें एक विशेष तापमान की जरूरत होती है। वायुमंडल के तापमान के बढ़ने पर उनके उत्पादन पर प्रतिकूल या नकारात्मक असर पड़ता है। जैसे गेंहू, सरसो, जौ एवं आलू आदि इन फसलों को कम तापमान की आवश्यकता होती है। वहीं, तापमान में बढ़ोतरी इनके लिए हानिकारक साबित होती है। इसी तरह ज्यादा तापमान बढ़ने से मक्का, ज्वार एवं धान इत्यादि फसलों का क्षरण हो सकता है। क्योंकि, ज्यादा तापमान की वजह से इन फसलों में दाना नहीं बनता या फिर कम बनता है। इस तरह तापमान में इजाफा इन फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

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