जानें कैसे किसान ने जीरा और इसबगोल की खेती से बदली अपनी किस्मत?

By: Merikheti
Published on: 03-Jan-2024

मेरीखेती के इस लेख में आज हम आपको ऐसे किसान के विषय में जानकारी देंगे, जो रासायनिक एवं जैविक ढ़ंग से खेती करके वार्षिक लाखों की आमदनी सुगमता से कर रहे हैं। दरअसल, हम प्रगतिशील किसान कुम्प सिंह की बात कर रहे हैं। कुम्प सिंह मूल रूप से गांव–बरमसर, जिला जैसलमेर, राजस्थान के रहने वाले हैं। वह अपने बालकाल से ही खेती करते आ रहे हैं। प्रगतिशील किसान कुम्प सिंह ने स्नातक किया हुआ है। उन्होंने बताया कि हमारे पूरे परिवार के पास समकुल 350 बीघा तक भूमि है, जिसमें वह सीजन के अनुरूप कृषि करते हैं। किसान कुम्प सिंह ने बताया कि वह बारिश के मौसम में बाजरा, ज्वार और मूंग आदि फसलों की खेती करते हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यह भी बताया है कि वह खेत में जीरा, काली सरसों और ईसबगोल की भी खेती करते हैं।


जैविक खेती के माध्यम से कैसा उत्पादन मिलता है 

आज हम आपको इस लेख में जीरे की खेती से अच्छी पैदावार और उपज लेने वाले किसान कुम्प सिंह के बारे में बताएंगे। कुम्प सिंह के मुताबिक, वह अपने खेत के 70% फीसद भूमि पर केवल जीरा की खेती/ Cumin Cultivation करते हैं। वहीं, अन्य शेष भूमि पर समस्त फसलों की खेती तकरीबन एक बराबर करते हैं। जैसे कि 20% फीसद में ईसबगोल एवं 10 प्रतिशत भाग में सरसों की खेती करते हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यह भी कहा है, कि वह अपने खेत में पहले रासायनिक तरीकों से खेती/ Farming by Chemical Methods किया करते थे। परंतु, फिलहाल वह धीरे–धीरे जैविक खेती/ Organic farming की ओर अपना कदम बढ़ा रहे हैं। क्योंकि, इससे उत्पादन काफी बढ़ता है। साथ ही, लागत भी बेहद कम आती है।

 

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जीरा और ईसबगोल की प्रति बीघा कितनी उपज मिलती है 

साथ ही, उन्होंने कहा है कि उनको प्रति बीघा जीरा उत्पादन 70 किलो तक सुगमता से मिल जाता है। वर्तमान में उनके इलाके में जीरे की कीमत 5000 रुपये प्रति किलो है। वहीं, उन्होंने यह भी बताया कि उनके खेत से ईसबगोल का उत्पादन प्रति बीघा एक से डेढ़ क्विंटल तक प्राप्त हो जाता है, जिसकी कीमत प्रति बीघा करीब 24 हजार रुपये तक होता है। वहीं, उन्होंने कहा कि जीरे की खेती में खर्चा भी काफी ज्यादा लगता है। साथ ही, ईसबगोल में लागत/ Cost in Isabgol जीरे से थोड़ी कम आती है।


कंपनी खुद खेत से अच्छे भाव पर फसल खरीदने आती हैं 

किसान कुम्प सिंह के मुताबिक उनकी पैदावार को खरीदने के लिए कंपनी वाले स्वयं खेत पर पहुँच उचित भाव पर खरीदकर लेकर जाते हैं। उन्हें अपनी फसल का बेहतर भाव अर्जित करने के लिए बाजार में नहीं भटकना पड़ता है। परंतु, इसके लिए उन्हें पहले कंपनी को अपनी फसल का एक सैंपल भेजना पड़ता है। यदि वह पास हो जाता है, तभी कंपनी वाले उनके पास उत्पादन खरीदने के लिए आते हैं।

 

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कृषक इन खादों का करें इस्तेमाल

किसान कुम्प सिंह ने बताया है, कि भारत के अधिकांश किसान जैविक खेती की दिशा में आगे बढ़े। जहां तक संभव हो अपने खेत में गोबर खाद के साथ ही घरेलू खादों का उपयोग सबसे ज्यादा करें। क्योंकि, इसके इस्तेमाल से फसल काफी बेहतर ढ़ंग से विकसित होती है। साथ ही, बाजार में भी शानदार भाव बड़ी सहजता से किसान को मिल जाता है।

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