पशुओं की जान ले सकता है लंगड़ा बुखार, इस तरह से पहचानें लक्षण

Published on: 06-Apr-2023

भारत के किसान खेती-किसानी के साथ-साथ पशुपालन भी करते हैं ताकि उन्हें कुछ अतिरिक्त आमदनी होती रहे। इसके लिए सरकार भी किसानों को पशुपालन के प्रति जागरुक करती है तथा समय-समय पर पशुपालन के लिए प्रोत्साहित करती रहती है। पशुपालन के लिए सरकार समय-समय पर किसानों को सब्सिडी भी देती है। हालांकि इस प्रकार की सहायता से भी पशुपालन में किसानों की चुनौतियां कम नहीं होती। कई बार दुधारू पशुओं में ऐसी बीमारियां लग जाती हैं जिनके कारण किसानों को काफी परेशान होना पड़ता है, इसके साथ ही कई बार किसानों को पशुपालन में घाटा भी लग जाता है। इन दिनों दुधारू पशुओं के बीच लंगड़ा बुखार का कहर देखने को मिल रहा है। पशुओं को होने वाली यह बीमारी जानलेवा हो सकती है, जिसके कारण पशुओं की मौत भी हो सकती है। यह बीमारी भैंस और गाय के साथ-साथ अन्य दूध देने वाले पशुओं में भी फैल जाती है। इस बीमारी के लिए क्लोस्टरीडियम चौवई नामक जीवाणु उत्तरदायी है, जो पशुओं में घाव के माध्यम से तथा दूषित चारागाह में चरने के दौरान चारे के माध्यम से फैलते हैं।

यह होते हैं लंगड़ा बुखार के लक्षण

यह एक जीवाणु जनित बीमारी है जिसके कारण पशु को तेज बुखार आता है। इसके साथ ही पशु के पिछली व अगली टांगों के ऊपरी भाग में भारी सूजन आ जाती है। सूजन वाली जगह सूख कर उनकी चमड़ी कड़ी हो जाती है। कुछ समय बाद इसी जगह पर घाव हो जाता है। धीरे-धीरे जीवाणुओं की मदद से यह रोग पूरे शरीर में फैल जाता है। इस बीमारी का जल्द से जल्द इलाज करवाना बहुत जरूरी है अन्यथा पशुओं की मृत्यु भी हो सकती है। इस बीमारी की रोकथाम में प्रोकेन पेनिसिलीन के टीके काफी उपयोगी पाए गए हैं। इसलिए बीमारी की रोकथाम में प्रोकेन पेनिसिलीन के टीकों का बहुतायत से उपयोग किया जाता है। ये भी पढ़े: गर्मियों में हरे चारे के अभाव में दुधारू पशुओं के लिए चारा

ऐसे करें लंगड़ा बुखार से पशुओं का बचाव

एक बार किसी भी पशु के लंगड़ा बुखार की जद में आने पर उसके बचने की संभावना बहुत कम हो जाती है। फिर भी कुछ उपाय करके इस रोग को अन्य पशुओं तक पहुंचने से रोका जा सकता है, साथ ही पशुओं की बचाया भी जा सकता है। एक बार बीमार होने पर बीमार पशु को अन्य पशुओं से अलग कर देना चाहिए। इसके साथ ही समय पर टीकाकरण करवा दें। सूजन में चीरा मारकर खोल देना चाहिए ताकि जीवाणु हवा के संपर्क में आ सकें। इससे जीवाणुओं का प्रभाव काफी कम हो जाता है। बीमारी के लक्षण दिखाई देते ही पशु का चिकित्सक से पशु का इलाज कराना चाहिए।

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