गेहूँ की फसल में लगने वाले प्रमुख घातक रोग: लक्षण, नुकसान और वैज्ञानिक नियंत्रण

Published on: 16-Jan-2026
Updated on: 16-Jan-2026

गेहूँ की फसल में लगने वाले प्रमुख घातक रोग

रबी मौसम में गेहूँ भारत की सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। यह ठंडी जलवायु में अच्छी वृद्धि करती है और हल्के पाले को भी सहन कर लेती है। लेकिन अनुकूल मौसम के साथ‑साथ गेहूँ की फसल कई गंभीर रोगों की चपेट में भी आ जाती है। यदि इन रोगों की समय पर पहचान और उचित प्रबंधन न किया जाए, तो उत्पादन और दाने की गुणवत्ता दोनों पर गहरा असर पड़ता है, जिससे किसानों को आर्थिक हानि होती है। इसलिए किसानों के लिए यह जरूरी है कि वे गेहूँ में लगने वाले प्रमुख रोगों, उनके लक्षणों और प्रभावी नियंत्रण उपायों की जानकारी रखें।

1. भूरा रतुआ: गेहूँ का सामान्य लेकिन हानिकारक रोग

भूरा रतुआ रोग Puccinia recondita tritici नामक फफूंद से फैलता है। यह रोग भारत के लगभग सभी गेहूँ उत्पादक क्षेत्रों में पाया जाता है। इसका प्रारंभ प्रायः हिमालयी और नीलगिरी पहाड़ियों से होता है, जहाँ से यह हवा द्वारा मैदानी क्षेत्रों तक पहुँचता है।

पहचान:

इस रोग के लक्षण सबसे पहले पत्तियों पर दिखाई देते हैं। पत्तियों पर नारंगी‑भूरे रंग के सुई की नोक जैसे छोटे धब्बे बनते हैं, जो धीरे‑धीरे फैलकर पूरी पत्ती को ढक लेते हैं। बाद में ये धब्बे गहरे भूरे या काले रंग में बदल जाते हैं।

नुकसान:

भूरा रतुआ प्रकाश संश्लेषण को बाधित करता है, जिससे दाने का भराव ठीक से नहीं हो पाता और उपज में उल्लेखनीय कमी आ जाती है।

2. पीला रतुआ: ठंडे मौसम में तेजी से फैलने वाला रोग

पीला रतुआ या स्ट्राइप रस्ट Puccinia striiformis नामक कवक के कारण होता है। यह रोग ठंडे और नमी वाले वातावरण में तेजी से फैलता है और उत्तर भारत में विशेष रूप से नुकसानदायक माना जाता है।

पहचान:

पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले रंग की लंबी धारियाँ दिखाई देती हैं, जो पत्ती की नसों के समानांतर होती हैं। समय के साथ ये धारियाँ पूरी पत्ती को पीला कर देती हैं और पीले रंग का पाउडर खेत में गिरने लगता है।

नुकसान:

यदि यह रोग कल्ले निकलने से पहले या उसी समय आ जाए, तो बालियों का बनना रुक सकता है और उपज लगभग नष्ट हो सकती है। तापमान बढ़ने पर रोग का असर कम हो जाता है और पीली धारियाँ काले रंग में बदल जाती हैं।

3. काला या तना रतुआ: फसल को गिराने वाला रोग

काला रतुआ, जिसे तना रतुआ भी कहा जाता है, Puccinia graminis tritici नामक फफूंद से होता है। यह रोग अधिकतर दक्षिण और मध्य भारत में पाया जाता है, जबकि उत्तर भारत में यह आमतौर पर फसल पकने की अवस्था में दिखाई देता है।

पहचान:

पत्तियों और तनों पर गहरे भूरे या काले रंग के उभरे हुए धब्बे दिखाई देते हैं। ये धब्बे पौधे की मजबूती को कमजोर कर देते हैं।

नुकसान:

इस रोग के कारण पौधे गिरने लगते हैं, जिससे कटाई में कठिनाई होती है और उपज घट जाती है। पुरानी किस्मों जैसे लोक‑1 में इसका प्रकोप अधिक देखा जाता है।

रतुआ रोगों का समेकित प्रबंधन

तीनों रतुआ रोगों से बचाव के लिए रोकथाम सबसे प्रभावी उपाय है। बुवाई के समय रोग‑प्रतिरोधी और उन्नत किस्मों का चयन करें।

  • बीज को थाइरम 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
  • रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही प्रोपिकोनाजोल 25 ई.सी. का 0.1% घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • यह उपाय रोग के फैलाव को नियंत्रित करने में सहायक होता है।

4. करनाल बंट: गुणवत्ता को प्रभावित करने वाला रोग

करनाल बंट गेहूँ का एक गंभीर रोग है, जिसकी पहचान सबसे पहले 1931 में हरियाणा के करनाल जिले में हुई थी। यह रोग Tilletia indica नामक कवक के कारण होता है, जो मिट्टी में लंबे समय तक जीवित रह सकता है।

प्रभावित क्षेत्र: 

यह रोग ठंडे और नम क्षेत्रों जैसे जम्मू‑कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के मैदानी भाग, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तरी राजस्थान में अधिक पाया जाता है। गर्म जलवायु वाले राज्यों में इसका प्रकोप कम होता है।

नुकसान:

इस रोग में दानों के अंदर काला चूर्ण भर जाता है, जिससे दाने की गुणवत्ता, अंकुरण क्षमता और बाजार मूल्य घट जाता है। इसके कारण गेहूँ के निर्यात पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

करनाल बंट से बचाव के उपाय

  • बुवाई से पहले बीज को थाइरम 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
  • रोग‑प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें।
  • दाना बनने की अवस्था में प्रोपिकोनाजोल 25 ई.सी. का 0.1% घोल छिड़कें।

यदि गेहूँ की फसल में इन रोगों का समय पर प्रबंधन न किया जाए, तो उपज और गुणवत्ता दोनों को भारी नुकसान हो सकता है। नियमित फसल निरीक्षण, शुरुआती लक्षणों की पहचान और वैज्ञानिक तरीके से उपचार अपनाकर किसान अपनी गेहूँ की फसल को इन घातक रोगों से सुरक्षित रख सकते हैं।

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