हाल के दिनों में मध्य-पूर्व क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच टकराव का असर अब भारत के कृषि बाजारों में भी दिखाई देने लगा है। यह संघर्ष केवल राजनीतिक या सैन्य स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके आर्थिक प्रभाव वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन पर भी पड़ रहे हैं। खाद्य तेल जैसे आवश्यक उत्पादों की सप्लाई बाधित होने से भारत जैसे आयात-निर्भर देश में स्थानीय फसलों की मांग तेजी से बढ़ी है। इसी का परिणाम है कि सरसों के भाव में अचानक उछाल देखने को मिल रहा है, जिससे किसानों को बड़ा फायदा मिल रहा है।
देश की प्रमुख मंडियों में सरसों के भाव 7,000 रुपये प्रति क्विंटल के पार पहुंच गए हैं, जो पिछले कई वर्षों में एक असामान्य स्थिति मानी जा रही है। खासकर अलवर की मंडियों में सरसों का भाव 7100 रुपये तक पहुंच गया है। इस तेजी ने किसानों के बीच उत्साह का माहौल बना दिया है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां बनी रहती हैं, तो आने वाले समय में कीमतों में और बढ़ोतरी संभव है।
अलवर की अनाज मंडी इन दिनों पूरी तरह सक्रिय नजर आ रही है। यहां रोजाना हजारों क्विंटल सरसों की आवक हो रही है और मंडी में भारी भीड़ देखी जा रही है। जहां पहले काम की कमी के कारण मजदूरों को दिक्कत होती थी, वहीं अब पल्लेदार दिन-रात काम कर रहे हैं। इससे न केवल किसानों बल्कि मजदूर वर्ग को भी रोजगार के अवसर मिल रहे हैं।
भारत का खाद्य तेल बाजार लगभग 55% तक आयात पर निर्भर करता है। लेकिन खाड़ी क्षेत्र में तनाव और डॉलर की कीमत में वृद्धि के कारण आयात महंगा और सीमित हो गया है। पाम ऑयल और सोयाबीन तेल की आपूर्ति में कमी आने से घरेलू बाजार में सरसों की मांग तेजी से बढ़ी है। यह बदलाव बाजार के पूरे समीकरण को प्रभावित कर रहा है।
सरसों की बढ़ती कीमतें किसानों के लिए एक सुनहरा अवसर लेकर आई हैं। सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 6200 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि बाजार में भाव इससे कहीं अधिक चल रहे हैं। ऐसे में किसान खुलकर बाजार में अपनी उपज बेच रहे हैं और अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। यह स्थिति लंबे समय बाद देखने को मिल रही है।
राजस्थान देश का सबसे बड़ा सरसों उत्पादक राज्य है और कुल उत्पादन का लगभग 50% यहीं होता है। अलवर, भरतपुर, झुंझुनू, सीकर, करौली और दौसा जैसे जिले सरसों उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं। इस बार कीमतों में आई तेजी का सबसे ज्यादा फायदा इसी राज्य को मिल रहा है।
इस साल सरसों की गुणवत्ता भी बेहतर बताई जा रही है। सामान्यतः सरसों से 40% तक तेल निकलता है, लेकिन इस बार यह बढ़कर 42–43% तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि किसानों को न केवल बेहतर दाम मिल रहे हैं बल्कि उत्पादन से मिलने वाला तेल भी ज्यादा है, जिससे उनकी आय में अतिरिक्त वृद्धि हो रही है।
पिछले वर्ष जहां देश में लगभग 117 लाख टन सरसों का उत्पादन हुआ था, वहीं इस साल इसके घटकर करीब 111 लाख टन रहने का अनुमान है। हालांकि उत्पादन में कमी आई है, लेकिन बेहतर गुणवत्ता और तेल की मात्रा बढ़ने से इसकी भरपाई कुछ हद तक हो सकती है। इसके बावजूद बाजार में तेजी बनी हुई है।
देशभर की अलग-अलग मंडियों में सरसों के भाव अलग-अलग स्तरों पर चल रहे हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और गुजरात की मंडियों में भाव 6200 से 7300 रुपये के बीच देखे जा रहे हैं। वहीं कुछ जगहों जैसे मुंबई और बैंगलोर में कीमतें 9500 से 11000 रुपये तक पहुंच गई हैं, जो स्थानीय मांग और सप्लाई पर निर्भर करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो सरसों और सरसों तेल के दाम में और बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, इससे आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का असर भी पड़ेगा। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे अपनी फसल बेचने से पहले नजदीकी मंडियों के ताजा भाव जरूर जांच लें और बाजार की स्थिति को समझकर ही निर्णय लें। सही समय पर बिक्री करने से उन्हें अधिकतम लाभ मिल सकता है।
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