ग्वार की खेती (Guar Cultivation) भारतीय किसानों के लिए एक लाभदायक और कम लागत वाली खेती मानी जाती है। यह फसल कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने की क्षमता रखती है, इसलिए सूखा प्रभावित क्षेत्रों में इसकी खेती विशेष रूप से की जाती है। भारत में ग्वार मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में उगाया जाता है। इनमें राजस्थान अकेला देश के लगभग 70 से 85 प्रतिशत ग्वार उत्पादन में योगदान देता है। ग्वार की फलियों का उपयोग हरी सब्जी के रूप में किया जाता है, जबकि इसके बीजों से ग्वार गम बनाया जाता है। ग्वार गम का उपयोग खाद्य उद्योग, दवा उद्योग, तेल उद्योग तथा कई अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में किया जाता है। इसकी अंतरराष्ट्रीय मांग होने के कारण किसानों को इसकी खेती से अच्छा लाभ प्राप्त होता है।
ग्वार एक ऐसी फसल है जो कम वर्षा और सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में भी अच्छी तरह उग जाती है। इसकी जड़ें मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिर करने का कार्य करती हैं, जिससे भूमि की उर्वरक क्षमता बढ़ती है। यही कारण है कि ग्वार की खेती मिट्टी सुधारक फसल के रूप में भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
यह खरीफ और गर्मी दोनों मौसमों में उगाई जा सकती है। इसकी खेती से किसानों को दोहरा लाभ मिलता है, क्योंकि फलियां सब्जी के रूप में बिकती हैं और बीजों से बनने वाले ग्वार गम की देश और विदेश में अच्छी मांग रहती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा ग्वार उत्पादक देश है और हर वर्ष हजारों टन ग्वार का उत्पादन किया जाता है।
भारत में ग्वार की खेती मुख्य रूप से खरीफ मौसम में की जाती है। खरीफ का मौसम जून से सितंबर तक रहता है। ग्वार की बुवाई के लिए पहली बारिश के लगभग 10 से 15 दिन बाद का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। जल्दी पकने वाली किस्मों की बुवाई 10 से 15 जुलाई तक करनी चाहिए, जबकि देर से पकने वाली किस्मों की बुवाई 25 से 30 जुलाई तक की जा सकती है।
इस समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होती है, जिससे बीजों का अंकुरण अच्छा होता है और पौधों की बढ़वार तेज़ी से होती है।
ग्वार की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। ऐसी मिट्टी में पानी का निकास अच्छा होता है और जड़ों में सड़न की समस्या नहीं होती। हल्की रेतीली और हल्की नमकीन मिट्टी में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिट्टी का pH मान 7 से 8 के बीच होना चाहिए।
ग्वार की अच्छी खेती के लिए 30 से 36 सेंटीमीटर वर्षा तथा 32 से 38 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल माना जाता है। यह फसल सूखे को सहन कर सकती है, लेकिन फूल आने और फलियां बनने के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी रहना आवश्यक होता है।
ग्वार की खेती शुरू करने से पहले खेत की अच्छी तैयारी करनी चाहिए। सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें। इसके बाद 2 से 2.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में डालें और मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें। इसके बाद कल्टीवेटर से दो बार जुताई करें तथा अंत में पाटा लगाकर खेत को समतल बना लें।
अच्छी तरह तैयार खेत में बीजों का अंकुरण समान रूप से होता है और पौधों की बढ़वार बेहतर होती है।
जल्दी पकने वाली किस्में
देर से पकने वाली किस्में
इन उन्नत किस्मों से खरीफ मौसम में 600 से 900 किलो प्रति हेक्टेयर तथा गर्मी के मौसम में 2500 से 3000 किलो प्रति हेक्टेयर तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।
ग्वार की बुवाई के लिए खरीफ मौसम में 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। जल्दी पकने वाली किस्मों के लिए 15 से 18 किलोग्राम तथा देर से पकने वाली किस्मों के लिए लगभग 25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर लेना चाहिए। गर्मी के मौसम में 40 से 45 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है।
बीजों को बुवाई से पहले 2 ग्राम थिरम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। इसके साथ राइजोबियम, पीएसबी और सूडोमोनास कल्चर का उपयोग भी लाभकारी होता है। इससे बीजों का अंकुरण अच्छा होता है और पौधों में रोगों का प्रकोप कम होता है।
ग्वार की बुवाई हमेशा लाइन विधि से करनी चाहिए। इससे पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है और खेत की देखभाल आसान हो जाती है। खरीफ मौसम में कतार से कतार की दूरी 40 से 50 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी लगभग 15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। गर्मी के मौसम में कतारों की दूरी लगभग 20 सेंटीमीटर रखी जाती है। बीजों को 5 से 10 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए ताकि अंकुरण अच्छा हो सके।
ग्वार की फसल में खरपतवार नियंत्रण बहुत जरूरी होता है। बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। इससे खेत में खरपतवार कम होते हैं और पौधों की जड़ों तक हवा और पोषण अच्छी तरह पहुंचता है।
यदि खेत में खरपतवार अधिक हों तो पेंडिमेथालिन 0.75 से 1 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव किया जा सकता है। खेत की नियमित निगरानी करते रहना चाहिए ताकि खरपतवार समय रहते नियंत्रित किए जा सकें।
यदि वर्षा समय पर और पर्याप्त मात्रा में हो रही हो तो अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन वर्षा कम होने की स्थिति में 1 से 2 सिंचाई करनी चाहिए। फूल आने और फलियां बनने के समय मिट्टी में नमी बनाए रखना आवश्यक होता है।
ग्वार की हरी फलियां लगभग 50 से 60 दिनों में तैयार हो जाती हैं। यदि सब्जी के लिए खेती की जा रही हो तो हरी और मुलायम फलियों की समय पर तुड़ाई करनी चाहिए। बीज उत्पादन के लिए फसल को 90 से 100 दिनों तक खेत में रहने दें और फलियों के सूखने पर कटाई करें।
उचित देखभाल और उन्नत तकनीकों के उपयोग से खरीफ मौसम में 600 से 900 किलो प्रति हेक्टेयर तथा गर्मी के मौसम में 2500 से 3000 किलो प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
ग्वार की खेती किसानों के लिए कम लागत और अधिक लाभ वाली खेती मानी जाती है। इसकी फलियां बाजार में अच्छे दामों पर बिकती हैं और बीजों से बनने वाले ग्वार गम की अंतरराष्ट्रीय मांग होने के कारण किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है।
सरकार भी ग्वार की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है। किसान अपने नजदीकी कृषि विभाग से संपर्क कर सब्सिडी तथा अन्य सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
सावधानियां
ग्वार की खेती भारतीय किसानों के लिए एक लाभदायक, कम लागत और टिकाऊ खेती का विकल्प है। सही समय पर बुवाई, उन्नत किस्मों का चयन, उचित सिंचाई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और नियमित देखभाल द्वारा किसान अच्छी पैदावार और अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। यह फसल न केवल किसानों की आय बढ़ाती है बल्कि मिट्टी की उर्वरता सुधारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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