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बंजर जमीन में अश्वगंधा की खेती कैसे करें: सही तरीका, समय और उन्नत तकनीकें

Published on: 03-May-2026

जानें, बंजर जमीन पर अश्वगंधा की खेती की पूरी जानकारी 

अश्वगंधा आज के समय में किसानों के लिए एक ऐसी नकदी और औषधीय फसल बनकर उभरी है, जो कम लागत में अधिक लाभ देने की क्षमता रखती है। खास बात यह है कि इसकी मुख्य उपज जड़ होती है, लेकिन पौधे का हर हिस्सा पत्ते, बीज और तना भी बाजार में उपयोगी और बिकाऊ है। यही कारण है, कि अश्वगंधा की खेती करने वाले किसान किसी एक उत्पाद पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि उन्हें बहुआयामी आय के अवसर मिलते हैं। कम उपजाऊ, बंजर या सिंचाई रहित भूमि वाले किसान भी इसे आसानी से उगा सकते हैं। यह उन क्षेत्रों के लिए वरदान है जहां पारंपरिक फसलें उगाना मुश्किल होता है।

उपयुक्त जलवायु और मिट्टी की आवश्यकता

अश्वगंधा की खेती के लिए शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है। लगभग 500 से 700 मिमी वार्षिक वर्षा और 30 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान इसकी बेहतर वृद्धि के लिए आदर्श है। यह फसल खारे पानी और कम उर्वर भूमि में भी अच्छी तरह बढ़ती है। खास बात यह है कि यदि इसकी सिंचाई हल्के खारे पानी से की जाए, तो इसमें पाए जाने वाले औषधीय तत्व ‘एल्कलॉइड’ की मात्रा दो से ढाई गुना तक बढ़ जाती है। इस कारण इसकी गुणवत्ता और बाजार मूल्य दोनों में वृद्धि होती है।

वानस्पतिक परिचय और पौधे की विशेषताएं

अश्वगंधा का वानस्पतिक नाम विथानिया सोम्निफेरा है। इसका पौधा सामान्यतः 40 से 150 सेंटीमीटर तक ऊंचा होता है और इसका तना सीधा तथा शाखायुक्त होता है। इसकी जड़ें लंबी, मोटी और अंडाकार होती हैं, जो बाजार में सबसे ज्यादा मूल्यवान होती हैं। इसके फूल हरे या हल्के पीले रंग के होते हैं, जबकि फल छोटे, गोल और लाल रंग के होते हैं जिनमें कई बीज पाए जाते हैं। यह पौधा रोगों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहता है और इसे रासायनिक उर्वरकों की बहुत कम आवश्यकता होती है।

देश में मांग और प्रमुख उत्पादन क्षेत्र

भारत में अश्वगंधा की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि उत्पादन अपेक्षाकृत कम है। देश में लगभग 5000 हेक्टेयर भूमि पर इसकी खेती होती है और वार्षिक उत्पादन करीब 1600 टन है, जबकि मांग लगभग 7000 टन तक पहुंच चुकी है। इस अंतर के कारण किसानों को बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। मध्य प्रदेश के मंदसौर, नीमच, जावड़ और भानपुरा क्षेत्र तथा राजस्थान के नागौर जिले में इसकी खेती विशेष रूप से प्रसिद्ध है। नागौरी अश्वगंधा की गुणवत्ता के कारण इसकी अलग पहचान बनी हुई है।

औषधीय उपयोग और पोषक तत्व

अश्वगंधा का उपयोग आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा में लंबे समय से किया जा रहा है। इसकी सूखी जड़ों से कई प्रकार की औषधियां बनाई जाती हैं, जो तनाव, चिंता और अनिद्रा जैसी समस्याओं को दूर करने में सहायक होती हैं। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और तंत्रिका तंत्र को मजबूत करता है। इसके अलावा, इसका उपयोग गठिया, कैंसर, त्वचा रोग, पेट के अल्सर, फेफड़ों की सूजन और अन्य कई रोगों के उपचार में किया जाता है। इसमें विथानिन, विथाफेरिन, कोलीन, निकोटीन जैसे एल्कलॉइड, साथ ही ग्लाइकोसाइड, अमीनो अम्ल और शर्करा भी पाए जाते हैं, जो इसे अत्यंत लाभकारी बनाते हैं।

खेती की विधि और उन्नत बीज

अश्वगंधा की खेती वर्ष में दो बार की जा सकती है—रबी (फरवरी-मार्च) और खरीफ (अगस्त-सितंबर) मौसम में। इसकी फसल लगभग 5 महीनों में तैयार हो जाती है। किसान इसे बीज छिड़काव विधि या नर्सरी से पौध तैयार कर रोपाई के माध्यम से उगा सकते हैं। नर्सरी जून-जुलाई में तैयार की जाती है। पौधों के बीच 5 से 10 सेंटीमीटर और पंक्तियों के बीच लगभग एक फुट की दूरी रखना उचित रहता है। ‘पोषिता’ और ‘रहिता’ जैसी उन्नत किस्में शुष्क क्षेत्रों के लिए बेहतर मानी जाती हैं और इनकी उत्पादकता भी अधिक होती है।

फसल प्रबंधन: सिंचाई, खाद और सुरक्षा

अश्वगंधा को बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है, इसलिए यह वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त है। यदि खेत में जल निकासी अच्छी हो, तो सिंचित क्षेत्रों में भी इसे उगाया जा सकता है। बुवाई से पहले गोबर की खाद या सीमित मात्रा में नाइट्रोजन का उपयोग पर्याप्त होता है। फसल में समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना जरूरी है ताकि जड़ों का विकास बेहतर हो सके। रोग और कीट नियंत्रण के लिए बीजों को थिरम या डाइथेन एम-45 से उपचारित करना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर कीटनाशकों का छिड़काव करना चाहिए।

कटाई, उपज, लागत और लाभ

अश्वगंधा की फसल 135 से 150 दिनों में तैयार हो जाती है। जब पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, तब इसकी खुदाई की जाती है। जड़ों को निकालकर साफ कर धूप में सुखाया जाता है और फिर आकार के अनुसार छांटा जाता है। एक हेक्टेयर में सामान्यतः 7-8 क्विंटल ताजी जड़ें प्राप्त होती हैं, जो सूखने के बाद 4-5 क्विंटल रह जाती हैं। इसके साथ 50-60 किलोग्राम बीज भी मिलते हैं। इसकी खेती की लागत लगभग 10-12 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर होती है, जबकि बाजार में जड़ें 150-200 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकती हैं। इस प्रकार किसान लागत से कई गुना अधिक लाभ कमा सकते हैं, जिससे यह फसल आर्थिक रूप से बेहद फायदेमंद साबित होती है।

प्रश्नोत्तरी 

प्रश्न: अश्वगंधा की खेती किन क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है?

उत्तर: अश्वगंधा की खेती शुष्क, अर्ध-शुष्क, कम उपजाऊ और खारे पानी वाली भूमि में आसानी से की जा सकती है।

प्रश्न: अश्वगंधा की फसल कितने समय में तैयार होती है?

उत्तर: अश्वगंधा की फसल सामान्यतः 135 से 150 दिनों में तैयार हो जाती है, जब पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं।

प्रश्न: अश्वगंधा में कौन-कौन से औषधीय तत्व पाए जाते हैं?

उत्तर: इसमें विथानिन, विथाफेरिन, कोलीन, निकोटीन, ग्लाइकोसाइड, अमीनो अम्ल और अन्य एल्कलॉइड पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं।

प्रश्न: अश्वगंधा की खेती में लागत और लाभ कितना होता है?

उत्तर: इसकी खेती में लगभग 10-12 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर लागत आती है और किसान कई गुना अधिक लाभ कमा सकते हैं।

प्रश्न: अश्वगंधा की बुवाई कैसे की जाती है?

उत्तर: इसकी बुवाई बीज छिड़काव या नर्सरी पौध रोपाई विधि से की जाती है, उचित दूरी रखने पर बेहतर उत्पादन मिलता है।

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