पूसा बासमती 1882: सूखे में भी बेहतरीन उत्पादन देने वाली भारत की पहली सूखा-सहिष्णु बासमती किस्म

Published on: 22-Jun-2026
Updated on: 22-Jun-2026
पूसा बासमती 1882: सूखे में भी बेहतरीन उत्पादन देने वाली भारत की पहली सूखा-सहिष्णु बासमती किस्म
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देश में बदलते मौसम, अनियमित मानसून और लगातार गिरते भूजल स्तर ने धान उत्पादक किसानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। विशेष रूप से बासमती धान की खेती करने वाले किसान पानी की कमी के कारण उत्पादन में गिरावट और आर्थिक नुकसान का सामना कर रहे हैं। ऐसे कठिन समय में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), पूसा द्वारा विकसित पूसा बासमती 1882 किसानों के लिए एक नई उम्मीद बनकर सामने आई है। 

यह भारत की पहली मास-व्युत्पन्न (MAS-Derived) सूखा-सहिष्णु बासमती धान की किस्म है, जिसे खासतौर पर उन क्षेत्रों के लिए विकसित किया गया है, जहां बासमती धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है और समय-समय पर सूखे जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं।  

पूसा बासमती 1882 की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किस्म पानी की कमी या सूखे की स्थिति में भी अपनी उत्पादन क्षमता को काफी हद तक बनाए रखती है। इसके साथ ही, यदि इसे सामान्य सिंचित परिस्थितियों में उगाया जाए, तो यह किसानों को अधिक उपज प्रदान करने की क्षमता रखती है। इसी वजह से इसे वर्ष 2022 में केंद्रीय किस्म विमोचन समिति द्वारा अधिसूचित किया गया, जिसके बाद यह तेजी से किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही है।

इन राज्यों के किसानों के लिए उपयुक्त है यह किस्म

पूसा बासमती 1882 को मुख्य रूप से उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के पारंपरिक बासमती उत्पादक क्षेत्रों के लिए विकसित और अनुशंसित किया गया है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बासमती उगाने वाले किसान इस किस्म की खेती करके बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इन क्षेत्रों की जलवायु और मिट्टी को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने इस किस्म को विकसित किया है, ताकि किसान बदलते मौसम की परिस्थितियों में भी अपनी फसल की उत्पादकता बनाए रख सकें। 

कम समय में तैयार होने वाली अधिक उत्पादन देने वाली किस्म

पूसा बासमती 1882 खरीफ सीजन की एक उन्नत बासमती किस्म है, जो औसतन 135 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी सामान्य औसत उपज लगभग 46.9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों, उचित पोषण प्रबंधन और समय पर सिंचाई के साथ यह किस्म 59.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने की क्षमता रखती है। 

यह किस्म मुख्य रूप से सिंचित परिस्थितियों में खेती के लिए तैयार की गई है, लेकिन अचानक पानी की कमी होने पर भी इसकी उत्पादन क्षमता अन्य सामान्य बासमती किस्मों की तुलना में काफी बेहतर रहती है। 

आधुनिक तकनीक से विकसित की गई है यह बासमती किस्म

पूसा बासमती 1882, लोकप्रिय बासमती किस्म पूसा बासमती 1 का ही एक उन्नत और आधुनिक संस्करण है। इसे विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों ने आधुनिक प्रजनन तकनीकों का उपयोग करते हुए इसमें qDTY 1.1 नामक विशेष क्यूटीएल (QTL) जीन को शामिल किया है। 

यह जीन पौधे को विशेष रूप से उस समय सूखे का सामना करने की क्षमता प्रदान करता है, जब फसल अपने प्रजनन चरण में होती है और उसमें बालियां निकल रही होती हैं। सामान्यतः यही वह अवस्था होती है, जब पानी की कमी होने पर धान की उपज पर सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

सूखे में लगभग दोगुनी उपज देने की क्षमता

इस किस्म की प्रभावशीलता को जांचने के लिए वैज्ञानिकों ने कृत्रिम सूखे की स्थिति वाले रेन आउट शेल्टर में इसका परीक्षण किया। परीक्षण के दौरान पारंपरिक पूसा बासमती 1 की औसत उपज केवल 496 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई, जबकि नई पूसा बासमती 1882 ने लगभग 987.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की शानदार औसत उपज दी। 

यह परिणाम दर्शाता है कि यह किस्म सूखे की परिस्थितियों में भी लगभग दोगुनी उपज देने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि इसे जलवायु परिवर्तन के दौर में बासमती किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है।

सामान्य परिस्थितियों में भी अधिक उत्पादन

पूसा बासमती 1882 केवल सूखे की स्थिति में ही बेहतर प्रदर्शन नहीं करती, बल्कि सामान्य सिंचित परिस्थितियों में भी यह अपनी मूल किस्म पूसा बासमती 1 की तुलना में लगभग 10.26 प्रतिशत अधिक उत्पादन देती है। इसका मतलब यह है कि जिन किसानों के पास पर्याप्त सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वे भी इस किस्म को अपनाकर अधिक उत्पादन और बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

किसानों के लिए क्यों फायदेमंद है पूसा बासमती 1882?

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित वर्षा और लगातार घटते भूजल स्तर को देखते हुए पूसा बासमती 1882 किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यदि फसल के दौरान अचानक पानी की कमी हो जाती है, तब भी यह किस्म अपनी उत्पादन क्षमता को बनाए रखने में सक्षम रहती है, जिससे किसानों की लागत डूबने की संभावना कम हो जाती है। 

कम समय में तैयार होने, कम पानी में भी बेहतर प्रदर्शन करने और अधिक उपज देने की क्षमता के कारण यह किस्म बासमती उत्पादकों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यही वजह है कि पूसा बासमती 1882 को आने वाले वर्षों में बासमती खेती के लिए एक टिकाऊ, लाभकारी और जलवायु-अनुकूल विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

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