लोहड़ी का त्यौहार कब, कैसे और किस वजह से मनाया जाता है

लोहड़ी का त्यौहार कब, कैसे और किस वजह से मनाया जाता है

0

लोहड़ी का त्यौहार मुख्य रूप से पंजाब व हरियाणा में बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है। लोहरी भारत के उत्तर प्रान्त में ज्यादा जोर-शोर से मनायी जाती है। लोहड़ी के समय सम्पूर्ण भारत में पतंगे उड़ती दिखाई नजर आती हैं। सम्पूर्ण देशवासी अपनी-अपनी भावनाओं और मान्यताओं के अनुरूप इस त्यौहार को खुशी से मनाते हैं।

लोहड़ी त्यौहार का मुख्य ध्येय क्या होता है

आमतौर पर त्यौहार प्राकृतिक बदलाव के अनुरूप मनाये जाते हैं। लोहड़ी भी कुछ इसी तरह का त्यौहार है। क्योंकि लोहड़ी वाले दिन साल की आखिरी सर्वाधिक रात्रि होती है। इस रात्रि के बाद आगामी दिनों में दिन बढ़वार आने लगती है। इसी दौरान किसानों की फसल तैयार होकर लहलहाटी है। किसानों के लिए यह भी बड़ी खुशी की बात होती है। साथ ही, मौसम भी बेहद अच्छा होता है। इस त्यौहार को परिजन एवं मित्र सब हिल-मिलकर बड़ी खुशी के साथ मनाते हैं। इस त्यौहार को एक साथ प्रशन्नता से मनाने से सौहार्द, प्रेम और भाईचारा बढ़ता है। जो कि लोहड़ी त्यौहार का का मुख्य ध्येय है। साथ ही, अग्नि एवं सूर्य देव को भोग लगाकर आगामी फसल अच्छी होने की अरदास भी की जाती है।

लोहड़ी कब मनाई जाती है

लोहड़ी के त्यौहार को जनवरी माह 13 तारीख की शाम से मकर संक्राति की सुबह होने तक बड़े हर्षोल्लास एवं खुशी से मनाते हैं। लोहरी हर साल मनाये जाने वाला त्यौहार है। लोहड़ी को पंजाबी लोग बेहद धूम धाम से मनाते हैं। भारत त्यौहारों के मामले में विश्वभर में अपनी अलग पहचान रखता है। देश के प्रत्येक प्रान्त में अपनी अपनी मान्यताओं से लोग एक साथ मिलकर त्यौहार मनाते हैं। लोहड़ी त्यौहार की चहल पहल काफी दिन पूर्व से आरंभ हो जाती है।

लोहड़ी के त्यौहार के पीछे ऐतिहासिक और पौराणिक दोनों ही महत्त्व हैं

अगर हम लोहड़ी के पौराणिक महत्त्व के बारे में जानें तो इस त्यौहार को सती के त्याग व बलिदान को हर साल याद करके मनाया जाता है। कथा के अनुरूप जिस समय प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव का तिरस्कार अपनी पुत्री सती की उपस्थित में भरी सभा में किया था। साथ ही, भगवान शिव को यज्ञ में शम्मिलित करने हेतु कोई निमंत्रण नहीं दिया गया तब माता सती जी स्वयं अग्नि में समर्पित हो गई थीं। उस दिन को एक पश्चाताप के तौर पर हर साल लोहड़ी पर मनाते हैं। इस वजह से घर की विवाहित पुत्री को लोहड़ी के दिन उपहार प्रदान किए जाते हैं। बेटियों को घर पर भोजन करने के लिए सादर आमंत्रित करके उनका आदर किया जाता है। इस दिन हर्षोल्लास के साथ विवाहित महिलाओं को श्रृंगार की सामग्री वितरित की जाती है।

ये भी देखें: पंजाब के गगनदीप ने बायोगैस प्लांट लगाकर मिसाल पेश की है, बायोगैस (Biogas) से पूरा गॉंव जला रहा मुफ्त में चूल्हा

लोहड़ी त्यौहार के ऐतिहासिक महत्त्व के बारे में जानें तो इसे दुल्ला भट्टी नामक पंजाबी सरदार की वजह से भी मनाया जाता है। यह बात तब की है जब अकबर का शासनकाल था। उस समय पंजाब प्रान्त के सरदार थे, दुल्ला भट्टी। उनकी छवि पंजाब के नायक के रूप में मानी जाती थी। उस समय संदलबार नाम का एक स्थान था, जो कि फिलहाल पाकिस्तान में आता है। वहाँ लड़कियों की खरीद फरोख्त की जाती थी। जिसका दुल्ला भट्टी ने विरोध किया और इस बात के बिल्कुल खिलाफ थे। दुल्ला भट्टी जी ने वहाँ की लड़कियों व महिलाओं का आदरपूर्वक इस दुष्कर्म से संरक्षण किया। केवल इतना ही नहीं उन लड़कियों का विवाह कराकर उनको एक सम्मानपूर्वक जीवन प्रदान किया। दुल्ला भट्टी की इस जीत के दिन को लोहड़ी के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। दुल्ला भट्टी जी को याद किया जाता है। लोहड़ी त्यौहार को मनाने के दौरान यह बात गीतों में भी गायी जाती है।.

लोहड़ी का त्यौहार किस तरह से मनाया जाता है

लोहड़ी का त्यौहार विशेषरूप से पंजाबियों द्वारा नाच, गाकर और ढोल बजाकर बड़ी ही खुशी और उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोहड़ी आने से पन्द्रह दिन पूर्व से ही नौजवान और बच्चे हर घर में जाकर लोहड़ी के गीत गाने लग जाते हैं। लोहड़ी के दिन गीतों में वीर शहीदों को याद करते हैं, दुल्ला भट्टी जी का नाम उनमें से एक मुख्य नाम है। हमारे भारत देश में प्रत्येक त्यौहार का एक मुख्य व्यंजन या भोजन होता है। उसी प्रकार लोहड़ी के त्यौहार में रेवड़ी, मुंगफली, गजक इत्यादि का सेवन किया जाता है। पकवान भी इन्ही से तैयार किए जाते हैं। लोहड़ी में मुख्यतयः सरसों का साग व मक्के की रोटी बनती हैं जिसको बड़े ही प्रेम से लोग खाते हैं और अपने निज जनों को भी खिलाते हैं।

ये भी देखें: पंजाब द्वारा लगवाई गई 300 मेगावाट सौर परियोजनाओं से कैसे होगा किसानों को लाभ

लोहड़ी के त्यौहार पर अलाव का क्या महत्त्व होता है

लोहड़ी का त्यौहार आने से काफी समय पूर्व लकड़ी एकत्रित की जाती हैं। जिसको गाँव या नगर के मध्य में किसी बढ़िया सी जगह पर जमाया जाता है। लोहरी वाली रात्रि में अपने परिवारीजन एवं मित्रगणों के साथ प्रेमपूर्वक अलाव के आस पास बैठ जाते हैं। इस दौरान बहुत से खेल कूद, गीत गायन बिना किसी शिकवा शिकायत के एक दूसरे के साथ हिल मिलकर किये जाते हैं। उसके बाद अलाव की परिक्रमा लगाई जाती है एवं अपने निज जनों की उन्नति एवं अच्छे स्वास्थ्य हेतु प्रार्थना की जाती है। रात्रि में इस अलाव के पास बैठ कर लोग गन्ने गजक रेबड़ी इत्यादि खाते हैं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More