देश में नारियल, काजू, कोको, मसाले, कॉफी और अन्य बागवानी फसलों की खेती करने वाले किसानों के लिए नए बाजार अवसर तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। हैदराबाद में आयोजित दक्षिणी राज्यों के क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन में कृषि क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियों, आगामी रबी मौसम की तैयारियों और बागवानी फसलों की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। सम्मेलन में नारियल के निर्यात में हुई उल्लेखनीय वृद्धि को प्रमुख उपलब्धि के रूप में रेखांकित किया गया।
प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, देश का नारियल निर्यात एक वर्ष में ₹4,349 करोड़ से बढ़कर ₹7,038 करोड़ तक पहुंच गया है। यह करीब 62 प्रतिशत की वृद्धि है। दक्षिण भारत देश के प्रमुख नारियल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है, इसलिए राज्यों से कहा गया कि वे निर्यात के बढ़ते अवसरों का लाभ किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करें।
सरकार ने बजट में नारियल क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए एक नई योजना की घोषणा की है। सम्मेलन में इस योजना को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आवश्यक कदमों और रणनीतियों पर चर्चा की गई। योजना का उद्देश्य नारियल उत्पादन से जुड़े किसानों को उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन के स्तर पर बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है।
निर्यात में बढ़ती मांग को देखते हुए किसानों को गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करने के साथ बाजार से बेहतर तरीके से जोड़ने पर भी जोर दिया गया। दक्षिणी राज्यों में नारियल की व्यापक खेती को देखते हुए स्थानीय उत्पादन को वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने की जरूरत बताई गई। इससे किसानों को घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी संभावित नए अवसर मिल सकते हैं।
पुराने नारियल बागानों की घटती उत्पादकता किसानों के सामने एक बड़ी चुनौती बन रही है। सम्मेलन में बताया गया कि 60 से 70 वर्ष पुराने नारियल के पेड़ों की उत्पादकता कई मामलों में कम हो जाती है और उपज की गुणवत्ता भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहती। ऐसे बागानों के पुनर्वास के लिए राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार रणनीति तैयार करने पर जोर दिया गया।
इसके तहत पुराने पेड़ों को एक साथ हटाने के बजाय चरणबद्ध तरीके से नए पौधे लगाने की व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में पुराने पेड़ों की जगह धीरे-धीरे नए पौधे लगाए जाएंगे, जिससे बागान का उत्पादन लंबे समय तक जारी रखा जा सके। चरणबद्ध पुनर्वास से किसानों की आय पर अचानक पड़ने वाले प्रभाव को कम करने और भविष्य में उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
नारियल के अलावा दक्षिण भारत में काजू और कोको जैसी फसलों में भी व्यापक संभावनाएं हैं। सम्मेलन में राज्यों को इन फसलों के विकास के लिए पहले से योजनाएं तैयार करने की सलाह दी गई, ताकि किसान बढ़ते बाजार अवसरों का लाभ उठा सकें। दक्षिणी राज्यों में मसाले, कॉफी, काजू, कोको और चंदन जैसी फसलों का भी महत्वपूर्ण उत्पादन होता है।
इन फसलों के उत्पादन, गुणवत्ता, प्रसंस्करण और विपणन को बेहतर ढंग से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। कृषि मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने से किसानों को स्थानीय मंडियों के साथ-साथ बाहरी बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है। सरकार और राज्यों के स्तर पर उत्पादन से लेकर बाजार तक बेहतर समन्वय विकसित करने की दिशा में योजनाएं तैयार करने पर भी चर्चा हुई।
कृषि निर्यात को बढ़ावा देना भी सम्मेलन की प्रमुख चर्चाओं में शामिल रहा। मुक्त व्यापार समझौतों के संदर्भ में फलों, सब्जियों, अनाजों और अन्य कृषि उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध अवसरों का अध्ययन करने की आवश्यकता बताई गई। राज्यों और संबंधित संस्थानों से कहा गया कि वे वैश्विक बाजार में कृषि उत्पादों की मांग और बदलती आवश्यकताओं को समझें तथा किसानों को गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए आवश्यक तकनीकी सहायता उपलब्ध कराएं।
इसके लिए कृषि मूल्य श्रृंखला में अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन महत्वपूर्ण माना गया। उत्पादन की गुणवत्ता, पैकेजिंग, प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्था को मजबूत करने से भारतीय कृषि उत्पादों को बाहरी बाजारों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है। किसानों को वैश्विक मांग के अनुरूप उत्पादन के लिए तैयार करना इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन का उद्देश्य राज्यों की अलग-अलग कृषि परिस्थितियों के अनुरूप कार्य योजनाएं तैयार करना भी रहा। देश के विभिन्न क्षेत्रों में मिट्टी, जल उपलब्धता, जलवायु और कृषि-जलवायु परिस्थितियों में अंतर है। ऐसे में सभी क्षेत्रों के लिए एक जैसी कृषि रणनीति अपनाने के बजाय स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर योजनाएं बनाने पर जोर दिया गया।
सम्मेलन में अल नीनो के संभावित प्रभाव, फसल विविधीकरण और आगामी रबी मौसम की तैयारियों पर भी चर्चा हुई। राज्यों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार कृषि कार्य योजना तैयार करने तथा रबी मौसम से पहले बीज, उर्वरक और अन्य कृषि संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए समन्वय मजबूत करने पर जोर दिया गया। सफल कृषि तकनीकों को एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागू करने की पहल पर भी चर्चा हुई।
सम्मेलन में डिजिटल कृषि से जुड़े कार्यों की भी समीक्षा की गई। किसान पहचान, कृषि प्रणाली, डिजिटल फसल सर्वेक्षण और 'भारत विस्तार' जैसी पहलों की प्रगति पर राज्यों से जानकारी ली गई। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यों को निर्धारित लक्ष्यों और प्रतिबद्धताओं को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने की सलाह दी। तेलंगाना और कर्नाटक में किसान पहचान पत्र बनाने के काम में 75 प्रतिशत से अधिक प्रगति होने की जानकारी दी गई।
तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना में जियो-रेफरेंसिंग का काम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। 'भारत विस्तार' सेवा को 13 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने के लिए काम किया जा रहा है, ताकि किसान अपनी भाषा में कृषि संबंधी सवाल पूछ सकें और उसी भाषा में सलाह प्राप्त कर सकें। इसे राज्यों की कृषि योजनाओं से जोड़ने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। अंडमान और निकोबार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल में डिजिटल फसल जनगणना पूरी होने की जानकारी भी दी गई।
कृषि अनुसंधान को प्रयोगशालाओं तक सीमित रखने के बजाय किसानों के खेतों तक पहुंचाने की जरूरत पर भी सम्मेलन में विशेष जोर दिया गया। कृषि मंत्री ने कहा कि देश में करीब 16,000 वैज्ञानिक हैं और आईसीएआर संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों तथा कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक गांवों और खेतों में जाकर किसानों की समस्याओं पर सीधे काम कर सकते हैं। राज्यों को अपनी सुविधानुसार 15 या 20 दिनों के विशेष शिविर आयोजित करने का सुझाव दिया गया, जहां किसान, वैज्ञानिक और कृषि विभाग के अधिकारी एक साथ बैठकर समस्याओं और उनके समाधान पर चर्चा कर सकें।
आगामी रबी मौसम की तैयारियों के लिए 28 और 29 सितंबर 2026 को दिल्ली के पूसा संस्थान में रबी सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इसमें राज्यों के कृषि मंत्री और अधिकारी अपनी रबी कार्य योजनाओं के साथ शामिल होंगे। संभावित बुवाई क्षेत्र के आधार पर बीज, उर्वरक और अन्य कृषि इनपुट की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए समन्वित योजना तैयार की जाएगी।
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