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मोटा अनाज हो सकता है आपके पशुओं के लिए घातक

मोटा अनाज हो सकता है आपके पशुओं के लिए घातक

हम सभी जानते हैं, कि यह साल विश्व में इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स (आईवायओएम/IYoM) के रूप में मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार सभी तरह के मोटे अनाज के उत्पादन और उसकी खपत के लिए जनता को प्रोत्साहित कर रही है। एक्सपर्ट्स का मानना है, कि मोटे अनाज का सेवन करना आपके लिए स्वास्थ्यवर्धक होता है। यह न सिर्फ आपको स्वास्थ्य को अच्छा बनाकर रखता है, बल्कि यह हमारी प्रतिरक्षा (Immunity) बढ़ाने के लिए भी बेहद जरूरी है। अगर आप नियमित रूप से मोटे अनाज का सेवन करते हैं, तो यह आपके प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune system) को स्ट्रांग करता है। आपको बहुत तरह के रोगों से दूर रखता है। मोटा अनाज इंसानों के अलावा पशुओं के लिए भी काफी लाभकारी माना गया है। लेकिन हमें यह भी जानने की जरूरत है, कि मोटा अनाज कभी-कभी पशुओं के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है और आज हम इसी के बारे में बात करेंगे। 

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पशुओं को किस तरह से खिलाया जाए बाजरा

अगर आप अपने पशुओं के आहार में बाजरे को मिलाना चाहते हैं, तो आप इसका दलिया बनाकर उसे अच्छी तरह से पका कर तैयार कर सकते हैं। उसके बाद आप इसे अपने पशुओं को खिला सकते हैं। साथ ही, आप पशुओं के चारे में बाजरे का आटा मिलाकर भी उन्हें खिला सकते हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी लेकिन पशुओं को भी थोड़े बहुत नमक की जरूरत होती है। इसलिए अगर जरूरत पड़े तो आप इस आटे में चुटकी भर नमक भी मिलाकर पशुओं को दे सकते हैं। रोजाना बात की जाए तो आप 1 से 2 किलो बाजरा अपने पशुओं को खिला सकते हैं। बाजरे का आटा खिलाने का सबसे बड़ा फायदा यह है, कि यह आपके पशुओं को वजन बढ़ाने में मदद करता है। 

पशुओं को बाजरा खिलाने के क्या है फायदे

पशुओं को बहुत पहले से बाजरा या फिर बाजरे का आटा खिलाया जाता रहा है। अगर आप के पशु को लिवर से जुड़ी हुई किसी तरह की समस्या है, तो आप उसे बेझिझक बाजरा खिला सकते हैं यह उसके लिए काफी लाभदायक होगा। बाजरा पशुओं के पाचन तंत्र को मजबूत करता है। बहुत से मामलों में ऐसा होता है, कि बच्चा पैदा करने के बाद पशु बीमार रहने लगता है। ऐसे मामले में आप उसे बाजरा खिला सकते हैं। यह न सिर्फ उसे बीमारियों से दूर रखेगा बल्कि यह पशुओं में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने में भी बहुत ज्यादा सहायक है। आप छोटे पशुओं जैसे कि बछड़े आदि को भी बाजरे के आटे की छोटी-छोटी लोई बनाकर खिला सकते हैं। यह उनके स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी है। 

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बाजरा खिलाने से कुछ नुकसान भी हो सकते हैं

हमने मोटे अनाज जैसे कि बाजरे आदि का पशुओं के आहार में फायदा तो देख लिया है। लेकिन कई बार इसके बहुत से नुकसान भी देखे जाते हैं। अगर आप लंबे समय तक अपने पशुओं को बाजरे का आटा या फिर बाजरे का दलिया खिलाते रहते हैं। तो उन में आयरन की कमी हो सकती है। इससे पशु की बॉडी पर गांठें उभरने लगती हैं। इसके अलावा अगर आप जरूरत से ज्यादा बाजरा पशुओं को खिला रहे हैं, तो उनमें अफारे की समस्या देखने को मिल सकती है। पशु चिकित्सक और एक्सपर्ट का कहना है, कि कभी भी किसी जानवर को बिना डॉक्टर की सलाह के बाजरा नहीं खिलाया जाना चाहिए। अगर आप इसे खिला भी रहे हैं, तो इसकी मात्रा हमेशा सीमित रखें।

बाजरा देगा कम लागत में अच्छी आय

बाजरा देगा कम लागत में अच्छी आय

बाजरा खरीफ की मुख्य फसल है लेकिन अब इसे रबी सीजन में भी कई इलाकों में लगाया जाता है। गर्मियों में इसमें रोग भी कम आते हैं और साल भर यह खाद्य सुरक्षा में भी योगदान दे पाता है। इसके लिए यह जानना जरूरी है कि बाजरे की उन्नत खेती कैसे करें 

बाजरे की आधुनिक, वैज्ञानिक खेती

बाजरा कोस्टल क्राप है और किसी भी कोस्टल क्राप में पोषक तत्व गेहूं जैसी सामान्य फसलों के मुकाबले कहीं ज्यादा होते हैं। बाजरा की हाइब्रिड किस्मों का उत्पादन गेहूं की खेती से ज्यादा लाभकारी हो रहा हैं। कम पानी और उर्वरकों की मदद से इसकी खेती हो जाती है। अन्न के साथ साथ यह पशुओं को हरा और सूखा भरपूर चारा भी दे जाता है। बाजरे के दाने में 11.6 प्रतिशत प्रोटीन, 5.0 प्रतिशत वसा, 67.0 प्रतिशत कार्बोहाइडेट्स एवं 2.7 प्रतिशत खनिज लवण होते हैं। इसकी खेती के लिए दोमट एवं जल निकासी वाली मृदा उपयुक्त रहती है। रेगिस्तानी इलाकों में सूखी बुबाई कर पानी लगाने की व्यवस्था करें। एक हैक्टेयर खेत की बुवाई के लिए 4 से 5 कि.ग्रा. प्रमाणित बीज पर्याप्त रहता है। 

बाजरे की उन्नत किस्में, संकर

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बाजरा की संकर किस्में ज्यादा प्रचलन में हैं। इनमें राजस्थान के लिए आरएचडी 21 एवं 30,उत्तर प्रदेश के लिए पूसा 415,हरियाणा एचएचबी 505,67 पूसा 123,415,605,322, एचएचडी 68, एचएचबी 117 एवं इम्प्रूब्ड, गुजरात के लिए पूसा 23, 605, 415,322, जीबीएच 15, 30,318, नंदी 8, महाराष्ट्र के लिए पूसा 23, एलएलबीएच 104, श्रद्धा, सतूरी, कर्नाटक पूसा 23 एवं आंध्र प्रदेश के लिए आईसीएमबी 115 एवं 221 किस्म उपयुक्त हैं। बाजार में प्राईवेट कंपनियों जिनमें पायोनियर, बायर, महको, आदि की अनेक किस्में किसानों द्वारा लगाई जाती हैं। आरएचबी 177 किस्म जोगिया रोग रोधी तथा शीघ्र पकने वाली है। औसत पैदावार लगभग 10-20 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तथा सूखे चारे की पैदावार 40-45 क्विंटल है। आरएचबी 173 किस्म 75-80 दिन, आरएचबी 154 बाजरे की किस्म देश के अत्यन्त शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों के लिये अधिसूचित है। 70-75 दिन में पकती है। आईसीएमएच 356- यह सिंचित एवं बारानी, उच्च व कम उर्वरा भूमि के लिए उपयुक्त, 75-80 दिन में पकने वाली संकर किस्म हैं। तुलासिता रोग प्रतिरोधी इस किस्म की औसत उपज 20-26 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। आईसीएमएच 155 किस्म 80-100 दिन में पककर 18-24 क्विंटल उपज देती है। एचएचबी 67 तुलासिता रोग रोधक है। 80-90 दिन में पककर 15-20 क्विंटल उपज देती है।

 

बीजोपचार

 

 बीज को नमक के 20 प्रतिशत घोल में लगभग पांच मिनट तक डुबो कर गून्दिया या चैंपा से फसल को बचाया जा सकता हैं। हल्के बीज व तैरते हुए कचरे को जला देना चाहिये। तथा शेष बचे बीजों को साफ पानी से धोकर अच्छी प्रकार छाया में सुखाने के बाद बोने के काम में लेना चाहिये। उपरोक्त उपचार के बाद प्रति किलोग्राम बीज को 3 ग्राम थायरम दवा से उपचारित करें। दीमक के रोकथाम हेतु 4 मिलीलीटर क्लोरीपायरीफॉस 20 ई.सी. प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। 

बुवाई का समय एवं विधि

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 बाजरा की मुख्य फसल की बिजाई मध्य जून से मध्य जुलाई तक होती है वहीं गर्मियों में बाजारा की फसल लगाने के लिए मार्च में बिजाई होती है। बीज को 3 से 5 सेमी गहरा बोयें जिससे अंकुरण सफलतार्पूवक हो सके। कतार से कतार की दूरी 40-45 सेमी तथा पौधे से पौधे की दरी 15 सेमी रखें। 

खाद एवं उर्वरक

बाजरा की बुवाई के 2 से 3 सप्ताह पहले 10-15 टन गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर की दर से देना चाहिए। पर्याप्त वर्षा वाले इलाकों में अधिक उपज के लिए 90 कि.ग्रा. नाइटोजन एवं 30 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से दें।

 

खरपतवार नियंत्रण

बाजरा की बुवाई के 3-4 सप्ताह तक खेत में निडाई कर खरपतवार निकाल लें। आवश्यकतानुसार दूसरी निराई-गुड़ाई के 15-20 दिन पश्चात् करें। जहां निराई सम्भव न हो तो बाजरा की शुद्ध फसल में खरपतवार नष्ट करने हेतु प्रति हेक्टेयर आधा कि.ग्रा. एट्राजिन सक्रिय तत्व का 600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

 

सिंचाई

 

 बाजरा की सिंचित फसल की आवश्यकतानुसार समय-समय पर सिंचाई करते रहना चाहिए। पौधे में फुटान होते समय, सिट्टे निकलते समय तथा दाना बनते समय भूमि में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।

बुवाई के बाद बाजरा की खेती की करें ऐसे देखभाल

बुवाई के बाद बाजरा की खेती की करें ऐसे देखभाल

बाजरा की  खेती की बुवाई जुलाई से अगस्त के बीच की जाती है। लेकिन किसान भाइयों को बुवाई के बाद भी फसल पर नजर रखनी होती है। यदि खेती की निगरानी अच्छी की गयी और खेती की जरूरत के हिसाब से देखभाल की गयी तो पैदावार अच्छी होती है। इससे किसान की आमदनी भी अच्छी हो जाती है। 

बुवाई के बाद सबसे पहले करें ये काम

बाजरे की पैदावार अच्छी बुवाई पर निर्भर करती है। यदि बीज अधिक बोया गया है और पौधों के बीच दूरी मानक के हिसाब से नही है तो पैदावार प्रभावित हो सकती है। यदि बीज कम हो बोया  गया हो तो उससे भी पैदावार प्रभावित होती है। इसलिये खेतों में बुवाई के समय ही एक क्यारी में अलग से बीज बो देने चाहिये ताकि जरूरत पड़ने पर क्यारी मे उगे पौधो की खेतों में रोपाई की जा सके। इसके लिए  बुवाई के बाद जब अंकुर निकल आयें तब किसानों को खेतों का निरीक्षण करना होगा। उस समय यह देखना चाहिये कि बुवाई के समय यदि बीज अधिक पड़ गया हो तो पेड़ों की छंटाई कर लेनी चाहिये। यदि पौधे कम हों या बीज कम अंकुरित हो सके हों तो पहले से तैयार क्यारी से पौधों को रोपना चाहिये।

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सिंचाई के प्रबंधन का रखें विशेष ध्यान

हालांकि बाजरा की बुवाई बरसात के मौसम होती है। बाजरा के बीजों को अंकुरित होने के लिए खेतों में नमी की आवश्यकता होती है। इसलिये  किसान भाइयों को बुवाई के बाद खेतों की बराबर निगरानी करनी होगी। यदि बुवाई के बाद वर्षा नही होती है तो  देखना होगा कि  खेत कहीं सूख तो नहीं रहा है। आवश्यकतानुसार सिंचाई करना चाहिये । आवश्यकता पड़ने पर दो से तीन बार सिंचाई करना चाहिये।  जब बाजरा में बाली या फूल आने वाला हो तब खेत की विशेष देखभाल करनी चाहिये। उस समय यदि वर्षा न हो रही हो और खेत सूख गया हो तो सिंचाई करनी चाहिये। इससे फसल काफी अच्छी हो जायेगी। 

जलजमाव हो तो करें पानी के निकालने का प्रबंध

बाजरा की खेती में किसान भाइयों को वर्षा के समय खेत की निगरानी करते समय यह भी ध्यान देना होगा कि कहीं खेत मे जलजमाव तो नहीं हो गया है। यदि हो गया हो तो पानी के निष्कासन की तत्काल व्यवस्था करनी चाहिये।  जलजमाव से भी फसल को नुकसान हो सकता है। बुवाई के बाद बाजरा की खेती की करें ऐसे देखभाल


खरपतवार को समाप्त करने के लिए करें समय-समय पर निराई गुड़ाई

बाजरे को खरपतवार से सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है। चूंकि  इसकी खेती बरसात के मौसम में होती है तो किसान भाइयों को वर्षा के कारण खेत की देखभाल का समय नहीं मिल पाता है। इसके बावजूद किसान भाइयों को चाहिये कि वे बाजरा की खेती की अच्छी पैदावार के लिए खरपतवार का नियंत्रण करे। बुवाई के 15 दिन बाद निराई गुड़ाई करनी चाहिये। उसके बाद एक माह बार निराई गुड़ाई करायें। फसल की बुवाई के दो माह बाद  निराई गुड़ाई करायें। इसके अलावा खरपतवार होने पर एट्राजीन  को पानी में घोल कर छिड़काव करायें।  किसान भाई ध्यान रखें कि एट्राजीन का छिड़काव निराई गुड़ाई करने से तीन-चार दिन पूर्व करना चाहिये। इससे काफी लाभ होता है। 

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बुवाई के बाद उर्वरक भी समय-समय पर दें

बाजरा की अच्छी पैदावार के लिए किसान भाइयों के बाद बुवाई के बाद खेतों को समय-समय पर उर्वरकों की उचित मात्रा देनी चाहिये। एकल कटाई के लिए बुवाई के एक माह बाद 40 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर देनी चाहिये। कई बार कटाई के लिए प्रत्येक कटाई के बाद 30 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर देनी चाहिये। जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों में 10-20 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर देनी चाहिये। कई जगहों पर नाइट्रोजन की जगह यूरिया का प्रयोग किया जाता है। जहां पर यूरिया का प्रयोग किया जाता है वहां पर बुवाई से डेढ़ महीने के बाद 20 से 25 किलो यूनिया प्रति एकड़ के हिसाब से देना चाहिये। बाजरा में कीट एवं रोग प्रबंधन

कीट एवं रोग प्रबंध

बाजरे की खेती में अनेक कीट एवं रोग लगते हैं। किसान भाइयों को चाहिये कि खेतों में खड़ी फसल को कीटों एवं रोगों से बचाने के उपाय करने चाहिये। इसके लिए खेतों में खड़ी फसल की निरंतर निगरानी करते रहना चाहिये। जब भी जैसे ही किसी कीट या रोग का पता चले उसका उपाय करना चाहिये।  

आईये जानते हैं कि कौन-कौन से कीट व रोग बाजरा की खेती में लगते हैं और उन्हें कैसे रोका जा सकता है। 

दीमक : यह कीट बाजरा की खड़ी फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। यह कीट जड़ से लेकर पत्ते तक में लगता है। जब भी इस कीट का पता चले किसान भाइयों को तत्काल सिंचाई के पानी के साथ क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ईसी ढाई लीटर हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहिये।  इसके अलावा नीम की खली का प्रयोग करना चाहिये, इसकी गंध से दीमक भाग जाती है।

तना छेदक कीट: यह कीट भी खड़ी फसल में लगता है। यह कीट पौधे के तने में लगता है और पूरे पौधे को चूस जाता है। इससे पौधे की बढ़वार रुक जाती है।  इससे बाजरे की फसल को बहुत नुकसान पहुंचता है। इस कीट का नियंत्रण करने के लिए कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 किलो अथवा फोरेट 10 प्रतिशत सीजी को 500 से 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिये। 

हरित बालियां रोग: इस रोग के लगने के बाद बाजरा की बालियां टेढ़ी-मेढ़ी और बिखर जाती हैं।  इस रोग के दिखते ही खरपतवार निकाल कर जीरम 80 प्रतिशत डब्ल्यूपी 2.0 किलो को 500-600 पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिये। 

सफेद लट: यह लट पौधों की जड़ों को काट कर फसल को विभिन्न अवस्थाओं में नुकसान पहुचाती है।  सफेद लट के कीट प्रकाश के प्रति आकषिँत होते हैं। इसलिये प्रकाश पाश पर आकर्षित कर सभी को एकत्रित करके मिट्टी के तेल मिले पानी में डालकर नष्ट कर दें। 

हरी बाली रोग: यह रोग अंकुरण के समय से पौधों की बढ़वार के समय लगता है। इस रोग से पौधों की पत्तियां पीली पड़ जातीं हैं और बढ़वार रुक जाती है।  ऐसे रोगी पौधों को खेत से बाहर निकाल कर नष्ट करें और कीटनाशकों का इस्तेमाल करें। 

अरगट रोग: यह रोग बाजरा में बाली के निकलने के समय लगता है।  इससे फसल को काफी नुकसान होता है। इस रोग के लगने के बाद पौधां से गुलाबी रंग का चिपचिपा गाढ़ा रस निकलने लगता है। यह पदार्थ बाद में भूरे रंग का हो जाता है। यह बालियों में दानों की जगह भूरे रंग का पिंड बन जाता है। ये जहरीला भी होता है। इसकी रोकथाम के  लिए सबसे पहले खरपतवार हटायें। उसके बाद 250 लीटर पानी में 0.2 प्रतिशत मैंकोजेब मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें। लाभ मिलेगा। 

टिड्डियों का प्रकोप: बाजरा की खेती में पौध बड़ा होने के कारण इसमें टिड्डियों के हमले का खतरा बना रहता है।  हमला करने के बाद टिड्डी दल पौधे की सभी पत्तियों को खा जाता है और इससे पैदावार को भी नुकसान होता है।  जब भी टिड्डी दल का हमला हो तो किसान भाइयों को चाहिये कि इसकी रोकथाम के लिए खेत में फॉरेट का छिड़काव करें। 

बाजरे की कटाई

बाजरे की कटाई उस समय करनी चाहिये जब दाना पूरी तरह पक कर तैयार हो जाये। यह माना जाता है कि बुवाई के 80 दिन से लेकर 95 दिन के बीच दाना पूरी तरह से पक जाता है। उसके बाद बाजरा के पौधे की कटाई करनी चाहिये। उसके बाद इसके सिट्टों यानी बालियों को अलग करके उनमें से दाना निकालना चाहिये।

बाजरा की खड़ी फसल से बाली चोंट लेना है फायदेमंद

बाजरा की खड़ी फसल से बाली चोंट लेना है फायदेमंद

आगरा। इन दिनों गर्मी वाले बाजरा की खेती पककर तैयार है। अब कटाई शुरू होने वाली है। उधर बारिश भी शुरू होने वाली हैं। ऐसे में बाजरा (Pearl Millet) की खड़ी फसल से ही बाली चोंट (काट) लेने में ही ज्यादा फायदा है। क्योंकि बाली कटने के बाद बाजरा खड़ी हुई बाजरा की फसल चारे के उपयोग में ली जा सकती है। या फिर हरी खाद बनाकर खेत में ही जोत देने में फायदा है। बारिश से गलकर यह पौधे एक अच्छा खाद का काम करेंगे। और यह खाद धान की फसल में बहुत ही उपयोगी साबित होगा।

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कैसे करें बाजरे की बाली की छटाई

- बाजरे की खड़ी फसल जब पककर तैयार हो जाए। तो मजदूरों की मदद से फसल के ऊपर पकी हुई बालियों को चोंट (काट) लेना चाहिए। और खेत के बाहर खाली मैदान में एकत्रित कर लेना चाहिए। और एक साथ सभी को थ्रेसर मशीन में डालकर बाजरा निकाल लेना चाहिए। इस बार चिलचिलाती धूप में भी बाजरा की अच्छी पैदावार हुई - बारिश शुरू होने से पहले धान की फसल करने वाले किसान गर्मियों वाला बाजरा कर लेते हैं। अमूमन यह फसल ज्यादा अच्छी नहीं हो पाती है। लेकिन इस बार बारिश शुरू होने से पहले ही अच्छी फसल के संकेत मिल रहे हैं। नौहझील के किसान ओमप्रकाश चौधरी बताते हैं कि उन्होंने किराए पर खेत लेकर 30 बीघा खेत में गर्मी वाला बाजरा किया है। बारिश शुरू होते ही इन खेतों में धान की फसल करेंगे। उझसे पहले बाजरा भी काफी अच्छा है। आगामी एक सप्ताह में बाजरा की बाली कटाई काम शुरू हो जाएगा। खड़ी हुई बाजरा की फसल को हरी खाद बनाकर खेत में ही जोत देंगे। जिससे धान की फसल के लिए खाद बनकर तैयार हो सके।

बाजरा में 6 बार पानी लगाया

- मथुरा जनपद के गांव मरहला मुक्खा निवासी किसान संतलाल बताते हैं कि बारिश कम होने के कारण बाजरा की फसल में 6 बार पानी लगाया गया है। खाद और अन्य कीटनाशक दवाओं के उपयोग से फसल अच्छी दिखाई दे रही है। उम्मीद है पैदावार भी बढ़िया होगी। ------- लोकेन्द्र नरवार
किसान ने बाजरा की खेती करने के लिए तुर्की से मंगवाया बाजरा

किसान ने बाजरा की खेती करने के लिए तुर्की से मंगवाया बाजरा

महाराष्ट्र राज्य के धुले जनपद में सकरी तालुका के पिंपलनेर निवासी किसान निसार शेख ने तुर्की (Turkey) से बाजरे (Pearl millet; Bajra) के बीज मंगाकर, बाजरे की खेती तैयार की है, जिससे उनको अच्छा खासा मुनाफा होने की आशा है। खेती की सारी तैयारी बेहतर तरीके से करने में सफल हुए निसार शेख, तुर्की से मंगाये बाजरे द्वारा तैयार की गयी फसल की ऊंचाई लगभग १२ फीट तक हो चुकी है। साथ ही निसार शेख ने फसल के बारे में बताते हुए कहा कि इस बाजरा की रोटी में अच्छा स्वाद है और इसकी अच्छी रोटी भी बनती है। बाजरा की फसल बारिश की वजह से काफी प्रभावित हुयी है, इसलिए उनको कम उत्पादन होने की सम्भावना है। बतादें कि तुर्की से बाजरे के बीज के लिए निसार शेख को १००० रुपये प्रति किलो की खरीदी पड़ी है।


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किसान नासिर शेख ने फसल के बारे में क्या कहा ?

नासिर शेख ने बाजरे की फसल के बारे में बताते हुए कहा है कि, उन्होंने बाजरे की बुवाई के दौरान प्रति एकड़ डेढ़ किलो बीज बोया है। इसकी भी बुवाई, जुताई एवं सिंचाई भी अन्य बाजरे की तरह ही होती है, इसमें भी समान ही उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। लेकिन इसकी उपज ६० क्विंटल प्रति एकड़ के करीब तक होती है। इस प्रकार तुर्की से बाजरे का बीज मंगाकर बाजरे की खेती किसी ने नहीं की है, साथ ही यह एक अनोखा प्रयोग है।

अन्य क्षेत्रों से भी आ रहे हैं किसान फसल की जानकारी लेने के लिए ?

तुर्की से मंगाए गए बाजरे के बीज की चर्चा आसपास के बहुत बड़े क्षेत्र में है। इस प्रकार से बाजरे की खेती किसी के द्वारा नहीं की जाने के चलते लोग इसको देखने के लिए बहुत दूर से आ रहे हैं। किसानों को इस तरह की फसल के बारे में जानने की बहुत लालसा हो रही है, इसलिए दूर दराज रहने वाले किसान भी नासिर सेख से मिलने आ रहे हैं। किसान बाजरे की १२ फ़ीट ऊंचाई को भी देखने के लिए आतुर हैं।


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बाजरा की खेती के लिए कितने राज्य अनुकूल हैं

बाजरा की खेती के लिए उत्तराखंड, झारखंड, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, हरयाणा एवं आंध्र प्रदेश सहित देश के २१ राज्य के वातावरण अनुकूल हैं। बाजरा को उगाने के लिए न्यूनतम बारिश (२००-६०० मिमी) की स्तिथि में शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में उगाया जाता है। बाजरा के अंदर काफी मात्रा में पोषक तत्व मिलते हैं, साथ ही इसकी फसल हर प्रकार की जलवायु में आसानी से प्रभावित नहीं होती है।
बाजरे की खेती (Bajra Farming information in hindi)

बाजरे की खेती (Bajra Farming information in hindi)

दोस्तों आज हम बात करेंगे, बाजरा के टॉपिक पर बाजरा जो सभी फसलों में प्रमुख माना जाता है। किसानों को बाजरे की फसल से काफी अच्छा मुनाफा होता है। बाजरे से जुड़ी सभी प्रकार की आवश्यक बातों को जानने के लिए हमारी इस पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहे:

बाजरा की खेती:

बाजरा भारत की सबसे ज्यादा उत्पादन वाली फसल है। इसीलिए भारत देश में बाजरे को अग्रणी फसलों की श्रेणी में रखा जाता है।भारत देश में करीब 85 लाख से अधिक क्षेत्रों में बाजरे की खेती की जाती है। बाजरे का उत्पादन करने वाले राज्य कुछ इस प्रकार है जहां बाजरे की खेती की जाती है। जैसे, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा राज्यों में भारी मात्रा में बाजरे का उत्पादन होता है।

बाजरा में मौजूद पोषक तत्व:

बाजरे में विभिन्न विभिन्न प्रकार के आवश्यक तत्व मौजूद होते हैं इसीलिए इसे आहार का मुख्य साधन माना जाता है। किसानों के अनुसार भारत देश में शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में इस फसल को प्रमुख खाद्य भी कहा जाता है। बाजरा ना सिर्फ मनुष्य अपितु पशुओं के भी पौष्टिक चारे का माध्यम है। बाजरे की खेती किसान पशुओं को चारा देने के लिए भी करते हैं। बाजरा के दानों में प्रोटीन की मात्रा 10.5 से लेकर14. 5% तक मौजूद होती है। पोषक तत्व की दृष्टिकोण से देखें तो यह बहुत ही उपयोगी है।

 बाजरा में लगभग वसा 4 से 8 % होता है वहीं दूसरी ओर कार्बोहाइड्रेट खनिज तत्व कैल्शियम केरोटिन राइबोफ्लेविन, विटामिन बी तथा नायसिन और विटामिन b6 भी भरपूर मात्रा में बाजरे में मौजूद होते हैं। गेंहू और चावल के मुकाबले बाजरे में अधिक मात्रा में लौह तत्व मौजूद होते हैं। बाजरे में भरपूर मात्रा में ऊर्जा मौजूद होती है इसी कारण इसका सेवन सर्दियों में ज़्यादा करते हैं। प्रोटीन, कैल्शियम फास्फोरस, और खनिज लवण, हाइड्रोरासायनिक अम्ल, बाजरे में उपयुक्त मात्रा में पाया जाता है। 

ये भी देखें : बाजरा की उन्नत किस्में  

पूसा संस्थान की पूसा कम्पोजिट 612, पूसा कंपोजिट्स 443, पूसा कम्पोजिट 383, पूसा संकर 415, एचएचबी 67, आर एस बी 121, MH169 जैसी अनेक क्षेत्रीय किसमें देश में मौजूद हैं।

बाजरे की फसल के लिए भूमि का चयन:

बाजरे की फसल के लिए किसान सभी प्रकार की भूमि को उपयुक्त बताते हैं, परंतु बलुई दोमट मिट्टी सबसे सर्वोत्तम मानी जाती है। बाजरे की फसल के लिए जल निकास की व्यवस्था को उचित बनाए रखना आवश्यक होता है। बाजरे की फसल के लिए अधिक उपजाऊ भूमि की कोई जरूरत नहीं पड़ती हैं। क्योंकि भारी भूमि कम अनुकूलित होती है।

बाजरे की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु:

बाजरे की खेती के लिए गर्म जलवायु सबसे उपयोगी होती है।बाजरे की खेती 400 से 600 मिलीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह से कर सकते हैं। बाजरे की खेती के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 32 से 37 सेल्सियस बेहतर माना जाता है। बाजरे की फसल का उत्पादन करने के लिए। कभी-कभी ऐसा होता है जब बाजरे पुष्पन अवस्था में हो और बारिश हो जाएगा। यह आप पानी के फव्वारों के जरिए सिंचाई कर दे। तो बाजारों के दाने धुल जाते हैं और बाजरे का उत्पादन नहीं हो पाता है। इस प्रकार बाजरे की खेती करते वक्त जलवायु का खास ख्याल रखें। 

ये भी देखें : बाजरा देगा कम लागत में अच्छी आय

बाजरे की फ़सल के लिए (फसल चक्र की व्यवस्था)

बाजरे की फसल के लिए, फसल चक्र की व्यवस्था बनाना बहुत ही उपयोगी होता है। इस प्रक्रिया को अपनाने से मिट्टियों की उर्वरता बनी रहती है। यह फसल चक्र आपको एकवर्षीय बनाने की आवश्यकता होती है। या फसल चक्र कुछ इस प्रकार बनाए जाते हैं जैसे: गेहूं और जौ, बाजरा सरसों और तारामीरा, या फिर बाजरा चना, मटर या मसूर, बाजरा गेहूं, सरसों, ज्वार, मक्का चारे के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तथा बाजरा, सरसों ग्रीष्मकालीन, मूंग आदि फसल चक्र बनाए जाते हैं।

बाजरे की फसल के लिए खेत को तैयार करें:

बाजरे की फसल को बोते समय खेत को भली प्रकार से तैयार करने की आवश्यकता होती है। गर्मी के दिनों में खेतों को गहरी अच्छी जुताई की आवश्यकता होती है। साथ ही साथ उत्तम जल निकास की व्यवस्था खेतों में बनाना आवश्यक होता है। खेत जोतने के बाद, खेतों को अच्छी तरह से समतल कर लेना चाहिए। बाजरे की फसल का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए हल द्वारा मिट्टी को अच्छी तरह से पलटे, दो से तीन बार जताई करें फिर उसके बाद बीज रोपण करें। बाजरे की फसल को सुरक्षित रखने के लिए तथा विभिन्न प्रकार के प्रकोप जैसे, दीमक और लट से बचाने के लिए आख़िरी जुताई के दौरान 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर से फोरेट का इस्तेमाल कर खेतों में डाले। बाजरे की खेती के लिए शून्य जुताई विधि किसान उत्तम बताते हैं। इसके लिए आपको खेत समतल करना होता है मिट्टी को फसल के लिए अवशेषों तथा वानस्पतिक अवशेषों का आवरण बनाए रखने की आवश्यकता होती है। किसान इस प्रक्रिया को खेत के लिए सबसे लाभप्रद बताते हैं।

जानिए बाजरा की खेती से जुड़ी अहम बातें

बाजरे की फसल के लिए खरपतवार प्रबंधन करना:

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार बाजरे की फसल के लिए खरपतवार प्रबंधन करना बहुत ही आवश्यक होता है। इसके लिए आपको लगभग 1 किलोग्राम एट्राजीन या पेंडिमिथालिन 500 से 600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव की आवश्यकता होती है। छिड़काव की यह प्रक्रिया बुवाई के बाद या फिर अंकुरण आने से पहले करते हैं। बाजरे की फसल बुवाई के बाद लगभग 25 से 30 दिनों के बाद खुरपी या कसौला की सहायता से खरपतवार को निकालना उपयोगी होता है। 

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बाजरे की फसल के लिए कीट प्रबंधन की व्यवस्था:

  • बाजरे की फसल को दीमक के प्रकोप से बचाने के लिए आपको 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से क्लोरोपाइरीफॉस की जरूरत पड़ती है। क्लोरोपाइरीफॉस का इस्तेमाल आप को जड़ों में और जब थोड़ी हल्की बारिश हो तब मिट्टियों में मिलाकर अच्छी तरह से बिखेर देना चाहिए।
  • तना मक्खी, जैसी समस्याओं और गिडारें और इल्लियां की शुरुआती अवस्था में पौधों की बढ़वार को काटकर अलग कर देना। इस अवस्था में पौधे सूख जाते हैं इस प्रकोप की रोकथाम करने के लिए आपको लगभग 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फॉरेट 25 किलोग्राम, फ्यूराडोन, 3%और मैलाथियान, 5% 25 किलोग्राम प्रति लीटर के हिसाब से खेतों में डालना उपयोगी होता है।
  • सफेद लट बाजरे की फसल को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। इस रोग की रोकथाम करने के लिए आपको फ्यूराडॉन 3% फॉरेट 10% दानों को करीब 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बाजरे की बुवाई करते टाइम मिट्टियों में मिलाना आवश्यक होता है।

दोस्तों हम उम्मीद करते हैं, कि आपको हमारा यह आर्टिकल बाजरा पसंद आया होगा। हमारे इस आर्टिकल में बाजरेकीफसलसेजुड़ी सभी तरह की आवश्यक जानकारी मौजूद है। जो आपके बहुत काम आ सकती हैं। हमारे इस आर्टिकल को ज्यादा से ज्यादा अपने दोस्तों और सोशल मीडिया तथा अन्य प्लेटफार्म पर शेयर करते रहे। धन्यवाद।

ओडिशा में आदिवासी परिवारों की आजीविका का साधन बनी बाजरे की खेती

ओडिशा में आदिवासी परिवारों की आजीविका का साधन बनी बाजरे की खेती

भुवनेश्वर। ओडिशा में बाजरे की खेती (Bajre ki Kheti) धीरे-धीरे आदिवासी परिवारों की आजीविका का साधन बन रही है। मिलेट मिशन (Odisha Millets Mission) के तहत बाजरे की खेती को फिर से बड़े पैमाने पर पुनर्जीवित करने की कोशिश की जा रहीं हैं। इससे राज्य के आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार की संभावना दिखाई दे रहीं हैं।
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सरकार राज्य के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में बाजरे की खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत है। इसके जरिए ही इन परिवारों को आर्थिक मजबूती देने की कोशिश है।

कम बारिश में अच्छी उपज देती है बाजरे की फसल

- बाजरे की फसल कम बारिश में भी अच्छी उपज देती है। इसीलिए उम्मीद जताई जा रही है कि यहां के आदिवासी परिवारों की बाजरे की खेती सबसे अधिक लाभकारी करेगी। यही कारण है कि ओडिशा के तीसरे बड़े आबादी वाले मयूरभंज जिले में महिला किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
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राज्य के 19 जिलों में बाजरे की खेती को किया जा रहा है पुनर्जीवित

- ओडिशा राज्य के 19 जिलों में बाजरा की खेती को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई गई है। इसमें 52000 हेक्टेयर से अधिक का रकबा शामिल किया गया है। साथ ही 1.2 लाख किसानों को बाजरे की खेती से जोड़ा जा रहा है।
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महिला किसानों की भागीदारी है प्रसंशनीय

- ओडिशा में बाजरे की खेती को लेकर आदिवासियों में जबरदस्त उत्साह है। इनमें खासतौर पर महिला किसानों की भागीदारी प्रसंशनीय है। कई जगह अकेले महिलाएं ही पूरी तरह बाजरे की खेती कर रहीं हैं। वहीं कई स्थानों पर महिलाएं अपने पुरुष समकक्षों संग धान की खेती में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहीं हैं। महिलाएं अपनी उपज को अच्छे भाव में बाजार में बेच रहीं हैं।

मिशन मिलेट्स के तहत खेती को मिल रहा है बढ़ावा

- राज्य में मिशन मिलेट्स के तहत बाजरे की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें सरकार भी किसानों की मदद कर रही है। किसान बंजर जमीन को उपजाऊ बनाकर बाजरे की खेती करके अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। इस कार्यक्रम का शुभारंभ साल 2017 में हुआ था। इन दिनों रागी, फोक्सटेल, बरनार्ड, ज्वार, कोदो व मोती जैसी विभिन्न किस्मों की खेती की जा रही है। यही बाजरे की खेती आदिवासी परिवारों की आजीविका का साधन बन रहा है। ----- लोकेन्द्र नरवार
बाजरे की खेती को विश्व गुरु बनाने जा रहा है भारत, प्रतिवर्ष 170 लाख टन का करता है उत्पादन

बाजरे की खेती को विश्व गुरु बनाने जा रहा है भारत, प्रतिवर्ष 170 लाख टन का करता है उत्पादन

बदलते परिवेश और खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए किसान लगातार इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि कौन सी फसल उगाएं। हालांकि, मोटे अनाज उगाना किसानों की चिंताओं को दूर करने का एक शानदार तरीका हो सकता है। मोटे अनाज की खेती, जैसे कि बाजरा (Pearl Millet), जब से संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को बाजरा वर्ष (इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स (आईवायओएम/IYoM-2023)) के रूप में घोषित किया है, बाजरे की खेती और मांग दोनों बढ़ गयी है।
इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स (IYoM) 2023 योजना का सरकारी दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें
[caption id="attachment_10437" align="alignleft" width="300"]बाजरे के बीज (Bajra Seeds) बाजरे के बीज[/caption] हैदराबाद में भारतीय बाजरा अनुसंधान संस्थान (भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान (Indian Institute of Millets Research), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत ज्वार तथा अन्य कदन्नों पर बुनियादी एवं नीतिपरक अनुसंधान में व्यस्त एक प्रमुख अनुसंधान संस्थान है) के अनुसार, भारत 170 लाख टन से अधिक मोटे अनाज का उत्पादन करता है। यह एशिया के 80 प्रतिशत और वैश्विक उत्पादन का 20 प्रतिशत हिस्सा है। यह लगभग 131 देशों में उगाया जाता है और 600 मिलियन एशियाई और अफ्रीकी लोगों इसको भोजन के रूप मे उपयोग करते है । [caption id="attachment_10434" align="alignright" width="188"]बाजरा (Bajra) बाजरा (Pearl Millet)[/caption] सबसे पुराने खाद्य पदार्थों में से एक बाजरा भी है, किसान कई वर्षों से मिश्रित खेती के तरीकों का उपयोग करके बाजरा उगा रहे हैं। आंध्र प्रदेश के मेडक में किसान एक ही भूखंड पर 15 से 30 विभिन्न किस्मों की फसल की खेती करते हैं, जिसमें विभिन्न प्रकार के बाजरा, दाल और जंगली खाद्य पदार्थ शामिल हैं। हाल के वर्षों में लाखों के संख्या मे लोग इसको अपनी दैनिक आहार में अनाज के अनुपात में मोटे अनाज जैसे बाजरा के उपयोग को प्राथमिकता दे रहे हैं। लोग रोगों से निपटने के लिए स्वास्थ्य जागरूकता में वृद्धि के परिणामस्वरूप बाजरे के सेवन को एक विकल्प के रूप मे तैयार कर रहे हैं। बाजरा को 'सुपरफूड' के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, क्योंकि इनमें फाइबर और प्रोटीन जैसे मैक्रोन्यूट्रिएंट्स के साथ-साथ कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे विटामिन और खनिजों की उच्च मात्रा होती है। ज्वार, बाजरा, फिंगर बाजरा, फॉक्सटेल बाजरा आदि अनाज 'सुपरफूड' बाजरा के उदाहरण हैं। ये सुपरफूड मधुमेह, मोटापा और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोगों की मदद कर सकते हैं। यह पाचन में भी सहायता करता है और भी बहुत समस्याओं से निजात दिलाता है |

प्राचीन और पौष्टिक अनाज उत्पादन को बढ़ावा

केंद्र सरकार ने प्राचीन और पौष्टिक भारतीय अनाज के उपयोग को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। सरकार के अभियान से खेत मालिकों को लाभ होगा और खाने वालों का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। 2023 के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा विश्वव्यापी अनाज वर्ष घोषित किया गया है। भारत के नेतृत्व में और 70 से अधिक देशों द्वारा समर्थित संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का उपयोग इसे पारित करने के लिए किया गया था। यह बाजरा के महत्व, टिकाऊ कृषि में इसकी भूमिका और दुनिया भर में एक बढ़िया और शानदार भोजन के रूप में इसके लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाने में मदद करेगा। [caption id="attachment_10436" align="alignleft" width="300"]बाजरे की रोटी (Bajre ki roti) बाजरे की रोटी[/caption] 170 लाख टन से अधिक के बाजरे के उत्पादन के साथ, भारत एक वैश्विक बाजरा केंद्र बनने की ओर अग्रसर है। एशिया में उत्पादित बाजरा का 80% से अधिक इस क्षेत्र में उगाया जाता है। ये अनाज भोजन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पहले पौधों में से एक थे और सिंधु सभ्यता में खोजे गए थे। यह लगभग 131 देशों में उगाया जाता है और लगभग 600 मिलियन एशियाई और अफ्रीकी लोगों का पारंपरिक भोजन है।

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भारत सरकार ने बाजरा उत्पादन और खपत को बढ़ावा देने के लिए 2018 को राष्ट्रीय बाजरा वर्ष घोषित किया।  संयुक्त राष्ट्र (United Nations) महासभा ने हाल ही में सर्वसम्मति से 2023 को "अंतर्राष्ट्रीय बाजरा वर्ष" घोषित करने के लिए बांग्लादेश, केन्या, नेपाल, नाइजीरिया, रूस और सेनेगल के सहयोग से भारत द्वारा शुरू किए गए एक प्रस्ताव को अपनाया। भारत ने 2023 पालन के लिए तीन प्राथमिक लक्ष्यों की पहचान की है:

i. खाद्य सुरक्षा और पोषण में बाजरा के योगदान के बारे में जागरूकता बढ़ाना;

ii. बाजरे के उत्पादन, उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार की दिशा में काम करने के लिए राष्ट्रीय सरकारों सहित प्रेरक हितधारक;

iii. बाजरा अनुसंधान और विकास और विस्तार सेवाओं में निवेश में वृद्धि के लिए सुधार करना।

देश की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद करने के लिए बाजरा को वर्षों से भारत की खाद्य सुरक्षा लाभ योजनाओं में शामिल किया गया है। मोटे अनाज अफ्रीका में 489 लाख हेक्टेयर भूमि पर उगाए जाते हैं, वार्षिक उत्पादन लगभग 423 लाख टन है। केंद्र सरकार के अनुसार, भारत मोटे अनाज (138 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में) का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। ऐसी स्थिति में, किसानों को मोटे अनाज की खेती के विकल्पों के बारे में पता होना चाहिए, जैसे कि बाजरा की खेती, जिसका उपयोग आर्थिक लाभ उत्पन्न करने के लिए किया जा सकता है।


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(Bajra Farming information in hindi)

बाजरा उत्पादन के प्रति जागरूकता

बाजरा के स्वास्थ्य लाभों को उजागर करने और जन जागरूकता बढ़ाने के लक्ष्य के साथ 5 सितंबर को 'भारत का धन, स्वास्थ्य के लिए बाजरा' विषय के साथ एक पेंटिंग प्रतियोगिता शुरू हुई। प्रतियोगिता का समापन 5 नवंबर, 2022 को होगा। अब तक, सरकार का दावा है कि उसे बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। 10 सितंबर, 2022 को बाजरा स्टार्टअप इनोवेशन चैलेंज (Millet Startup Innovation Challenge) शुरू किया गया था। millet startup innovation challenge  
"अंतरराष्ट्रीय पोषक-अनाज वर्ष 2023 के उपलक्ष में वित्त एवं कृषि मंत्री व सीएम के आतिथ्य में कॉन्क्लेव
 (Millets Conclave 2022), और मिलेट स्टार्टअप इनोवेशन चैलेंज" 
से सम्बंधित सरकारी प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) रिलीज़ का दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए,
 यहां क्लिक करें : https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1854884
https://twitter.com/nstomar/status/1563471184464715779?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E1563471184464715779%7Ctwgr%5E256261f5a04f0ab375ae464d14642d51ee55205a%7Ctwcon%5Es1_&ref_url=https%3A%2F%2Fpib.gov.in%2FPressReleaseIframePage.aspx%3FPRID%3D1854884
"अंतर्राष्ट्रीय पोषक अनाज वर्ष 2023 की समयावधि तक कृषि मंत्रालय ने पूर्व में शुरू किए गए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन
 और प्राचीन तथा पौष्टिक अनाज को फिर से खाने के उपयोग में लाने पर जागरूकता फैलाने की पहल" से सम्बंधित सरकारी
 प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) रिलीज़ का दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें
यह पहल युवाओं को मौजूदा बाजरा पारिस्थितिकी तंत्र की समस्याओं के लिए तकनीकी और व्यावसायिक समाधान प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित करती है। यह नवाचार प्रतियोगिता 31 जनवरी 2023 तक खुली रहेगी। बाजरा और इसके लाभों के बारे में प्रश्न पूछने वाले माइटी मिलेट्स क्विज (Mighty Millets Quiz) को हाल ही में लॉन्च किया गया था, और इसे जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है। क्विज का आयोजन कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा किया जा रहा है, क्विज में प्रवेश करने के इच्छुक प्रतिभागी यहाँ क्लिक करें। यह प्रतियोगिता 20 अक्टूबर 2022 को समाप्त होगी, इससे लोगों की बाजरे और मोटे अनाज के बारे में समझ बढ़ेगी। Mighty Millets Quiz बाजरे के महत्व के बारे में एक ऑडियो गीत और वृत्तचित्र फिल्म के लिए एक प्रतियोगिता भी जल्द ही शुरू की जाएगी। अंतर्राष्ट्रीय बाजरा वर्ष 2023 लोगो और स्लोगन प्रतियोगिता पहले ही शुरू हो चुकी है। विजेताओं की घोषणा शीघ्र ही की जाएगी। भारत सरकार जल्द ही ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय बाजरा वर्ष 2023 के उपलक्ष्य में लोगो ( Logo ) और नारा जारी करेगी। लक्ष्य मोटे अनाज को किसी भी तरह से लोकप्रिय बनाना है।


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वेदों में भी बाजरा उत्पादन का चर्चा

यजुर्वेद में बाजरे के उपयोग के साक्ष्य मिले है। बाजरे की खेती से किसानों को काफी लाभ हो सकता है। बाजरा या मोटा अनाज भी आपकी सेहत के लिए अच्छा होता है, इसमें बाजरा सबसे लोकप्रिय है। [caption id="attachment_10440" align="aligncenter" width="1024"]भारत का राज्यवार बाजरा नक्शा (from https://agricoop.nic.in/sites/default/files/Crops.pdf) भारत का राज्यवार बाजरा नक्शा[/caption] बाजरा कई प्रकार की किस्मों में भी आता है। प्रियंगु (लोमड़ी की पूंछ वाला बाजरा, Priyangu ), स्यामक (काली उंगली बाजरा, shyamak) और अनु (बार्नयार्ड बाजरा) ये सब बाजरे की महत्वपूर्ण किस्म है। यजुर्वेद में भी उपमहाद्वीप के कई क्षेत्रों में बाजरा के उपयोग के प्रमाण मिलते हैं। बाजरा 1500 ईसा पूर्व से बहुत पहले उगाया और खाया जाता था। मोटे अनाज खाने वालों के बीच लोकप्रिय बाजरे की किस्में रागी (मोती बाजरा), ज्वार (ज्वार उर्फ द ग्रेट बाजरा), और प्रियांगु (फॉक्स टेल बाजरा) हैं।