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दुग्ध उत्पादन से मोटा मुनाफा लेने के लिए इन तीन गायों को पालें किसान

दुग्ध उत्पादन से मोटा मुनाफा लेने के लिए इन तीन गायों को पालें किसान

इस गाय की प्रतिदिन औसतन 12 से 20 लीटर दूध देने की क्षमता है। यदि आप इस गाय का बेहतर ढंग से देखभाल रखें तो यह पाया गया है, कि यह गाय प्रतिदिन 50 से 60 लीटर दूध भी दे सकती है। भारत में इस समय डेयरी का व्यवसाय बड़ी तीव्रता से फैलता जा रहा है। दूध के व्यापार से लोग प्रति माह लाखों का मुनाफा अर्जित कर रहे हैं। दरअसल, दुग्ध व्यवसाय को करने के लिए भी तकनीक एवं नॉलेज की काफी आवश्यकता होती है। यदि आप बेहतर मवेशियों के साथ यह व्यवसाय आरंभ करते हैं, तो आपको निश्चित तौर पर अच्छा-खासा मुनाफा मिलेगा। वर्ना आप इसमें उतना पैसा नहीं कमा पाएंगे। हम आपको आज इस लेख में बताएंगे कि आप किन तीन प्रजातियों की गायों को पाल कर एक माह में मोटा मुनाफा कमा सकते हैं। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि अब गाय पालन के लिए सरकार की तरफ से भी मदद मिलती है। मतलब कि आपको यह व्यवसाय चालू करने के लिए अत्यधिक निवेश भी नहीं करना पड़ेगा।

देश में दुग्ध उत्पादन की काफी आवश्यकता है

भारत में दुग्ध उत्पादन करना किसान और पशुपालकों के लिए फायदे का सौदा होता है। दुग्ध उत्पादन करने से आज भी देश के अधिकांश किसान अपनी आजीविका चलाते हैं। आजीविका को चलाने के लिए कृषि के साथ-साथ किसान पशुपालन कर दूध बेचकर आमदनी करते हैं। बतादें कि भारत में दूध की अच्छी खासी खपत है। इसलिए दूध की आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए बेहतर नस्ल के मवेशी पालना बेहद आवश्यक है।

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प्रथम नस्ल गिर गाय

गिर गाय भारत में सबसे अधिक दूध देने वाली गाय मानी जाती है। गिर नस्ल की गाय के थन काफी अधिक बड़े होते हैं। यह गाय गुजरात के गीर के जंगलों में मिलती हैं। दरअसल, वर्तमान में इसको संपूर्ण भारत में पाला जाने लगा है। यह गाय प्रति दिन औसतन 12 से 20 लीटर दूध देती है। परंतु, यदि आप इस गाय का बेहतर ढ़ंग से ध्यान रखते हैं तो ऐसा पाया गया है, कि यह गाय 50 से 60 लीटर दूध भी प्रति दिन दे सकती है। अब आप सोचिए यदि आप इस प्रकार की तीन चार गाय भी रखते हैं, तो प्रति माह केवल इनका दूध बेचकर कितना धन कमा सकते हैं।

द्वितीय स्थान पर लाल सिंधी गाय

यह लाल सिंधी गाय सिंध के इलाके में पाई जाती है। जो कि इसके नाम से ही पता चलता है। साथ ही, यह गाय दिखने में थोड़ी लाल रंग की होती है। इसलिए इस गाय को लाल सिंधी गाय कहा जाता है। आजकल यह गाय ओडिशा, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक और केरल में भी बड़ी मात्रा में पाली जाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में भी कुछ किसान इस गाय को पालने का कार्य कर रहे हैं। यह गाय प्रतिदिन 15 से 20 लीटर दूध देती है। हालांकि, यदि आपने इसकी बेहतर ढंग से देखभाल रखी तो यह प्रतिदिन 40 से 50 लीटर भी दूध दे सकती है।

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तृतीय स्थान पर साहिवाल गाय

बतादें कि तीसरे स्थान पर आने वाली साहिवाल गाय आपको मध्य प्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में काफी नजर पड़ती है। इन राज्यों में किसानों के मध्य यह गाय सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। औसतन यह गाय प्रति दिन 10 से 15 लीटर दूध देती है। परंतु, यदि आप इस गाय का अच्छे से खानपान और देखभाल रखेंगे तो यह आपको प्रतिदिन 30 से 40 लीटर भी दूध दे सकती है। इस गाय की सबसे अच्छी बात यह होती है, कि इसे कम जगह में भी आसानी से रखा जा सकता है। इसका अधिक ध्यान रखने की भी आवश्यता नहीं पड़ती।
जानें ग्राफ्टिंग विधि से खेती करने से कितने फायदे होते हैं

जानें ग्राफ्टिंग विधि से खेती करने से कितने फायदे होते हैं

सामान्य तौर पर सबका मानना है, कि एक पेड़ पर एक ही किस्म का फल प्राप्त होता है। परंतु, क्या आपको मालूम है कि एक ऐसी तकनीक है, जिसके माध्यम से हम एक पेड़ से बहुत सारे फल अर्जित कर सकते हैं। 

आइए इस लेख में आगे हम इसके बारे में विस्तार से जानेंगे। आपकी जानकारी के लिए बतादें कि कुछ लोगों को घरों में अथवा गार्डेन में विभिन्न प्रकार के पौधे लगाने का शौक होता है। 

गार्डेनिंग का शौक रखने वाले नर्सरी से विभिन्न किस्मों के पौधे लाकर अपने बगीचे में रोपते हैं। ऐसे शौकीन लोगों के लिए ग्राफ्टिंग तकनीक बेहद ही फायेदमंद साबित होती है। हालांकि, यह तकनीक कृषि क्षेत्र में भी काफी कारगर होती है।

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि ग्राफ्टिंग एक ऐसी तकनीक है, जिसमें दो पौधों को जोड़ कर एक नया पौधा तैयार किया जाता है, जो मूल पौधे की तुलना में अधिक पैदावार प्रदान करता है। 

ग्राफ्टिंग विधि द्वारा तैयार किये गए पौधे की खासियत यह है कि, इसमें दोनों पौधों के गुण और विशेषताएं रहती हैं। आपकी जानकारी के लिए बतादें कि, ग्राफ्टिंग तकनीक का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के पौधों को तैयार करने के लिए किया जाता है। इस तकनीक का इस्तेमाल आम, जामुन, गुलाब, सेब एवं संतरे जैसे बहुत सारे बारहमासी पौधो पर किया जाता है।

ग्राफ्टिंग कितने प्रकार की होती है

  • एप्रोच ग्राफ्टिंग – Approach grafting
  • साइड ग्राफ्टिंग – Side grafting
  • स्प्लिस ग्राफ्टिंग – Splice grafting
  • सैडल ग्राफ्टिंग – Saddle grafting
  • फ्लैट ग्राफ्टिंग – Flat grafting
  • क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग – Cleft grafting
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ग्राफ्टिंग किस प्रकार की जाती है

घर के गार्डेन में पौधों की ग्राफ्टिंग करना बेहद ही सुगम है। इसके साथ ही ग्राफ्टेड पौधे शीघ्रता से तैयार हो जाते हैं। गार्डन में पौधों की ग्राफ्टिंग करने के लिए जड़ वाले पौधे यानी कि रूट स्टॉक एवं सायन और कलम वाले पौधे को लिया जाता है। 

अब रूट स्टॉक और सायन को एक दूसरे से जोड़ने के लिए दोनों के सिरों को 1-5 इंच तक चाकू के माध्यम से तिरछा काटें। इसके उपरांत सायन के तिरछे कटे भाग को रूट भंडार के कटे हिस्से के ऊपर लगाते हैं। 

उसके पश्चात दोनों कटे हुए भागों को आपस में जोड़कर एक टेप की सहायता से बाँध देते हैं। इसके उपरांत रूट स्टॉक और सायन ऊतक आपस में जुड़ने लग जाते हैं। इस विधि के माध्यम से पौधों की उन्नति होनी चालू हो जाती है। इस तरह इस विधि द्वारा पौधों को विकसित कर सकते हैं।

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ग्राफ्टिंग तकनीक से खेती करने के लाभ

  • ग्राफ्टिंग तकनीक से तैयार पौधों का आकार बेशक छोटा हो परंतु, इनमें फल-फूल शीघ्र लगने लगते हैं।
  • ग्राफ्टिंग करने से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है, इससे पौधों में रोग भी कम लग पाता है।
  • ग्राफ्टिंग से तैयार पौधों को अत्यधिक देखभाल की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
  • ग्राफ्टेड पौधों की गुणवत्ता एवं विशेषता बीजों द्वारा रोपे गए पौधों से बेहतर होती है।
  • ग्राफ्टिंग तकनीक का उपयोग करके हम फल तथा फूलों के पौधों को सहजता से तैयार कर सकते हैं।
  • ग्राफ्टिंग से तैयार पौधे से लगभग वर्षभर फूल अथवा फल अर्जित होते हैं।
  • ग्राफ्टिंग विधि से तैयार पौधों को घर पर गमले की मृदा में भी रोपा जा सकता है।