भारत में एलोवेरा की खेती (Aloevera Farming) तेजी से लोकप्रिय हो रही है क्योंकि इसकी प्रति एकड़ आय सामान्य फसलों की तुलना में अधिक होती है और इसमें पानी व मेहनत दोनों कम लगते हैं। एलोवेरा से किसान पत्तियों को सीधे बेच सकते हैं या फिर उसका जूस निकालकर मार्केटिंग कर सकते हैं। इस लेख में एलोवेरा की खेती की पूरी प्रक्रिया, उत्पादन और मुनाफे से जुड़ी जानकारी दी गई है।
एलोवेरा, जिसे घृतकुमारी भी कहा जाता है, एक रसीला (Succulent) पौधा है जिसका औषधीय और व्यावसायिक महत्व बहुत अधिक है। इसका वैज्ञानिक नाम एलो बारबाडेंसिस मिलर है और यह एस्फोडिलेसी (या Liliaceae) परिवार से संबंधित है। यह एक शुष्क क्षेत्रों में उगने वाला पौधा है, इसलिए इसे कम पानी में भी आसानी से उगाया जा सकता है। इसे “अमरता का पौधा” भी कहा जाता है।
यह एक बहुवर्षीय झाड़ीदार पौधा है जो मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है, जहां अत्यधिक ठंड नहीं पड़ती। विश्व स्तर पर इसकी खेती अरूबा, हैती, भारत, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और वेनेजुएला में की जाती है। भारत में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।
एलोवेरा पौधा सूखे की स्थिति को सहन कर सकता है, लेकिन बेहतर उत्पादन के लिए उष्ण और उपोष्ण जलवायु उपयुक्त रहती है। इसे लगभग 35-40 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता है। कम पानी की उपलब्धता में भी यह अच्छी तरह बढ़ता है, इसलिए यह राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फसल है।
एलोवेरा कम उपजाऊ और हल्की मिट्टी में भी उग सकता है। यह उच्च pH, सोडियम और पोटाश वाली मिट्टी में भी जीवित रह सकता है। मध्य भारत की काली कपास मिट्टी इसके लिए उपयुक्त मानी जाती है। व्यावसायिक खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी, जिसका pH 8.5 तक हो, सबसे बेहतर रहती है।
एलोवेरा की लगभग 150 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें Aloe barbadensis, Aloe indica, Aloe vulgaris, Aloe chinensis आदि प्रमुख हैं। भारत में IC111271, IC111269, IC111280 जैसी किस्में अधिक एलोइन (औषधीय तत्व) के कारण लोकप्रिय हैं। वहीं AL-1 किस्म, जिसे CIMAP लखनऊ द्वारा विकसित किया गया है, व्यावसायिक खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
खेत की जुताई मिट्टी और जलवायु पर निर्भर करती है, सामान्यतः 1-2 जुताई के बाद खेत को समतल किया जाता है। ध्यान रखें कि जड़ें 20-30 सेमी तक ही जाती हैं, इसलिए गहरी जुताई न करें। खेत को 10-15 मीटर लंबी क्यारियों में बांटकर जल निकासी की उचित व्यवस्था करनी चाहिए। अंतिम जुताई के समय 10-15 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद डालना लाभदायक होता है।
एलोवेरा का प्रजनन मुख्य रूप से जड़ सकर्स (Root suckers) या राइजोम कटिंग से किया जाता है। राइजोम की 5-5.5 सेमी लंबी कटिंग, जिसमें 2-3 नोड्स हों, लगाई जाती है। सकर्स को 50×45 सेमी दूरी पर रोपा जाता है और पौधे का दो-तिहाई भाग मिट्टी के अंदर होना चाहिए।
एक हेक्टेयर में लगभग 37,000 से 56,000 पौधे लगाए जा सकते हैं, जो रोपण दूरी पर निर्भर करता है।
एलोवेरा को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती। सूखे मौसम में 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें, जबकि बरसात में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। पहली सिंचाई रोपण के तुरंत बाद करें। जलभराव से बचना जरूरी है, क्योंकि इससे पौधे खराब हो सकते हैं।
एलोवेरा की खेती में जैविक खाद जैसे गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट और हरी खाद का उपयोग करना बेहतर रहता है। 10-15 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद खेत की तैयारी के समय डालें। अधिक उत्पादन के लिए 2.5-5 टन प्रति हेक्टेयर वर्मी कम्पोस्ट भी उपयोगी है।
फसल को खरपतवार मुक्त रखना जरूरी है। रोपण के एक महीने बाद पहली निराई-गुड़ाई करें। इसके बाद हर साल 2 बार हल्की गुड़ाई करें। सूखे फूल और रोगग्रस्त पौधों को समय-समय पर हटा देना चाहिए।
पहले वर्ष में एलोवेरा के साथ ग्वार, मूंगफली, तिल, इसबगोल, धनिया, जीरा जैसी फसलें उगाई जा सकती हैं। इससे अतिरिक्त आय और मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। हालांकि दूसरे वर्ष से इन फसलों को नहीं लगाना चाहिए।
एलोवेरा पौधा 18-24 महीनों में पूरी तरह तैयार हो जाता है, लेकिन 8 महीने बाद से ही पत्तियों की कटाई शुरू की जा सकती है। साल में 3-4 बार कटाई की जाती है।
उत्पादन की बात करें तो बिना सिंचाई के 15-20 टन प्रति हेक्टेयर और सिंचित फसल में 30-35 टन प्रति हेक्टेयर तक पत्तियों की पैदावार हो सकती है।
इस प्रकार एलोवेरा की खेती कम लागत, कम पानी और अच्छी आय देने वाली एक बेहतरीन कृषि व्यवसाय विकल्प है।
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