सरसों की फसल में प्रमुख रोग और रोगों का प्रबंधन

Published on: 01-Jan-2023

सरसों की फसल भारत में तिलहन के रूप में लगायी जाती है सरसों के तेल का इस्तेमाल भी भारत में सबसे ज्यादा किया जाता है। भारत में सरसों की फसल की पैदावार अच्छी होती है पर रोगों के कारण फसल की पैदावार घटती रहती है। रोगों के कारण किसानों की फसल की पैदावार कम हो जाती है जिससे किसानो को नुकसान होता है इस नुकसान को कम करने के लिए आपको सही समय पर फसल में रोग प्रबंधन करना जरुरी है। हमारे इस लेख  के माध्यम से आप सरसों की फसल में रोगों की पहचान और उनके उपचार के बारे में जानेगे।

सरसों की फसल के रोग एवं उपचार

   1.अल्टरनेरिया ब्लाइट

यह लक्षण - सरसों की फसल में अल्टरनेरिया लीफ ब्लाइट के नाम से सबसे पहले पत्तियों पर दिखाई देती है। जिसमें छोटे, गहरे भूरे या काले धब्बे पीले प्रभामंडल और केंद्रित, लक्ष्य-जैसे छल्ले के साथ दिखाई देते हैं। संकेंद्रित वलय वाले गोल धब्बे होते है कई धब्बे आपस में मिलकर बड़े-बड़े धब्बे बना लेते हैं| पत्तियों को झुलसा देते हैं और झड़ जाते हैं रोग के लक्षण पहले निचली और पुरानी पत्तियों पर दिखाई देते हैं धब्बे तनों और फूलों पर भी दिखाई देते हैं। इस रोग के कारण बीज सिकुड़े हुए और छोटे आकार के हो जाते है |  alternaria blight ये भी पढ़े: सरसों के कीट और उनसे फसल सुरक्षा

उपचार और प्रबंधन

  • बुवाई के लिए स्वस्थ बीजों के प्रयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • जैसे ही पौधों पर लक्षण दिखाई देने लगें मैनकोजेब 75 डब्ल्यूपी 2kg  की दर से 200 लीटर पानी प्रति एकड़ की दर से 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें।
  • फसल की कटाई के बाद प्रभावित पौधों के हिस्सों को इकट्ठा करके जला दें |

   2. सफेद रतुआ

यह लक्षण- पौधे के पत्तों, टहनियों, तनों, फूलो,और फलियों पर दिखाई देते है। पत्तियों की निचली सतह पर सफेद दाने और ऊपरी पत्ती की सतह पर पीले रंग का पीलापन दिखाई देता है। बाद की अवस्था में, पीले प्रभामंडल के साथ दाने गाढ़े रूप में दिखाई दे सकते हैं। जब युवा तना और पुष्पक्रम संक्रमित होते हैं, तो कवक प्रणालीगत हो जाता है और पौधों में विकृतियों को उत्तेजित करता है। सफेद रतुआ बीमारी फलियों व तने पर अधिक आती है। इससे तना सिकुड़ जाता है। इससे फसल के उत्पादन पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है। सफ़ेद रतुआ का प्रकोप ज्यादा तर पिछेती फसल में होता है। White rust

उपचार और प्रबंधन

  • समय से बुवाई करें (10-25 अक्टूबर), फसल के अवशेषों को नष्ट करें, विशेष रूप से पिछली फसलों के अवशेषों को। 
  • रोगमुक्त बीजों का प्रयोग करें, बीज को एप्रन 35एसडी @ 6 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करें,फसल की अधिक सिंचाई से बचें | 
  • फसल पर डाइथेन एम-45 @ 0.2% का छिड़काव करें और 15 दिनों के अंतराल पर दोहराएं या सफेद रतुआ आने पर खेत में मैनकोजैब दवाई 600 से 800 ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से 200 लीटर पानी मिलाकर अवश्य स्प्रे करें व दूसरा स्प्रे 15 दिन के बाद करें।

  3. डाउनी मिल्ड्यू

इसका पहला लक्षण नयी पत्तियों पर जामुनी कत्थई धब्बों के रूप में प्रकट होता है। पत्ती की ऊपरी सतह पर घाव हलके रंग से लेकर पीले रंग का होता है ये भी पढ़े: जानिए सरसों की बुआई के बाद फसल की कैसे करें देखभाल इन घावों की निचली सतह पर आमतौर पर कवक की कोमल वृद्धि दिखाई देती है। प्रणालीगत संक्रमण में, सफेद जंग के रूप में लक्षण बहुत स्पष्ट होते हैं। रोग जायदा फैलने पर फूलों के गुच्छे बन जाते है और फूल फली बनाने में असमर्थ हो जाते है। इस रोग से फसल की पैदावार कम हो जाती है। Downy mildew

उपचार और प्रबंधन

  • फसल अवशेषों को नष्ट करें,रोगमुक्त बीजों का प्रयोग करें,बीज को एप्रन एसडी 35 @ 6 ग्राम/किलो बीज से उपचारित करें,फसल पर डाइथेन एम-45 @ 0.2% का छिड़काव करें। 

4. पाउडर फफूंदी

इस रोग के लक्षण पत्तियों की ऊपरी, निचली सतह और पौधे के अन्य ऊपरी भागों पर सफेद चूर्ण जैसा दिखाई देते है। इस रोग के कारण होने वाली उपज हानि फसल के संक्रमण की अवस्था पर निर्भर करती है। यदि फसल के विकास के प्रारंभिक चरण में रोग फसल को संक्रमित करता है, तो नुकसान भारी होता है। रोग आमतौर पर बुवाई के बाद देर से प्रकट होता है। गंभीर संक्रमण में, पत्तियाँ पीली हो जाती हैं, जिससे समय से पहले पत्तियाँ झड़ जाती हैं और जबरन परिपक्वता आ जाती है। Powdery mildew   ये भी पढ़े: सरसों के फूल को लाही कीड़े और पाले से बचाने के उपाय

उपचार और प्रबंधन

  • मई-जून के दौरान गहरी जुताई करें और फसल चक्र का पालन करें | 
  • समय से बुवाई करें और देर से बोने से बचें, फसल के अवशेषों को जला दें, रोग की शुरुआत के समय वेटेबल सल्फर @ 0.2% या कैराथेन @ 0.1% का छिड़काव करें।

5. तना गलन या ओगल

इस रोग के लक्षण बढ़े हुए और पानी से भरे हुए होते है इसके घाव ज्यादातर तने पर विकसित होते हैं। जो कॉटनी मायसेलियल ग्रोथ से ढके होते हैं ,केंद्रीय तना पूरी तरह से नष्ट हो जाता है और सफेद कवक जाल से भर जाता है जो बाद में सख्त हो जाता है और काला स्क्लेरोशिया बनता है| कवक के काले अनियमित शरीर प्रभावित पौधों पर या अंदर देखे जा सकते हैं। प्रभावित पौधों में बौनापन और समय से पहले पकने के लक्षण दिखाई देते है। ज्यादा संक्रमण होने पर तने का टूटना, मुरझाना और सूखना दिखाई देता है। Stem Rot

उपचार और प्रबंधन

  • गर्मी के मौसम में गहरी जुताई करें, बिजाई के लिए स्क्लेरोटियल मुक्त बीज का प्रयोग करें| 
  • गैर-मेज़बान फ़सलों जैसे जौ, गेहूँ के साथ फ़सल चक्रीकरण करें,फसल अवशेषों को नष्ट करें| 
  • कार्बेन्डाजिम @ 0.2% के साथ बीज उपचार के बाद कार्बेन्डाजिम @ 0.1% के दो छिड़काव बुवाई के 45 और 60 दिनों के बाद करे।

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