सरसों की फसल के रोग और उनकी रोकथाम के उपाय

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सरसों की फसल का रकबा बढ़ गया है क्योकि खाद्य तेलों की मांग और आपूर्ति में आये अंतर की वजह से इसकी कीमत अच्छी रहने की उम्मीद है. इसी वजह से इसकी बुबाई भी ज्यादा मात्रा में की गई है. अभी हमारे किसान भाई सरसों में पानी और खाद लगा कर उसकी बढ़वार और पेड़ पर कोई रोग न आये उसके ऊपर ध्यान केंद्रित रख रहे हैं.

सरसों की खेती में लागत काम और देखभाल ज्यादा होती है क्योकि इसको कच्ची फसल बोला जाता है. इसको कई प्रकार के कीटों से खतरा रहता है इनमे मुख्यतः माहू मक्खी, सुंडी, चेंपा आदि है. अगर इसका समय से उपचार न किया जाये तो ये 10 से 90% तक फसल को नुकसान कर जाता है. इसलिए यह अति आवश्यक है कि इन कीटों की सही पहचान कर उचित और समय पर रोकथाम की जाए. यदि समय रहते इन रोगों एवं कीटों का नियंत्रण कर लिया जाये तो सरसों के उत्पादन में बढ़ोत्तरी की जा सकती है.

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मेरीखेती के WhatsApp ग्रुप के सदस्य ने हमें अपने खेत का फोटो भेजा तथा इस पर जानकारी चाही इस पर हमारे सलाहकार मंडल के सदस्य श्री दिलीप यादव जी ने उनकी समस्या का समाधान किया. नीचे दिए गए फोटो को देखकर आप भी अपने उचित सलाह हमारे किसान भाइयों को दे सकते हैं.

सरसों के प्रमुख कीट और नियंत्रण:

आरा मक्खी: 

इस समय सरसों में चित्रित कीट व माहू कीट का प्रकोप होने का डर ज्यादा रहता है. इसके असर से शुरू में फसलों के छोटे पौधों पर आरा मक्खी की गिडारें ( सुंडी, काली गिडार व बालदार गिडार) नुकसान पंहुचाती हैं, गिडारें काले रंग की होती हैं जो पत्तियों को बहुत तेजी के साथ किनारों से विभिन्न प्रकार के छेद बनाती हुई खाती हैं जिसके कारण पत्तियां बिल्कुल छलनी हो जाती हैं. इससे पेड़ सूख जाता है और समाप्त हो जाता है.

उपाय: मेलाथियान 50 ई.सी. की 200 मि.ली. मात्रा को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें, तथा पानी भी लगा दें. जिससे की नीचे आने वाले कीट डूब कर मर जाएँ.

माहू या चेंपा: 

यह रोग देर से बोई गई प्रजाति पर ज्यादा आता है लेकिन कई बार मौसम अगर जल्दी गरम हो जाये और फसल पर फलियां बन रही हों या कच्ची हो तो इसका ज्यादा नुकसान होता है. यह फसल को पूरी तरह से ख़तम कर देता है.

उपाय: बायोएजेन्ट वर्टिसिलियम लिकेनाइ एक किलोग्राम प्रति हेक्टेयर एवं 7 दिन के अंतराल पर मिथाइल डिमेटोन (25 ई.सी.) या डाइमिथोएट (30 ई.सी) 500 मि.ली./हेक्टेयर का छिड़काव करें.

मृदुरोमिल आसिता:

लक्षण- जब सरसों के पौधे 15 से 20 दिन के होते हैं तब पत्तों की निचली सतह पर हल्के बैंगनी से भूरे रंग के धब्बे नजर आते हैं बहुत अधिक नमी में इस रोग का कवक तने तथा स्टेग हैड’ पर भी दिखाई देता है| यह रोग फूलों वाली शाखाओं पर अधिकतर सफेद रतुआ के साथ ही आता हैं|

सफेद रतुआ

लक्षण- सरसों की पत्तियों के निचली सतह पर चमकीले सफेद उभरे हुए धब्बे बनते हैं, पत्तियों को ऊपरी सतह पीली पड़ जाती हैं, जिससे पत्तियों झुलसकर गिर जाती हैं एवं पौधे कमजोर हो जाते हैं| रोग की अधिकता में ये सफेद धब्वे तने और कलियों पर भी दिखाई देते नमी रहने पर रतुआ एवं रोमिल रोगो के मिले जुले धन्ये ‘स्टेग हैड” (विकृत फ्लों) पर साफ दिखाई देते हैं|

काले धब्बों का रोग

लक्षण- सरसों की पत्तियों पर छोटे-छोटे गहरे भूरे गोल धब्बे बनते हैं, जो बाद में तेजी से बढ़ कर काले और बड़े आकार के हो जाते हैं, एवं इन धब्बों में गोल छल्ले साफ नजर आते हैं| रोग की अधिकता में बहुत से धवे आपस में मिलकर बड़ा रूप ले लेते हैं तथा फलस्वरूप पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं, तने और फलों पर भी गोल गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं|

तना गलन

लक्षण- सरसों के तनों पर लम्बे व भूरे जलसिक्त धब्बे बनते हैं, जिन पर बाद में सफेद फफूंद की तह बन जाती है, यह सफेद फंफूद पत्तियों, टहनियों और फलियों पर भी नजर आ सकते हैं| उग्र आक्रमण यदि फुल निकलने या फलियाँ बनने के समय पर हो तो तने टूट जाते हैं एवं पौधे मुरझा कर सूख जाते हैं| फसल की कटाई के उपरान्त ये फफूंद के पिण्ड भूमि में गिर जाते हैं या बचे हुए दूठों (अवशेषों) में प्रर्याप्त मात्रा में रहते हैं, जो खेत की तैयारी के समय भूमि में मिल जाते हैं|

उपरोक्त रोगों का सामूहिक उपचार- सरसों की खेती को तना गलन रोग से बचाने के लिये 2 ग्राम बाविस्टिन प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें|

छिड़काव कार्यक्रम

सरसों की खेती में आल्टनेरिया ब्लाईट, सफेद रतुआ या ऊनी मिल्ड्यू के लक्षण दिखते ही डाइथेन एम- 45 का 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव सरसों की खेती पर दो बार 15 दिन के अन्तर पर करें| जिन क्षेत्रों में तना गलन रोग का प्रकोप हर वर्ष अधिक होता है, वहां बाविस्टिन से 2 ग्राम प्रति किलो को दर से बीज का उपचार करे और इसी दवा का बिजाई के 45 से 50 और 65 से 70 दिन बाद 0.1 प्रतिशत की दर से छिड़काव करें|

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