पपीते की खेती: उन्नत किस्में, पौध तैयार करना और अधिक मुनाफा कैसे कमाएँ?

Published on: 11-Jun-2024
Updated on: 11-Jun-2024

पपीता शीघ्र तैयार होने वाला लाभदायक फल है। इसमें कई पोषक तत्व भी पाए जाते है। इसकी खेती अब व्यवसायिक रूप से की जाती है, हालांकि यह सिर्फ शीतकटिबन्धीय क्षेत्रों में की जाती है। 

यह स्वास्थ्य में बहुत फायदेमंद है इसमें पपेन और पैक्टिन हैं। पपेन एक औषधि है, पपेन पपीते के कच्चे फलों से निकाला जाता है।

पपीते की खेती के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस लेख को अंत तक पढ़ें।

पपीते की उन्नतशील किस्में

अच्छी उपज पाने के लिए किस्मों का अहम योगदान होता है इसलिए उन्नत किस्मों का ही चुनाव करना चाहिए।

पूसा डेलीसस 1-15, पूसा मैजिस्टी 22-3, पूसा जायंट 1-45-वी, पूसा ड्वार्फ 1-45-डी, पूसा नन्हा या म्युटेंट डुवार्फ, सी०ओ०-1, सी०ओ०-2, सी०ओ०-3, सी०ओ०-4, कुर्ग हनी, एवम हनीडीयू जैसी उन्नतशील प्रजातियाँ उपलब्ध है।

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पपीते की खेती में पौधों को कैसे तैयार किया जाता है?

पपीते की खेती में पौधों को तैयार करने के लिए पहले पौधों को 10 सेमी ऊँची, 3 मीटर लम्बी और 1 मीटर चौड़ी क्यारी में या गमले या पालीथीन बैग में तैयार करते हैं। 

बीज बोने से पहले क्यारी को 10% फार्मेलड़ीहाईड घोल से ढक देते हैं। फिर बीज को 1 से.मी. गहरे और 10 से.मी. की दूरी पर बोते हैं।

60 दिन बाद इन पौधों को रोपना चाहिए, जब वे 15 से 25 से.मी. ऊँचे हो जाएँ।

पपीता के पौधों का रोपण किस मौसम में किया जाता है?

भारत में पपीता की तीन मौसम में रोपाई क़ी जाती है तथा पौध उसी तरह से 60 दिन पहले तैयार क़ी जाती है सबसे पहले जून एवम जुलाई में, इसके बाद सितम्बर-अक्टूबर में तथा अंत में फरवरी एवं मार्च में रोपण किया जाता है।

दक्षिण भारत मे साधारणत् फरवरी-मार्च में रोपाई क़ी जाती है, खेत में पौधों क़ी रोपाई दोपहर बाद 3 बजे से करनी चाहिए।

रोपाई के बाद पानी लगाना अतिआवश्यक है तैयार किए गए गढ़ढ़ो में प्रत्येक गढढ़ो में 2 या 3 पौधे थोड़ी थोड़ी दूरी पर लगाना चाहिए। 

जब तक अच्छी तरह से पौधे स्थापित न हो जाये तब तक प्रतिदिन 3 बजे सायं के बाद हल्की सिचाई करनी चाहिए, फूल आने पर 10% नर पौधे को छोड़ कर सभी नर पौधे को काट कर अलग कर देना चाहिए।

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पपीते के पौधों में पोषण प्रबंधन

पपीता एक शीघ्र बढने एवं फल देने वाला पौधा है जिसके कारण आधिक तत्व क़ी आवश्यकता पड़ती है।

अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 250 ग्राम नाइट्रोजन 150 ग्राम फास्फोरस तथा 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधा के हिसाब से प्रति वर्ष देना चाहिए यह मात्रा पौधे के चारो ओर 2 से 4 बार में थोड़े-थोड़े समय के अन्तराल पर देनी चाहिए।

पपीते पर मिट्टी चढाना अति आवश्यक है। प्रत्येक गढ्ढे में एक पौधे को रखने के बाद पौधे क़ी जड़ के आस पास 30 से.मी. क़ी गोलाई में मिट्टी को ऊँचा चढ़ा देते है ताकि पेड़ के पास सिचाई का पानी आधिक न लग सके तथा पौधे सीधा खड़ा रखते है।

फसल में जल प्रबंधन

वर्षा ऋतू में वर्षा न होने पर पपीते को आवश्यकतानुसार सिचाना चाहिए, गर्मियों में 6 से 7 दिन और सर्दियों में 10-12 दिन के अंतराल पर सिचाना चाहिए, सिंचाई का पानी पौधे के सीधे संपर्क में नहीं आना चाहिए।

खेत की लगातार सिंचाई से मिट्टी बहुत कड़ी हो जाती है, जिससे पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है। हर दो या तीन सिचाई के बाद खेत में हल्की निराई करनी चाहिए, ताकि हवा और पानी का अच्छा संचार हो सके।

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फलों की तुड़ाई और पैदावार

फल को चिड़ियों से बचाना बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए उन्हें पकने से पहले ही तोड़ देना चाहिए, जब फल की ऊपरी सतह पर खरोच कर दूध या पानी की तरह तरल पदार्थ निकलने लगे और उनका रंग बदलने लगे, तो फल पक गया है और तोड़ देना चाहिए।

फल को सुरक्षित तोड़ने के बाद, उन्हें कागज या अखबार आदि से लपेटकर प्रत्येक फल को लकड़ी या गत्ते के बाक्स में अलग-अलग बिछाकर रखना चाहिए। फिर बाक्स को बंद करके बाजार में भेजना चाहिए, ताकि फल खराब न हो और अच्छे भाव मिल सके।

पैदावार उचित देखभाल, जलवायु और मिट्टी की किस्म पर निर्भर करती है समुचित व्यवस्था पर प्रत्येक पेड़ एक मौसम में 35 से 50 कि. फल और 15 से 20 टन उपज प्रति हेक्टर देता है।

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