कोरोना का कहर पोल्ट्री उद्योग पर

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कोरोनावायरस का कहर पोल्ट्री उद्योग पर भी पड़ा है। कोरोना का कोहराम जैसे ही शुरू हुआ वैसे ही नानवेज उत्पादों की खपत में कमी आनी शुरू हो गई है। मीट के लिए पाले जाने वाले खरगोश, मुर्गी, ईमू, तीतर, बटेर, बकरी आदि सभी का उपभोग लोगों ने कम कर दिया है।

इन कारोबारों में नई शुरूआत करने वाले लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए। भारत गांवों का देश है और गांव में बसे लोग अपनी जीविका संचालन के लिए अनेक तरह के पशु एवं पक्षियों का पालन करते हैं। इससे खेती के साथ उनकी अतिरिक्त आय होती है। जबसे कोराना का शोर मचा है नानवेज बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई है। पाल्ट्री फार्म संचालक दिगेन्द्र स्वरूप कहते हैं कि उन्हें लगातार नुकसान के चलते अपना पाल्ट्री फार्म बंद करना पड़ा है। वह डेढ़ माह में तकरीबन तीन लाख का नुकसान उठा चुके हैं। लगातार कीमतें गिर रही है।  मुर्गी का उनके फार्म से उठान 50 से 60 रुपए प्रति किलोग्राम में भी नहीं हो रहा है। जनवरी में यह रेट काफी ठीक चल रहा था। दूसरी ओर सरकार और किसानों ने जोर देकर कहा है कि चिकन तथा अंडे के उपभोग का इस वायरस के प्रसार से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है।

कोरोनावायरस का मुख्य स्रोत स्तनधारी जीव हैं, न कि पक्षी। लेकिन उपभोक्ताओं ने चिकिन, अंडा आदि से दूरी बना ली है।

पोल्ट्री उद्योग में ज्यादातर छोटे और असंगठित लोग हैं इसलिए वे इतना बड़ा नुकसान नहीं झेल सकते। लिहाजा वे अपनी उत्पादन क्षमता में कटौती कर रहे हैं। स्थिति यह है कि बहुत-से छोटे मुर्गीपालक अपना धंधा बंद करके आजीविका के दूसरे साधनों का रुख कर चुके हैं। दाने की कीमतों में उछाल के चलते दो साल से मुर्गी पालन में ज्यादा लाभ नहीं हो पा रहा है।

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