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सब्ज्यिों की रानी मटर की करें खेती

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जिन क्षेत्रों में श्रमिकों की उपलब्धता है वहां मटर की खेती किसानों के लिए वरदान बन सकती है। मटर कच्ची और दाने दोनों प्रयोग के लिए लगाई जाती है। कच्ची फली तोड़कर किसान कम समय में ही लागत को निकाल सकते हैं और बाकी की फसल को दाने के लिए पकाकर मुनाफा ले सकते हैं। इस तरह की खेती में अच्छी आय के लिए थोड़ी अगेती करना आवश्यक है। समूचे देश में जितनी मटर की खेती होती है उसकी आधी अकेले उत्तर प्रदेश में होती है। मध्य प्रदेश, उड़ीसा एवं बिहार में भी मटर की खेती हाती है।

भूमि की तैयारी

मटर की खेती विभिन्न प्रकार की उपजउू मृदा में हो सकती है लेकिन गंगा के मैदानी भागों की गहरी दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे अच्छी रहती है। अच्छे अंकुरण के लिए मिट्टी में नमी भी रहे और खेत में ढ़ेल नहीं होने चाहिए।

मटर की प्रमुख प्रजातियाँ और उनकी खूबी

रचना किस्म 20-22 कुंतल उपज देती है। इसे संपूर्ण उत्तर प्रदेश में लगाया जा सकता है। यह सफेद फफुन्द अवरोधी है तथा 135 दिन में पक जाती है। इन्द्र किस्म 30—32 कुंतल उपज देती है। बुन्देलखण्ड में लगाने योग्य। मालवीय मटर-२ की उपज 20-25 कुंतल, पूर्वी एवं पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में बोने योग्य। शिखा किस्म से भी 30 कुंतल तक उपज मिलती है। अपर्णा किस्म से 25-30 कुंतल व मध्य पूर्वी एवं पश्चिमी क्षेत्र हेतु उपयुक्त। के.पी.एम.आर. 522 से 25-30 कुंतल उपज मिलती है। यह पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में बोने योग्य, सफेद फफूंद अवरोधी है। पूसा प्रभात एवं पूसा पन्ना किस्में 18-20 कुंतल उपज, पूर्वी मैदानी क्षेत्र में लगाने योग्य बेहद कम समय में पकने वाली हैं। अमन किस्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए है। इससे 30 कुंतल तक उत्पादन मिलता है। प्रकाश एवं हरियाल किस्में 32 कुंतल तक उपज देती हैं। यह क्रमश: बुन्देलखण्ड एवं पश्चिमी यूपी के लिए संस्तुत हैं।
मटर की फसल, खरीफ ज्वार, बाजरा, मक्का, धान और कपास के बाद उगाई जाती है। मटर, गेंहूँ और जौ के साथ अंतः पसल के रूप में भी बोई जाती है। हरे चारे के रूप में जई और सरसों के साथ इसे बोया जाता है। बिहार एवं पश्चिम बंगाल में इसकी उतेरा विधि से बुआई की जाती है।

बीजोपचार जरूरी

हर दलहनी फसल का बीजोपचार जरूरी है। पहले रासायनिक फफूंदनाशक से एवं बाद में राइजोबियम कल्चर से उपचारित करके बोने से रोग प्रभाव कम होता है और उपज ज्यादा मिलती है।
मटर की बुआई मध्य अक्तूबर से नवम्बर तक की जाती है जो खरीफ की फसल की कटाई पर निर्भर करती है। समय पर बुआई के लिए 70-80 किग्रा. बीज/है. पर्याप्त होता है। पछेती बुआई में 90 किग्रा./है. बीज होना चाहिए। सीड ड्रिल से 30 सेंमी. की दूरी पर बुआई करनी चाहिए। बीज की गहराई 5-7 सेंमी. रखनी चाहिये। बौनी किस्म की मटर के लिए बीज दर 100 किलोग्राम/है. उपयुक्त है।
उर्वरक – मटर में सामान्यतः 20 किग्रा, नाइट्रोजन एवं 60 किग्रा. फास्फोरस बुआई के समय देना पर्याप्त होता है।
सिंचाई- मटर में पहली हल्की सिंचाई फूल आने के समय और दूसरी सिंचाई फलियाँ बनने के समय करनी चाहिए।
खतपतवार नियंत्रण – खेत में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार, जैसे-बथुआ, सेंजी, कृष्णनील, सतपती अधिक हों तो 4-5 लीटर स्टाम्प-30 (पैंडीमिथेलिन) 600-800 लीटर पानी में प्रति हेक्टेयर की दर से घोलकर बुआई के तुरंत बाद छिड़काव कर देना चाहिए।

रोग एवं कीट प्रबन्धन

रतुआ –

इस रोग के कारण जमीन के ऊपर के पौधे के सभी अंगों पर हल्के से चमकदार पीले (हल्दी के रंग के ) फफोले नजर आते हैं। अवरोधी प्रजाति मालवीय मटर 15 प्रयोग करें।
आर्द्रजड़ गलन- इस रोग से प्रकोपित पौधों की निचली पत्तियाँ हल्के पीले रंग की हो जाती है। यह रोग मृदा जनित है। रोग की बीजाणु वर्षों तक मिट्टी में जमे रहते हैं। हर बार एक ही खेत में मटर न लगाएं। बीज को उपचारित करके बाएं।
चांदनी रोग- इस रोग से पौधों पर एक से.मी. व्यास के बड़े-बड़े गोल बादामी और गड्ढे वाले दाग पीड जाते हैं। यह भी बीजोपचार न करने से फैलने वाला रोग है। बाद में भी फफूंदनाशक का छिड़काव करें।
तुलासिता/रोमिल फफूंद- इसका प्रभाव पत्तियों पर होता है। बचाव हेतु 0.२% मौन्कोजेब अथवा जिनेब का छिड़काव 400-800 लीटर पानी में प्रति हेक्टेयर की दर से करनी चाहिए।

मूल विगलन-

जमीन के पास के हिस्से से नये फूटे क्षेत्रों पर इस रोग का प्रकोप होता है। 3 ग्रा. थीरम+1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें खेत का जल निकास ठीक रखें।

कीट


तना मक्खी – ये पूरे देश में पाई जाती है। पत्तियों, डंठलों और कोमल तनों में गांठें बनाकर मक्खी उनमें अंडे देती है।
मांहू (एफिड) – कभी-कभी मांहू भी मटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इनके बच्चे और वयस्क दोनों ही पौधे का रस चूस लेते हैं। इससे फलियाँ सूख जाती हैं। हल्क पानी के छिडकाव या बेहद हल्की कीटनाशक ही इसको मारने के लिए काफी है।
मटर का अधफंदा (सेमीलूपर) – यह मटर का साधारण कीट है। इसकी गिड़ारें पत्तियाँ खाती है। २% फोरेट से बीज उपचार करें या 1 किग्रा. फोरेट प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की मिट्टी में बुआई के समय मिला दें। आवश्यकता होने पर पहली निकलने की अवस्था में फसल पर 0.03% डामेथोएट 400 से 500 लीटर पानी में मिलाकर घोल कर प्रति हेक्टेयर छिड़कें।
कटीला फली भेदक (एटीपेला) – यह फली भेदक उत्तर भारत में अधिक पाया जाता है।

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