बाजरा लगाएं धान की सोच रहे किसान

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कोरोना  का असर धान के निर्यात पर भी पड़ना तय है। ऐसे में यदि किसानों को आर्थिक तंगी से उबरना  है तो वह गेहूं के खाली खेतों में तत्काल बाजरा की हाइब्रिड किस्में  लगा सकते हैं। कम लागत और अच्छे उत्पादन वाली बाजरा की उन्नत किस्में अनेक  प्राइवेट कंपनियों द्वारा बाजार में उतारी हुई है। 60 दिन में पकने वाले साठा बाजरे के भ्रम में किसान ना आएं क्योंकि इतने कम समय में बाजरा की कोई किस्म नहीं पकती । बाजरे की अत्याधुनिक किस्में भी 80 से 85 दिन में पक कर तैयार होती है।

हरियाणा पंजाब और उत्तर प्रदेश के अनेक इलाकों में गेहूं का बहुत बड़ा क्षेत्रफल धान के लिए खाली पड़ा रहता है। इस बार कोविड-19 के प्रभाव के चलते धान के निर्यात में दिक्कतें हो सकती हैं। इस ओर ध्यान देते हुए किसानों को कम लागत वाली बाजरा की बिजाई 1 हफ्ते में कर देनी चाहिए। बाजरा लगाने से किसानों को दोहरा फायदा होगा। प्रति एकड़ करीब 20 से ₹25000 गर्मी के सीजन में प्राप्त हो जाएंगे यदि धान को लेकर आने वाले कल में दिक्कतें पैदा होती हैं तो किसानों को लॉक डाउन के चलते आर्थिक तंगी का शिकार नहीं होना पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि बाजरा बेहद कम खाद पानी और लागत वाली फसल है। इससे अनाज के साथ-साथ पशुओं के लिए हरे चारे का भी इंतजाम हो जाता है। बाजरा की बिजाई के लिए बीज की 1 एकड़ में 2 किलोग्राम से ज्यादा जरूरत नहीं होती। बिजाई कटाई सिंचाई उर्वरक एवं खरपतवार प्रबंधन पर कुल मिलाकर ₹5000 एकड़ से ज्यादा का खर्चा नहीं आता। बाजरा की खेती के लिए एक पानी या अधिकतम दो पानी की जरूरत होती है। बाजरा पोषण से भरपूर कोस्टल क्रॉप है इसे गेहूं से ज्यादा ताकतवर माना जाता है। विदित हो की कोविड-19 के चलते समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था डामाडोल है और हर देश आयात निर्यात से डर रहा है। भारत के बासमती चावल का निर्यात अनेक यूरोपियन एवं गल्फ देशों को होता आया है। इस बार कोरोना के डर की वजह से निर्यात प्रभावित हुआ तो किसानों के धान की कीमत नहीं मिल  पाएंगी। इससे उन्हें मोटा नुकसान उठाना पड़ सकता है। मोटी लागत समय और रिस्क वाली धान की फसल से बचने के लिए और धन की व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाजरा समय की मांग है और उपयुक्त फसल है।

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