ग्लैडियोलस फूलों की खेती से किसान भाई होंगे मालामाल

ग्लैडियोलस फूलों की खेती से किसान भाई होंगे मालामाल

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ग्लैडियोलस एक बहुत ही सुन्दर फूल है जो ज़्यादातर कलकत्ता, कलिंगपोंग, मणिपुर और श्रीलंका में बड़ी मात्रा में उगाया जाता है। इस फूल को लोग कट फ्लावर के रूप में सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। इन फूलों के पौधे 2 से लेकर 8 फीट तक ऊंचे होते हैं। ग्लैडियोलस के फूल कई तरह के रंगों में निकलते हैं। पेड़ की एक दंडी में या तो एक रंग के अन्यथा 2 या तीन रंगों के फूल एकसाथ निकलते हैं। पेड़ की एक स्पाईक या एक दंडी में 15 से 25 फूल तक आ सकते हैं।

बहुरंगी किस्मों के साथ-साथ फूलों का आकार और फूल के लम्बे दिनों तक तरोताजा बने रहने के कारण ग्लैडियोलस फूलों की मांग बाजार में तेजी से बढ़ रही है। भारतीय उपमहाद्वीप में यह फूल का पौधा तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, क्योंकि ग्लैडियोलस फूल का पौधा हर मौसम में अपना प्रसार करता है। फूल देता है। इसकी खेती हिमालय की जलवायु के साथ-साथ तराई के मैदानों और पहाड़ी इलाकों में बेहद आसानी से की जा रही है। ग्लैडियोलस के फूलों को गमलों, सड़कों, बगीचों और पार्कों में उगाने से उस जगह की रमणीयता बढ़ जाती है।

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अगर वर्तमान में देखा जाए तो दुनिया भर में ग्लैडियोलस फूलों की 260 प्रजातियां पाई जाती हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा ये फूल एशिया, यूरोप, दक्षिण अफ्रीका और उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका में भारी मात्रा में पाए जाते हैं। सजावट के साथ-साथ ग्लैडियोलस के फूलों का औषधीय रूप में भी उपयोग किया जाता है। इन फूलों का इस्तेमाल दस्त और पेट की गड़बड़ी के उपचार में किया जाता है। इनके फूल पेड़ की दंडी पर एक बार खिलने पर 15 दिनों तक खिले रहते हैं। ग्लैडियोलस एक लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘तलवार’। इसके फूलों का आकार तलवार जैसा होता है।

इन दिनों अगर भारतीय महाद्वीप की बात करें तो ग्लैडियोलस फूलों का उपयोग गुलदस्ते बनाने में, शादी और पार्टी आदि कार्यक्रमों में किया जाता है। ग्लैडियोलस की कुछ अद्वितीय विशेषताओं के कारण बाजार में इसकी मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।

ग्लैडियोलस फूलों को उगाने के लिए चाहिए इस तरह की भूमि और जलवायु

वैसे तो ग्लैडियोलस के फूलों की खेती करने के लिए हर तरह की मिट्टी उपयुक्त होती है। लेकिन यदि बलुई दोमट मृदा जिसका Ph मान 5.5 से 6.5 के मध्य हो, ऐसी मिट्टी इन फूलों के उत्पादन में बेहतर परिणाम दे सकती है। साथ ही इसके के लिए ऐसी भूमि का चुनाव करना चाहिए जहां सूरज की रोशनी दिन भर रहती हो और पानी के निकासी की उचित व्यवस्था हो। ग्लैडियोलस फूलों की खेती के लिए न्यूनतम तापमान 16 डिग्री सेल्सियस तथा अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त होता है। इनके पेड़ों को बरसात से सुरक्षित रखना चाहिए। पेड़ों पर तेज धूप लगने के कारण ये पेड़ ज्यादा फूलों का उत्पादन कर सकते हैं।

ऐसे करें भूमि की तैयारी एवं बुवाई

खेत की 2 से लेकर 3 बार अच्छे से जुताई कर लें। इसके बाद मध्य नवंबर से मध्य दिसम्बर के बीच ग्लैडियोलस के कंदों की अलग-अलग क्यारियों में बुवाई करें। बुवाई करते समय हर कंद के बीच 20 सेंटीमीटर की दूरी रखना आवश्यक है। इसके साथ ही कंदों को 5 सेमी की गहराई में बुवाई करना चाहिए। क्यारियों के अलावा मेड़ो की लाईन में भी कंदों की बुवाई की जा सकती है। इससे पेड़ों में निंदाई गुड़ाई, बुवाई, उर्वरक देना, मिट्टी चढ़ाना आदि बेहद आसानी से हो सकता है।

ग्लैडियोलस की फसल में कम से कम 4 से 5 बार तक निंदाई-गुड़ाई की जरूरत पड़ती है। इसके साथ ही कम से कम दो बार पौधों पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए। इससे पेड़ को मजबूती मिलती है और पेड़ हवा से गिरने से बच जाते हैं, इससे किसानों को नुकसान नहीं होता।

ऐसे दें खाद एवं उर्वरक

खेत में सड़ी-गली गोबर की खाद 5 कि.ग्रा. प्रति वर्गमीटर के हिसाब से डालें। इसके साथ ही खेत की जुताई करते समय नाईट्रोजन 30 ग्रा., फास्फोरस 20 ग्रा., पोटाश 20 ग्रा. प्रति वर्गमीटर के हिसाब से डाल दें। इसके अलावा प्रति हेक्टेयर की दर से 200 किग्रा नाईट्रोजन, 400 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 200 कि.ग्रा. पोटाश उर्वरक के रूप में खेत में डालें।

इस प्रकार से करें ग्लैडियोलस की फसल में सिंचाई

ग्लैडियोलस की फसल में 10 से 15 दिनों के बीच सिंचाई करते रहें। इसके अलावा गर्मियों के दिनों में हर 5 दिन में सिंचाई करें। सिंचाई करने के बाद ध्यान रखें कि खेत या क्यारी में पानी भरा न रहे। खेत में सिर्फ पर्याप्त नमी बनी रहनी चाहिए।

ऐसे करें इस फसल में कीटों व रोगों की रोकथाम

इस फसल में झुलसा रोग, कंद सड़न रोग एवं पत्तियों के सूखने की बीमारी लगना एक आम बात है। इन रोगों के नियंत्रण के लिए किसान भाई डाईथेन एम 45, बाविस्टीन अथवा बेलनेट के घोल का 10 से 12 दिन के अंतराल पर छिडक़ाव कर सकते हैं। इसके अलवा कीटों की बात की जाए तो इसमें माहू एवं लाल सुंडी का हमला होता है, जिनसे निपटने के लिए किसान भाई रोगोर 30 ई. सी. को पानी में मिलाकर स्प्रे की सहायता से छिड़काव करें।

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फूलों की तुड़ाई

बुवाई के 65-90 दिनों के बाद पेड़ फूल देने लगते हैं। इन फूलों की तुड़ाई पुष्प दंडिका के साथ करें तथा पुष्प दंडिका को पानी की बाल्टी में डुबो कर रखें। इससे पुष्प लंबे समय तक तरोताजा बने रहेंगे। फूलों की तुड़ाई करने से पहले अगर सिंचाई कर दी जाती है तो फूलों में पानी का प्रवाह बना रहता है और फूल आसानी से मुरझाते नहीं हैं।

ग्लैडियोलस की भारत में उपयोग की जाने वाली किस्में

वैसे तो दुनिया में ग्लैडियोलस की बहुत सारी किस्में उपयोग की जाती हैं। लेकिन भारत में अग्निरेखा, मयूर, सुचित्रा, मनमोहन, सपना, पूनम, नजराना, अप्सरा, मनोहर, मुक्ता, अर्चना, अरूण और शोभा किस्में प्रसिद्ध है। भारत में किसान भाई ज्यादातर इन्हीं किस्मों के कंदों की बुवाई करते हैं।

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ग्लैडियोलस की खेती में लगने वाली लागत

ग्लैडियोलस की खेती में मुख्य रूप से कंदों की लागत गिनी जाती है। इसकी खेती में एक एकड़ में 1 लाख कंद लगाए जाते हैं और एक कंद की कीमत 3 से लेकर 5 रुपये के बीच होती है। इस हिसाब से एक एकड़ खेत में कंदों की बुवाई में 3 से लेकर 5 लाख रुपये तक का खर्चा आ सकता है।

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