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प्याज की खेती के जरूरी कार्य व रोग नियंत्रण

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जिन फसलों की पौध तैयार करनी होती है उनमें विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। नर्सरी से ही अनेक रोगों का संक्रमण होता है। इस लिए नर्सरी परंपरागत या वैज्ञानिक तरीके से पूरी समझ—बूझ के साथ डालनी चाहिए। प्याज की खेती की नर्सरी डालने के लिए पौधशाला के लिए चुनी हुई जगह की पहले जुताई करें। इसके पश्चात् उसमें पर्याप्त मात्रा में गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट डालना चाहिए। ​यदि कम्पोस्ट में ट्राईकोडर्मा मिलाकर एक हफ्ते छांव में रखने के बाद खेत की मिट्टी में मिला दिया जाए तो अनेक फफूंद जनित रोग नहीं होते। नर्सरी की क्यारी की चौड़ाई एक मीटर व लम्बाई जरूरत के हिसाब से रख सकते हैं। नर्सरी का बैड जमीन से थोड़ा उूंचा रखना चाहिए ताकि जलभराव नहो। बुवाई के बाद शैय्या में बीजों को 2-3 सेमी. मोटी सतह जिसमें छनी हुई महीन मृदा एवं सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद से ढंक देना चाहिए। खरीफ मौसम की फसल के लिए 5-7 सेमी. लाइन से लाइन की दूरी रखते हैं।

खरीफ मौसम हेतु पौधशाला शैय्या पर बीजों की पंक्तियों में बुवाई 1-15 जून तक करें। पौध 45 दिन की हो जाएं तो उन्हें रोप दें। रोपाई कूड़ शैय्या पद्धिति से 1.2 मीटर चैड़ी शैय्या एवं लगभग 30 से.मी. चैड़ी नाली तैयार करके करें।

खरपतवारों की रोकथाम

खरपतवारों की रोकथाम हेतु  3 से 4 निराई करें। इसके लिए रासायनिक नियंत्रण हेतु पैन्डीमैथेलिन 2.5 से 3.5 लीटर/हैक्टेयर पौध रोपाई के 3 दिन पश्चात 750 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

सिंचाई प्रबन्धन

खरीफ में रोपण करते ही सिंचाई करेंं। इस बात का ध्यान रखा जाऐ कि शल्ककन्द निर्माण के समय पानी की कमी नहो। अधिक मात्रा में पानी बैंगनी धब्बा(पर्पिल ब्लाच) रोग को आमंत्रित करता है। काफी लम्बे समय तक खेत को सूखा नहीं रखना चाहिए अन्यथा शल्ककंद फट जाएंगेे। अतः आवश्यकतानुसार 8-10 दिन के अंतराल से हल्की सिंचाई करना चाहिए। खरीफ प्याज की फसल लगभग 5 माह में नवम्बर-दिसम्बर माह में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है।

प्याज के रोग एवं कीट:-

थ्रिप्स:

ये कीट पत्तियों का रस चूसते हैं जिसके प्रकाश संश्लेषण की क्रिया और उत्पादन प्रभावित होते हैं। नियंत्रण हेतु नीम तेल आधारित कीटनाशियों का छिड़काव करें या इमीडाक्लोप्रि कीटनाशी 17.8 एस.एल. दवा की मात्रा 125 एमएल./हैक्टेयर 500-600 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

माइट:

इस कीट के प्रकोप के कारण पत्तियों पर धब्बे बन जाते हैं। इसके नियंत्रण हेतु 0.05ः डाइमेथोएट दवा का छिड़काव करें।

बैंगनी धब्बा (परपल ब्लाॅच):

यह फफूंदी जनित रोग हैं। अधिक वर्षा एवं नजदीक पौध रोपण से होता है। पत्तियों पर बैंगनी रंग के धब्बे बन जाते हैं। इसके लक्षण दिखाई देने पर मेनकोजेब (2.5 ग्रा./ली. पानी में घोलकर 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें। स्प्रे के दौरान स्टीकर का प्रयोग जरूर करें। श्रेष्ठ तकनीक से खेती करने पर 250-300 क्विंटल तक उपज मिल जाती है।

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