दलहन की फसलों की लेट वैरायटी की है जरूरत

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भारत में हमेशा से ही दालों की कीमत खाद्यान्नों में सबसे अधिक रही है। इसके बावजूद उसका उत्पादन नहीं बढ़ता है। कम उत्पादन और बढ़ती मांग के कारण दालों की कीमतें फिर से तेजी से बढ़ी हुईं हैं। इसका प्रमुख कारण यह माना जा रहा है कि दलहन की फसल की लेट वैरायटी नहीं है। इसलिये जो किसान भाई दलहन की फसल की लेट वैरायटी करना भी चाहें तो उन्हें यह सुविधा नहीं मिल पाती है। इस वजह से दलहन की फसल के लिये समय का पालन करना पड़ता है।

Content

  1. क्या है समस्या
  2. क्यों है लेट वैरायटी की जरूरत
  3. चना व मसूर की लेट वैरायटी के मिले हैं संकेत
  4. अब दिसम्बर में भी बोया जा सकेगा चना
  5. चने की कुछ अन्य लेट वैरायटियां
  6. मसूर की लेट वैरायटी
  7. अभी काफी शोध की है जरूरत
  8. किसान भाइयों को हो सकता है ये लाभ

क्या है समस्या ?

दलहन की फसल यदि लेट बोई जाये तो उसके कई नुकसान हैं। उसमें मौसम के हिसाब से रोग व कीट लगते हैं तथा पकने से पहले ही पौधे तापमान को नहीं वर्दाश्त कर पाते हैं। नतीजा यह होता है कि आधे-अधूरे दाने ही पक जाते हैं, जो पूर्णतया फसल को खराब कर देते हैं।

क्यों है लेट वैरायटी की जरूरत ?

किसान भाइयों जैसे गेहूं, जौं आदि की फसलों की लेट वैरायटी आ गयी है। वैसे ही दलहन की फसल की लेट वैरायटी भी आने की सख्त जरूरत है। जो किसान भाई किसी कारण से फसलें लेने में लेट हो गये हैं और वे चाहते हैं कि दालों की फसल लेकर अधिक आय अर्जित करें या लेट के कारण हो रहे नुकसान की भरपाई कर सकें या उनके क्षेत्र की मिट्टी ही ऐसी है जिसमें दलहन की फसल ली जा सकती है। इसके अलावा मौसमी हालात कुछ ऐसे बन गये कि दलहन का सही समय था वो निकल गया और जब मौसम सही हुआ है तो दलहन की बुआई का समय ही निकल गया है तो फिर क्या करें। इन समस्याओं के लिए लेट वैरायटी होना ही चाहिये।

चना व  मसूर की लेट वैरायटी के मिले हैं संकेत

chana or masoor ki dal

दलहन की लेट वैरायटी के बारे में चने की लेट वैरायटी तो खोजी जा चुकी है।  मसूर की लेट वैरायटी के बारे में भी शुरुआती जानकारी मिल रही है ।  अभी तक इन वैरायटियों के बारे में उत्साहजनक नतीजे आने बाकी है।  फिर भी अनुसंधान संस्थानों ने इन वैरायटियों के बारे में अच्छी-अच्छी बातें बतायीं हैं। किसान भाइयों की उम्मीदों पर यदि ये बातें खरी उतरतीं हैं तो खेती के लिए यह अच्छी बात होगी।

दिसम्बर में भी बोया जा सकेगा चना

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कृषि वैज्ञानिकों ने दस साल की कड़ी मशक्कत के बाद चने की एक ऐसी किस्म खोजी है जिसकी बुवाई दिसम्बर माह में की जा सकती है। इस किस्म से अच्छी फसल भी ली जा सकती है तथा इसमें कीट का असर भी नहीं होता है। इस वैरायटी की फसल में एक या दो पानी की जरूरत होती है और एक वैरायटी तो ऐसी है कि यदि आपने धान के बाद चने की फसल ले रहे हैं तो आपको एक बार भी पानी की आवश्यकता नहीं पड़ने वाली। इन लेट वैरायटियों की खास बात यह भी है कि आप चने की फसल की अपेक्षा ये नई वैरायटियों की फसलें फरवरी मार्च की गर्मी को आसानी से सहन कर सकतीं हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार इन लेट वैरायटी की फसल का उत्पादन भी 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होंगा।

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चने की लेट वैरायटियां

चने की लेट वैरायटी में दो नई किस्में आयीं हैं। आरजीवी 202 (RGV 202) और आरजीवी 203 (RGV 203) ऐसी किस्में हैं जो 90 दिन से लेकर 120 दिन के बीच तैयार हो जाती है। इन दोनों किस्मों की फसल की बुआई नवंबर के अंतिम सप्ताह से लेकर दिसम्बर के दूसरे सप्ताह तक की जा सकती है।

चने की कुछ अन्य लेट वैरायटियां

किसान भाइयों कृषि वैज्ञानिक लेट फसल लेने के लिए जेजी 11, जेजी 16, जेजी 63, जेजी 14 अ किस्मों की भी सलाह देते हैं। इनकी फसल दो बार की सिंचाई में तैयार हो जाती हैं। इन वैरायटियों की फसल 90 दिन में तैयार हो जाती है। कम पानी वाले क्षेत्र में जेजी 11 सबसे अच्छी वैरायटी है। इस वैरायटी की खास बात यह है कि यदि धान के बाद इसकी फसल ली जाये तो इसमें पानी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

मसूर की लेट वैरायटी

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मसूर की लेट फसल की एकमात्र वैरायटी का पता चला है। इस वैरायटी का राम राजेन्द्र मसूर 1 बताया गया है। इस मसूर को 2352 नाम से भी पहचाना जाता है। इस वैरायटी को 1996 में स्वीकृति मिल चुकी है। इस वैरायटी को गामा किरणों (100 GY) के साथ विकिरण द्वारा विकसित किया गया है। इस नयी किस्म का मुख्य गुण कम तापमान को सहन करना और जल्दी पकना है। इसलिये इस वैरायटी को लेट बुआई में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका लैटिन नाम लेन्स कालिनारिस मेडिक है।

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अभी बहुत शोध की है जरूरत (Need of research)

ये चने और मसूर की लेट वैरायटी हैं, इनके बारे में अधिक प्रचार प्रसार इसलिये नहीं हो पाया है क्योंकि एक विशेष क्षेत्र तक ही इनकी खेती की जा सकती है।  इसलिये अभी दलहन क्षेत्र की लेट वैरायटी के बारे में काफी शोध की जरूरत है। कम से कम देश के विभिन्न भागों में खेती करने के लिए उपयुक्त लेट वैरायटियां होनी चाहिये। इस बारे में दलहन अनुसंधान संस्थान को रिसर्च करनी चाहिये। तभी दलहन का उत्पादन बढ़ सकेगा।

किसान भाइयों को हो सकता है यह लाभ

यदि दलहन की फसल की लेट वैरायटी की उपलब्धता हो जाये तो किसान भाइयों को बहुत लाभ हो सकते हैं। जैसे किसान भाई किसी अन्य पछैती फसल के साथ इन दलहनों को अंतरवर्तीय फसल के रूप में बोना चाहे तो उसके साथ बुआई करके अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं। सरकारों को चाहिये कि वे इस बारे में किसानों की मदद करें। इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों को आवश्यक दिशानिर्देश दें। इससे देश की सम्पन्नता बढ़ेगी। दलहनों का आयात कम होगा और देश को फायदा होगा।

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