किसानों को नहीं मिल रही यूरिया, केंद्रीय मंत्री को मिली ₹99 लाख रुपये की सब्सिडी

Published on: 29-Jun-2026
Updated on: 29-Jun-2026

किसानों को नहीं मिल रही यूरिया खाद और केंद्रीय मंत्री भगीरथ चौधरी को मिली 99 लाख रुपये की सब्सिडी

देश के कई हिस्सों में किसान खरीफ सीजन के दौरान यूरिया खाद की कमी से जूझ रहे हैं। इसी बीच केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी को उनके ही मंत्रालय के अधीन संचालित एक सरकारी योजना के तहत लगभग 99 लाख रुपये की सब्सिडी मिलने का मामला चर्चा का विषय बन गया है। इस पूरे प्रकरण का खुलासा द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट में किया गया है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के परिवार को भी इसी योजना के तहत 1.16 करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी प्रदान की गई। इसके बाद हितों के टकराव (Conflict of Interest) को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बहस तेज हो गई है।  

राजस्थान के फार्म से जुड़ा है मामला

रिपोर्ट के अनुसार यह मामला राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के पीह गांव स्थित भगीरथ चौधरी के कृषि फार्म से जुड़ा है। फार्म परिसर में लगे सूचना बोर्ड पर उल्लेख किया गया है कि राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) द्वारा इस परियोजना के लिए 99.60 लाख रुपये की वित्तीय सहायता स्वीकृत की गई है। हालांकि बोर्ड पर यह जानकारी नहीं दी गई कि परियोजना का लाभ लेने वाले स्वयं केंद्र सरकार में कृषि राज्य मंत्री हैं।

पॉलीहाउस में खीरे की खेती के लिए शुरू की गई परियोजना

बताया गया है कि भगीरथ चौधरी ने अपने खेत पर आधुनिक पॉलीहाउस तकनीक के माध्यम से व्यावसायिक स्तर पर खीरे की खेती शुरू करने के लिए यह परियोजना तैयार की। परियोजना की कुल लागत लगभग 1.99 करोड़ रुपये रही। इसमें करीब 49.80 लाख रुपये स्वयं निवेश किए गए, जबकि लगभग 1.49 करोड़ रुपये का बैंक ऋण लिया गया। परियोजना पूरी होने के बाद राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की योजना के तहत 99.03 लाख रुपये की सब्सिडी सीधे बैंक ऋण खाते में जमा कर दी गई।

किस योजना के तहत मिला लाभ?

यह वित्तीय सहायता 'डेवलपमेंट ऑफ कमर्शियल हॉर्टिकल्चर थ्रू प्रोडक्शन एंड पोस्ट हार्वेस्ट मैनेजमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर क्रॉप्स' योजना के अंतर्गत दी गई। यह योजना मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) का हिस्सा है, जिसे केंद्र सरकार वर्ष 2014-15 से संचालित कर रही है। इस योजना का उद्देश्य आधुनिक बागवानी और संरक्षित खेती (Protected Cultivation) को बढ़ावा देना है।

विवाद की वजह क्या है?

इस मामले में विवाद इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड कृषि मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। बोर्ड के पदेन अध्यक्ष केंद्रीय कृषि मंत्री होते हैं, जबकि कृषि राज्य मंत्री पदेन उपाध्यक्ष होते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या उसी मंत्रालय के अधीन चल रही योजना का लाभ संबंधित मंत्री द्वारा लेना हितों के टकराव की स्थिति पैदा करता है। हालांकि नियमों के अनुसार परियोजनाओं की अंतिम स्वीकृति एक अलग प्रोजेक्ट अप्रूवल कमेटी देती है, जिसमें अध्यक्ष और उपाध्यक्ष शामिल नहीं होते।

आवेदन से मंजूरी तक की प्रक्रिया

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार परियोजना के लिए 15 अप्रैल 2025 को आवेदन किया गया था। इसके केवल 14 दिन बाद, यानी 29 अप्रैल 2025 को सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई। इसके बाद 11 मार्च 2026 को अंतिम स्वीकृति जारी की गई और 30 मार्च 2026 को लगभग 99.03 लाख रुपये की सब्सिडी संबंधित बैंक खाते में जमा कर दी गई।

किसानों को नहीं मिल रही यूरिया और DAP खाद, मंत्री ने ले ली 99 लाख की सब्सिडी!

देश के कई राज्यों में किसान खरीफ फसलों के लिए यूरिया और DAP खाद की कमी का सामना कर रहे हैं। कई स्थानों पर किसानों को खाद लेने के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है, जबकि कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध नहीं होने की शिकायतें सामने आई हैं। इसी बीच केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी द्वारा अपने कृषि फार्म के लिए करीब 99 लाख रुपये की सब्सिडी प्राप्त करने का मामला चर्चा में आ गया है। इस मुद्दे को लेकर विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए हैं और इसे हितों के टकराव (Conflict of Interest) से जोड़ते हुए जांच की मांग की है। वहीं, सरकार और संबंधित पक्ष का कहना है कि सब्सिडी का लाभ निर्धारित नियमों और पात्रता के अनुसार लिया गया है तथा इसमें किसी प्रकार की अनियमितता नहीं हुई है। ऐसे में यह मामला राजनीतिक बहस का विषय बन गया है, जबकि किसान समय पर यूरिया और DAP की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं।

संपत्ति विवरण में परियोजना का उल्लेख नहीं

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में जमा 31 मार्च 2025 तक की संपत्ति घोषणा में भगीरथ चौधरी ने पीह गांव स्थित कृषि भूमि का उल्लेख तो किया है, लेकिन इस पॉलीहाउस परियोजना का जिक्र नहीं किया गया। हालांकि मंत्री कार्यालय से जुड़े एक सहयोगी ने कहा कि परियोजना से संबंधित आवश्यक जानकारी सरकार को उपलब्ध करा दी जाएगी।

पहले भी किया था आवेदन

रिपोर्ट के मुताबिक भगीरथ चौधरी ने पहली बार वर्ष 2018 में भी इसी योजना के तहत आवेदन किया था, लेकिन तकनीकी कारणों से वह मंजूर नहीं हो सका। उसी वर्ष उनके बेटे ने भी आवेदन किया था, जिसे निर्धारित पात्रता शर्तें पूरी न होने के कारण स्वीकृति नहीं मिली।

मंत्री ने क्या दी सफाई?

मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए भगीरथ चौधरी ने कहा कि वे सबसे पहले एक किसान हैं और लंबे समय से खेती कर रहे हैं। उनके अनुसार पूरी परियोजना सरकार की निर्धारित गाइडलाइन के अनुरूप तैयार की गई है। उन्होंने बताया कि इस आधुनिक खेती परियोजना के लिए लगभग 2 करोड़ रुपये का बैंक ऋण लिया गया और फार्म पर चार बड़े जलाशय बनाए गए हैं, जिनमें करीब 2 करोड़ लीटर वर्षा जल संग्रहित किया जा सकता है। इसी पानी से लगभग 60 बीघा क्षेत्र में आधुनिक खेती की जा रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि सब्सिडी प्राप्त करने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रही है और फार्म पर लगाए गए सूचना बोर्ड में परियोजना की लागत तथा मिली सब्सिडी का पूरा विवरण दर्ज है, ताकि अन्य किसान भी आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हो सकें। उनका कहना है कि योजना की सभी पात्रता शर्तें पूरी करने वाला कोई भी किसान इस योजना का लाभ प्राप्त कर सकता है।

आईएएस अधिकारी के परिवार को भी मिला लाभ

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि वर्तमान में मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय में सचिव नरेश पाल गंगवार के परिवार के तीन सदस्यों को भी इसी योजना के तहत 1.16 करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी मिली। इनमें उनकी मां, पत्नी और बेटे के नाम पर जयपुर जिले में खीरे की खेती से संबंधित परियोजनाओं को अलग-अलग समय पर वित्तीय सहायता प्रदान की गई।

योजना के लिए कौन है पात्र?

सरकारी नियमों के अनुसार इस योजना का लाभ व्यक्तिगत किसान, किसान उत्पादक संगठन (FPO), स्वयं सहायता समूह, सहकारी समितियां, कंपनियां, ट्रस्ट, विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान भी ले सकते हैं। इसके लिए न्यूनतम 4000 वर्गमीटर भूमि, बैंक ऋण तथा अन्य निर्धारित तकनीकी मानकों को पूरा करना आवश्यक होता है।

अब उठ रहे हैं बड़े सवाल

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह बहस तेज हो गई है कि भले ही सब्सिडी निर्धारित नियमों के अनुसार स्वीकृत की गई हो, लेकिन क्या अपने ही मंत्रालय के अधीन संचालित योजना का लाभ किसी मंत्री द्वारा लेना नैतिक दृष्टि से उचित माना जा सकता है। वहीं दूसरी ओर, सरकार और मंत्री का पक्ष है कि यदि कोई भी पात्र किसान सभी नियमों का पालन करता है तो उसे योजना का लाभ मिलने का अधिकार है।

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