जैविक खेती कर के किसान अपनी जमीन को स्वस्थ रख सकते है और कमा सकते हैं कम लागत में ज्यादा मुनाफा - Meri Kheti

जैविक खेती कर के किसान अपनी जमीन को स्वस्थ रख सकते है और कमा सकते हैं कम लागत में ज्यादा मुनाफा

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भारत में किसानो को जैविक खेती की ओर क्यों जाना चाइये

कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग के परिणामस्वरूप पर्यावरण को नुकसान और उनके प्रति कीड़ों की प्रतिरोधक क्षमता में कमी होती जा रही है। कीटनाशकों ने मिट्टी में उपयोगी जीवों को नुकसान पहुंचाया है। अधिक उपज देने वाले बीजों की एकल कृषि के लिए रासायनिक उर्वरकों के बाहरी आदानों की आवश्यकता होती है। इन का दीर्घकालिक प्रभाव फसल की पैदावार में कमी लाता जा रहा है और रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के ज्यादा प्रयोग से भूमि की उपजाऊ शक्ति खत्म होती जा रही है। ये रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक भूमि में उपस्थित मित्र कीटो को भी मार देते है। अगर इसी तरह हम भूमि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग करते रहें तो एक दिन हमारी भूमि बंजर हो जाएगी। इसलिए हमें अपनी भूमि की उपजाऊ शक्ति बनाये रखने के लिए हमें अपनी जमीन में जैविक खाद, जैव उर्वरक और जैव नियंत्रण एजेंट का प्रयोग करना चाहिए। जिस से हम अपनी भूमि की उपजाऊ शक्ति में बढ़ोत्तरी कर सकते हैं और ज्यादा महंगे रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का प्रयोग ना करके कम लागत में आय में बढ़ोतरी कर सकते हैं। जैविक खेती कृषि का वह रूप है, जो फसल चक्र, हरी खाद, खाद, जैविक कीट पर निर्भर करता है।

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फसलों और किस्मों का चुनाव

सभी बीज और पौधों की सामग्री जैविक प्रमाणित होनी चाहिए। खेती की जाने वाली प्रजातियों और किस्मों को मिट्टी और जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए और बीमारी और कीटों के प्रति प्रतिरोधी होना चाहिए। किस्मों के चयन में आनुवांशिक विविधता को ध्यान में रखा जाना चाहिए। जब प्रमाणित जैविक बीज और पौधा सामग्री उपलब्ध नहीं हो तो रासायनिक रूप से अनुपचारित पारंपरिक सामग्री का उपयोग किया नहीं जाना चाहिए। इंजीनियर बीज, पराग, ट्रांसजीन पौधे या पौधे सामग्री के उपयोग की अनुमति नहीं है।

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खाद और जैविक उर्वरकों का इस्तेमाल

खाद के रूप में जैविक खाद, वर्मीकम्पोस्ट, गाय का मूत्र और बकरी के गोबर की खाद, मुर्गे की बीट की खाद भी बहुत सारे पोशक तत्वों की कमी को पूरा करते हैं। तिलहन से तेल निकालने के बाद बचा हुआ ठोस भाग खली के रूप में सुखाया जाता है, जिसे खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। जैसे की मूंगफली की खली, नारियल की खली, सरसो की खली, अरंडी की खली, नीम की खली, महुआ की खली आदि। हरी खाद का मतलब है, की हरी खाद वाली फसल को खेत में उगा कर बाद में उसे पर्याप्त वृद्धि के बाद हैरो चला कर मिट्टी में मिला देना है, जो जमीन में गलने के बाद खाद का काम करती है। ढैंचा, ग्वार या सुनहेम्प हरी खाद के लिए लगायी जाने वाली मुख्य फसलें है। ये भूमि में नाइट्रोजन की कमी को पूरा करती हैं, क्योंकि ये फसलें भूमि के वातावरण में नाइट्रोजन नियंत्रण करती हैं।

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