नौकरी छोड़ सतीश बने किसान:वर्मी कम्पोस्ट यूनिट के बाद लगाया दो एकड़ पॉलीहाउस

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अलीगढ़ जनपद के गांव कैथवाडी निवासी किसान सतीश ने दो दशक पूर्व विज्ञान वर्ग से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद दवाओं की कंपनी में नौकरी लग गई लेकिन उनका मन नहीं लगा। 2005 में जॉब छोड़कर वह पैत्रक काम खेती करने का निश्चय कर खेत में उतर आए। उन्होंने सोचा नौकरी के बराबर 25 हजार रुपए मासिक आय यदि खेती से हो जाए तो किसी की गुलामी नहीं करनी होगी। इसके बाद उन्होंने खेती के साथ आय बढ़ाने के लिए वर्मी कम्पोस्ट बनाने का निर्णय लिया और कम लागत का टीन शेड डालकर 10 बैड से शुरूआत की। धीरे धीरे इसे 500 बैड तक पहुंचा दिया। वह बताते हैं कि वह तीन साल तक खाद बनाते रहे लेकिन सेल इतनी ज्यादा नहीं थी कि आय होती हो। खर्चे चलते रहते थे।

तीन साल बाद खाद बिकना शुरू हुआ।10 बैड से शुरूआत की, बाद में पांचसौ बैग व पांचसौ टन का उत्पादन करना इतना आसान नहीं था लेकिन अनेक जटिलताओं के बाद भी काम बढ़ता गया। सतीश ने बताया कि किसान वर्मी कम्पोस्ट डालने के आदी नहीं हैं। वह अभी भी केवल डीएपी—यूरिया डालने के ही आदी है। उन्हें वर्मी कम्पोस्ट की ओर आकर्शित करने में कुछ सरकारी अफसरों का सहयोग मिला तब जाकर बात आगे बढ़ी। इससे उन्हें मासिक तौर पर 70 से 80 हजार की आय व आठ 10 लेबर का खर्चा निकल जाता था। कंपोस्ट काम चालू पड़ने के साथ उन्होंने सोचा कि संरक्षित खेती यानी पॉलीहाउस जैसी नई तकनीक का सहारा लेकर खेती में  कुछ नया किया जाए। इसके लिए उन्होंने अपने जीवन की सारी पूंजी दांव पर लगा दी। इसके लिए पहले पॉलीहाउस संचालन की ट्रेनिंग ली और दो एकड़ का करीब 90 लाख का प्रोजेक्ट फाइनल कर दिया। इस पर 38 लाख की छूट सरकार की ओर से मिली। साथ ही 25 बीघा नींबू का बाग लगाया। पॉलीहाउस में लागत इतनी ज्यादा लग गई कि संचालन करना मुश्किल हो गया। संचालन के सारे इंतजाम हो गए लेकिन बीमारियों ने घेर लिया। अनेक प्रयासों के बाद भी रोगों से फसलों को बचाना मुश्किल हो गया।

किसान सतीश कहते हैं कि पॉलीहाउस में तीन साल तक लाभ तो भूल ही जाइये। तीन साल तो सीखने में ही निकल जाता है। पॉलीहाउस में थ्रिप्स, निमोटोड, माइट, डाउनी आदि अनेक रोग लगते हैं। निमोटोड का समाधान किसी कंपनी और वैज्ञानिक के पास नहीं है। निमोटोड से पॉलीहाउस को बचाने के लिए मई जून में सोलराइजेशन करते हैं। जमीन पर प्लास्टिक सीट बिछाकर गर्मी देते हैं। इससे 50 प्रतिशत राहत ही होती है। इन महीनों में सब्जियों की कीमतें ठीक मिल जाती हैं लेकिन रोग नियंत्रण के लिए पॉलीहाउस खाली रखना पड़ता है।

वह बातते हैं कि कम्पटीशन बहुत हो गया है। पॉलीहाउस खूब लग रहे हैं लेकिन 80 प्रतिशत पॉलीहाउस में खीरा ही लगा हुआ है। खीरा जैसी फसलें घाटे का सौदा तो नहीं है, इस सवाल पर उन्होंने कहा कि फूलों की खेती से भी अनेक लोगों का मुनाफा नहीं बढ़ा। इस समय खीरा 15 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है। बाजार में 50 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है। दिल्ली, आगरा, अलीगढ़ आदि की सभी मंडियों में दो से तीन रुपए का ही अंतर नजर आता है। वह कहते हैं कि उनके खेती को लेकर खट्टे अनुभव ज्यादा रहे हैं। मीठे कम रहे हैैं। अलीगढ़ में एक दर्जन पॉलीहाउस लगे हैं लेकिन एक भी सफल नहीं है। छोटे किसान को इस दिशा में कदम नहीं रखना चाहिए। वह यदि इस क्षेत्र में आना चाहता है तो लो टनल पॉलीहाउस जैसी तकनीक पर काम करके आगे बढ़ना चाहिए।

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