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सोयाबीन की खेती कैसे होती है

सोयाबीन की खेती कैसे होती है

सोयाबीन की खेती

सोयाबीन विश्व की प्रमुख तिलहनी फसल है। यह विश्व खाद्य तेल उत्पादन में करीब 30 फ़ीसदी का योगदान देती है। इसमें 20% तेल 40% प्रोटीन होता है। सोयाबीन का स्थान भारत की मुख्य फसलों में से एक है। 

विश्व में क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से भारत उसमें प्रमुख स्थान रखता है।भारत में सोयाबीन की औसत उत्पादकता 11 से 12 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। भारत में सोयाबीन खरीफ में उगाई जाने वाली एक प्रमुख  फसल है। 

हमारे देश में सोयाबीन उत्पादन प्रमुख रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक में होती है। सोयाबीन के कुल क्षेत्र एवं उत्पादन में मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र का विशेष योगदान है। 

देश में सोयाबीन उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। सोयाबीन से तेल प्राप्त होने के अलावा दूध दही पनीर आदि खाद्य पदार्थ भी तैयार किए जाते हैं।

मिट्टी

सोयाबीन की अच्छी पैदावार के लिए समतल एवं जल निकासी वाली दोमट भूमि अच्छी रहती है।इसकी खेती क्षारीय तथा अम्लीय भूमियां छोड़कर हर तरह की जमीन में की जा सकती है। 

काली मिट्टी में भी सोयाबीन की खेती अच्छी होती है। वैज्ञानिक भाषा में जिस मिट्टी का पीएच मान 6:30 से 7:30 के बीच हो वह इसकी खेती के लिए अच्छी होती है।

बीज

खरीफ में लगाई जानी फसल के लिए 70 से 75 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है जबकि ग्रीष्म एवं वसंत ऋतु के लिए 100 से 125  किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज चाहिए।

अच्छी पैदावार के लिए प्रमाणित या आधारित बीज लेना चाहिए और बुवाई से पूर्व थीरम या कार्जाबन्कडाजिम नामक दवा से ढाई ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचार करना चाहिए। 

इसके अलावा सोयाबीन में नाइट्रोजन स्थिरीकरण बाजार ग्रंथियों के शीघ्र विकास के लिए 20 को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए । 

पौधों के अच्छे विकास के लिए बीज को पीएसबी कल्चर से भी उपचारित करना चाहिए। इससे जमीन में मौजूद तत्वों को व्यक्ति दिया पौधे की जड़ों तक पहुंचाने में सुगमता लाता है। 

उक्त कल्चरों से बीज को उपचारित करने के लिए एक बर्तन में पानी लेकर 100 ग्राम गुड़ या शक्कर घोलकर उसमें इन कल्चर को मिलाया जाता है और उनका लेप बीज पर कर दिया जाता है।

बुवाई का समय

अच्छे उत्पादन के लिए बुवाई के समय का प्रमुख स्थान होता है। खरीफ सीजन में 25 जून से 15 जुलाई के मध्य का समय इसकी खेती के लिए उपयुक्त माना गया है। 

कम समय में पकने वाली किस्मों का चयन करें ताकि मौसमी दुष्प्रभाव से नुकसान को बचाया जा सके। मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों व दक्षिण भारत में सोयाबीन बसंत यानी कि जायद ऋतु में बोई जाती है । 

उसकी बुबाई का उपयुक्त समय 15 फरवरी से 15 मार्च के बीच रहता है। इसकी बिजाई में पंक्ति से पंक्ति की दूरी  45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 3 से 5 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। इसके अलावा 20 30 से 4 सेंटीमीटर से ज्यादा गहरा नहीं डालना चाहिए।

उर्वरक प्रबंधन

अच्छे उत्पादन के लिए 10 टन सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर डालनी चाहिए।इसके अलावा नाइट्रोजन 25 किलोग्राम, फास्फोरस 80, किलोग्राम एवं पोटाश 50 किलोग्राम की दर से डालाना चाहिए। 

इसके अतिरिक्त 25 किलोग्राम सल्फर का प्रयोग करने से कई तरह की बीमारियां नहीं आती हैं। फास्फोरस की पूर्ति के लिए यदि डीएपी डाला जा रहा है तो सल्फर अलग से नहीं देनी चाहिए।

जल प्रबंधन

चुकी सोयाबीन की खेती बरसात के सीजन में की जाती है इसलिए पानी की ज्यादा जरूरत नहीं होती लेकिन यदि बरसात कम हो तो क्रांतिक अवस्थाओं, शाखाओं के विकास के समय फूल बनते समय एवं फलियां बनते समय और दाने के विकसित होते समय पानी लगाना चाहिए। वसंत ऋतु में 12 से 15 दिन के अंतराल पर 45 से चाहिए करनी होती हैं।

खरपतवार नियंत्रण

सोयाबीन की खरीफ ऋतु की फसल में खरपतवारओं का अधिक प्रयोग होता है जैसे उपज पर 40 से 50% तक नकारात्मक प्रभाव दिखता है। 

इसके नियंत्रण के लिए बुवाई के 20 से 25 दिन बाद हैंड हो द्वारा कतारों को मध्य में होगे खरपतवार को नष्ट कर देना चाहिए। 

इसके बाद 30 से 40 दिन बाद निराई गुड़ाई करके और है साथ में किया जाना चाहिए। रसायनिक नियंत्रण के लिए भी बाजार में कई तरह की दवाई मौजूद हैं।

बीमारी नियंत्रण, रोग

  1. भूरा धब्बा रोग फसल में फूल के समय पर आता है। इस रोग के धब्बे टेढ़े मेढ़े, लाल भूरे व किनारों से हल्के हरे होते हैं। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियां गिर जाती हैं। इससे बचाव के लिए स्वस्थ बीज का प्रयोग करें। मध्यम रोग प्रतिरोधी पालम सोया, हरित सोया, ली और ब्रैग जैसी किस्में लगाएं।
  2. बैक्टीरियल पश्चुयुल रोग के कारण पत्तियों के दोनों सदनों पर पीले उभरे हुए धब्बे प्रकट होते हैं जो बाद में लाल बुरे हो जाते हैं। छोटे-छोटे ऐसे ही धब्बे फलियों पर भी प्रकट होते हैं। इससे बचाव के लिए पंजाब नंबर 1 किस ना लगाएं रोग प्रतिरोधक किस्में ही लगाएं।
  3. पीला म्यूजिक विषाणु जनित रोग है। यह रोग सफेद मक्खी के माध्यम से फैलता है। इसके कारण पत्तों पर झुर्रियां पड़ जाती हैं और पत्ते और पौधे छोटे रह जाते हैं फलियां कम लगती हैं । मौसम में नमी अधिक होने पर तथा तापमान 22 से 25 डिग्री सेंटीग्रेड के बीच होने पर रोग तेजी से फैलता है। बचाव के लिए विषाणु रहित बीज का प्रयोग करें और एक ही पौधे को तुरंत खेत से निकाल दें। गर्म क्षेत्र में ब्रैग किस्म न लगाएं। निचले क्षेत्रों में शिवालिक किस्म लगाने से बचें।

कीट नियंत्रण

  1. कूबड़ कीट की सुन्डियां पत्तों को क्षति पहुंचाती हैं। इससे पौधे की बढ़वार नहीं हो पाती है। बचाव के लिए फसल पर 50 मिलीलीटर मेलाथियान या 25 मिलीलीटर डाईक्लोरोवास 50 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। सुंडी को इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए। यह दवाएं अगर प्रतिबंधित की गई हैं तो इनके विकल्प के रूप में जो दवाएं बाजार में मौजूद हैं वह डालें।
  2. बीन बाग कीट युवा और प्रौढ़ अवस्था में पत्तों का रस चूसते हैं। इससे पत्तों की ऊपर की सतह पर छोटे-छोटे सफेद या पीले धब्बे पड़ जाते हैं। बाद में यह पत्ते सूख कर गिर जाते हैं। बचाव के लिए 50 मिलीलीटर मोनोक्रोटोफॉस या 50 मिलीलीटर साइपरमैथरीन 50 लीटर पानी में घोलकर प्रति बीघा छिड़काव करना चाहिए।
  3. लपेटक बीटल भृंग फसल को शुरुआती दौर में 15 से 20 दिन तक तना, शाखा और पत्तियों को बहुत नुकसान पहुंचाता है। इसके बाद यह कीट तने में सुरंग बना देता है। इससे पौधे के ऊपर हिस्से मुरझा जाते हैं। बचाव के लिए फसल को खरपतवारओं से मुक्त रखें प्रकोप शुरू होने पर 50 मिलीलीटर मोनोक्रोटोफॉस 50 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

सोयाबीन में रासायनिक खरपतवार नियंत्रण

  1. घास समुदाय वाले खरपतवार के नियंत्रण के लिए पेंडीमिथालिन स्टांप की ढाई लीटर मात्रा डुबाई के दो दिन बाद पर्याप्त पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
  2. घास कुल वाले खरपतवार एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए फ्लूक्लोरालीन बाशालिन की 2 लीटर मात्रा बोने से पूर्व छिड़काव करें तथा अच्छी तरह से मिट्टी में मिला दें।
  3. केवल चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार ओं को मारने के लिए मेटसल्फ्यूरान 4 से 6 ग्राम प्रति हेक्टेयर मोबाइल के 20 से 25 दिन बाद छिड़काव करें।

Soyabean Tips: लेट मानसून में भी पैदा करना है बंपर सोयाबीन, तो करें मात्र ये काम

Soyabean Tips: लेट मानसून में भी पैदा करना है बंपर सोयाबीन, तो करें मात्र ये काम

देश में इस साल मानसून की असामान्य गतिविधि देखी जा रही है। कहीं पानी तो कहीं गर्मी सूखे के कारण, कृषक तय नहीं कर पा रहे हैं कि वो फसल कब और कौन सी बोएं। आम तौैर पर मानसून आधारित औसतन कम पानी की जरूरत वाली खरीफ की फसलों में शामिल, सोयाबीन की किस्मों पर किसान यकीन करते हैं।

असामान्य स्थिति

बारिश जनित असमान्य स्थितियों के कारण इस साल सोयाबीन खेती आधारित पैदावार क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा के आगमन एवं फैलाव में स्थितियां पिछले सालों की तुलना में अलग हैं। कुछ जगहों के कृषक मित्र सोयाबीन की खेती शुरू कर चुके हैं, जबकि कुछ इलाकों के किसान सोयाबीन की बुआई के लिए अभी भी पर्याप्त वर्षा जल का इंतजार कर रहे हैं। मतलब इन इलाकों की सोयाबीन बुआई फिलहाल अभी रुकी हुई है।

ये भी पढ़ें: सोयाबीन, कपास, अरहर और मूंग की बुवाई में भारी गिरावट के आसार, प्रभावित होगा उत्पादन मानसून में हो रही देरी के कारण कृषि वैज्ञानिकों ने सोयाबीन के बीजों के चयन, उनको बोने एवं आवश्यक ध्यान रखने के बारे में कुछ सलाह जारी की हैं।

बुआई के लिए

मानसून की देरी से परेशान ऐसे किसान जिन्होंने अभी तक सोयाबीन की बुवाई नहीं की है, या फिर अभी 3 से 4 दिन पहले ही सोयाबीन बोया है तो उनके लिए यह सलाह काफी अहम है। आम तौर पर वैज्ञानिकों के अनुसार जुलाई महीने के पहले सप्ताह तक का समय सोयाबीन बोवनी के लिए उपयुक्त होता है। इसमें देरी होने पर कृषक ख्याल रखें कि बोवनी क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा (100 मि.मी.) होने पर ही सोयाबीन कि बुवाई का वे जोखिम उठाएं।

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सोयाबीन की किस्म

इस बारे में कृषकों को सलाह दी गई है कि, वे एक ही किस्म की सोयाबीन बोवनी की बजाए खेत में विभिन्न समयावधि में पकने वाली किस्मों की बोवनी करें। इसमें 2 से 3 अनुशंसित किस्मों की सोयाबीन खेती को प्राथमिकता दी जा सकती है।

बीज दर का गणित

बीज ऐसा चुनें जिसकी गुणवत्ता न्यूनतम 70% अंकुरण की हो। इस आधार पर ही बोए जाने वाले बीज दर का भी प्रयोग करें। अंकुरण परीक्षण से सोयाबीन बोवनी हेतु उपलब्ध बीज का अंकुरण न्यूनतम 70 फीसदी सुनिश्चित करने से भी कृषक अपने बीज का परीक्षण कर सकते हैं।

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पद्धति का चुनाव

सोयाबीन के लिए विपरीत माने जाने वाली सूखे कि स्थिति, अतिवृष्टि आदि से संभाव्य नुकसान कम करने सोयाबीन की बोवनी बी.बी.एफ. पद्धति या रिज एवं फरो विधि (Ridge and furrow) से करने की सलाह कृषि वैज्ञानिकों ने दी है।

सोयाबीन बीज उपचार

बोवनी के समय बीज को अनुशंसित तरीके से उपचारित कर थोड़ी देर छाया में सुखाएं | फिर इसके बाद अनुशंसित कीटनाशक से भी उपचारित करें | कृषक रासायनिक फफूंद नाशक के स्थान पर बीजों में जैविक फफूंद नाशक ट्रायकोडर्मा का भी उपयोग कर सकते है। इसे जैविक कल्चर के साथ मिलकर प्रयोग किया जा सकता है।

खाद का संतुलन

किसान सोयाबीन की फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों नाईट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश व सल्फर की पूर्ति केवल बोवनी के वक्त करें।

बोवनी वक्त दूरी

सोयाबीन की बोनी के लिए 45 से.मी. कतारों की दूरी अनुपालन की अनुशंसा की जाती है। बीज को 2 से 3 से.मी. की गहराई पर बोते हुए पौधे से पौधे की दूरी 5 से 10 सेमी रखने की सलाह कृषि वैज्ञानिक देते हैं। कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि, सोयाबीन बीज दर 65 से 70 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करने से बेहतर पैदावार होगी।
सोयाबीन फसल की सुरक्षा के उपाय

सोयाबीन फसल की सुरक्षा के उपाय

दोस्तों आज हम बात करेंगे सोयाबीन की फसल की सुरक्षा के बारे में, सोयाबीन की फसल किसानों के लिए बहुत ही ज्यादा उपयोगी होती है। ऐसे में इस फसल की सुरक्षा करना बहुत ही जरूरी है। 

सोयाबीन की फसल में विभिन्न प्रकार के रोग लग जाते हैं जिनके कारण फसल खराब होने का भय रहता है। जैसे सोयाबीन की फसल में कभी-कभी विनाशकारी सफेद मक्खी कीट का रोग लग जाता है, जिससे फसल पूरी तरह से बर्बाद हो जाती है। 

सोयाबीन की फसल को इस भयंकर कीटों से बचाव करने के लिए हमें विभिन्न प्रकार के तरीके अपनाने चाहिए। सोयाबीन की फसल से जुड़ी सभी प्रकार की आवश्यक बातों को जानने के लिए हमारे इस पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहे।

सोयाबीन के फसल की खेती वाले राज्य :

सोयाबीन की खेती, किसान खरीफ के मौसम में करते हैं। खरीफ का मौसम सोयाबीन की खेती करने के लिए सबसे उत्तम होता है। बहुत से क्षेत्र हैं जहां सोयाबीन की खेती की जाती है। 

जैसे भारत में सोयाबीन की खेती महाराष्ट्र, राजस्थान मध्य प्रदेश में भारी मात्रा में उत्पादन की जाती है। यदि हम बात करें इनकी पैदावार की तो मध्यप्रदेश लगभग 45% का उत्पादन करती है। 

हीं दूसरी ओर महाराष्ट्र में यह लगभग 40% का भारी उत्पादन करती हैं। इसके अलावा और भी क्षेत्र हैं जहां सोयाबीन की खेती की जाती है। जैसे  बिहार आदि क्षेत्र सोयाबीन की खेती के लिए प्रमुख माने जाते हैं।

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सोयाबीन की खेती के लिए उपयुक्त भूमि का चुनाव:

किसानों के अनुसार सोयाबीन की फसल किसी भी भूमि पर आप आसानी से कर सकते हैं। परंतु  हल्की और रेतीली भूमि में सोयाबीन की खेती करना उपयुक्त नहीं होता है। 

सोयाबीन की फसल दोमट चिकनी मिट्टी में सबसे उत्तम होती है इन भूमि पर सोयाबीन की अधिक पैदावार होती है।

सोयाबीन की फसल में लगने वाले रोग:

सोयाबीन की फसल में सफेद मक्खी कीट तेजी से लग जाते हैं, यदि इनकी रोकथाम सही समय पर ना की जाए तो यह फसल को पूरी तरह से खराब कर देते हैं। बारिश के दिनों में सोयाबीन में पीला मोजेक रोग तथा सेमिलूपर कीट रोग का प्रभाव बन जाता है। यह रोग बारिश के मौसम में नमी के कारण पनपते हैं, ऐसे में यदि जल निकास की व्यवस्था को ठीक ढंग से न बनाया जाए, तो यह रोग पूरी फसल को तहस-नहस कर देते हैं।

सोयाबीन की फसल में सफेद मक्खी रोग के प्रभाव:

वैसे तो आकार में यह मक्खियां बहुत ही छोटी होती है। पर इनके आकार को देखकर आप इनकी शक्ति का अंदाजा नहीं लगा सकते हैं कि यह किस प्रकार से पूरी फसल को बर्बाद करती है। 

यह लगभग 8 मिमी की होती है, परंतु इनके कुप्रभाव से पूरी फसल बर्बाद हो जाती है, जिससे किसानों को बहुत हानि पहुंचती है। इन मक्खियों के शरीर तथा परो पर मोमी स्राव मौजूद होता है। 

यह सफेद मक्खियां खेतों के निचली सतह पर स्थित होती हैं और जब कभी आप खेतों को हिलाते डुलाते हैं तो यह उड़कर मंडराना शुरु कर देती हैं। ज्यादातर यह सफेद मक्खियां सूखी व गर्म स्थानों पर पनपती है।

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यह मक्खियां खेतों की निचली सतह पर रहकर अंडे भी उत्पादन करती है। यह सफेद नवजात शिशुओं को पैदा करती है जो दिखने में सफेद तथा अंडकार और हरे पीले होते हैं। 

इन सफेद मक्खियों की उत्पादकता को कम करने के लिए खेतों से घासफूस हटाना बहुत ही ज्यादा आवश्यक होता है, जिससे इन मक्खियों की आबादी को नियंत्रित किया जा सकता हैं। सोयाबीन की फसल में कुछ इस प्रकार से सफेद मक्खी रोग के कुप्रभाव पढ़ते हैं।

सोयाबीन की फसल को सफेद मक्खियों तथा कीट से बचाने के उपाय :

  • किसान सफेद मक्खियों के इस प्रकोप को नियंत्रण रखने के लिए सोयाबीन की रोगरोधी किस्म का इस्तेमाल करता है जो सफेद मक्खियों को अपनी ओर बढ़ने से रोकती है।
  • या सफेद मक्खियां नमी के कारण और ज्यादा पनपती हैं ऐसे में बारिश के दिनों में खेतों में जल निकास की व्यवस्था को सही ढंग से बनाए रखना चाहिए।
  • सोयाबीन की बुवाई सही समय पर करनी चाहिए। किसानों के अनुसार इसकी बुवाई ना बहुत देर में ना ही जल्दी, दोनों ही प्रकार से नहीं करनी चाहिए, उचित समय पर सोयाबीन की बुवाई करें।
  • उर्वरीकरण तथा पौधों में संतुलिता को बनाए रखने की कोशिश करें।
  • फसल की कटाई के बाद सभी प्रकार के पौधों के अवशेषों को जड़ से हटा दें। खरपतवार का खास ध्यान रखें।
  • फसल को सुरक्षित रखने के लिए कृषि विशेषज्ञों के अनुसार रासायनिक दवाओं का भी इस्तेमाल खेतों में करें।
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दोस्तों हम उम्मीद करते हैं कि आपको हमारा यह आर्टिकल सोयाबीन फसल की सुरक्षा के उपाय पसंद आया होगा। हमारे इस आर्टिकल में सोयाबीन की खेती से जुड़ी सभी प्रकार की आवश्यक जानकारियां मौजूद है जिससे आप लाभ उठा सकते हैं। 

यदि आप हमारी दी हुई जानकारियों से संतुष्ट हैं तो आप हमारे इस आर्टिकल को ज़्यादा से ज़्यादा अपने दोस्तों और सोशल मीडिया पर शेयर करें। धन्यवाद ।

सोयाबीन की तीन नई किस्मों को मध्य प्रदेश शासन ने दी मंजूरी

सोयाबीन की तीन नई किस्मों को मध्य प्रदेश शासन ने दी मंजूरी

भारत में सोयाबीन (soyabean) का सबसे ज्यादा उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है इसलिए इस राज्य को सोया राज्य कहा जाता है, चूंकि मध्य प्रदेश के किसान हर साल बड़ी मात्रा में सोयाबीन की खेती करते हैं। इसलिए केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश शासन मिलकर इसके रिसर्च और अनुसंधान पर भी पूरा ध्यान देते हैं, ताकि समय-समय पर किसानों को नए बीज उपलब्ध करवाए जा सकें, जिससे उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो तथा किसानों को भी फायदा हो। भारत में खाद्य तेलों की बढ़ती हुई मांग को देखते हुए, ICAR - भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (IISR), इंदौर पिछले कई सालों से सोयाबीन की नई किस्मों को विकसित करने के लिए अनुसंधान कर रहा है। इस संस्थान के कृषि वैज्ञानिकों के सतत प्रयासों के बाद भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (IISR), इंदौर ने सोयाबीन की 3 नई किस्मों को विकसित करने में सफलता पाई है। इन किस्मों को कृषि वैज्ञानिकों द्वारा एनआरसी 157, एनआरसी 131 और एनआरसी 136 नाम दिया गया है।

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कृषि वैज्ञानिकों के काम से खुश होकर मध्य प्रदेश शासन ने इन तीनों किस्मों को तुरंत ही मंजूरी दे दी है, ताकि ये किस्में जल्द से जल्द बाजार में किसानों के लिए उपलब्ध हो सकें, जिससे किसान ज्यादा से ज्यादा नई किस्मों के द्वारा लाभान्वित हो सकें। संस्थान के हेड साइंटिस्ट और ब्रीडर डॉ संजय गुप्ता ने सोयाबीन की नई किस्मों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि एनआरसी 157 एक मध्यम अवधि की फसल है, जो बुवाई करने के बाद मात्र 94 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म की उपज भी शानदार है। यह किस्म प्रति हेक्टेयर 16.5 क्विंटल फसल का उत्पादन दे सकती है। एनआरसी 157 नाम की यह किस्म अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट, बैक्टीरियल पस्ट्यूल और टारगेट लीफ स्पॉट जैसी बीमारियों से मध्यम प्रतिरोधी क्षमता रखती है। इसकी खेती करने वाले किसानों को ज्यादा हानि होने की संभावना नहीं है। इसके साथ ही यदि इस किस्म की बुवाई 20 जुलाई तक भी की जाती है, तो भी यह इस किस्म के लिए उपयुक्त मानी जाएगी।

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दूसरी किस्म एनआरसी 131 भी एक मध्यम अवधि की फसल है, जो बुवाई करने के बाद 93 दिनों में तैयार हो जाती है। यह औसत रूप से एक हेक्टेयर में 15 क्विंटल फसल का उत्पादन दे सकती है। यह किस्म भी चारकोल रॉट और टार्गेट लीफ स्पॉट जैसी बीमारियों के लिए मध्यम रूप से प्रतिरोधी है।

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इन दो किस्मों के साथ तीसरी किस्म एनआरसी 136 है। जिसे मध्य प्रदेश शासन ने अभी मंजूरी दी है। हालाँकि यह किस्म देश में पहले से ही उपयोग की जा रही है। इसका उपयोग ज्यादातर पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में किया जाता है। इसके बारे में जानकारी देते हुए संस्थान के एक प्रधान कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि, यह किस्म बुवाई के बाद 105 दिन की अवधि में तैयार होती है। साथ ही, यह सोयाबीन की ऐसी पहली किस्म है, जिसके ऊपर सूखे का कोई ख़ास प्रभाव देखने को नहीं मिलता, इस किस्म का उत्पादन एक हेक्टेयर में 17 क्विंटल तक हो सकता है। यह किस्म मूंग बीन येलो मोज़ेक वायरस के लिए मध्यम रूप से प्रतिरोधी है।
कृषक अपनी सूखी सोयाबीन की फसल देख हुए बेकाबू डीएम का कार्यालय घेरा

कृषक अपनी सूखी सोयाबीन की फसल देख हुए बेकाबू डीएम का कार्यालय घेरा

डीएम शिवराज सिंह वर्मा का कहना है कि खरगोन जिला ही नहीं संपूर्ण राज्य में अगस्त माह के अंतर्गत बारिश बिल्कुल नहीं हुई। काफी कम बारिश हुई है फसलें बर्बाद होने की जानकारी किसानों के जरिए से मिली है। हमने भी कृषि विभाग और राजस्व विभाग की टीम को सतर्क किया है और उनसे कहा है कि वस्तु स्थिति पर निगरानी रखें और खेतों पर जाकर देखें फसलों की क्या हालत है। मध्य प्रदेश के खरगोन में सोयाबीन की फसल सूखने से हताश किसानों ने डीएम कार्यालय का घेराव किया। सोयाबीन की सूखी फसल लेकर किसान डीएम के कार्यालय पहुंच गए। परंतु, वहां डीएम के दफ्तर का गेट बंद देख किसानों का गुस्सा और अधिक बढ़ गया। किसानों ने डीएम कार्यालय का गेट खोला और भीतर घुस गए। डीएम कार्यालय का घेराव कर वहीं धरना डाल दिया, जिसके उपरांत झिरन्या के किसानों ने सोयाबीन की सूखी फसल पशुओं को खिला दी। खरगोन जनपदभर में सोयाबीन एवं कपास की फसल सूखने से नाराज बड़ी तादात में किसान सोयाबीन की सूखी फसल लेकर डीएम कार्यालय पहुंचे। डीएम परिसर का गेट बंद करने पर किसान भाइयों का गुस्सा फूट पड़ा। गुस्साए किसान नारेबाजी करते हुए दरवाजा खोलकर डीएम कार्यालय के समक्ष पहुंच गए। बिजली अधिकारी और डीएम के खिलाफ नारेबाजी की गयी। बड़ी संख्या में किसान धरने पर बैठे। संपूर्ण जिले की भीकनगांव, भगवानपुरा, बड़वाह, महेश्वर, झिरन्या तहसीलों से किसान पहुंचे। 

क्रोधित कृषकों ने प्रशासन एवं डीएम के खिलाफ की नारेबाजी

किसानों ने डीएम कार्यालय के सामने सरकार, पुलिस, प्रशासन एवं डीएम के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। किसानों ने डीएम कार्यालय के सामने कई घंटे तक धरना दिया। जिला प्रशासन से 2 दिन का आश्वासन मिलने के पश्चात किसानों ने शाम लगभग 5 बजे अपना धरना खत्म कर दिया। 

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बिजली कंपनी अपनी मनमानी कर रही है- किसान संघ

किसान संघ जिला अध्यक्ष सदाशिव पाटीदार का कहना है, कि विद्युत वितरण कंपनी द्वारा मनचाहे तरीके से 7 घंटे बिजली देने का शेड्यूल बनाया गया है। हम सूचना देने के लिए ज्ञापन के जरिए से यहां एकत्रित हुए थे। परंतु सवाल यह खड़ा है कि हमारे आने से पहले कलेक्टर कार्यालय का गेट बंद कर दिया गया। इससे कृषकों ने उग्र रूप धारण कर लिया एवं सभी किसान यहां पहुंच गए हैं। वर्तमान में डीएम साहब घर पर ही निवास कर रहे हैं और जानकारी मिली है कि वे निर्वाचन में काफी व्यस्त हैं। हमारा कहना है, कि जब वोट डालने वाले ही नहीं रहेंगे तो निर्वाचन किसके लिए होगा। विद्युत वितरण कंपनी द्वारा कहा गया है, कि ये शेड्यूल ऊपर से तैयार किया गया है।