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पत्ते

श्रावण मास में उगाएंगे ये फलफूल, तो अच्छी आमदनी होगी फलीभूत

श्रावण मास में उगाएंगे ये फलफूल, तो अच्छी आमदनी होगी फलीभूत

श्रावण मास में रहती है इन चीजों की मांग : उद्यान/किसान कमा सकते हैं तगड़ा मुनाफा

भगवान
शिव की सेवा में समर्पित श्रावण मास के दौरान खास किस्म के पुष्पों, पौधों, प्रसाद की मांग बढ़ जाती है। ऐसे में कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) के लिए पूर्व नियोजित तैयारी की मदद से, सावन की रिमझिम फुहार के बीच, किसान आमदनी की बौछार में तरबतर हो सकते हैं।

कांवड़ यात्रा के दौरान रहेगी इनकी मांग

भगवान शिव को अर्पित होने वाली फूल व पौधों की खेती के बारे में जानकारी, जिससे श्रावण मास (Shraavana) में कांवड़ यात्रा के माह में फलीभूत होती है तगड़ी कमाई। सावन के महीने में भगवान शिव को बिल्व (Indian bael) या बेल पत्र, भांग-धतूरा, आंकड़ा या मदार के पुष्प एवं पत्ते आदि चढ़ाना शुभ माना जाता है। इन फूल पौधों की खेती व दूध-दही के उत्पाद से किसानों के साथ-साथ पशु पालकों को भी श्रावण मास में आमदनी का प्रसाद मिल जाता है।

क्या उगाएं किसान

भगवान शिव को फल-फूल-सब्जी एवं अनाज चढ़ाने के अपने महत्व हैं। भगवान भोले को शमी एवं बिल्व के पत्र, बेला का फूल विशिष्ट रूप से अर्पित किया जाता है। भगवान शिव की आराधना में अलसी के फूलों का भी खास महत्व है। कनेर का फूल भगवान शिव के साथ अन्य देवी-देवताओं को भी अर्पित किया जा सकता है। भगवान शिव को प्रिय चमेली के फूलों की खेती करके भी किसान बेहतर कमाई का जरिया तलाश सकते हैं। बेला, कनेर, चमेली के पुष्प ऐसे फूल हैं जिनकी मांग साल भर धार्मिक अनुष्ठानों एवं पुष्प प्रेमियों के बीच बनी रहती है। भगवान शिव को हरसिंगार का पुष्प भी चढ़ाया जाता है। हरसिंगार को पारिजात या शिउली के पुष्प के नाम से भी पुकारा जाता हैा। नारंगी डंडी वाला सफेद रंग का यह पुष्प रात्रि में खिलता है। अपराजिता का फूल भी भोलेनाथ को चढ़ाया जाता है, अपराजिता के फूलों यानी तितली मटर (butterfly pea, blue pea, Aprajita, Cordofan pea, Blue Tea Flowers or Asian pigeonwings) की पहचान, उसके औषधीय गुणों के कारण दुनिया भर में है। यह तो हुई सुगंध एवं सुंदरता से लैस पुष्पों से जुड़े किसानों के लिए कमाई के अवसर की बात, अब बात करते हैं भगवान वैद्यनाथ को अर्पित की जाने वाली उन चीजों की, जो अपनी प्रकृति के कारण औषधीय गुणों से भी भरपूर हैं।


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अकौआ, आंकड़ा या मदार

अकौआ जिसे आंकड़ा या मदार भी कहा जाता है, इसके लाल एवं सफेद रंग के पुष्प भगवान शिव की उपासना में अर्पित किए जाते हैं। इसके पुष्प एवं पत्ते भी भगवान शिव को चढ़ाने का विधान है। मान्यताओं के अनुसार आंकड़े के पुष्प चढ़ाने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके फूलों का इलाज में भी उपयोग होता है। खांसी आदि में इसका लौंग आदि से वैद्य द्वारा तैयार मिश्रण खासा मददगार साबित होता है।

बिल्व पत्र एवं फल

भगवान शिव को बिल्व पत्र एवं बिल्व फल चढ़ाकर शिवभक्त पूजन करते हैं। किसान मित्र, नर्सरी में मिलने वाले बिल्व जिसे आम बोलचाल की भाषा में बेल भी कहते हैं, का पौधा खेत या बगीचे में लगाकर सावन के अलावा अन्य माह में भी अपनी आय सुनिश्चित कर सकते हैं। बिल्व पत्र की मांग जहां साल भर रहती है, वहीं इसके फल खाने के साथ ही शरबत के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। कृषि उत्पाद के तौर पर बेल की जैली, मुरब्बा की भी बाजार में खासी मांग है।

शिव प्रिय फल के रामबाण इलाज

औषधीय उपयोग में भी बेल के फल, छाल, जड़ों को उपयोग में लाया जाता है। कब्ज आदि के उपचार में शिव प्रिय बेल का फल रामबाण इलाज माना जाता है।


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इन चीजों की जरूरत

शिवभक्त भगवान शिव की आराधना के दौरान भांग, धतूरा, ऋतुफल भी चढ़ाए जाते हैं।

भांग-धतूरा

भांग की खेती जहां, सरकारी अनुमति से की जाती है, वहीं धतूरे की खेती करते समय किसान को कुछ सावधानियां बरतना अनिवार्य है। आम तौर पर दोनों ही चीजें मानवीय मस्तिष्क तंत्र को प्रभावित करती हैं। इसका प्रयोग एलोपेथिक दवाओं के साथ ही आयुर्वेद आदि में प्रचुरता से किया जाता है। इनकी शासकीय नियमानुसार खेती कर किसान न केवल श्रावण मास, बल्कि साल के अन्य दिनों में भी अपना लाभ पक्का कर सकते हैं। (लेख में वर्णित भांग, धतूरा आदि के बगैर चिकित्सक की सलाह के प्रयोग से बचें। इनका गलत मात्रा में प्रयोग प्राणघातक हो सकता है।)
सर्दियों में घर पर ही उगाएं बिना केमिकल का इस्तेमाल किए ऑर्गेनिक सब्जियां

सर्दियों में घर पर ही उगाएं बिना केमिकल का इस्तेमाल किए ऑर्गेनिक सब्जियां

सर्दियों का मौसम रंग-बिरंगी, हरी पत्तेदार, स्वादिष्ट और ताजा सब्जियों का मौसम होता है। इन दिनों की एक और खास बात यह है, कि इन दिनों में सब्जियां जल्दी खराब भी नहीं होती हैं। इन दिनों मेथी, पालक, धनिया, सरसों के साग से लेकर गाजर, मूली, बीन्स, मटर, शकरकंद, चेरी टमाटर, ब्रोकली और हरी प्याज खूब पसंद की जाती है। सब्जियां खरीदने के लिए जब भी हम बाजार जाते हैं, तो हमारे दिमाग में एक चीज जरूर आती है। वह यह कि हम कहीं इन सब्जियों का उत्पादन केमिकल आदि डालकर तो नहीं किया गया है। ऐसे में हम उन सब्जियों को पकाने में जरा परहेज करते हैं। आज हम आपको बताएंगे, कि अपने घर की छोटी सी बालकनी या फिर किचन गार्डन में आप कौन-कौन सी सब्जियां उगा सकते हैं और वह भी एक दम बिना किसी केमिकल का इस्तेमाल किए।

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चेरी टमाटर

टमाटर एक ऐसी सब्जी है, जो लगभग बाकी सभी सब्जियों में डाली जाती है, टमाटर डालते ही सब्जी का स्वाद बढ़ जाता है। टमाटर की सब्जी को लगभग हर मौसम में उगाया जा सकता है और इसका उत्पादन आसानी से हो जाता है। लेकिन सर्दियों में इसे उगाना और भी आसान है। बाजार में भी टमाटर की बहुत मांग है। इसे अपने घर की छत, गार्डन या बालकनी में उगा सकते हैं। आप चाहें तो इसका बना-बनाया प्लांट ऑर्डर कर सकते हैं या फिर बीज समेत अपने गार्डन में ताजा टमाटर उगाएं। सर्दियों में लाल टमाटर सूप और सैलेड के तौर पर खूब इस्तेमाल होता है। इसके अलावा अगर आप पारंपरिक टमाटर की खेती नहीं करना चाहते हैं, तो आप अपनी बालकनी गार्डन में चेरी टमाटर याने की छोटे-छोटे दिखने वाले टमाटर का उत्पादन भी कर सकते हैं। यह टमाटर सूप आदि के लिए भी अच्छा रहता है और अगर आप इसका इस्तेमाल सब्जी में करते हैं, तो यह सब्जी का स्वाद काफी बढ़ा देता है।

प्याज

भारतीय घरों में शायद ही कोई ऐसा दिन होगा जब प्याज का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। प्याज के बिना सब्जियों में स्वाद लाना जरा मुश्किल हो जाता है। इसकी खेती या गार्डनिंग करने के लिए सर्दियों का समय उचित रहता है। आप चाहें तो मिट्टी, कंपोस्ट, खाद, कोकोपीट डालकर गमले में प्याज का बल्ब लगा सकते हैं। यदि किचन में प्याज की जड़ पड़ी हैं, तो आप सीधा पानी का एक जार तैयार करके भी हरी प्याज का उत्पादन ले सकते हैं। ये किचन में इस्तेमाल होने वाली सबसे सामान्य सब्जी है, जो अब घर बैठे पर कम मेहनत में आपको ताजा मिल जाएगी। सर्दियों में इसकी ग्रोथ भी अच्छी होती है, इसलिए अपनी किचन गार्डन में ये सदाबहार सब्जी जरूर लगाएं।

गाजर-मूली

गाजर का हलवा खाना चाहते हो या फिर मूली के पराठे दोनों के लिए ही गाजर और मूली होना बेहद जरूरी है। आजकल बाजार में गाजर और मूली में सबसे ज्यादा केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है। अब इन्हें आप घर पर ही उगा सकते हैं, ठंड और शीतलहर के मध्य इन सब्जियों की तेजी से ग्रोथ होती है। इन्हें घर पर उगाने के लिए गमले की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। घर बेकार पड़ी बाल्टी या टब में भी इन जड़ वाली सब्जियों को उगा सकते हैं। एक बार बुवाई के बाद ही ये सब्जियां 40 से 60 दिन के अंदर अच्छा-खासा उत्पादन देने लगती हैं।

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हरी पत्तेदार सब्जियां

हरी सब्जियों को घर पर उगाना सबसे ज्यादा आसान होता है। इनमें आपको ज्यादा मेहनत करने की जरूरत भी नहीं पड़ती है और एक बार बीज डालने के बाद यह सब्जियां अपने आप ही उग जाती हैं। पालक, मेथी, धनिया, सरसों का साग जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां ही सर्दियों की शान हैं। जाने कितने व्यंजन इन सब्जियों से पूरी सर्दियों में बनते हैं। पते की बात तो ये है, कि सबसे ज्यादा आयरन और न्यूट्रिएंट्स इन्हीं पत्तेदार सब्जियों में होते हैं। इसलिए फटाफट इनके सीड्स ऑइनलाइन मार्केट या किसी नर्सरी से मंगवाकर गार्डनिंग चालू कर दीजिए। आप चाहें तो इन देसी पत्तेदार सब्जियों के अलावा विदेश की स्विस चार्ड, रोलाई, केल, एशियाई साग भी उगा सकते हैं।

बीन्स-मटर

हालांकि बींस और मटर की खेती करना जरा सा मुश्किल होता है। लेकिन फिर भी आप इसकी दो अलग-अलग वैरायटी बेलदार और झाड़ीदार में से किसी एक का चुनाव करके अपने घर में जगह के अनुसार उत्पादन शुरू कर सकते हैं। इन्हें कम दाम में घर पर ही उगा सकते हैं, इस काम के लिए दिसंबर से लेकर फरवरी सबसे अच्छा समय होता है।
नववर्ष के जनवरी माह में करें इन सब्जियों का उत्पादन मिलेगा बेहतरीन मुनाफा

नववर्ष के जनवरी माह में करें इन सब्जियों का उत्पादन मिलेगा बेहतरीन मुनाफा

नया साल आ गया है, नए साल के आरंभ में फसलों का चयन उस हिसाब से करना अच्छा होगा जिससे आपको आगामी कुछ माह के अंतराल में ही अच्छा खासा मुनाफा हो सके। नववर्ष के जनवरी माह में किसान उन फसलों को उगाएं, जिनसे किसानों को होली आने तक बेहतरीन लाभ अर्जित हो सके। नए साल के समय में खेतीबाड़ी या कृषि के क्षेत्र में इस वर्ष काफी कुछ अच्छा, नवीन एवं अलग होना है। किसानों की आशाएं नए साल सहित एक बार पुनः जाग्रत हो गई हैं। फसलों से अच्छी पैदावार लेने हेतु किसान निरंतर कोशिशों में जुटे हुए हैं। फिलहाल, बहुत सारे किसानों द्वारा खेतों में सरसों, गेंहू, तोरिया एवं सब्जी फसलों का उत्पादन करना शुरू किया है। अगर आपने अभी ऐसी सब्जियों की बुवाई नहीं की है, तो आप मौसम के अनुरूप कुछ विशेष सब्जियों का चयन करके 2 से 3 माह में बेहतरीन उत्पादन कर सकते हैं। हम आपको आगे यह बताने वाले हैं, कि जनवरी के मौसम में किन सब्जियों का उत्पादन करना चाहिए। किसानों को उन फसलों का उत्पादन करें जिनसे उनको बेहतरीन मुनाफा अर्जित हो सके।

टमाटर का उत्पादन करें

ये बात जग जाहिर है, कि टमाटर की सब्जी बारह महीने चलने वाली फसल है, जिसका उत्पादन प्रत्येक सीजन में किया जा सकता है। सर्दियों के मौसम में भी टमाटर की फसल का उत्पादन किया जा जा सकता है। परंतु फसल को अत्यधिक ठंड-शर्द हवाओं से संरक्षित करना होगा, आप चाहें तो खेत के एक भाग में टमाटर का पौधरोपण कर सकते हैं। बेहतरीन एवं सुरक्षित उत्पादन हेतु पॉलीहाउस अथवा ग्रीन हाउस के भीतर भी टमाटर की फसल उगा सकते हैं। एक बार बुवाई अथवा पौध की रोपाई के उपरांत 10 दिन के अंतराल में एक बार सिंचाई करनी बेहद जरूरी होगी। टमाटर की बेहतरीन किस्मों से कृषि की जा रही है तो निश्चित रूप से आपको होली तक टमाटर का अच्छा उत्पादन प्राप्त हो जाएगा।

मिर्च का उत्पादन करें

सर्दी हो अथवा गर्मी, प्रत्येक मौसम में मिर्च को अत्यधिक उपभोग में लिया जाता है। आपको यह बतादें, कि सर्दियों के मौसम में मिर्च का उपभोग काफी बढ़ जाता है। इस वजह से जनवरी माह में मिर्च का उत्पादन करना अच्छा होगा। अगर नवंबर माह के अंदर आपने मिर्च की नर्सरी को तैयार किया हो, तो इन पौधों को खेत के किनारे मेड़ों पर भी उगा सकते हैं।


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इस मिर्च का प्रयोग खाने से ज्यादा सुरक्षा उत्पादों में किया जाता है।
लेकिन याद रहे कि पौधों के मध्य में 18 से 24 इंच की दूरी अवश्य हो। सर्दियों में मिर्च की फसल में अधिक पानी देने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है। इस वजह से 10 से 15 दिन के अंतराल में हल्का सा जल जरूर दें, जिससे 60 से 90 दिनों के भीतर बेहतरीन उत्पादन हाँसिल हो सके।

प्याज का उत्पादन करें

सर्द जलवायु में प्याज से अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है, कि 17 जनवरी तक प्याज के पौधों का रोपण कर सकते हैं। अगर प्याज की बाजार में मांग के बारे में बात करें तो लाल प्याज सहित हरे प्याज की भी अच्छी खासी मांग रहती है। प्याज की खेती से बेहतरीन उत्पादन हेतु खेतों में पहले उर्वरक डाल क्यारियां तैयार करें।


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रबी सीजन में प्याज उत्पादन करने वाले किसानों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी
इसके उपरांत 10 से 20 सेमी की दूरी पर प्याज का पौधरोपण की कर दें। आपको बतादें कि प्याज की बुवाई या रोपाई हेतु सबसे अच्छा समय शाम का माना जाता है। प्याज में हल्की सिंचाई करने से फसल में नमी बनी रहती है।

कंद सब्जियों का उत्पादन करें

ठंड के मौसम को कंद सब्जियों का भी मौसम माना जाता हैं, आलू से लेकर अदरक, हल्दी, शकरकंद, गाजर, मूली आदि का उत्पादन किया जाता है। यह समस्त फसलें 60 से 90 दिन में पूरी तरह उपभोग हेतु तैयार हो जाती हैं। यह भूमि में उत्पादन करने वाली सब्जियां हैं, इस वजह से मृदा में सामान्य नमी का होना जरुरी है। जिन खेतों में जलभराव हो वहाँ कंद सब्जियां ना उगाएं, इसकी वजह से उत्पादन में सड़न-गलन उत्पन्न हो जाती है। इन बागवानी सब्जियों की अप्रैल माह तक बाजार में खरीद बनी रहती है।

हरी पत्तेदार सब्जियां उगाएँ

सर्दियों की प्रसिद्ध हरी सब्जियां पालक, मेथी, धनिया, बथुआ एवं सरसों का साग अत्यधिक मांग में रहता है। एक बार खेतों में इन सब्जियों का उत्पादन करके प्रथम कटाई के उपरांत हर 15 दिन के अंतराल में 3 से 4 बार कटाई ली जा सकती है। हरी पत्तेदार सब्जियों में आयरन की बहुत अच्छी मात्रा पायी जाती है। बहुत सारे लोग इन सब्जियों को सुखाकर वर्षभर उपयोग करते हैं, जिन्हें ड्राई वेजिटेबल्स भी कहा जाता है। अगर आप जनवरी माह में इन सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं, तो मार्च माह तक आपको खूब उत्पादन प्राप्त हो जाएगा।

मटर के उत्पादन से होंगे यह लाभ

मटर का उत्पादन सर्दियों के मौसम में किया जाता है, परंतु इससे किसान मात्र एक बार की खेती से वर्ष भर लाभ उठा सकते हैं। जनवरी में मटर की बुवाई कर एकसाथ उत्पादन लेकर इसकी प्रोसेसिंग करें एवं इसको फ्रोजन मटर का रूप दें। इस तरह आपकी उपज पूरे वर्ष बिकेगी एवं बर्बाद भी नहीं होगी। बतादें कि बहुत सारे डेयरी केंद्र, परचून की दुकान एवं विभिन्न उत्पाद श्रेणियों पर फ्रोजन मटर की माँग रहती है। चाहें तो ई-नाम के माध्यम से सीधे ऑनलाइन मंडी में मटर का उत्पादन को विक्रय किया जा सकता है।
किसान इन तीन पत्तों के कारोबार से अच्छी खासी आमदनी कर सकते हैं

किसान इन तीन पत्तों के कारोबार से अच्छी खासी आमदनी कर सकते हैं

वर्तमान की नई पीढ़ी को शायद साखू के पत्तों के विषय में जानकारी भी नहीं होगी। एक दौर था जब वैवाहिक कार्यक्रमों में इसके पत्ते का उपयोग प्लेट के तौर पर किया जाता था। भारत में विभिन्न तरह की खेती की जाती है। भिन्न-भिन्न सीजन और रीजन के अनुरूप यहां किसान अपनी फसल का चयन करते हैं। बहुत सारे लोग पारंपरिक खेती से इतर फूलों का उत्पादन करते हैं, तो कुछ किसान सब्जियों का उत्पादन करते हैं। साथ ही, कुछ लोग फलदार पेड़ लगाकर उससे आमदनी अर्जित करते हैं। हाल ही में जड़ी बूटियों की खेती से भी बेहतरीन मुनाफा अर्जित किया जा रहा है। परंतु, हम आज जिस खेती के विषय में चर्चा कर रहे हैं, वो पत्ते हैं। जी हां, पत्ते, जिन्हें अक्सर किसी काम का नहीं समझा जाता। परंतु, यह तीन पत्ते आपके भाग्य को चमका सकते हैं। पूरे साल इनकी इतनी मांग रहती है, कि यदि आपने इनकी खेती कर ली तो मालामाल हो जाएंगे।

पान के पत्तों से अच्छी आमदनी होगी

बनारस के पान के संबंध में तो आपने अवश्य सुना ही होगा। परंतु, यह बनारस का पान पनवाड़ी के पास किसी खेत से ही आता है। बतादें, कि पान की मांग अब उत्तर भारत से निकल कर संपूर्ण विश्व में हो रही है। इसके औषधीय लाभों ने लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया है। गुटका खाने वाले लोग भी अब इसके स्थान पर पान को विकल्प बना रहे हैं। भारत सहित दुनियाभर में पान विभिन्न तरह के निर्मित किए जाते हैं, उसी प्रकार से पान के पत्ते के भी विभिन्न प्रकार के होते हैं। यदि आप भी पान से धन अर्जित करना चाहते हैं, तो आज ही इसकी खेती का प्रशिक्षण लीजिए और इन्हें अपने खेतों में उत्पादित करना आरंभ कर दीजिए। ये भी पढ़े: बनारस के अब तक 22 उत्पादों को मिल चुका है जीआई टैग, अब बनारसी पान भी इसमें शामिल हो गया है

साखू के पत्तों से कमाऐं

आजकल की नई पीढ़ी को साखू के पत्तों के विषय में शायद ही पता होगा। एक वक्त था जब वैवाहिक कार्यक्रम में इसके पत्ते का उपयोग प्लेट के तौर पर किया जाता था। उत्तर भारत एवं पहाड़ी क्षेत्रों में यह बेहद लोकप्रिय है। जब से लोगों के अंदर जागरुकता और समझदारी आई है। डिस्पोजल को छोड़ कर पुनः नेचर की ओर लौट रहे हैं। इस वजह से साखू के पत्तों की मांग विगत कुछ वर्षों में बढ़ी है। सबसे खास बात यह है, कि एक ओर जहां आप साखू के पत्तों से आमदनी करते हैं। साथ ही, दूसरी ओर आप इसकी लकड़ी को बेचकर भी लाखों रुपये की आमदनी की जा सकती है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि साखू की लकड़ी की मांग भारत सहित विदेशों में भी सदैव बनी रहती है।

केले के पत्ते से कमाऐं

केले के पत्तों का उपयोग खाना खाने के लिए किया जाता है। दक्षिण भारत में इसकी मांग बेहद अधिक होती है। परंतु, फिलहाल भारत के अन्य इलाकों में भी केले के पत्तों की मांग में इजाफा हुआ है। दरअसल, साउथ इंडियन रेस्टोरेंट भारत के प्रत्येक इलाके में तीव्रता से खोले जा रहे हैं। अधिकांश साउथ इंडियन रेस्टोरेंट फिलहाल अपने ग्राहकों को ऑथेंटिक भोजन खिलाना चाहते हैं। इसके लिए वह उस भोजन को परोसने के लिए केले के पत्ते का उपयोग कर रहे हैं। यही वजह है, कि दक्षिण भारत के साथ-साथ उत्तर भारत और देश के बाकी इलाकों में भी केले के पत्तों की मांग बढ़ी है। केले की खेती में सर्वोत्तम बात यह है, कि अब इसका हर हिस्सा बिक जाता है। केला, केले का पत्ता यही नहीं वर्तमान में कुछ लोग इसके तने तक भी खरीद रहे हैं। दरअसल, केले के तने से एक फाइबर उत्पन्न हुई है, जो काफी ज्यादा मजबूत होता है। यही कारण है, कि कुछ लोग केले के तने को भी खरीद रहे हैं।
किसान इस खांसी, सर्दी और जुकाम जैसे रोगों से निजात दिलाने वाले औषधीय पौधे से अच्छी आय कर सकते हैं

किसान इस खांसी, सर्दी और जुकाम जैसे रोगों से निजात दिलाने वाले औषधीय पौधे से अच्छी आय कर सकते हैं

बनफशा बहुत सारी खतरनाक बीमारियों को जड़ से समाप्त करने की क्षमता रखता है। आइए इस पौधे के विषय में विस्तार पूर्वक जानते हैं। क्या आपने कभी बनफशा के विषय में सुना है ? बहुत सारे लोग यह नाम शायद पहली बार सुन रहे होंगे। दरअसल, यह एक औषधीय पौधा होता है। जो मेडिकल लाइन में काफी प्रसिद्ध है। इसका इस्तेमाल उन औषधियों को तैयार करने में किया जाता है। जो कि जुकाम, सर्दी और खांसी आदि में काम आते हैं। बनफशा बेहद सुगंधित पौधा होता है, जो फूलों के जरिए से पहचाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Viola odorata है। यह पौधा सामान्य तौर पर भारत, दक्षिण एशिया, यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका में पाया जाता है। इसके पत्ते छोटे एवं हरे रंग के होते हैं, जबकि इसके फूल लवंगी अथवा नीले रंग के होते हैं।

बनफशा का इस्तेमाल सर्वाधिक यहां होता है

बनफशा के पत्तों, फूलों और गुच्छों का इस्तेमाल आयुर्वेदिक चिकित्सा में किया जाता है। इसको प्रमुख तौर पर मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करने के लिए जाना जाता है। यह सांस की समस्याओं को कम करने और श्वसन तंत्र को सुधारने में काफी ज्यादा सहयोग कर सकता है। यह अपच और आंत्र-संबंधित समस्याओं में उपयोगी भूमिका अदा कर सकता है। ये भी पढ़े: इन फूलों का होता है औषधियां बनाने में इस्तेमाल, किसान ऐसे कर सकते हैं मोटी कमाई

जुकाम और साइनस संक्रमण

बनफशा के पानी को जुकाम और साइनस संक्रमण को खत्म करने के लिए उपयोग किया जाता है। इसके द्वारा नाक से संक्रमण और जुकाम के लक्षणों को कम किया जा सकता है।

शांतिदायक गुण

बनफशा की शांतिदायक गुणों की वजह से भी प्रशंसा की जाती है। इसका इस्तेमाल तनाव, चिंता, अस्थायी नींद जैसी समस्याओं एवं मानसिक तनाव को कम करने में किया जाता है। ये भी पढ़े: इस औषधीय गुणों वाले बोगनविलिया फूल की खेती से होगी अच्छी-खासी कमाई

त्वचा समस्याओं का समाधान

बनफशा का तेल त्वचा की देखभाल के लिए उपयोग किया जाता है। यह त्वचा को मुलायम एवं चमकदार बनाने में काफी सहायता कर सकता है। साथ ही, त्वचा संबंधी समस्याओं, जैसे कि खुजली, छाले, दाग-धब्बे आदि को कम करने में भी सहयोग कर सकता है। हालांकि, बीमारियों को दूर भगाने के लिए कितनी मात्रा में बनफशा का इस्तेमाल किया जाता है। इस सन्दर्भ में सिर्फ डॉक्टर ही बता सकते हैं। डॉक्टर संदीप का कहना है, कि बनफशा को दवा बनाने वाली कई कंपनियां इस्तेमाल करती हैं। वनफशा को काफी महंगी कीमत पर खरीदा जाता है। वैसे तो बनफशा प्रमुख तौर पर दक्षिण एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में पाया जाता है। परंतु, भारत में भी इसकी कुछ किस्में पाई जाती हैं। भारत में बनफशा प्राकृतिक तौर पर कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। कुल मिलाकर बनफशा के पौधे गर्म तापमान को सहन नहीं कर सकते। इनके लिए ठंडा तापमान सबसे सही होता है।
आम के पत्तों के सिरे के झुलसने (टिप बर्न) की समस्या को कैसे करें प्रबंधित?

आम के पत्तों के सिरे के झुलसने (टिप बर्न) की समस्या को कैसे करें प्रबंधित?

आम में नमक के दुष्प्रभाव जिसे "सैप बर्न" के रूप में भी जाना जाता है, तब होती है जब नमक आधारित उर्वरक या मिट्टी के अंदर का नमक आम के पेड़ की जड़ों के संपर्क में आते हैं। लक्षणों में पत्ती का जलना, पत्ती के किनारों का भूरा होना और समग्र रूप से पत्तियों का रंग खराब होना शामिल हैं। प्रभावित पत्तियां परिगलन प्रदर्शित कर सकती हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है और विकास रुक जाता है। नमक के दुष्प्रभाव से पानी ग्रहण करने और पोषक तत्वों के अवशोषण में बाधा आती है, जिससे आम के पेड़ पर दबाव पड़ता है। प्रारंभ में, प्रभावित पत्तियाँ मुरझाई हुई या झुलसी हुई दिखाई देती हैं, जो सूखे के तनाव के लक्षणों से मिलती जुलती हैं। जैसे-जैसे स्थिति बढ़ती है, पत्तियाँ समय से पहले गिर जाती हैं, जिससे पेड़ की प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से ऊर्जा पैदा करने की क्षमता प्रभावित होती है। मिट्टी में नमक का संचय पौधों की कोशिकाओं के भीतर आसमाटिक संतुलन में हस्तक्षेप करता है, जिससे क्षति और बढ़ जाती है। आम के पत्तों में टिपबर्न अक्सर तीन स्थितियों में से एक के कारण होती है, हालांकि हमेशा नहीं जैसे पहला कारण पौधे को पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है दूसरा कारण मिट्टी में नमक जमा हो गया है तीसरा मैग्नीशियम की कमी इस समस्या का एक और संभावित कारण हो सकता है। सभी एक ही समय में हो सकते हैं। यदि आप अपने पौधे को नियमित रूप से पानी देते हैं, तो आपको नमी की कमी के कारण आम के पत्तों की टिपबर्न दिखाई नहीं देगा। आमतौर पर, छिटपुट सिंचाई या मिट्टी की नमी में अत्यधिक उतार-चढ़ाव एक प्रमुख कारण हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप टिपबर्न होता है।

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आम के फूल व फलन को मार्च में गिरने से ऐसे रोकें: आम के पेड़ के रोगों के उपचार

स्वस्थ और उत्पादक बागों को सुनिश्चित करने के लिए आम की खेती में नमक के दुष्प्रभाव का प्रबंधन करना महत्वपूर्ण है। नमक का दुष्प्रभाव, जो अक्सर मिट्टी की अत्यधिक लवणता या नमक युक्त सिंचाई के पानी के कारण होती है, आम के पेड़ों पर हानिकारक प्रभाव डालती है, जिससे पैदावार कम हो जाती है और फलों की गुणवत्ता खराब हो जाती है।

आम में नमक की क्षति

नमक की क्षति तब होती है जब मिट्टी या सिंचाई के पानी में घुलनशील लवण, मुख्य रूप से सोडियम और क्लोराइड आयनों की सांद्रता आम के पेड़ों की सहनशीलता सीमा से अधिक हो जाती है। उच्च नमक का स्तर पानी और आवश्यक पोषक तत्वों के अवशोषण को बाधित करता है, जिससे पेड़ों में विभिन्न शारीरिक और संरचनात्मक समस्याएं पैदा हो जाती हैं।

आम में नमक के दुष्प्रभाव को कैसे करें प्रबंधित?

नमक के दुष्प्रभाव को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए, इसका सटीक निदान करना आवश्यक है। आम के पेड़ों में नमक के दुष्प्रभाव के लक्षणों में पत्ती का जलना, पत्ती का झुलसना, कम वृद्धि और खराब फल विकास शामिल हैं। मिट्टी और पानी के परीक्षण से बगीचे में नमक संचय की सीमा निर्धारित करने में मदद मिलती है।

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मृदा प्रबंधन में अत्यधिक नमक की मात्रा को कैसे करें प्रबंधित?

मिट्टी की लवणता को प्रबंधित करने के लिए नियमित और पर्याप्त लीचिंग एक प्राथमिक तरीका है। लीचिंग में जड़ क्षेत्र के नीचे जमा नमक को बाहर निकालने के लिए अतिरिक्त पानी का उपयोग शामिल है। इस प्रक्रिया को कम नमक वाले सिंचाई पानी का उपयोग करके, अधिक मात्रा में पानी लगाकर या जल निकासी प्रणाली स्थापित करके प्राप्त किया जाता है।

नमक-सहिष्णु रूटस्टॉक्स का चयन करना

नमक-सहिष्णु रूटस्टॉक्स चुनना आवश्यक है, क्योंकि वे मिट्टी में उच्च नमक के स्तर का सामना कर सकते हैं।

मिट्टी की संरचना में सुधार

कार्बनिक पदार्थों को जोड़कर मिट्टी की संरचना को बढ़ाने से पोषक तत्वों को धारण करने और जारी करने की क्षमता बढ़ जाती है, जिससे नमक की क्षति के नकारात्मक प्रभाव कम हो सकते हैं।

सिंचाई प्रबंधन

नमक के स्तर की निगरानी के लिए सिंचाई जल की गुणवत्ता का नियमित परीक्षण करें। कम नमक सामग्री वाले उच्च गुणवत्ता वाले जल स्रोत बेहतर हैं। सिंचाई को नियमित करके नमी में उतार-चढ़ाव के कारण होने वाली टिपबर्न को कम किया जा सकता है। अपने पौधे को पानी देने का समय निर्धारित करें और नियमित रूप से सिंचाई करते रहें।

ड्रिप सिंचाई

ड्रिप सिंचाई नमक युक्त पानी और पेड़ की जड़ों के बीच सीधे संपर्क को कम करती है, जिससे नमक का तनाव कम हो जाता है। यह जल उपयोग दक्षता को भी बढ़ावा देता है।

वैकल्पिक जल स्रोत

कम नमक सामग्री वाले वैकल्पिक जल स्रोतों का उपयोग करने पर विचार करें, जैसे अतिरिक्त नमक को हटाने के लिए संग्रहित वर्षा जल या जल उपचार प्रणाली।

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उर्वरकों का प्रयोग

उचित रूप से संतुलित उर्वरक का प्रयोग नमक के दुष्प्रभाव के प्रभाव को कम कर सकता है। पोषक तत्वों की कमी नमक के तनाव को बढ़ा सकती है, इसलिए इष्टतम पोषक तत्वों के स्तर को बनाए रखना आवश्यक है।

सूक्ष्म पोषक तत्व प्रबंधन

सूक्ष्म पोषक तत्वों की सावधानीपूर्वक निगरानी और प्रबंधन करें, क्योंकि नमक की क्षति उनके अवशोषण को प्रभावित कर सकती है। सूक्ष्म पोषक तत्वों का पर्णीय प्रयोग आवश्यक हो सकता है। इस प्रकार का लक्षण मैग्नीशियम की कमी के कारण भी हो सकता है।इस कमी को दूर करने के लिए कम्पोस्ट पेड़ की उम्र के अनुसार प्रयोग करना चाहिए ।

कल्चरल (कृषि)विधियां

यदि पौधे के आस पास जल निकासी खराब है, तो मिट्टी में नमक जमा हो सकता है, जिससे आम के पत्ते जल सकते हैं। यदि मिट्टी में नमक जमा हो गया है, तो नमक को जड़ क्षेत्र से बाहर निकालने के लिए भारी पानी देने का प्रयास करें। यदि मिट्टी में जल निकासी की समस्या है, तो जल निकासी चैनल बनाएं। बरसात के मौसम में हरी खाद की फसल के रूप में सनई, ढैचा, मूंग, लोबिया इत्यादि में से कोई एक को अंतर फसल के रूप में उगाएं और 50% फूल आने पर वापस जुताई करें। यह अभ्यास कम से कम 4 से 5 साल तक करना चाहिए। आम के पेड़ों के आधार के चारों ओर जैविक गीली घास लगाने से मिट्टी की नमी को संरक्षित करने में मदद मिलती है और मिट्टी की सतह पर नमक का संचय कम हो जाता है। कटाई छंटाई करके एक अच्छी तरह हवादार छतरी को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे अच्छा वायु परिसंचरण सुनिश्चित हो और आर्द्रता कम हो, जो नमक की क्षति को कम कर सकती है। खराब मिट्टी की उर्वरता को ठीक करने के लिए के ह्यूमीक एसिड, बीसीए, जिप्सम और विघटित जैविक उर्वरकों के साथ पर्याप्त जैविक खाद डालें। जिप्सम मिट्टी की संरचना में सुधार करने में मदद करता है। मिट्टी अकार्बनिक कणों, कार्बनिक कणों और छिद्रों, पानी और मिट्टी के रोगाणुओं का एक जटिल मिश्रण है।

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इसकी संरचना मौसम की घटनाओं जैसे बारिश , जुताई से, या पौधों के विकास के लिए पोषक तत्वों को खींचने के कारण बदलती है। साल दर साल अच्छी फसल पैदावार बनाए रखने के लिए किसानों को अपनी मिट्टी का अच्छी तरह से प्रबंधन करना पड़ता है। मिट्टी की संरचना में सुधार से किसानों को कुछ सामान्य कृषि समस्याओं में मदद मिलती है। जिप्सम को मिट्टी में मिलाने से वर्षा के बाद पानी सोखने की मिट्टी की क्षमता में वृद्धि होती है। जिप्सम का प्रयोग मृदा प्रोफाइल के माध्यम से मिट्टी के वातन और पानी के रिसाव में भी सुधार करता है। जिप्सम के इस्तेमाल से पानी की आवाजाही में सुधार होता है।बारीक पिसा हुआ जिप्सम सिंचाई के पानी में घोलकर प्रयोग किया जा सकता है। जिप्सम का प्रयोग रोपण से पहले या पेड़ के विकास की अवस्था में मिट्टी में किया जा सकता हैं।

निगरानी और रखरखाव

नियमित निरीक्षण: नमक की क्षति के संकेतों के लिए समय-समय पर बगीचे का आकलन करें। शीघ्र पता लगने से समय पर सुधारात्मक कार्रवाई की जा सकती है। रिकॉर्ड रखना: समय के साथ परिवर्तनों और सुधारों को ट्रैक करने के लिए मिट्टी परीक्षण, सिंचाई कार्यक्रम और बाग प्रबंधन प्रथाओं का रिकॉर्ड बनाए रखना।

नमक प्रतिरोधी आम की किस्में

नमक प्रतिरोधी आम की किस्मों की खोज नमक की क्षति का दीर्घकालिक समाधान हो सकती है। आम की कुछ नई किस्मों को खारेपन की स्थिति के प्रति अधिक सहनशील बनाने के लिए पाला गया है, और इन्हें अपने बगीचे में एकीकृत करने से नमक की क्षति के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

एकीकृत कीट और रोग प्रबंधन

नमक से प्रभावित आम के पेड़ कीटों और बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। पेड़ों के स्वास्थ्य को बनाए रखने और अतिरिक्त तनाव को कम करने के लिए एकीकृत कीट और रोग प्रबंधन विधियों का प्रयोग करें।

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निष्कर्ष

आम के बागों में नमक क्षति प्रबंधन एक बहुआयामी दृष्टिकोण है जिसमें मिट्टी और जल प्रबंधन, रूटस्टॉक्स और किस्मों का सावधानीपूर्वक चयन और कल्चरल विधियां शामिल हैं। इन दिशानिर्देशों का पालन करके, आम उत्पादक स्वस्थ बगीचे बनाए रख सकते हैं, फलों की गुणवत्ता और उपज बढ़ा सकते हैं, और नमक तनाव के हानिकारक प्रभावों को कम कर सकते हैं। आम की खेती में नमक की क्षति के प्रबंधन में दीर्घकालिक सफलता के लिए प्रबंधन प्रथाओं में नियमित निगरानी और समायोजन महत्वपूर्ण हैं।

Dr AK Singh

डॉ एसके सिंह
प्रोफेसर (प्लांट पैथोलॉजी) एवं विभागाध्यक्ष,

पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी, 

प्रधान अन्वेषक, 
अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना,डॉ राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा-848 125, 
समस्तीपुर,बिहार 
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