fbpx

कद्दू की खेती के उन्नत तरीके

0 229

कद्दू की खेती लगभग पूरे भारत में होती है।कद्दू एक ऐसी सब्जी है जिसे क्षेत्र और राज्य के अनुसार इसके नाम होते हैं। अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करते हैं तो कद्दू को काशीफल, सीताफल, कोला या कोयला कई जगह इसे पैठे की सब्जी भी बोला जाता है | इसे इंग्लिश में पम्पकिन बोला जाता है | कद्दू की सब्जी को लोग बड़े चाव से खाते हैं तथा इसकी सब्जी को जब भी कोई धार्मिक भंडारा होता है तो इसकी सब्जी जरूर बनाई जाती है. दक्षिण भारत में इसको सांभर में प्रयोग किया जाता है.

आज जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है तो लोगों की आवश्यकता भी उसी अनुरूप बढ़ रही है। सब्जी की खेती किसान को भी अच्छी आमदनी दिलाती है, इससे किसान को रोजाना की आमदनी होती है।कहना गलत नहीं होगा कि अगर किसान को अपनी आय बढ़ानी है तो उसे सब्जी की खेती करनी होगी।

कम लागत, अच्छी आमदनी :

सरकार किसानों कि आय दोगुनी करने पर कार्य कर रही है, इसके लिए वो किसानों को नए-नए तरीके से फसल करना, खेती सम्बंधित व्यवसाय करना आदि कि ट्रेनिंग दे रही है | कद्दू कि खेती भी किसानों के लिए एक वरदान का काम कर सकती है | इसकी उपज में लागत कम आती है तथा इसका उत्पादन अच्छा होता है | इसके फल का वजन भी ज्यादा होता है | पके कददू गहरे पीले रंग के होते हैं तथा इसमें कैरोटीन की मात्रा भी बहुतायत में पाई जाती है। इसके बीज का सेवन पुरुषों के लिए बहुत लाभप्रद बताये जाते हैं.

कद्दू की खेती

खेत की तैयारी:

सामान्यतः अन्य फसलों की तरह इसकी खेती के लिए भी खेत में पोषक तत्वों की मात्रा भरपूर होनी चाहिए. इसका सबसे सटीक उपाय है की आप खेत में पहली जुताई से पहले गोबर की बनी ( सड़ी) हुई खाद डाल कर उसपर 2 से 3 बार कल्टीवेटर से जुताई लगा दें और ऊपर से पाटा लगा दें जिससे की खेत समतल हो जाये. अगर हो सके तो अपने खेत को कम से कम 3 साल में एक बार हरी खाद जरूर दें.  इससे जमीन को ताकत मिलती है तथा आपकी फसल भी कम से कम रासायनि खादों पर निर्भर रहती है.

ये भी पढ़ें : रासायनिक से जैविक खेती की तरफ वापसी

 

भूमि का चुनाव:

इसकी फसल के लिए भूमि का चुनाव करते समय ध्यान रहे की उस खेत में पानी निकासी की व्यवस्था होनी चाहिए | यानि की इसकी जमीन में पानी नहीं रुकना चाहिए इससे इसके पौधे और फल दोनों ही गलने लग जाते हैं. इसके लिए रेतीली, भुरभुरी और दोमट मिटटी उपयुक्त रहती है.

जलवायु:

जलवायु की बात करें तो इसके लिए गर्म और बारिश वाला समय उपयुक्त रहता है. इसके बीज को उगाने के लिए दोनों मौसम सहायक होते हैं लेकिन सर्दी के मौसम में इसके बीज को उगाना मुश्किल है | लेकिन आज तो लोग कृत्रिम मौसम देकर इसके बीज को समय से पहले ही उगा लेते हैं | कददू की खेती के लिए सर्दी और कम सर्दी वाली जलवायु भी उपयुक्त होती है इसके लिए 18 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट का सामान्य मौसम होना चाहिए.

कद्दू कितने तरह के होते हैं:

कद्दू की प्रजाति या प्रकार की हम बात करें तो, हमारे कृषि वैज्ञानिक इसकी नई नई किस्में विकसित कर रहें हैं. जो कि निम्न प्रकार हैं:

1- पूसा विशवास:

कद्दू की इस किस्म को उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में उगाया जाता है क्योकि इस किस्म को थोड़ा ठंडा और गर्म दोनों मौसम के अनुसार पूसा संस्थान ने विकसित किया है. इसके एक फल का वजन 5 से 7  किलो के आसपास जाता है. जबकि इसका कुल उत्पादन 400 से 450 किवंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास होता है. इसके फलों का रंग दूसरी किस्मों की अपेक्षा ज्यादा हरा दिखाई देता है. जिन पर सफ़ेद रंग के धब्बे बने होते हैं. इस किस्म के पौधों पर फल बीज रोपाई के 110 से 120 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं.

2- पूसा विकास:

कद्दू की इस किस्म के पौधे बारिश के मौसम में उगाये जाते हैं. इस किस्म के बेल की लम्बाई दो से तीन मीटर के बीच पाई जाती है. इसके फल कच्चे रूप में सब्जी में ज्यादा उपयोग में लिए जाते हैं. इसका फल छोटे आकार का होता है तथा इसके अंदर गूदा भी अच्छा होता है. जिनका वजन दो से तीन किलो के आसपास पाया जाता है. एक हेक्टेयर के इसका उत्पादन 300 – 350 किवंटल के आस पास जाता है.

3 – कल्यानपुर पम्पकिन-1,

4 – नरेन्द्र अमृत,

5 – अर्का सुर्यामुखी,

6 – अर्का चन्दन,

7 – अम्बली,

8 – सी एस 14,

9 – सी ओ1 एवम 2,

इनके साथ-साथ कुछ विदेशी प्रजातियां भी अपने यहाँ उगाई जाती है जो निम्न प्रकार हैं:

विदेशी किस्में:

भारत में पैटीपान , बतर न्ट, ग्रीन हब्बर्ड , गोल्डन हब्बर्ड , गोल्डन कस्टर्ड, और यलो स्टेट नेक नामक किस्में भी बहुत छोटे स्तर पर उगाई जाती है |

बोने का तरीका:

इसके बीज को मेंड़ बना कर लगाना उचित रहता है. इसकी मेंड़ से मेंड़ कि दूरी कम से कम 4 फ़ीट की होनी चाहिए. जिससे की इसकी बेल को फैलने के लिए पूरी जगह मिल सके. उचित होगा अगर आप इसकी बेल को ऊपर चढ़ा दें जिससे की मिटटी की वजह से इसके फल को नुकसान नहीं होता है.

किसान के घर में औरतें भी इसकी खेती करती हैं. जब बारिश शुरू हो जाती हैं तो वो इसके बीजों को बुर्जी और बिटोरों के पास लगा देती हैं धीरे धीरे ये बेल बुर्जी और बिटोरे पर चढ़ जाती हैं और ऊपर फल लगने लगते हैं जो कि पूरी तरह से ऑर्गनिक फल होते हैं.

ये भी पढ़ें : तोरई की खेती में भरपूर पैसा

 

फसल कि देखरेख:

इसकी फसल कि देखरेख में सबसे ज्यादा जो ध्यान रखने वाली चीज है वो ये है कि अगर आपने इसकी फसल को गर्मी में लगाया है तो इसको हर 8 से 10 दिन में पानी कि आवश्यकता होती है तथा बारिश के मौसम की फसल को खरपतवार से बचाना होता है. इसकी समय समय पर निराई गुड़ाई करते रहें. अगर इसकी फसल में खरपतवार हो गया तो इसको कीट रोग बहुत जल्दी लगेंगे. अगर संभव हो तो शाम के समय में गूगल, धूप डाल के खेत में जगह जगह धुँआ कर दें इससे कीट पतंगें इससे दूर रहेंगें.

कद्दू की फसल में लगने वाले रोग:

कीट एवं रोग नियंत्रण के जैविक तरीके:

  • लालड़ी

पौधों पर दो पत्तियां निकलने पर इस कीट का प्रकोप शुरू हो जाता है यह कीट पत्तियों और फूलों को खाता है इस कीट की सुंडी भूमि के अन्दर पौधों की जड़ों को काटती है जिससे हमारी फसल का पौधा सूख जाता है जिसका नुक्सान हमे उठाना पड़ता है जिससे हमारी पैदावार पर काफी प्रभाव पड़ता है |

रोकथाम

इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए |

  • फल की मक्खी

यह मक्खी फलों में प्रवेश कर जाती है और वहीँ पर अंडे देती है अण्डों से सुंडी बाहर निकलती है वह फल को बेकार कर देती है यह मक्खी विशेष रूप से खरीफ वाली फसल को अधिक हानी पहुंचाती है जिससे हमारी फसल ख़राब हो जाती है | इसकी मक्खी फल के रस को चूस लेती है. इसको रस चूसक भी बोला जाता है.

रोकथाम

इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए |

  • सफ़ेद ग्रब

यह कीट कद्दू वर्गीय पौधों को काफी क्षति पहुंचाती है यह भूमि के अन्दर रहती है और पौधों की जड़ों को खा जाती है जिसके कारण पौधे सुख जाते है |

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिए खेत में नीम का खाद प्रयोग करें |

  • चूर्णी फफूदी

यह रोग ऐरीसाइफी सिकोरेसिएरम नमक फफूंदी के कारण होता है पत्तियों एवं तनों पर सफ़ेद दरदरा और गोलाकार जल सा दिखाई देता है जो बाद में आकार में बढ़ जाता है और कत्थई रंग का हो जाता है पूरी पत्तियां पिली पड़कर सुख जाती है पौधों की बढ़वार रुक जाती है |

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिए देसी गाय का मूत्र 5 लीटर लेकर 15 ग्राम के आकार के बराबर हींग लेकर पिस कर अच्छी तरह मिलाकर घोल बनाना चाहिए प्रति 2 ली. पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे ।

  • मृदु रोमिल फफूंदी

यह स्यूडोपरोनोस्पोरा क्यूबेन्सिस नामक फफूंदी के कारण होता है रोगी पत्तियों की निचली सतह पर कोणाकार धब्बे बन जाते है जो ऊपर से पीले या लाल भूरे रंग के होते है |

रोकथाम

इम से कम 40-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें मिश्रण तैयार कर 3 ली. को प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिडकाव करना चाहिए |

  • मोजैक

यह विषाणु के द्वारा होता है पत्तियों की बढ़वार रुक जाती है और वे मुड़ जाती है फल छोटे बनते है और उपज कम मिलती है यह रोग चैंपा द्वारा फैलता है |

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गोमूत्र तम्बाकू मिलाकर पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे ।

  • एन्थ्रेक्नोज

यह रोग कोलेटोट्राईकम स्पीसीज के कारण होता है इस रोग के कारण पत्तियों और फलो पर लाल काले धब्बे बन जाते है ये धब्बे बाद में आपस में मिल जाते है यह रोग बीज द्वारा फैलता है |

रोकथाम

बीज क़ बोने से पूर्व गौमूत्र या कैरोसिन या नीम का तेल के साथ उपचारित करना चाहिए |

Leave A Reply

Your email address will not be published.


The maximum upload file size: 5 MB.
You can upload: image, audio, document, interactive.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More