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चने की खेती से किसानों को होगा अच्छा मुनाफा, जानें चने की प्रमुख उन्नत किस्में

Published on: 26-Oct-2026
Updated on: 27-Oct-2026

रबी सीजन की प्रमुख फसल है चना, बाजार में रहती है अच्छी मांग

रबी सीजन की प्रमुख फसलों में चने का अपना एक विशेष स्थान है। चने की खेती (Gram Cultivation) मुख्य रूप से मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक सहित देश के कई राज्यों में की जाती है। भारत में मध्यप्रदेश चने का सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य है। चने के दानों से दाल बनाई जाती है, जिसे देशभर में बड़े पैमाने पर खाया जाता है। इसके अलावा चने को पीसकर बेसन तैयार किया जाता है, जिसका इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के व्यंजन और मिठाइयां बनाने में किया जाता है। चने की हरी फसल की सब्जी भी काफी पसंद की जाती है। इसके भूसे का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है। यही वजह है कि चने की खेती किसानों के लिए आय का एक अच्छा स्रोत मानी जाती है।

चने की खेती से बढ़ती है मिट्टी की उर्वरा शक्ति

चने की खेती (chana ki kheti) केवल किसानों की आमदनी बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चना एक दलहनी फसल है, जिसकी जड़ों में राइजोबियम जीवाणुओं की सहायता से वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है। इससे मिट्टी में नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ती है और भूमि की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है। फसल चक्र में चने जैसी दलहनी फसलों को शामिल करने से मिट्टी की सेहत बेहतर हो सकती है। चने में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, आयरन और नियासीन जैसे पोषक तत्व भी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। इसकी बाजार मांग पूरे साल बनी रहती है। ऐसे में किसान चने की उन्नत किस्मों का चयन करके बेहतर उत्पादन और मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं।

पूसा पार्वती (बीजी 3062) चने की उन्नत किस्म

चने की पूसा पार्वती (BG 3062) एक उन्नत किस्म है, जिसे वर्ष 2020 में विकसित किया गया था। यह किस्म किसानों के बीच अच्छी पैदावार क्षमता के लिए जानी जाती है। पूसा पार्वती चने की फसल लगभग 113 दिनों में पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी खेती से अनुकूल परिस्थितियों में करीब 22.94 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। यह किस्म मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में खेती के लिए उपयुक्त बताई गई है। किसान अपने क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी और उपलब्ध सिंचाई सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए इस किस्म का चयन कर सकते हैं। बेहतर उत्पादन के लिए समय पर बुवाई और संतुलित पोषण प्रबंधन जरूरी है।

फुले विक्रम (फुले जी 08108) से प्राप्त करें बेहतर उत्पादन

फुले विक्रम (Phule G 08108) चने की एक अन्य उन्नत किस्म है, जिसे वर्ष 2020 में विकसित किया गया था। यह किस्म भी लगभग 113 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी औसत उत्पादन क्षमता अच्छी मानी जाती है और अनुकूल परिस्थितियों में इससे करीब 22.94 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है। फुले विक्रम किस्म मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ भागों में खेती के लिए उपयुक्त है। किसान इस किस्म की बुवाई करते समय अपने क्षेत्र की कृषि-जलवायु परिस्थितियों का ध्यान रखें। अच्छी पैदावार के लिए खेत की उचित तैयारी, गुणवत्तापूर्ण बीज, समय पर बुवाई और फसल की नियमित निगरानी करना आवश्यक है।

जेजी 24 (JG 2016-24) चने की किस्म से मिलेगी अच्छी पैदावार

चने की जेजी 24 (JG 2016-24) किस्म को वर्ष 2020 में विकसित किया गया था। यह किस्म लगभग 115 दिनों में पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इससे किसानों को करीब 22.37 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त हो सकता है। जेजी 24 किस्म की खेती मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में की जा सकती है। चने की इस किस्म का चयन करने वाले किसानों को बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा फसल को खरपतवार, कीट और बीमारियों से बचाने के लिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार आवश्यक प्रबंधन करना चाहिए। इससे उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।

आरवीजी 204 (आरवीएसएसजी 8102) चने की किस्म

आरवीजी 204 (RVSSG 8102) चने की एक उन्नत किस्म है, जिसे वर्ष 2021 में विकसित किया गया था। यह किस्म लगभग 111 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता करीब 22.32 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है। कम समय में पकने वाली इस किस्म को मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के कुछ भागों में खेती के लिए उपयुक्त माना गया है। किसान रबी सीजन में इस किस्म की बुवाई करके अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, उत्पादन मिट्टी की गुणवत्ता, मौसम, सिंचाई और फसल प्रबंधन पर निर्भर करता है। इसलिए किसानों को बुवाई से पहले अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विशेषज्ञ से किस्म की उपयुक्तता की जानकारी अवश्य लेनी चाहिए।

धीरा (एनबीईजी 47) चने की जल्दी पकने वाली किस्म

चने की धीरा (NBeG 47) किस्म को वर्ष 2017 में विकसित किया गया था। यह जल्दी पककर तैयार होने वाली किस्म है, जो लगभग 90 से 105 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इस किस्म से किसानों को करीब 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त हो सकता है। धीरा किस्म को विशेष रूप से आंध्रप्रदेश की कृषि जलवायु परिस्थितियों के लिए उपयुक्त पाया गया है। कम अवधि में तैयार होने के कारण यह किस्म उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकती है, जहां फसल को सीमित समय में पकाना आवश्यक होता है। किसान इसकी खेती करते समय बुवाई की सही अवधि, बीज की गुणवत्ता और मिट्टी में उपलब्ध नमी का विशेष ध्यान रखें। इससे फसल की अच्छी बढ़वार और उत्पादन में मदद मिल सकती है।

चने की बुवाई का सही तरीका और बीज उपचार की जानकारी

चने की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना जरूरी है। सबसे पहले बीजों को उपयुक्त फफूंदीनाशी से उपचारित करना चाहिए। इसके बाद राइजोबियम कल्चर से बीजों का उपचार किया जा सकता है। बारानी खेती में लगभग 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और सिंचित क्षेत्र में करीब 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा पर्याप्त मानी जाती है। बारानी क्षेत्रों में बीजों की बुवाई 7 से 10 सेंटीमीटर गहराई पर तथा सिंचित क्षेत्रों में 5 से 7 सेंटीमीटर गहराई पर करनी चाहिए। बुवाई के समय पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से 50 सेंटीमीटर रखना उपयुक्त रहता है। किसानों को स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग की सलाह के अनुसार बीज उपचार और बुवाई की तकनीक अपनानी चाहिए। इससे फसल को शुरुआती अवस्था में बेहतर विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां मिलती हैं।

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