लोहड़ी का त्यौहार क्यों, कब और कैसे मनाया जाता ? इसका किसानों से क्या संबंध है?

Published on: 11-Jan-2024

लोहड़ी के त्यौहार का प्रमुख आकर्षण रात में जलाई जाने वाली आग है, जिसको लोहड़ी कहा जाता है। लोहड़ी में जलने वाली आग अग्निदेव का प्रतिनिधित्व करती है। बतादें, कि इस दिन रात के दौरान एक जगह पर आग जलाई जाती है। समस्त लोग इस अग्नि के चारों तरफ एकत्रित हो जाते हैं।

उत्तर भारत में लोहड़ी को एक खुशी के त्यौहार के तोर पर मनाया जाता है। यह त्यौहार मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व मनाया जाता है। यह त्यौहार विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में हिंदू और सिख समुदायों द्वारा मनाया जाता है। लोहड़ी का त्यौहार किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस समय खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं। लोहड़ी का त्यौहार मनाने के लिए रात के समय लकड़ी का घेरा बनाकर आग जलाई जाती है, जिसे लोहड़ी कहा जाता है। यह अग्नि पवित्रता और शुभता का प्रतीक है। इस अग्नि में मूंगफली, रेवड़ी, गजक, तिल और गुड़ आदि चढ़ाए जाते हैं। 

लोहड़ी के त्यौहार की मान्यता के बारें में जानकारी ?

लोहड़ी शब्द 'तिलोहारी' यानी 'तिल' यानी तिल और 'रोराही' यानी गुड़ से बना है। इसीलिए इसे लोहड़ी कहा जाता है। यह त्यौहार प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। इस दिन अग्नि देवता को गुड़, गजक, तिल जैसी खाद्य सामग्री अर्पित की जाती हैं। लोहड़ी मुख्य रूप से उत्तरी भारत में कृषक समुदाय द्वारा मनाई जाती है, जिसमें वे अपनी कटी हुई फसलें अग्नि देवता को अर्पित करते हैं। लोहड़ी फसल के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है। यह दिन नव वर्ष की शुरुआत का भी प्रतीक है। इसके अतिरिक्त लोहड़ी सर्दी के मौसम के अंत का प्रतीक है और उस दिन सर्दी अपने चरम पर होती है और उसके बाद सर्दी धीरे-धीरे कम होने लगती है। इस प्रकार, लोहड़ी की रात पारंपरिक रूप से वर्ष की सबसे लंबी रात मानी जाती है, जिसे शीतकालीन संक्रांति के रूप में जाना जाता है।

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लोहड़ी के त्यौहार पर आग जलाने की परंपरा

लोहड़ी के त्यौहार का विशेष आकर्षण रात में जलाई जाने वाली आग है, जिसको लोहड़ी कहा जाता है। लोहड़ी में जलने वाली अग्नि अग्निदेव का प्रतिनिधित्व करती है। इस दिन रात के दौरान एक जगह पर आग जलाई जाती है। समस्त लोग इस अग्नि के चारों तरफ एकत्रित हो जाते हैं। सभी लोग एक साथ मिलकर अग्निदेव को तिल, गुड़ इत्यादि से निर्मित मिठाइयाँ अर्पित करते हैं। लोककथाओं के मुताबिक, लोहड़ी पर जलाए गए अलाव की लपटें फसलों के विकास में सहयोग करने के लिए लोगों के संदेश और सूर्य भगवान से प्रार्थना करती हैं। इसके बदले में सूर्य देव भूमि को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। लोहड़ी के अगले दिन को मकर संक्रांति के तौर पर मनाया जाता है।

लोहड़ी के त्यौहार से दुल्ला भट्टी का क्या संबंध है ?

लोहड़ी के दिन लोग आग जलाकर उसके चारों तरफ नृत्य करते हैं। साथ ही, घर के बड़े-बुज़ुर्ग एक घेरा बनाकर सभी को दुल्ला भट्टी की कहानी सुनाते हैं। ऐसा कहा जाता है, कि मुगल काल में अकबर के समय में दुल्ला भट्टी नाम का एक व्यक्ति पंजाब में रहता था। उस समय कुछ अमीर व्यापारी सामान के बदले शहर की लड़कियों को बेच देते थे, तब दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों को बचाया और उनकी शादी करवाई। तभी से हर साल लोहड़ी के त्योहार पर उनकी याद में दुल्ला भट्टी की कहानी सुनाने की परंपरा चली आ रही है। 

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