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गाज़र की खेती: लाखों कमा रहे किसान

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गाजर एक जड़ वाली फसल है इसके लिए अगस्त से ही खेतों की तैयारी शुरू हो जाती है, गाजर सेहत से भरपूर तो होती ही है ये किसान के लिए अच्छी आमदनी वाली फसल भी है. इसका जूस हमारे शरीर को कई विटामिन्स देते है. कहते तो ये हैं की अगर इसका जूस बच्चों को पिलाने से उनकी आँखों की रोशनी बढ़ती है और उनका चश्मा हट जाता है. गाजर को हम कई तरह से प्रयोग में लाते हैं जैसे: गाजर का अचार, सलाद , सब्जी और जूस, हलवा इत्यादि… हलवा तो सर्दियों की मशहूर मिठाई होती है जो की घरों में भी बनाई जाती है. गाजर का मुरब्बा भी प्रयोग में लाया जाता है.

जमीन का चुनाव:

गाजर की खेती

गाजर या जड़ वाली किसी भी फसल के लिए हलकी और भुरभुरी मिटटी की आवश्यकता होती है इसके लिए खेत को अच्छे से जुताई करके जब तक की उस खेत से पैदल निकलना मुश्किल न हो जाये तब तक जुताई की जनि चाहिए और उसमे गोबर का खाद डाल के मिक्स कर देना चाहिए फिर उसमे झोरा ( एक प्रकार की मेंड़) बना के उसके ऊपर इसकी बुवाई करनी चाहिए. वैसे तो सामान्य खेत में भी इसकी खेती होती है लेकिन झोरा बनाने से इसके फसल को बढ़ने के लिए मुफीद माहौल मिलता है तथा पानी की मात्रा भी हलकी रखी जाती है इससे गाजर की लम्बाई और मोटाई में मिटटी बाधक नहीं होती क्यों की झोरा की मिटटी पर ऊपर पानी नहीं चढ़ता तो वो मिटटी हल्की गीली रहती है तथा गाजर को नमी मिलती रहती है. जब किसान फसल की खुदाई करता है तो उसको साबुत और लम्बी गाजर मिल जाती है जबकि सामान्य खेत में फसल करने से खुदाई करते समय उसके टूटने के डर रहता है.

लगाने का समय:

इसको लगाने का समय अगस्त में शुरू हो जाता है तथा इसको अक्टूबर, नवम्बर तक लगाया जाता है. ये सर्दियों की सब्जी है तो इसको लगाने का समय भी वही है. सामान्य गाजर को स्टोर नहीं किया जाता है तथा गाजर की जिस किस्म को स्टोर किया जाता है उसको पावर कर्रेंट बोला जाता है इसकी जानकारी भी आपको नीचे मिलेगी.

गाजर की किस्में:

गाजर को सामान्यतः दो किस्मों में बांटा जाता है यूरोपियन एवं एशियन. जैसा की नाम से ही पता चल रहा है यूरोपियन ज्यादा तापमान नहीं सह पाती है जबकि एशियन थोड़ा तापमान ज्यादा हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता.

एशियन किस्में- पूसा मेघाली, गाजर नं- 29, पूसा केशर, हिसार गेरिक, हिसार रसीली, हिसार मधुर, चयन नं- 223, पूसा रुधिर, पूसा आंसिता और पूसा जमदग्नि आदि प्रमुख किस्में है. एशियन किस्में, तापमान भी सहन कर जाती हैं तभी इनकी बुबाई अगस्त में शुरू कर दी जाती है तथा अक्टूबर तक की जाती है. ये लाल रंग की चमकदार और लम्बी गाजर होती है.

यूरोपियन किस्में: इसकी जड़े सिलैंडरीकल, मध्यम लम्बी, पुंछनुमा सिरेवाली और गहरे संतरी रंग की होती है| इनकी औसत उपज 250 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है. इन किस्मों को ठण्डे तापमान की आवश्यकता होती है. यह किस्में गर्मी सहन नहीं कर पाती है| इसकी प्रमुख किस्में- नैन्टीज, पूसा यमदागिनी, चैन्टने आदि है.

किस्मों की खासियत और उपज:

नैनटिस-

इस किस्म का उपरी भाग छोटा तथा हरी पत्तियों वाला होता है| इस किस्म कि जड़ें बेलनाकार और नारंगी रंग की
होती है| जिनका अगला सिरा छोटा पतला होता है| यह एक अच्छी गंध वाली, दानेदार मुलायल एवं मीठी किस्म है| यह खाने में अत्यंत स्वादिष्ट लगती है.

पूसा मेघाली-

इसकी जड़े गोलाकार, लम्बी, नारंगी रंग के गूदे और कैरोटीन की अधिक मात्रा वाली होती है| इसकी अगेती बुवाई अगस्त से सितम्बर में की जाती है, इसकी बुवाई अक्टूबर तक कर सकते है.

गाजर नं 29- यह शीघ्र तैयार होने वाली किस्म है| इसकी जड़े लम्बी बढ़ने वाली और हल्की लाल रंग की होती है| इसकी औसत पैदावार 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

चैंटनी-

इस किस्म कि गाजरें मोटी तथा गहरे लाल नारंगी रंग कि होती है| यह किस्म बोने के 75 से 90 दिनों बाद तैयार हो जाती है| इस किस्म का बीज मैदानी क्षेत्रों में तैयार किया जा सकता है| यह प्रति हेक्टेयर 150 क्विंटल तक पैदावार देती है|

पूसा केशर- यह एक अकेली देशी किस्म है| इस किस्म के पत्तों का समूह छोटा होता है.

हिसार गेरिक- इसकी जड़े लम्बी व संतरी रंग की है और इसकी पैदावार भी अच्छी होती है.

हिसार रसीली (संशोधित)- इस किस्म की गाजर 30 से 35 सेंटीमीटर लम्बी, पतली व आकर्षक लाल रंग, मध्य भाग का रंग हल्का लाल आकर्षक रंग के कारण ग्राहक की रुचि तथा उच्च उत्पादन के कारण कृषकों की पहली पसन्द होती है क्योकि चमकदार होने की वजह से इसके रेट भी अच्छे मिल जाते हैं.

हिसार मधुर (संशोधित)- यह गाजर की नवीन किस्म है| औसतन गाजर की लम्बाई 25 से 30 सेंटीमीटर तथा गहरा लाल रंग या हल्की श्यामल झलक कैरोटीन की मात्रा 90 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम होती है| शाखाएँ नही निकलती है, गाजर का व्यास 2.5 से 3.0 सेंटीमीटर होता है|

चयन नं 223- यह एशियाई किस्म है किन्तु यह यूरोपियन किस्म नेन्टस के समान गुणों का प्रदर्शन करती है| यह फसल बोने के 90 दिन बाद तैयार हो जाती है तथा खेत में 90 दिनों तक अच्छी दशा में रहती है| इसकी जड़ें नारंगी रंग कि 15 से 18 सेंटीमीटर लम्बी और मीठी होती है| इसे देर से भी बोया जा सकता है| यह प्रति हेक्टेयर 200 से 300 क्विंटल तक पैदावार दे देती है.

पूसा जमदग्नि- इस किस्म की जड़ें देश के अलग-अलग भागों में 85 से 130 दिनों में तैयार हो जाती है| हरी पत्तियों वाला उपरी वाला भाग मंझौला होता है. इसका मध्य भाग तथा गुदा केसरिया रंग का होता है. इसका तना सुगन्धित होता है तथा खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है.

पूसा रुधिर- यह लम्बी और लाल रंग की होती है. इसका फल थोड़ा पतला और लम्बा होता है.

पूसा आंसिता- यह लम्बी और काला रंग लिए होती है.

पूसा नयनज्योति- यह गाजर सामान्य गाजर होती है इसको ज्यादा देखभाल की भी जरूरत नहीं होती और इसकी पैदावार भी अच्छी होती है…

सामान्यतः सभी किस्मों का समय 100 से 120 के बीच होता है. और इसकी खेती के लिए कम सिंचाई की जरूरत होती है तथा पानी की निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए. इसकी खेती सामान्य खेत की तरह भी की जा सकती है तथा इसकी खेती झोरा बनके भी की जा सकती है. गाजर का कोई विशेष रोग नहीं होता लेकिन जो भी कीट लगता है उसका उपचार भी किसान भाई प्राकृतिक तरीके से कर लेते हैं. इसमें किसान भाई गोबर का खाद इसके खेत को तैयार करते समय ही मिला लेते है जो की जुताई के साथ ही खेत में मिल जाता है, तो इसमें विशेष रासायनिक खाद भी देने की जरूरत नहीं पड़ती है.

किसान भाई इसकी कोई भी जानकारी चाहते हैं तो हमें नीचे कमेंट बॉक्स में सवाल पूछ सकते हैं. उनको सारी जानकारी दी जाएगी.

 

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